By पं. अमिताभ शर्मा
फाल्गुन शुक्ल द्वितीया पर महान रहस्यदर्शी संत का प्राकट्य

फाल्गुन मास के शुक्ल पक्ष की द्वितीया तिथि सनातन धर्म के आधुनिक इतिहास में एक अत्यंत युगांतरकारी तिथि मानी जाती है। इसी पावन तिथि पर आधुनिक भारत के महानतम रहस्यदर्शी संत, मां काली के अनन्य उपासक और स्वामी विवेकानंद के आध्यात्मिक गुरु भगवान रामकृष्ण परमहंस देव का प्राकट्य हुआ था। अंग्रेजी कैलेंडर के अनुसार 18 फरवरी 1836 को पश्चिम बंगाल के हुगली जनपद में स्थित कमारपुकुर गांव में एक अत्यंत निष्ठावान, निर्धन और धर्मनिष्ठ ब्राह्मण परिवार में उनका जन्म हुआ। उनके पिता क्षुदिराम चट्टोपाध्याय और माता चंद्रमणि देवी ने बालक का नाम गदाधर रखा था, क्योंकि उनके जन्म से पूर्व पिता को गया तीर्थ में भगवान गदाधर विष्णु का स्वप्नादेश प्राप्त हुआ था।
| पंचांग घटक | शास्त्रीय विवरण |
|---|---|
| मास एवं पक्ष | फाल्गुन मास, शुक्ल पक्ष |
| पावन तिथि | शुक्ल पक्ष द्वितीया तिथि (फुलेरा दूज संयोग) |
| नक्षत्र संबंध | पूर्वाभाद्रपद नक्षत्र |
| जन्म स्थान | ग्राम कमारपुकुर, हुगली, पश्चिम बंगाल |
| बाल्यकाल नाम | गदाधर चट्टोपाध्याय |
| आध्यात्मिक साधनाएं | तंत्र, वैष्णव भाव, अद्वैत वेदांत, इस्लाम, ईसाई धर्म |
| प्रधान साधना स्थली | दक्षिणेश्वर भवतारिणी काली मंदिर, कोलकाता |
| मूल आध्यात्मिक सूत्र | जतो मत ततो पथ (जितने मत, उतने पथ) |
रामकृष्ण परमहंस जयंती के पावन अवसर पर उनके सार्वभौमिक आध्यात्मिक संदेश को आत्मसात करने के लिए साधक को विशिष्ट सात्विक नियमों का पालन करना चाहिए।
गदाधर का प्रारंभिक जीवन अत्यंत सरल था, परंतु उनकी अंतर्मुखी चेतना बाल्यावस्था से ही समाधि की ओर अग्रसर थी। बड़े भाई रामकुमार के साथ कोलकाता आने के उपरांत वे दक्षिणेश्वर में रानी रासमणि द्वारा निर्मित भव्य मां भवतारिणी काली मंदिर के प्रधान पुजारी नियुक्त हुए। दक्षिणेश्वर की पावन भूमि पर गदाधर की साधना का वह विराट युग प्रारंभ हुआ, जिसने आगे चलकर संपूर्ण विश्व को हिला दिया। मां काली की पाषाण प्रतिमा उनके लिए कोई जड़ मूर्ति नहीं थी, वे साक्षात चिन्मयी मां थीं, जिनसे वे प्रत्यक्ष वार्तालाप करते थे, उन्हें अपने हाथों से भोजन कराते थे और उनके विरह में बालकों की भांति अश्रु बहाते थे।
परमहंस देव की साधना की सबसे अनूठी विशेषता यह थी कि उन्होंने किसी एक मार्ग पर टिककर सत्य की खोज नहीं की, अपितु सनातन परंपरा के समस्त अंगों का प्रत्यक्ष अनुभव किया। उन्होंने भैरवी ब्राह्मणी के सानिध्य में तंत्र की अत्यंत कठिन 64 तांत्रिक साधनाओं को सफलतापूर्वक संपन्न किया। इसके पश्चात उन्होंने वैष्णव संप्रदाय के वात्सल्य, सख्य, शांत और मधुर भाव की साधना की। मधुर भाव में उन्होंने स्वयं को राधा मानकर भगवान श्री कृष्ण के विरह का वह चरम रूप अनुभव किया, जिसमें उनके रोम छिद्रों से रक्त की बूंदें रिसने लगी थीं।
