फुलेरा दूज का ज्योतिषीय रहस्य क्या है?

By पं. अभिषेक शर्मा

वर्ष का सबसे बड़ा अबूझ मुहूर्त और राधा कृष्ण की फूलों की होली

फुलेरा दूज: अबूझ मुहूर्त, महत्व, पूजा विधि और उपाय

पंचांग परिचय और अबूझ मुहूर्त का शास्त्रीय विज्ञान

फाल्गुन मास के शुक्ल पक्ष की द्वितीया तिथि को सनातन पंचांग में फुलेरा दूज के पावन नाम से जाना जाता है। यह पावन पर्व शिशिर ऋतु के विदाई काल और वसंत ऋतु के पूर्ण प्रस्फुटन का संधिकाल माना जाता है। सनातन परंपरा में फुलेरा दूज को वर्ष का सबसे बड़ा और निर्विवाद रूप से स्वयं सिद्ध अबूझ मुहूर्त स्वीकार किया गया है। अबूझ मुहूर्त का शाब्दिक और शास्त्रीय अर्थ वह विशिष्ट कालखंड है, जिसमें किसी भी मांगलिक या नए सांसारिक कार्य को प्रारंभ करने के लिए किसी ज्योतिषी से पंचांग शुद्धि करवाने अथवा ग्रह गोचर की स्थिति का विश्लेषण करने की आवश्यकता नहीं होती। इस दिन संपूर्ण प्रकृति दिव्य सकारात्मक ऊर्जा से परिपूर्ण रहती है।

पंचांग घटकशास्त्रीय विवरण
मास एवं पक्षफाल्गुन मास, शुक्ल पक्ष
पावन तिथिशुक्ल पक्ष द्वितीया तिथि
अधिष्ठाता युगलभगवान श्री राधा कृष्ण
मुहूर्त स्वरूपवर्ष का परम पावन अबूझ मुहूर्त
प्रधान साधनापुष्पों की होली, गुलाल अर्पण, माखन मिश्री भोग
विशेष नैवेद्यसुगंधित श्वेत मिष्ठान्न, पोहा, माखन और मिश्री
मुख्य आध्यात्मिक फलदांपत्य सौहार्द, प्रेम वृद्धि और दोषहीन विवाह

फुलेरा दूज के पावन अवसर पर अभीष्ट फल की प्राप्ति और वैवाहिक जीवन में शांति स्थापित करने के लिए साधक को विशिष्ट शास्त्रीय नियमों का निष्ठापूर्वक पालन करना चाहिए।

  • प्रातः काल सूर्योदय से पूर्व ब्रह्म मुहूर्त में उठकर शीतल जल में गंगाजल मिलाकर स्नान करना और श्वेत या गुलाबी वस्त्र धारण करना।
  • गृह मंदिर की वेदी को सुगंधित जल से धोकर उस पर ताजे पीले और लाल वस्त्र बिछाना।
  • भगवान श्री कृष्ण और श्री राधा रानी के युगल विग्रह को पंचामृत से स्नान कराकर नवीन वसंतकालीन वस्त्र पहनाना।
  • युगल सरकार को चमेली, गुलाब, गेंदा और पलाश के ताजे सुगंधित पुष्पों की पंखुड़ियां अर्पित करना।
  • भगवान के श्री चरणों में शुद्ध प्राकृतिक अबीर और गुलाल समर्पित करके प्रेमपूर्वक प्रार्थना करना।
  • दिनभर सात्विक भाव रखते हुए ॐ क्लीं कृष्णाय नमः अथवा ॐ राधाकृष्णाय नमः मंत्र का निरंतर जप करना।
  • सायंकाल के समय तुलसी के पौधे के समीप गाय के शुद्ध घी का दीपक प्रज्वलित करके परिक्रमा करना।
  • किसी भी व्यक्ति के प्रति मन में कटुता, ईर्ष्या, क्रोध और कलह की भावना को स्थान न देना।

ब्रज मंडल में फूलों की होली और प्रेम तत्त्व का प्रकटीकरण

फुलेरा दूज का पावन पर्व ब्रज मंडल अर्थात मथुरा, वृंदावन, बरसाना, गोकुल और नंदगांव में अत्यंत भव्य और अलौकिक रूप से मनाया जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इसी पावन तिथि पर भगवान श्री कृष्ण और राधारानी ने पहली बार एक दूसरे पर ताजे सुगंधित पुष्पों की वर्षा करके वसंतोत्सव का शुभारंभ किया था। इस घटना के साथ ही संपूर्ण ब्रज में होली के औपचारिक महोत्सव की शुरुआत मानी जाती है। ब्रज के समस्त मंदिरों में इस दिन भगवान के श्री विग्रहों पर सूखे गुलाल और रंग बिरंगे फूलों की पंखुड़ियों की होली खेली जाती है।

