फाल्गुन मास में वास्तु सुधार कैसे करें?

By पं. अमिताभ शर्मा

वसंत की ऊर्जा से घर के वास्तु दोषों का निवारण और नई शुरुआत

फाल्गुन वास्तु उपाय: कबाड़ मुक्ति, ईशान कोण शुद्धि और तोरण

पंचांग विवरण और उत्तरायण सूर्य का ऊर्जा प्रवाह

सनातन वैदिक पंचांग के अनुसार फाल्गुन मास संपूर्ण चांद्र संवत्सर का द्वादश एवं अंतिम मास होता है। इस कालखंड में भुवन भास्कर सूर्य देव मकर राशि की यात्रा पूर्ण करके कुंभ से होते हुए मीन राशि की ओर अग्रसर होते हैं। सूर्य के उत्तरायण पथ का प्रभाव इस अवधि में अत्यंत प्रत्यक्ष और प्रखर हो जाता है। उत्तरायण की इस बढ़ती हुई ऊर्जा के कारण पृथ्वी के उत्तरी गोलार्ध में दिन की अवधि लंबी होने लगती है और सौर विकिरण का कोण बदल जाता है। वैदिक वास्तु शास्त्र के अनुसार सूर्य की रश्मियों में होने वाला यह खगोलीय परिवर्तन प्रत्येक आवासीय भवन, व्यावसायिक प्रतिष्ठान और भूखंड के ऊर्जा आभामंडल को गहराई से प्रभावित करता है।

वास्तु शास्त्र में दिशाओं को केवल भौतिक सीमाएं नहीं, अपितु अष्ट दिक्पालों और विशिष्ट पंच महाभूतों के अधिष्ठान के रूप में स्वीकार किया गया है। फाल्गुन मास में जब शीत ऋतु की जड़ता समाप्त होकर वसंत की नवसृजन ऊर्जा प्रवाहित होती है तब भवनों के भीतर जमी हुई पुरानी, बासी और नकारात्मक ऊर्जा को निष्कासित करने का यह वर्ष का सर्वोत्तम प्राकृतिक समय होता है। शास्त्रों में उल्लेख मिलता है कि जो व्यक्ति संवत्सर के समापन से पूर्व अपने गृह की वास्तु शुद्धि नहीं करता, उसके घर में वर्षभर 'अलक्ष्मी' और 'ज्येष्ठा' का वास बना रहता है।

पंचांग व वास्तु घटक शास्त्रीय विवरण
मास एवं ऋतु संधिकाल फाल्गुन मास, शिशिर का अवसान एवं वसंत का चरमोत्कर्ष
खगोलीय सौर स्थिति सूर्य देव का उत्तरायण संचरण, प्रखर सौर विकिरण कोण
प्रधान वास्तु दिशा उत्तर पूर्व (ईशान कोण) एवं पूर्व दिशा
अधिष्ठाता वास्तु शक्तियां वास्तु पुरुष, ईशान शिव, इंद्र देव और भगवान सूर्यनारायण
प्रधान पंचमहाभूत तत्त्व जल तत्त्व एवं अग्नि तत्त्व का पावन संतुलन
प्रमुख शोधक द्रव्य सेंधा नमक, गोमूत्र, गंगाजल, हल्दी, रोली और आम्र पल्लव
मुख्य आध्यात्मिक फल गृह क्लेश निवारण, अलक्ष्मी निष्कासन, धन प्रवाह और आरोग्य

फाल्गुन मास में गृह की नकारात्मक ऊर्जा को समाप्त करके नवीन सकारात्मक प्राण ऊर्जा को आकर्षित करने के लिए साधक को ब्रह्म मुहूर्त से ही विशिष्ट शास्त्रीय वास्तु नियमों का पालन करना चाहिए।