इसके उपरांत 1865 में अद्वैत वेदांत के महान संन्यासी तोतापुरी महाराज का दक्षिणेश्वर आगमन हुआ। तोतापुरी जी ने गदाधर को निर्विकल्प समाधि की दीक्षा दी। जिस निर्विकल्प समाधि को सिद्ध करने में योगियों को दशकों लग जाते हैं, गदाधर ने अपने तीक्ष्ण वैराग्य के बल पर तोतापुरी जी के एक ही निर्देश से कांच के टुकड़े से दोनों भौंहों के बीच ध्यान केंद्रित करके मात्र तीन दिनों में उस परम अद्वैत अवस्था को प्राप्त कर लिया, जहां नाम और रूप की समस्त सीमाएं विलीन हो जाती हैं। तोतापुरी जी विस्मय से भर गए और उन्होंने उन्हें रामकृष्ण नाम प्रदान किया।
सनातन धर्म की सबसे बड़ी शक्ति उसका अगाध खुलापन और सार्वभौमिक स्वीकार्यता है, जिसे आधुनिक युग में रामकृष्ण परमहंस देव ने पुनः जीवित किया। अद्वैत वेदांत की पूर्णता प्राप्त करने के बाद भी वे रुके नहीं। उन्होंने इस्लाम धर्म के सूफी संतों की भांति साधना की, नमाज पढ़ी और कुरान के भाव में डूबकर अल्लाह का साक्षात्कार किया। इसके पश्चात उन्होंने प्रभु ईसा मसीह के चित्र का ध्यान करके ईसाई धर्म की परम प्रेममयी चेतना का प्रत्यक्ष अनुभव किया।
इन समस्त अनुभूतियों के पश्चात परमहंस देव ने संपूर्ण मानवता को एक अत्यंत क्रांतिकारी और शांतियुक्त महावाक्य दिया, जिसे बंगाली में जतो मत ततो पथ कहा जाता है, जिसका अर्थ है जितने मत, उतने पथ। उन्होंने स्पष्ट किया कि जिस प्रकार एक ही सरोवर के चार घाट होते हैं, जहां हिंदू जल कहते हैं, मुसलमान पानी कहते हैं और अंग्रेज वाटर कहते हैं, वस्तु एक ही है, केवल नाम अलग हैं। उसी प्रकार ईश्वर एक ही है, जिसे साधक अपनी अपनी रुचि और भाषा के अनुसार अलग अलग नामों से पुकारते हैं। उन्होंने धार्मिक कट्टरता, सांप्रदायिक उन्माद और श्रेष्ठता के दंभ को आध्यात्मिक अज्ञान की सबसे बड़ी ग्रंथि घोषित किया।
| साधना मार्ग | गुरु व पथ प्रदर्शक | प्रमुख साधना द्रव्य व भाव | अनुभूत सत्य व सिद्धि |
|---|---|---|---|
| शाक्त तंत्र | भैरवी ब्राह्मणी | पंचमकार संस्कार व ध्यान | शक्ति का सगुण साकार प्राकट्य |
| वैष्णव साधना | विभिन्न वैष्णव संत | मधुर भाव व राधा चेतना | सगुण साकार श्री कृष्ण मिलन |
| अद्वैत वेदांत | तोतापुरी महाराज | नेति नेति विचार व ओंकार | निर्विकल्प समाधि व अद्वैत बोध |
| सूफी साधना | गोविंद राय | नमाज, फकीरी भाव व तौहीद | निराकार परवरदिगार का साक्षात्कार |
| ईसाई साधना | ईसा मसीह का रूप | निष्काम प्रेम व ईश्वरीय पुत्रत्व | ख्रीष्ट चेतना में विलय |
