By पं. अभिषेक शर्मा
महाशिवरात्रि से पूर्व शिव कृपा, भौम व शनि प्रदोष के उपाय

सनातन वैदिक पंचांग के अनुसार प्रत्येक चांद्र मास के दोनों पक्षों-शुक्ल पक्ष एवं कृष्ण पक्ष-की त्रयोदशी तिथि को देवाधिदेव महादेव भगवान शिव और माता पार्वती की असीम अनुकंपा प्राप्त करने के लिए परम पावन प्रदोष व्रत का अनुष्ठान किया जाता है। परंतु फाल्गुन मास में पड़ने वाले प्रदोष व्रतों का आध्यात्मिक, ज्योतिषीय और तांत्रिक महत्व वर्ष के अन्य समस्त महीनों के प्रदोष व्रतों से सहस्र गुना अधिक माना गया है। इसका मूल कारण यह है कि फाल्गुन मास संपूर्ण चांद्र संवत्सर का अंतिम मास होता है और इस मास के कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि वर्ष के सबसे बड़े शैव महापर्व 'महाशिवरात्रि' (फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी) से ठीक एक दिन पूर्व पड़ती है।
वैदिक पंचांग के अनुसार त्रयोदशी तिथि का वह पावन कालखंड जो सूर्यास्त से ठीक 45 मिनट पूर्व प्रारंभ होकर सूर्यास्त के 45 मिनट पश्चात तक रहता है, उसे 'प्रदोष काल' कहा जाता है। यह लगभग 1 घंटा 30 मिनट (दो घटी) का समय होता है। स्कंद पुराण के ब्रह्मोत्तर खंड में स्पष्ट उल्लेख आता है कि प्रदोष काल के समय देवाधिदेव महादेव अपने समस्त गणों, नंदी, वीरभद्र, कार्तिकेय और भगवती पार्वती के साथ कैलाश पर्वत के रजत शिखर पर आनंद तांडव नृत्य करते हैं। उस समय समस्त देवी देवता, ब्रह्मा, विष्णु, इंद्र और गंधर्व भगवान शिव की स्तुति करते हुए उनके चरणों में नतमस्तक होते हैं। अतः इस संधिकाल में किया गया पूजन मनुष्य के करोड़ों जन्मों के संचित पापों को उसी क्षण भस्म कर देता है।
| पंचांग घटक | शास्त्रीय विवरण |
|---|---|
| मास एवं पक्ष | फाल्गुन मास, कृष्ण पक्ष एवं शुक्ल पक्ष |
| पावन तिथि | त्रयोदशी तिथि (प्रदोष व्यापिनी) |
| मुख्य पूजन मुहूर्त | सूर्यास्त से 45 मिनट पूर्व एवं 45 मिनट पश्चात (प्रदोष काल) |
| अधिष्ठाता युगल | भगवान उमा-महेश्वर (सदाशिव व आदिशक्ति पार्वती) |
| विशेष वार संयोग | मंगलवार को पड़ने पर 'भौम प्रदोष', शनिवार को पड़ने पर 'शनि प्रदोष' |
| प्रमुख नैवेद्य द्रव्य | गाय का कच्चा दूध, बेलपत्र, भांग, धतूरा, श्वेत चंदन, अबीर |
| मुख्य आध्यात्मिक फल | ऋण मुक्ति, शनि संताप निवारण, संतान सुख और मोक्ष |
फाल्गुन मास के इस परम पावन प्रदोष व्रत का संपूर्ण फल प्राप्त करने और भगवान शिव की अविचल कृपा पाने के लिए साधक को प्रातः काल से ही विशिष्ट शास्त्रीय नियमों का निष्ठापूर्वक पालन करना चाहिए।
प्रदोष व्रत जब किसी विशिष्ट वार के संयोग से जुड़ता है, तो उसका प्रभाव असाधारण रूप से बढ़ जाता है। फाल्गुन मास में विशेष रूप से दो प्रदोष व्रतों-भौम प्रदोष (मंगलवार) और शनि प्रदोष (शनिवार)-का अत्यंत दुर्लभ और चमत्कारी महत्व शास्त्रों में प्रतिपादित किया गया है।