पौराणिक संदर्भ के अनुसार जब शीतकाल के कारण ब्रज की कुंज गलियों में पुष्प मुरझाने लगे थे और प्रकृति में कुछ उदासी छाने लगी थी, तब भगवान श्री कृष्ण के दर्शन न पाकर गोपियां और राधारानी अत्यंत विरह का अनुभव कर रही थीं। जब फाल्गुन शुक्ल द्वितीया को भगवान श्री कृष्ण ब्रज की कुंजों में प्रकट हुए, तो प्रकृति में अचानक नए पुष्प खिल उठे। भगवान श्री कृष्ण ने एक खिलता हुआ पुष्प तोड़कर राधारानी के ऊपर फेंका। प्रत्युत्तर में राधारानी और सखियों ने भी भगवान पर पुष्पों की वर्षा कर दी। इस प्रकार फूलों की होली का यह पावन क्रम प्रारंभ हुआ। यह लीला यह स्पष्ट करती है कि ईश्वर और जीव के मध्य का सच्चा संबंध केवल प्रेम, समर्पण और निष्काम उल्लास पर ही टिका हुआ है।

विवाह, सगाई और व्यापार के लिए स्वयं सिद्ध मुहूर्त का विधान

वैदिक ज्योतिष में विवाह, गृह प्रवेश, मुंडन, नामकरण और नवीन व्यापारिक प्रतिष्ठान की शुरुआत के लिए अनेक प्रकार के पंचांगीय दोषों का विचार किया जाता है। त्रिबल शुद्धि, सूर्य और गुरु का बल, भद्रा का परिहार और खरमास जैसी स्थितियों को देखकर ही सामान्य दिनों में शुभ मुहूर्त निकाले जाते हैं। परंतु फुलेरा दूज एक ऐसा अद्वितीय दिन है जो इन समस्त पंचांगीय प्रतिबंधों से पूरी तरह मुक्त माना गया है।

जिन युवक युवतियों की जन्म कुंडली में कोई शुभ लग्न नहीं निकल रहा हो, अथवा जिनके विवाह में ग्रहों की प्रतिकूलता के कारण निरंतर अड़चनें आ रही हों, उनके लिए फुलेरा दूज पर विवाह बंधन में बंधना अत्यंत कल्याणकारी माना जाता है। इस दिन अग्नि के फेरे लेने वाले दंपतियों का वैवाहिक जीवन सदैव सुरक्षित, समृद्ध और निष्कलंक बना रहता है। इसके अतिरिक्त नवीन गृह में प्रवेश करने, भूमि या भवन का अनुबंध करने, स्वर्ण आभूषण क्रय करने अथवा नए व्यापार का खाता खोलने के लिए भी इस तिथि को सर्वोत्तम माना गया है। इस दिन प्रारंभ किया गया कोई भी कार्य कभी निष्फल नहीं होता।

मांगलिक कार्यफुलेरा दूज पर शास्त्रीय अनुष्ठानअभीष्ट फल
विवाह संस्कारयुगल राधा कृष्ण को साक्षी मानकर पाणिग्रहणअखंड दांपत्य सुख व दोष मुक्ति
नवीन व्यापार आरंभबहीखातों पर कुमकुम से स्वास्तिक व गणेश पूजनव्यापार में निरंतर वृद्धि व धन लाभ
गृह प्रवेशमुख्य द्वार पर आम के पल्लव व तोरण बंधनगृह शांति व नकारात्मक ऊर्जा का नाश
सगाई व वाग्दानवर वधू पक्ष द्वारा पुष्प व मिष्ठान्न का आदान प्रदानसंबंधों में स्थायित्व व मधुरता

दांपत्य कलह निवारण और प्रेम वृद्धि के अचूक शास्त्रीय उपाय

यदि किसी जातक के वैवाहिक जीवन में लंबे समय से तनाव, अलगाव, अविश्वास अथवा संवादहीनता की स्थिति बनी हुई हो, तो फुलेरा दूज का दिन इन समस्त कष्टों को समाप्त करने के लिए एक दिव्य वरदान के समान कार्य करता है। ज्योतिष में वैवाहिक सुख का कारक ग्रह शुक्र है और प्रेम का कारक ग्रह चंद्रमा है। फुलेरा दूज पर की गई साधना इन दोनों ग्रहों के समस्त अशुभ प्रभावों को धो डालती है।

