By पं. सुव्रत शर्मा
काशी में बाबा विश्वनाथ का गौना और गुलाल की प्रथम होली

फाल्गुन मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि को सनातन पंचांग में रंगभरी एकादशी के पावन नाम से जाना जाता है। संपूर्ण भारतवर्ष में इसे आमलकी एकादशी के नाम से भी श्रद्धापूर्वक मनाया जाता है, परंतु मोक्षदायिनी काशी नगरी में इस तिथि का स्वरूप अत्यंत अलौकिक, अद्वितीय और लोकोत्तर हो जाता है। पौराणिक मान्यता के अनुसार फाल्गुन मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को महाशिवरात्रि के दिन देवाधिदेव महादेव का विवाह माता पार्वती के साथ संपन्न हुआ था। विवाह के उपरांत फाल्गुन शुक्ल एकादशी ही वह पावन तिथि थी जब भगवान शिव माता भगवती पार्वती का गौना कराकर पहली बार अपनी शाश्वत प्रिय नगरी काशी में लेकर आए थे। इस पावन आगमन की स्मृति में काशी नगरी का कण कण आनंदित होकर रंग और गुलाल से सराबोर हो उठता है।
| पंचांग घटक | शास्त्रीय विवरण |
|---|---|
| मास एवं पक्ष | फाल्गुन मास, शुक्ल पक्ष |
| पावन तिथि | शुक्ल पक्ष एकादशी तिथि |
| अधिष्ठाता देवता | काशी पुराधिपति बाबा विश्वनाथ व माता अन्नपूर्णा |
| प्रधान साधना स्थली | काशी विश्वनाथ धाम, वाराणसी, उत्तर प्रदेश |
| उत्सव स्वरूप | माता पार्वती का गौना, शिव बारात, प्रथम गुलाल अर्पण |
| प्रमुख नैवेद्य | भांग, ठंडाई, माखन, मिश्री, बेलपत्र और अबीर |
| मुख्य आध्यात्मिक फल | वैवाहिक क्लेशों का नाश, अखंड सौभाग्य और मोक्ष |
रंगभरी एकादशी के पावन दिन शिव कृपा और दांपत्य सुख की प्राप्ति हेतु प्रत्येक साधक को प्रातः काल से ही विशिष्ट शास्त्रीय अनुशासन का पालन करना चाहिए।
रंगभरी एकादशी की सबसे अद्भुत और भव्य परंपरा काशी विश्वनाथ मंदिर के भूतपूर्व महंत परिवार के आवास से प्रारंभ होती है। इस दिन ब्रह्म मुहूर्त में भगवान विश्वनाथ और माता पार्वती की दुर्लभ पंचबदन रजत प्रतिमा का विधि विधान से विशेष षोडशोपचार पूजन किया जाता है। माता गौरा को ससुराल विदा करने की संपूर्ण वैदिक और लौकिक रस्में निभाई जाती हैं। उन्हें 16 श्रृंगार की समस्त सामग्रियां अर्पित की जाती हैं और उनके हाथों में परंपरागत हल्दी तथा मेहंदी का लेप लगाया जाता है।
इसके पश्चात देवाधिदेव महादेव और माता गौरा की इन चल प्रतिमाओं को एक अत्यंत सुंदर और सुसज्जित रजत पालकी में विराजमान किया जाता है। पालकी के साथ ही भगवान गणेश और कार्तिकेय के विग्रह भी सुशोभित रहते हैं। जब यह पालकी महंत आवास से निकलकर काशी की प्राचीन गलियों से होते हुए विश्वनाथ मंदिर की ओर प्रस्थान करती है, तो संपूर्ण काशी में शंख, डमरू, घंट घड़ियाल और हर हर महादेव के गगनभेदी जयघोष गूंज उठते हैं। काशीवासी, अघोरी, सन्यासी, देवगण और भक्तजन अपनी अश्रुपूरित आंखों से माता पार्वती का स्वागत करते हुए पालकी पर मन भर लाल अबीर और सुगंधित गुलाल की वर्षा करते हैं। हवा में उड़ता हुआ यह लाल गुलाल आकाश को सिंदूरी बना देता है। मान्यता है कि इस पालकी पर उड़ाया गया गुलाल जिस भी श्रद्धालु के मस्तक या शरीर पर पड़ता है, उसके जीवन के समस्त अमंगल उसी क्षण जलकर भस्म हो जाते हैं।