जब त्रयोदशी तिथि मंगलवार के दिन पड़ती है, तो उसे शास्त्रोक्त परंपरा में 'भौम प्रदोष' कहा जाता है। मंगल ग्रह को भूमिपुत्र, रक्त का कारक, पराक्रम का स्वामी और ऋण का अधिष्ठाता माना गया है। यदि किसी जातक की जन्म कुंडली में मंगल नीच राशि कर्क में स्थित हो, मांगलिक दोष बना रहा हो, अथवा जातक लंबे समय से भारी कर्जों के जाल में फंसा हुआ हो, तो फाल्गुन मास का भौम प्रदोष उसके लिए साक्षात संजीवनी का कार्य करता है।
पौराणिक कथा के अनुसार मंगल देव ने स्वयं भगवान शिव की कठोर तपस्या करके उनसे नवग्रहों में सेनापति का पद और शुभत्व का वरदान प्राप्त किया था। भौम प्रदोष के दिन शिवलिंग पर लाल चंदन, कनेर के पुष्प और शहद से अभिषेक करने के पश्चात 'ऋणमोचक मंगल स्तोत्र' का पाठ करने से बड़े से बड़ा आर्थिक कर्ज भी चमत्कारिक रूप से समाप्त हो जाता है और जातक को भूमि व भवन का अकूत सुख प्राप्त होता है।
जब त्रयोदशी तिथि शनिवार के दिन उपस्थित होती है, तो उसे 'शनि प्रदोष' की महा संज्ञा दी जाती है। शनि देव भगवान शिव के परम शिष्य और सेवक हैं। शनि देव ने अपने पिता सूर्य के तेज के निवारण और दंडाधिकारी का पद प्राप्त करने के लिए भगवान आशुतोष की ही शरण ली थी। फाल्गुन मास का शनि प्रदोष वर्ष के अंतिम कर्म शोधन का दिन होता है।
जो जातक शनि की साढ़ेसाती, ढैय्या अथवा महादशा के भीषण संताप से पीड़ित हों, अथवा जिन्हें विवाह के वर्षों पश्चात भी संतान सुख प्राप्त न हो रहा हो, उनके लिए शनि प्रदोष का व्रत कल्पवृक्ष के समान फलदायी होता है। इस दिन प्रदोष काल में शिवलिंग पर काले तिल, कच्चा दूध और अपराजिता के नीले पुष्प अर्पित करने से शनि की समस्त क्रूरता उसी क्षण शांत हो जाती है।
| प्रदोष प्रकार | वार संयोग | मुख्य ग्रह शांति | विशिष्ट शास्त्रीय उपाय | अभीष्ट आध्यात्मिक फल |
|---|---|---|---|---|
| सोम प्रदोष | सोमवार | चंद्र देव (जल तत्त्व) | शिवलिंग पर कच्चा दूध व मिश्री अर्पित करें | मानसिक शांति व सर्व मनोकामना पूर्ति |
| भौम प्रदोष | मंगलवार | मंगल देव (अग्नि तत्त्व) | लाल मसूर, शहद व ऋणमोचक स्तोत्र पाठ | पुराने कर्जों से मुक्ति व पराक्रम वृद्धि |
| बुध प्रदोष | बुधवार | बुध देव (पृथ्वी तत्त्व) | 108 दूर्वा दल व मूंग दाल का दान | कुशाग्र बुद्धि, व्यापार में लाभ व विद्या |
| गुरु प्रदोष | गुरुवार | बृहस्पति देव (आकाश तत्त्व) | पीले कनेर के फूल व बेसन के लड्डू भोग | ज्ञान, दांपत्य सुख व शत्रु विजय |
| भृगु प्रदोष | शुक्रवार | शुक्र देव (जल तत्त्व) | इत्र, मखाने की खीर व सुगंधित सफेद अबीर | भौतिक वैभव, सौंदर्य व आकर्षण वृद्धि |
| शनि प्रदोष | शनिवार | शनि देव (वायु तत्त्व) | काले तिल, सरसों तेल व शमी पत्र अर्पण | साढ़ेसाती मुक्ति, दीर्घायु व संतान सुख |
| रवि प्रदोष | रविवार | सूर्य देव (तेज तत्त्व) | तांबे के लोटे से जल, गुड़ व लाल चंदन | आरोग्यता, राजकीय सम्मान व पिता सुख |