  • प्रातः काल सूर्योदय से पूर्व उठकर संपूर्ण भवन के खिड़की और दरवाजों को खोल देना ताकि ताजी प्राण वायु भीतर प्रवेश कर सके।
  • घर के मुख्य द्वार से लेकर पिछले कोने तक की सघन सफाई करना और धूल, मकड़ी के जाले तथा कचरे को बाहर निकालना।
  • भवन के फर्श पर पोछा लगाते समय जल में समुद्री सेंधा नमक, थोड़ा सा गोमूत्र और नीम का अर्क मिलाना।
  • घर के पूजा स्थल को गंगाजल से धोकर स्वच्छ करना और वहां शुद्ध गाय के घी का चौमुखी दीपक प्रज्वलित करना।
  • उत्तर पूर्व अर्थात ईशान कोण से भारी, अनुपयोगी और टूटी फूटी वस्तुओं को तत्काल हटाकर उस स्थान को हल्का करना।
  • बंद पड़ी दीवार घड़ियां, टूटे हुए दर्पण, चटके हुए बर्तन और फटे पुराने वस्त्रों को संकोच छोड़कर घर से निष्कासित करना।
  • मुख्य द्वार की चौखट पर गाय के घी में सिंदूर मिलाकर अथवा शुद्ध हल्दी से नया मांगलिक स्वस्तिक चिन्ह अंकित करना।
  • सायंकाल के समय गुग्गुल, लोबान, पीली सरसों और कपूर की धूनी संपूर्ण घर के प्रत्येक कक्ष में घुमाना।

अलक्ष्मी निष्कासन और कबाड़ मुक्ति का वास्तु विज्ञान

वैदिक वास्तु शास्त्र और पद्म पुराण में यह स्पष्ट विधान है कि जहां गंदगी, सीलन, अंधकार और व्यर्थ का कबाड़ संचित होता है, वहां दरिद्रता की अधिष्ठात्री देवी अलक्ष्मी का स्थायी डेरा बन जाता है। आधुनिक घरों में प्रायः देखा जाता है कि लोग वर्षों से अनुपयोगी पड़ी वस्तुओं, बंद घड़ियों, टूटे हुए इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों, पुराने जूतों और जंग लगे लोहे के सामान को छत पर अथवा सीढ़ियों के नीचे दबाकर रख देते हैं।

वास्तु के अनुसार सीढ़ियों के नीचे का स्थान राहु का क्षेत्र माना जाता है। जब वहां कबाड़ रखा जाता है, तो घर का राहु अत्यंत कुपित हो जाता है, जिससे गृहस्वामी को अनिद्रा, मानसिक तनाव, आकस्मिक धन हानि और गंभीर मुकदमों का सामना करना पड़ता है। इसी प्रकार बंद पड़ी घड़ियां काल चक्र के अवरोध का प्रतीक हैं। वे घर के सदस्यों की प्रगति, पदोन्नति और भाग्य को पूरी तरह बांध देती हैं।

संचित अनुपयोगी वस्तु वास्तु दोष का प्रकार संबंधित ग्रह दोष संभावित नकारात्मक प्रभाव
बंद पड़ी दीवार घड़ियां काल चक्र अवरोध शनि व बुध दोष करियर में ठहराव, महत्वपूर्ण अवसरों का हाथ से निकलना
टूटे दर्पण व चटके कांच दृष्टि दोष व ऊर्जा विखंडन राहु व चंद्र दोष मानसिक भ्रम, अवसाद, निरंतर घरेलू कलह
सीढ़ियों नीचे जमा कबाड़ आधार स्तम्भ संदूषण राहु व केतु दोष अचानक कर्ज वृद्धि, व्यापारिक घाटा, अनिद्रा
फटे पुराने वस्त्र व जूते शनि दरिद्रता योग शनि देव की वक्र दृष्टि निरंतर बीमारी, आर्थिक तंगी, समाज में अपयश
जंग लगा हुआ लोहा आग्नेय अवरोध शनि व मंगल टकराव रक्त विकार, दुर्घटना का भय, भाइयों में विवाद

फाल्गुन मास में होलिका दहन से पूर्व इन समस्त दूषित पदार्थों को घर से बाहर निकाल फेंकना चाहिए। जब यह कबाड़ हटता है, तो घर के आभामंडल में रिक्त स्थान (स्पेस एलिमेंट) उत्पन्न होता है, जो वसंत की नई रचनात्मक तरंगों को भीतर खींचने का कार्य करता है।