रंगभरी एकादशी के दिन से ही भगवान शिव की नगरी काशी में होली के महापर्व की औपचारिक और आध्यात्मिक शुरुआत मानी जाती है। पूरे उत्तर भारत में जहां होली पूर्णिमा के दिन से खेली जाती है, वहीं काशी में रंगभरी एकादशी से ही रंगों का प्रवाह प्रारंभ हो जाता है। काशी के संदर्भ में इस पर्व का एक अत्यंत गूढ़ और तात्विक पक्ष मणिकर्णिका और हरिश्चंद्र घाट की मसान की होली से जुड़ा हुआ है।
रंगभरी एकादशी के दिन भगवान शिव समस्त देवताओं, गंधर्वों, यक्षों और गृहस्थ भक्तों के साथ नगर में गुलाल की होली खेलते हैं। परंतु श्मशान में निवास करने वाले उनके प्रिय गण भूत, प्रेत, पिशाच, डाकनी और शाकनी इस गृहस्थ उत्सव में सम्मिलित नहीं हो पाते क्योंकि वे सामाजिक मर्यादाओं से परे हैं। अपने उन विरक्त और त्यागे हुए भक्तों के प्रेम की रक्षा के लिए भगवान शिव रंगभरी एकादशी के ठीक अगले दिन अर्थात द्वादशी तिथि को महाश्मशान मणिकर्णिका घाट पर पधारते हैं। वहां वे जलती हुई चिताओं की राख अर्थात भस्म से अपने गणों के साथ होली खेलते हैं। यह परंपरा यह दर्शाती है कि शिव का प्रेम केवल सुंदर और सुरुचिपूर्ण समाज तक सीमित नहीं है, वे श्मशान के भस्म, दुख और मृत्यु को भी अपने आलिंगन में लेकर उसे आनंद में रूपांतरित कर देते हैं।
वैदिक ज्योतिष में भगवान शिव और माता पार्वती का स्वरूप वैवाहिक जीवन की सर्वोच्च पूर्णता और निष्कलंकता का प्रतीक माना जाता है। रंगभरी एकादशी का दिन उन सभी दंपतियों के लिए संजीवनी के समान है जिनके वैवाहिक जीवन में निरंतर क्लेश, कटुता, संवादहीनता अथवा अलगाव की स्थिति बनी हुई है। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार वैवाहिक सुख का कारक ग्रह शुक्र और मन का कारक ग्रह चंद्रमा जब जन्म कुंडली में राहु, केतु अथवा शनि के क्रूर प्रभाव से पीड़ित होते हैं, तो दांपत्य जीवन में अशांति उत्पन्न होती है।
| वैवाहिक या पारिवारिक समस्या | रंगभरी एकादशी पर अनुशंसित अनुष्ठान | अभीष्ट आध्यात्मिक फल |
|---|---|---|
| दांपत्य जीवन में निरंतर विवाद | शिव पार्वती विग्रह पर सुगंधित लाल गुलाल व इत्र अर्पण | मनमुटाव का शमन और पारस्परिक अनुराग |
| विवाह में अकारण अत्यधिक विलंब | माता पार्वती को 16 श्रृंगार व पीली चुनरी का अर्पण | शीघ्र विवाह और योग्य जीवनसाथी |
| पति अथवा पत्नी का रोग ग्रस्त होना | शिवलिंग पर दूध, शहद व भस्म का त्रिपुंड लेपन | शारीरिक आरोग्य और जीवन रक्षा |
| परिवार में आर्थिक तंगी व क्लेश | माता अन्नपूर्णा स्तोत्र का 11 बार सस्वर पाठ | गृह लक्ष्मी की कृपा और अटूट समृद्धि |
रंगभरी एकादशी पर भगवान शिव और माता पार्वती को एक ही थाली में रखकर लाल गुलाल अर्पित करने से दोनों पक्षों के आंतरिक अहंकार का नाश होता है। जो पति पत्नी इस दिन एक साथ मिलकर शिवलिंग पर जलधारा अर्पित करते हैं और माता गौरा को सिंदूर समर्पित करते हैं, उनके रिश्ते में कभी भी दरार नहीं आती। माता पार्वती को चढ़ाया गया सिंदूर जब सुहागिन स्त्रियां अपनी मांग में धारण करती हैं, तो उन्हें अखंड सौभाग्य और कुल की समृद्धि का आशीष प्राप्त होता है।