ठाकुर रामकृष्ण का संपूर्ण जीवन त्याग की पराकाष्ठा था। उन्होंने आध्यात्मिक जीवन के दो सबसे बड़े अवरोधकों को कामिनी और कंचन नाम दिया। कामिनी का अर्थ केवल स्त्री नहीं है बल्कि कामिनी का वास्तविक अर्थ भोग विलास, कामुक वासना और दैहिक आकर्षण है। कंचन का अर्थ केवल स्वर्ण नहीं बल्कि संचय की प्रवृत्ति, धन का लोभ और भौतिक संपदा के प्रति अंधा अनुराग है।
उन्होंने अपने शिष्यों को सिखाने के लिए एक बार एक हाथ में मिट्टी का ढेला और दूसरे हाथ में चांदी का सिक्का लिया और गंगा के किनारे बैठकर टाका माटी माटी टाका अर्थात रुपया मिट्टी है और मिट्टी रुपया है का उच्चारण करते हुए दोनों को एक साथ गंगा में विसर्जित कर दिया। उनका यह त्याग इतना गहरा और शारीरिक स्तर तक पहुंच चुका था कि यदि वे निद्रा की अवस्था में भी किसी धातु या मुद्रा को स्पर्श कर लेते थे, तो उनका शरीर झटके से पीछे हट जाता था और उनकी उंगलियां अकड़ जाती थीं।
माता शारदा देवी के साथ उनका संबंध संसार के इतिहास में दांपत्य का सबसे पावन और अलौकिक उदाहरण है। विवाह के पश्चात जब माता शारदा दक्षिणेश्वर आईं, तो ठाकुर ने उनके चरणों में बैठकर पूछा कि तुम मुझे संसार के बंधन में खींचने आई हो या मेरी साधना में सहयोग करने? माता शारदा ने उत्तर दिया कि मैं आपके मार्ग में बाधा बनने नहीं, आपके चरणों की दासी बनकर ईश्वर मार्ग पर चलने आई हूं। इसके उपरांत ठाकुर ने माता शारदा को वेदी पर बिठाकर साक्षात षोडशी त्रिपुर सुंदरी के रूप में उनका षोडशोपचार पूजन किया और अपनी संपूर्ण साधना का फल उनके चरणों में समर्पित कर दिया। उन्होंने अपनी पत्नी को सदैव जगज्जननी का रूप माना।
भगवान रामकृष्ण केवल एक अंतर्मुखी साधक नहीं थे, वे एक महान पारखी जौहरी थे जो भारत की सोई हुई चेतना को जाग्रत करने वाले महापुरुषों का निर्माण कर रहे थे। जब युवा नरेंद्रनाथ दत्त, जो घोर तर्कवादी, संशयवादी और ब्रह्म समाज के विचारों से प्रभावित थे, दक्षिणेश्वर पहुंचे और उन्होंने सीधा प्रश्न पूछा कि क्या आपने ईश्वर को देखा है? ठाकुर ने तनिक भी संकोच किए बिना अत्यंत सहजता से उत्तर दिया कि हां, मैंने ईश्वर को देखा है, ठीक वैसे ही जैसे मैं तुम्हें देख रहा हूं बल्कि उससे भी अधिक स्पष्ट रूप में। इस एक उत्तर ने नरेंद्र के जीवन की दिशा बदल दी।
ठाकुर ने नरेंद्र को केवल अद्वैत ज्ञान नहीं दिया बल्कि उनके भीतर विश्व कल्याण की ज्वाला प्रज्वलित की। जब नरेंद्र ने निर्विकल्प समाधि में निरंतर लीन रहने की इच्छा व्यक्त की, तो ठाकुर ने उन्हें झिड़कते हुए कहा कि तू इतना संकीर्ण विचार रखता है? मैं सोचता था कि तू एक विशाल वटवृक्ष बनेगा जिसकी छाया में लाखों थके हुए प्राणी शांति पाएंगे और तू केवल अपनी मुक्ति चाहता है? ठाकुर ने अपनी महासमाधि से पूर्व अपनी संपूर्ण यौगिक और आध्यात्मिक शक्तियां नरेंद्र के भीतर संचरित कर दीं और उन्हें स्वामी विवेकानंद बना दिया, जिन्होंने आगे चलकर 1893 में शिकागो के धर्म सम्मेलन में सनातन वेदांत की विजय पताका फहराई।