  • पति पत्नी को मिलकर एक साथ राधा कृष्ण के मंदिर में जाना चाहिए और पीले कनेर या लाल गुलाब के पुष्पों से बनी माला युगल विग्रह को अर्पित करनी चाहिए।
  • राधारानी को सिंदूर, लाल चुनरी और सुगंधित चंदन समर्पित करके प्रार्थना करनी चाहिए जिससे दांपत्य जीवन में समर्पण का भाव जाग्रत होता है।
  • एक भोजपत्र पर लाल चंदन की स्याही से ॐ राधाकृष्णाय नमः लिखकर भगवान के चरणों में अर्पित करने से संबंधों की कड़वाहट तत्काल समाप्त होती है।
  • जिन दंपतियों के बीच व्यर्थ के विवाद होते हों, वे इस दिन एक दूसरे को सुगंधित श्वेत पुष्प भेंट करें और माखन मिश्री का प्रसाद ग्रहण करें।
  • सायंकाल के समय अपने शयनकक्ष में कपूर के साथ दो लौंग प्रज्वलित करने से नकारात्मक तरंगें समाप्त होकर दांपत्य प्रेम में वृद्धि होती है।

मानसिक संताप की शांति और आध्यात्मिक चेतना का उत्थान

फुलेरा दूज केवल सांसारिक सुखों को प्राप्त करने का पर्व नहीं है, अपितु यह मनुष्य के अंतःकरण को प्रफुल्लित करने वाली एक आध्यात्मिक औषधि भी है। शीत ऋतु की नीरसता के बाद वसंत की इस प्रारंभिक बेला में मानव मन स्वतः आनंद की खोज करता है। जब साधक भगवान श्री राधा कृष्ण के प्रेम स्वरूप का ध्यान करता है, तो उसके भीतर छिपी हुई कुंठा, मानसिक संताप, एकाकीपन और अवसाद के भाव शांत होने लगते हैं।

फूल कोमलता, सुगंध और निर्दोष सौंदर्य का प्रतीक है। भगवान को पुष्प अर्पित करने का आध्यात्मिक अर्थ यह है कि मनुष्य अपने चित्त को पुष्प की भांति कोमल, अहंकार रहित और सुगंधित बनाए। जब हृदय में ईश्वर के प्रति शुद्ध प्रेम का जागरण होता है, तो संसार के समस्त भौतिक द्वंद्व समाप्त हो जाते हैं। फुलेरा दूज हमें यह संदेश देती है कि जिस प्रकार वसंत आने पर प्रकृति का प्रत्येक अंग खिल उठता है, उसी प्रकार मनुष्य को भी अपने जीवन में भक्ति और उल्लास का रंग भरकर समाज में शांति और सौहार्द का प्रसार करना चाहिए।

FAQ

फुलेरा दूज को अबूझ मुहूर्त क्यों कहा जाता है?
यह तिथि समस्त ग्रह दोषों और पंचांगीय प्रतिबंधों से मुक्त मानी जाती है, इसलिए इस दिन बिना मुहूर्त निकाले कोई भी शुभ कार्य किया जा सकता है।

फुलेरा दूज पर राधा कृष्ण की पूजा में क्या विशेष अर्पित किया जाता है?
इस पावन दिन पर राधा कृष्ण को सुगंधित रंग बिरंगे फूलों की पंखुड़ियां, प्राकृतिक अबीर गुलाल और माखन मिश्री का भोग अर्पित किया जाता है।

ब्रज में फुलेरा दूज का क्या विशेष महत्व है?
ब्रज मंडल में इसी पावन तिथि से फूलों की होली के साथ संपूर्ण होली महोत्सव का औपचारिक और भव्य शुभारंभ होता है।

वैवाहिक कलह दूर करने के लिए फुलेरा दूज पर क्या उपाय करना चाहिए?
दंपतियों को राधा कृष्ण के युगल स्वरूप पर ताजे पुष्प अर्पित करके एक दूसरे को सुगंधित पुष्प भेंट करने चाहिए और मिश्री का सेवन करना चाहिए।

क्या फुलेरा दूज पर नया व्यापार शुरू किया जा सकता है?
हाँ, फुलेरा दूज स्वयं सिद्ध मुहूर्त है, इसलिए इस दिन नए व्यापार का शुभारंभ, गृह प्रवेश या वाहन की खरीदारी अत्यंत शुभ और फलदायी होती है।

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लेखक

पं. अभिषेक शर्मा

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