फाल्गुन मास के कृष्ण पक्ष का प्रदोष व्रत केवल एक सामान्य व्रत नहीं है, अपितु यह सनातन जगत की सबसे बड़ी रात्रि 'महाशिवरात्रि' का प्रवेश द्वार और आध्यात्मिक आधारशिला है। महाशिवरात्रि फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी को मनाई जाती है। अतः उससे ठीक एक दिन पूर्व त्रयोदशी तिथि का यह प्रदोष व्रत साधक के शरीर, मन और प्राण को उस महामिलन के लिए पूरी तरह शुद्ध और तैयार कर देता है।
शास्त्रों में विधान है कि जो साधक महाशिवरात्रि का निर्जल अथवा कठोर व्रत रखना चाहते हैं, उन्हें फाल्गुन कृष्ण प्रदोष से ही अपने संकल्प की शुरुआत करनी चाहिए। इस पावन संध्या पर भगवान शिव अपने नटराज स्वरूप में अत्यंत प्रसन्न मुद्रा में होते हैं। मान्यता है कि इसी पावन त्रयोदशी की संध्या को भगवान शिव ने माता पार्वती के साथ विवाह का औपचारिक प्रस्ताव स्वीकार किया था और संपूर्ण देवलोक में उत्सव प्रारंभ हुआ था।
इस दिन किया गया शिव अभिषेक जातक के अंतःकरण के समस्त कफ, पित्त और वात दोषों को शांत कर देता है। जब साधक फाल्गुन कृष्ण प्रदोष के दिन शिवलिंग पर पलाश के फूलों का अर्क और अबीर अर्पित करता है, तो उसके भीतर की समस्त नकारात्मक ऊर्जाएं भस्म हो जाती हैं और वह अगले दिन महाशिवरात्रि पर भगवान शिव और शक्ति के परम मिलन की ऊर्जा को धारण करने में पूर्णतः समर्थ हो जाता है।
सनातन तंत्र और शिव पुराण के विद्येश्वर संहिता में शिवलिंग पर विभिन्न औषधीय एवं प्राकृतिक द्रव्यों से किए जाने वाले अभिषेक का अत्यंत सूक्ष्म और वैज्ञानिक विवरण मिलता है। शिवलिंग केवल एक पाषाण विग्रह नहीं है, अपितु यह ब्रह्मांडीय ऊर्जा का एक विशाल जनरेटर और संवाहक (कंडक्टर) है। जब हम विशिष्ट द्रव्यों की अखंड धारा उस पर प्रवाहित करते हैं, तो उत्पन्न होने वाली ऊर्जा तरंगे साधक के संपूर्ण आभामंडल को पुनर्जीवित कर देती हैं।
| अभिषेक द्रव्य | शास्त्रीय मंत्र | संबंधित शारीरिक व मानसिक चक्र | प्राप्त होने वाला मुख्य लाभ |
|---|---|---|---|
| शुद्ध गंगाजल | ॐ तत्पुरुषाय विद्महे महादेवाय धीमहि तन्नो रुद्रः प्रचोदयात् | सहस्रार चक्र (मस्तिष्क केंद्र) | मोक्ष मार्ग प्रशस्त, पाप क्षय |
| गोदुग्ध (कच्चा दूध) | ॐ हौं जूं सः ॐ भूर्भुवः स्वः ॐ त्र्यम्बकं यजामहे | आज्ञा चक्र (भ्रूमध्य) | मानसिक अवसाद मुक्ति, लंबी आयु |
| शुद्ध मधु (शहद) | ॐ नमः शम्भवाय च मयोभवाय च नमः शंकराय च | विशुद्ध चक्र (कंठ प्रदेश) | वाणी दोष निवारण, धन व संपदा |
| शुद्ध गोघृत (घी) | ॐ ईशानः सर्वविद्यानामीश्वरः सर्वभूतानाम् | स्वाधिष्ठान चक्र (नाभि के नीचे) | संतान प्राप्ति, ओज व पौरुष वृद्धि |
| पलाश पुष्प रस | ॐ अघोरेभ्योऽथ घोरेभ्यो घोरघोरतरेभ्यः | अनाहत चक्र (हृदय प्रदेश) | चर्म रोग नाश, शीतलता व सौंदर्य |