मुख्य द्वार का कायाकल्प और मंगल प्रतीक स्थापना

वास्तु शास्त्र में घर के मुख्य द्वार को 'महाद्वार' अथवा 'सिंह द्वार' कहा जाता है। यह वह पावन मुख है जिससे होकर संपूर्ण सकारात्मक ऊर्जा, धन धान्य और कुल देवता घर के भीतर प्रवेश करते हैं। यदि मुख्य द्वार ही मलिन, अंधकारमय अथवा दोषपूर्ण होगा, तो घर के भीतर कभी भी शांति और समृद्धि नहीं आ सकती।

फाल्गुन मास में उत्तरायण सूर्य की किरणों का स्वागत करने के लिए मुख्य द्वार का शास्त्रीय कायाकल्प करना अनिवार्य बताया गया है:

  • पवित्र स्वस्तिक अंकन: मुख्य द्वार के दोनों ओर शुद्ध हल्दी और कुमकुम को गाय के घी में मिलाकर नौ अंगुल लंबा और नौ अंगुल चौड़ा स्वस्तिक चिन्ह बनाएं। स्वस्तिक की चारों भुजाएं चारों पुरुषार्थों धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष का प्रतीक हैं।
  • आम्र व अशोक पल्लव तोरण: मुख्य द्वार की चौखट पर ताजे आम के पत्तों अथवा अशोक के पत्तों का बना हुआ बंदनवार लाल मौली में पिरोकर बांधें। वनस्पति विज्ञान के अनुसार आम के पत्ते कार्बन डाइऑक्साइड को सोखकर चौबीसों घंटे ऑक्सीजन उत्सर्जित करते हैं और बाहर से आने वाले रोगाणुओं को चौखट पर ही नष्ट कर देते हैं।
  • द्वार देहरी पूजन: घर की मुख्य देहरी (दहलीज) को कभी भी टूटा हुआ अथवा गंदा न रहने दें। प्रातः काल देहरी को जल से धोकर उस पर हल्दी का लेप लगाएं और दोनों कोनों पर थोड़ा सा अक्षत व ताजे पुष्प अर्पित करें।
  • जल से भरा तांबे का पात्र: मुख्य द्वार के ठीक भीतर अथवा प्रवेश करते ही दाईं ओर एक कांसे अथवा तांबे के चौड़े पात्र में शुद्ध जल भरकर उसमें कुछ ताजे सुगंधित पीले पुष्प डाल दें। यह उपाय बाहर से आने वाली किसी भी प्रकार की नकारात्मक तरंग अथवा नजर दोष को तत्काल सोख लेता है।

ईशान कोण की शुद्धि और जल तत्त्व का संवर्धन

वास्तु पुरुष के शरीर की संरचना में उत्तर पूर्व दिशा अर्थात ईशान कोण को उनका मस्तक माना गया है। यह दिशा देवाधिदेव महादेव शिव और देवगुरु बृहस्पति की साक्षात अधिष्ठान स्थली है। ईशान कोण घर के भीतर आध्यात्मिक शांति, सात्विक बुद्धि, स्मरण शक्ति, वंश वृद्धि और अखंड ऐश्वर्य का संवाहक होता है।

शीत ऋतु के दौरान प्रायः ईशान कोण में खिड़कियां बंद रखी जाती हैं जिससे वहां ऊर्जा का संचय अवरुद्ध हो जाता है। फाल्गुन मास में ईशान कोण को जाग्रत करने के लिए निम्नलिखित कदम उठाएं:

  • ईशान कोण को पूरी तरह भार मुक्त करें। यदि वहां कोई भारी अलमारी, तिजोरी अथवा लोहे का संदूक रखा हो, तो उसे तत्काल दक्षिण अथवा पश्चिम दिशा में स्थानांतरित करें।
  • इस कोण में कभी भी झाड़ू, पोंछा, कूड़ेदान अथवा जूते चप्पल न रखें। यह दोष घर के मुखिया के मस्तिष्क को अशांत कर देता है और संतान के विकास को रोक देता है।
  • ईशान कोण में शुद्ध जल का एक छोटा भूमिगत स्रोत, फव्वारा अथवा मिट्टी के घड़े में गंगाजल भरकर रखें।
  • वहां एक स्वच्छ पीतल के पात्र में कपूर और लौंग नित्य प्रातः प्रज्वलित करें।
  • ईशान कोण की दीवारों पर हल्का पीला, सफेद अथवा हल्का आसमानी रंग कराएं। किसी भी परिस्थिति में यहां गहरा लाल, काला अथवा भूरा रंग न होने दें क्योंकि ये रंग जल तत्त्व के शत्रु माने जाते हैं।
दिशा कोण वास्तु तत्त्व व स्वामी आदर्श व्यवस्था सर्वथा वर्जित निर्माण व वस्तुएं
ईशान (उत्तर-पूर्व) जल तत्त्व / भगवान शिव व गुरु पूजा स्थल, जल पात्र, खुला व हल्का शौचालय, रसोई, सीढ़ियां, भारी कबाड़
आग्नेय (दक्षिण-पूर्व) अग्नि तत्त्व / शुक्र व अग्नि देव रसोई घर, विद्युत मीटर, इनवर्टर पानी का टैंक, बोरवेल, शयनकक्ष
नैऋत्य (दक्षिण-पश्चिम) पृथ्वी तत्त्व / राहु व पितृ गण मुख्य शयनकक्ष, भारी अलमारी मुख्य द्वार, कुआं, खुला आंगन, गड्ढा
वायव्य (उत्तर-पश्चिम) वायु तत्त्व / चंद्र व पवन देव अतिथि कक्ष, अनाज भंडारण भारी निर्माण, स्वामी का शयनकक्ष

फाल्गुन मास के 5 अचूक वास्तु उपाय

यदि आपके घर में निरंतर आर्थिक तंगी, गृह क्लेश अथवा बीमारियों का वास रहता है, तो फाल्गुन मास की पूर्णिमा से पूर्व निम्नलिखित 5 अचूक वास्तु उपायों को श्रद्धापूर्वक संपन्न करें:

  • सेंधा नमक का ऊर्जा शोधन: घर के चारों कोनों में और विशेष रूप से स्नानघर में कांच की छोटी कटोरी में साबुत सेंधा नमक भरकर रख दें। यह नमक वायुमंडल में उपस्थित समस्त नकारात्मक और सीलन भरी तरंगों को सोख लेता है। प्रत्येक सप्ताह इस नमक को बहते जल में बहा दें और नया नमक भर दें।
  • हल्दी जल का गृह सिंचन: एक तांबे के लोटे में जल भरकर उसमें दो चुटकी पिसी हुई हल्दी और थोड़ा सा गंगाजल मिलाएं। आम के पत्ते से इस जल को संपूर्ण घर के प्रत्येक कक्ष, कोने और मुख्य द्वार पर ॐ नमो भगवते वासुदेवाय का जप करते हुए छिड़कें। यह उपाय घर के संपूर्ण वास्तु चक्र को पवित्र कर देता है।
  • पंच पल्लव हवन शुद्धि: फाल्गुन की किसी भी शुभ तिथि को मिट्टी के पात्र में कंडे की अग्नि जलाकर उस पर गुग्गुल, लोबान, गाय का घी, कपूर और पांच पवित्र वृक्षों (पीपल, बरगद, आम, गूलर और पाकर) की सूखी पत्तियों का चूर्ण डालकर घर के भीतर धूनी दें। यह धुआं अदृश्य वास्तु दोषों को तत्काल भस्म कर देता है।
  • तुलसी चौरी का पुनरुद्धार: शीत ऋतु के पाले से यदि घर की तुलसी सूख गई हो, तो फाल्गुन मास में उस सूखी तुलसी को आदरपूर्वक किसी पवित्र नदी में विसर्जित करें और ईशान अथवा पूर्व दिशा में एक नवीन हरा भरा तुलसी का पौधा रोपित करें। संध्या समय वहां नियमित शुद्ध घी का दीपक जलाएं।
  • दक्षिण दिशा में भारीपन संतुलन: घर की दक्षिण और पश्चिम दीवारों के साथ भारी फर्नीचर लगाएं ताकि पृथ्वी तत्त्व सुदृढ़ हो सके और उत्तर व पूर्व दिशा को पूरी तरह हल्का और स्वच्छ रखें ताकि जल और वायु तत्त्व निर्बाध रूप से संचरण कर सकें।