आज का मानव जब तीव्र मानसिक तनाव, अत्यधिक भौतिक लालसा, पारिवारिक विखंडन और धार्मिक असहिष्णुता के भंवर में फंसा हुआ है तब श्री रामकृष्ण का सरल और व्यावहारिक जीवन एक प्रकाश स्तंभ के समान मार्ग दिखाता है। उन्होंने धर्म को किसी जटिल दर्शन, भारी भरकम पुस्तकों या शुष्क कर्मकांडों में कैद नहीं किया। उन्होंने सिखाया कि ईश्वर को पाने के लिए जंगल जाने की आवश्यकता नहीं है। संसार में रहो, अपने कर्तव्यों का पालन करो, परंतु मन को सदैव ईश्वर में लगाए रखो, ठीक वैसे ही जैसे एक दासी अपने मालिक के बच्चों का लालन पालन करती है, परंतु मन में जानती है कि उसका अपना घर कहीं और है।
फाल्गुन शुक्ल द्वितीया का यह पावन दिन हमें यह स्मरण कराता है कि धर्म का वास्तविक अर्थ विवाद नहीं, अपितु साक्षात्कार है। मतभेद केवल बुद्धि के धरातल पर होते हैं, जब मनुष्य प्रेम और निष्काम भक्ति के तल पर पहुंचता है, तो समस्त भेद मिट जाते हैं। ठाकुर का यह जीवन दर्शन मनुष्य को अपने भीतर छिपी हुई दिव्यता को पहचानने और संपूर्ण सृष्टि को ईश्वर का विराट रूप मानकर उसकी सेवा करने की प्रेरणा देता है।
रामकृष्ण परमहंस जयंती किस तिथि को मनाई जाती है?
यह पावन जयंती प्रतिवर्ष फाल्गुन मास के शुक्ल पक्ष की द्वितीया तिथि को मनाई जाती है, जिसे फुलेरा दूज भी कहा जाता है।
रामकृष्ण परमहंस का मूल नाम क्या था?
उनका बाल्यकाल का नाम गदाधर चट्टोपाध्याय था, जो बाद में तोतापुरी महाराज द्वारा संन्यास दीक्षा के पश्चात रामकृष्ण परमहंस के नाम से विख्यात हुए।
जतो मत ततो पथ का क्या अर्थ है?
यह उनका परम प्रसिद्ध सूत्र है जिसका अर्थ है जितने मत, उतने पथ अर्थात संसार के सभी धर्म और संप्रदाय एक ही परम सत्य तक पहुंचने के विभिन्न मार्ग हैं।
ठाकुर ने अपनी पत्नी माता शारदा की पूजा किस रूप में की थी?
ठाकुर ने दक्षिणेश्वर में माता शारदा देवी को साक्षात षोडशी त्रिपुर सुंदरी जगज्जननी मानकर उनकी विधिवत पूजा की थी और दांपत्य को दिव्यता प्रदान की थी।
परमहंस देव ने कामिनी और कंचन के त्याग का क्या संदेश दिया?
उन्होंने सिखाया कि कामुक वासना और धन का अंधा लोभ ही आत्मा के पतन का मूल कारण है, इसलिए चित्त को इनसे अनासक्त रखना अनिवार्य है।
पाएं अपनी सटीक कुंडली
कुंडली बनाएं
अनुभव: 20
इनसे पूछें: Family Planning, Career
इनके क्लाइंट: Punjab, Haryana, Delhi
इस लेख को परिवार और मित्रों के साथ साझा करें
WELCOME TO
Right Decisions at the right time with ZODIAQ