फाल्गुन मास के प्रदोष व्रत में सायंकाल के समय प्रदोष वेला में की जाने वाली पूजा का एक अत्यंत विस्तृत और शास्त्रीय क्रम है। साधक को सूर्यास्त से 15 मिनट पूर्व ही समस्त पूजन सामग्री एकत्र करके पवित्र आसन पर बैठ जाना चाहिए।
फाल्गुन मास का प्रदोष व्रत हमें सनातन संस्कृति के उस सर्वोच्च अद्वैत दर्शन का साक्षात्कार कराता है जो संहार में भी सृजन और वैराग्य में भी परम आनंद को देखता है। भगवान शिव श्मशान में निवास करते हैं, भस्म रमाते हैं और विष का पान करते हैं; परंतु वे ही संपूर्ण ब्रह्मांड के 'शिव' अर्थात परम कल्याणकारी हैं।
फाल्गुन मास संवत्सर का अंतिम काल होता है, जो यह स्मरण कराता है कि यह नश्वर शरीर और सांसारिक वैभव एक दिन विलीन हो जाने वाले हैं। प्रदोष काल का संधिकाल दिन और रात का मिलन बिंदु है, जो जीव और ब्रह्म के एकत्व का प्रतीक है। जब मनुष्य संसार की समस्त चिंताओं, वासनाओं और अहंकार को त्यागकर प्रदोष काल की पावन वेला में शिवत्व की शरण में चला जाता है, तो उसके भीतर का 'शव' साक्षात 'शिव' में रूपांतरित हो जाता है।
यह व्रत मनुष्य को सिखाता है कि जीवन के वास्तविक विष-अपमान, दुख, रोग और संघर्ष-को अपने कंठ में धारण करके भी संसार को केवल प्रेम, शीतलता और कल्याण का अमृत ही प्रदान करना चाहिए। जो साधक फाल्गुन मास के प्रदोष व्रत को श्रद्धापूर्वक संपन्न करता है, वह इस नश्वर जगत के समस्त भौतिक सुखों को भोगकर अंत में भगवान शिव के परम धाम कैवल्य मोक्ष को प्राप्त करता है।
फाल्गुन मास का प्रदोष व्रत किस समय करना चाहिए?
यह व्रत त्रयोदशी तिथि को सूर्यास्त से 45 मिनट पूर्व और सूर्यास्त के 45 मिनट पश्चात के प्रदोष काल में विधि विधान से संपन्न करना चाहिए।
भौम प्रदोष किसे कहते हैं और इसका क्या विशेष फल है?
जब त्रयोदशी तिथि मंगलवार को पड़ती है तो उसे भौम प्रदोष कहते हैं, इसके पूजन से पुराने से पुराने कर्जों से मुक्ति मिलती है और मंगल दोष शांत होता है।
शनि प्रदोष व्रत रखने से किन कष्टों से राहत मिलती है?
शनिवार को पड़ने वाले शनि प्रदोष का व्रत रखने से शनि की साढ़ेसाती, ढैय्या, अकाल मृत्यु का भय और संतान हीनता के कष्ट पूरी तरह शांत हो जाते हैं।
महाशिवरात्रि से पूर्व पड़ने वाले प्रदोष व्रत का क्या महत्व है?
फाल्गुन कृष्ण प्रदोष महाशिवरात्रि से ठीक एक दिन पहले पड़ता है, जो साधक के शरीर और मन को महाशिवरात्रि की ऊर्जा धारण करने के लिए पूर्णतः शुद्ध करता है।
प्रदोष काल में शिवलिंग पर पलाश के फूलों का जल चढ़ाने से क्या लाभ होता है?
फाल्गुन में पलाश के फूलों के जल से अभिषेक करने पर त्वचा के समस्त रोग शांत होते हैं, मानसिक शीतलता मिलती है और शारीरिक कांति में वृद्धि होती है।
पाएं अपनी सटीक कुंडली
कुंडली बनाएं
अनुभव: 20
इनसे पूछें: Family Planning, Career
इनके क्लाइंट: Punjab, Haryana, Delhi
इस लेख को परिवार और मित्रों के साथ साझा करें
WELCOME TO
Right Decisions at the right time with ZODIAQ