वसंत ऊर्जा, वास्तु पुरुष और मानव चेतना का तादात्म्य

वास्तु शास्त्र केवल ईंट, पत्थर और चूने से बने मकान का नक्शा नहीं है, अपितु यह उस जीवित ऊर्जा क्षेत्र का विज्ञान है जिसके भीतर रहकर मनुष्य अपनी साधना और सांसारिक कर्तव्यों का निर्वाह करता है। भवन को वास्तु पुरुष का जीवित शरीर माना गया है। जिस प्रकार मानव शरीर में रक्त और प्राण का संचार होता है, उसी प्रकार घर के भीतर अदृश्य ऊर्जा रेखाएं प्रवाहित होती हैं।

फाल्गुन मास का यह पावन संधिकाल हमें यह स्मरण कराता है कि बाह्य प्रकृति के वसंत को अपने घर के भीतर भी आमंत्रित किया जाए। जब हम अपने घर से कबाड़, धूल और दुर्भावनाओं को बाहर निकाल फेंकते हैं और घर को पवित्र सुगंध, रंगों और प्रकाश से सजाते हैं, तो वह घर साक्षात एक देवालय में परिवर्तित हो जाता है।

ऐसे ऊर्जावान और संतुलित भवन में निवास करने वाले व्यक्तियों का मन स्वतः शांत, एकाग्र और उत्साही बना रहता है। पारिवारिक सदस्यों के मध्य परस्पर प्रेम बढ़ता है और धन का आगमन सुगम हो जाता है। फाल्गुन का यह वास्तु शोधन मनुष्य के अंतःकरण और उसके बाह्य परिवेश दोनों को नवीन संवत्सर के स्वागत हेतु एक दिव्य आधारशिला प्रदान करता है।

FAQ

फाल्गुन मास में वास्तु शोधन करना क्यों सर्वाधिक फलदायी माना गया है?
सूर्य के उत्तरायण पथ के प्रखर होने से वसंत ऋतु में सौर ऊर्जा का कोण बदलता है, जिससे घर की पुरानी और नकारात्मक ऊर्जा को बाहर निकालना सबसे आसान होता है।

घर से कबाड़ और बंद घड़ियां निकालना वास्तु में क्यों जरूरी है?
बंद घड़ियां काल चक्र को अवरुद्ध करती हैं और कबाड़ अलक्ष्मी व राहु के दोष को बढ़ाता है, जिससे आर्थिक तंगी और मानसिक तनाव उत्पन्न होता है।

मुख्य द्वार पर आम के पत्तों का तोरण क्यों बांधा जाता है?
आम के पत्ते चौबीसों घंटे ऑक्सीजन छोड़ते हैं, वातावरण के सूक्ष्म रोगाणुओं को नष्ट करते हैं और घर के भीतर केवल सकारात्मक प्राण ऊर्जा को प्रवेश करने देते हैं।

ईशान कोण में किन वस्तुओं का होना घोर वास्तु दोष माना जाता है?
ईशान कोण में शौचालय, भारी कबाड़, सीढ़ियां, जूते चप्पल और रसोई घर का होना भयंकर वास्तु दोष माना जाता है जो बुद्धि और वंश वृद्धि को रोकता है।

घर की नकारात्मक ऊर्जा को दूर करने के लिए कौन सी धूनी सबसे उत्तम है?
गुग्गुल, लोबान, कपूर, पीली सरसों और गाय के घी की धूनी संपूर्ण घर में देने से अदृश्य नकारात्मक शक्तियां और वास्तु दोष तत्काल शांत हो जाते हैं।

पाएं अपनी सटीक कुंडली

कुंडली बनाएं

क्या आपको यह पसंद आया?

लेखक

पं. अमिताभ शर्मा

पं. अमिताभ शर्मा (63)


अनुभव: 20

इनसे पूछें: Family Planning, Career

इनके क्लाइंट: Punjab, Haryana, Delhi

इस लेख को परिवार और मित्रों के साथ साझा करें

WELCOME TO

ZODIAQ

Right Decisions at the right time with ZODIAQ