रंगभरी एकादशी की पूजा में रंगों का चयन केवल मनोरंजन के लिए नहीं है बल्कि इसके पीछे एक गहरा आध्यात्मिक और रासायनिक विज्ञान कार्य करता है। इस दिन कृत्रिम और रासायनिक रंगों का प्रयोग पूरी तरह वर्जित माना गया है। प्राचीन काल से ही इस पावन तिथि पर पलाश के फूलों से बने लाल और नारंगी गुलाल अथवा शुद्ध चंदन और अबरक मिले श्वेत अबीर का उपयोग किया जाता रहा है।
रंगभरी एकादशी हमें यह सर्वोच्च आध्यात्मिक संदेश देती है कि सनातन धर्म में वैराग्य और आनंद परस्पर विरोधी नहीं हैं। भगवान शिव जो श्मशान के निवासी हैं, जो भस्म रमाते हैं और जिनके गले में मुंडमाला सुशोभित है, वे भी अपने भक्तों के प्रेम के लिए लाल गुलाल के रंग में रंग जाते हैं। यह इस बात का प्रमाण है कि जब हृदय में सच्चा प्रेम और ईश्वर के प्रति निष्काम भक्ति होती है, तो वैराग्य भी आनंद का उत्सव बन जाता है।
यह एकादशी मनुष्य को अपने मन के समस्त काले और नकारात्मक विचारों को ईश्वर के प्रेम रूपी लाल रंग में रंगने की प्रेरणा देती है। जब साधक संसार के समस्त द्वंद्वों से ऊपर उठकर शिव और शक्ति के इस पावन मिलन का साक्षात्कार करता है, तो उसकी चेतना से पाप, भय और अज्ञान का अंधकार समाप्त हो जाता है। रंगभरी एकादशी का यह पावन पर्व साधक के हृदय में वह दिव्य प्रकाश भर देता है जो उसे सांसारिक कर्तव्यों का निर्वाह करते हुए भी अंत में परब्रह्म शिव के चरणों में शाश्वत मोक्ष प्रदान करता है।
रंगभरी एकादशी का क्या विशेष महत्व है?
इस पावन दिन महाशिवरात्रि पर विवाह के बाद भगवान शिव माता पार्वती का गौना कराकर पहली बार काशी नगरी में लाए थे, जिसकी स्मृति में गुलाल की होली खेली जाती है।
रंगभरी एकादशी और आमलकी एकादशी में क्या संबंध है?
फाल्गुन शुक्ल पक्ष की एकादशी को पूरे भारत में आमलकी एकादशी कहा जाता है, परंतु काशी में इसी तिथि को रंगभरी एकादशी के रूप में मनाया जाता है।
रंगभरी एकादशी पर भगवान शिव को कौन सा रंग अर्पित करना चाहिए?
भगवान शिव और माता पार्वती को पलाश के फूलों से बना शुद्ध प्राकृतिक लाल गुलाल और सुगंधित अबीर अर्पित करना सबसे उत्तम माना गया है।
काशी में मसान की होली रंगभरी एकादशी से कैसे जुड़ी है?
रंगभरी एकादशी पर नगर में गुलाल से होली खेलने के बाद अगले दिन भगवान शिव मणिकर्णिका घाट पर अपने गणों भूत पिशाचों के साथ चिता भस्म से होली खेलते हैं।
दांपत्य सुख के लिए इस दिन क्या उपाय करना चाहिए?
पति पत्नी को एक साथ शिव पार्वती को लाल गुलाल अर्पित करना चाहिए और माता पार्वती को चढ़ाया हुआ सिंदूर सुहागिन स्त्री को अपनी मांग में लगाना चाहिए।
पाएं अपनी सटीक कुंडली
कुंडली बनाएं
अनुभव: 20
इनसे पूछें: Family Planning, Career
इनके क्लाइंट: Punjab, Haryana, Delhi
इस लेख को परिवार और मित्रों के साथ साझा करें
WELCOME TO
Right Decisions at the right time with ZODIAQ