By अपर्णा पाटनी
परागकण (Pollen) और कफ जनित रोगों के आयुर्वेदिक व ज्योतिषीय उपाय

सनातन वैदिक पंचांग के अनुसार फाल्गुन मास और चैत्र मास का संधिकाल प्रकृति का वह नाजुक संक्रांति काल माना जाता है जहाँ शिशिर ऋतु का अवसान होता है और वसंत ऋतु अपने पूर्ण यौवन पर पहुँचती है। खगोलीय दृष्टि से इस समय भगवान भुवन भास्कर उत्तरायण की ओर तेजी से बढ़ते हैं, जिसके कारण दिन के तापमान में निरंतर वृद्धि होती है जबकि रात्रि और प्रातः काल के समय वातावरण में हल्की शीतलता बनी रहती है। प्रकृति के इस संधिकाल में जहाँ एक ओर वन उपवनों में वृक्षों पर नवीन पल्लव, रंग बिरंगे पुष्प और मंजरी खिलने लगती है, वहीं दूसरी ओर वातावरण की वायु में खरबों की संख्या में सूक्ष्म परागकण तैरने लगते हैं।
आयुर्वेद के आधारभूत ग्रंथ चरक संहिता और अष्टांग हृदयम में स्पष्ट उल्लेख मिलता है कि शीत ऋतु में शरीर के भीतर संचित हुआ भारी, स्निग्ध और शीतल कफ फाल्गुन मास की तेज धूप पाकर पिघलने लगता है। पिघलता हुआ यह कफ मनुष्य के आमाशय, फेफड़ों, श्वास नलिकाओं और नासिका मार्ग में जाकर जम जाता है। जब वायुमंडल में तैरते हुए तीक्ष्ण परागकण श्वास के साथ नासिका मार्ग में प्रवेश करते हैं, तो वे पहले से कुपित कफ के साथ मिलकर एक भयंकर एलर्जी प्रतिक्रिया उत्पन्न करते हैं। इसे आयुर्वेद में वात कफज प्रतिश्याय और आधुनिक चिकित्सा विज्ञान में मौसमी एलर्जिक राइनाइटिस अथवा पोलन एलर्जी कहा जाता है।
| पंचांग व मौसमी घटक | शास्त्रीय व आयुर्वेदिक विवरण |
|---|---|
| मास एवं ऋतु संधिकाल | फाल्गुन मास का उत्तरार्ध एवं चैत्र मास का पूर्वार्ध |
| मुख्य वातावरणीय कारक | हवा में उड़ते हुए सूक्ष्म परागकण (पोलन ग्रेन) और धूल |
| शरीर में मुख्य दोष प्रकोप | कफ दोष का द्रवीभवन और वात दोष की उत्तेजना |
| प्रभावित शारीरिक अंग | नासिका मार्ग, फेफड़े, आंखें, कंठ और त्वचा |
| प्रमुख लक्षण | निरंतर छींकें, आंखों में जलन, श्वास कष्ट, सूखी खांसी |
| प्रमुख वैदिक औषधियां | गिलोय, सोंठ, काली मिर्च, हल्दी, तुलसी और नीम |
| मुख्य आध्यात्मिक फल | प्राण वायु का शोधन, त्रिदोष संतुलन और शारीरिक आरोग्यता |
वसंत ऋतु के इस संधिकाल में मौसमी एलर्जी और संक्रमण से अपने शरीर की रक्षा करने के लिए प्रत्येक साधक को प्रातः काल से ही विशिष्ट शास्त्रीय और प्राकृतिक नियमों का निष्ठापूर्वक पालन करना चाहिए।
आयुर्वेद में किसी भी रोग का उपचार केवल उसके बाह्य लक्षणों को दबाना नहीं है, अपितु शरीर के भीतर उपस्थित उसके मूल कारण का समूल नाश करना है। वसंत ऋतु में होने वाली एलर्जी का मुख्य कारण शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता का असंतुलन और ओज धातु की दुर्बलता है। जब जठराग्नि मंद पड़ जाती है, तो आंतों में अपचित भोजन से 'आमदोष' अर्थात एक चिपचिपा विषाक्त द्रव्य उत्पन्न होता है। यह आमदोष रक्त में मिलकर शरीर के सूक्ष्म स्रोतों को अवरुद्ध कर देता है।
जब परागकण नासिका की श्लेष्मा झिल्ली को छूते हैं, तो शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली उन्हें एक घातक आक्रमणकारी समझकर अत्यधिक मात्रा में हिस्टामाइन नामक रसायन का स्राव प्रारंभ कर देती है।
| शारीरिक अंग | परागकण एलर्जी के प्रमुख लक्षण | आयुर्वेदिक असंतुलन | अपेक्षित प्राकृतिक उपचार |
|---|---|---|---|
| नासिका व श्वसन मार्ग | निरंतर 15 से 20 छींकें आना, नाक से पतला पानी बहना | वात और कफ का नासिका में क्षोभ | जलनेति क्रिया व सोंठ काढ़े का सेवन |
| नेत्र मंडल | आंखों में लालिमा, अत्यधिक खुजली और पानी गिरना | पित्त और रक्त धातु में उष्णता | त्रिफला जल से आंखों का प्रक्षालन |
| फेफड़े व कंठ | गले में खराश, घरघराहट, दमा और सूखी खांसी | प्राणवह स्रोतस में कफ अवरोध | सितोपलादि चूर्ण व शहद का लेहन |
| त्वचा व आभामंडल | त्वचा पर लाल चकत्ते, पित्ती उछलना और तीव्र खुजली | त्वचा में रक्त और कफ का प्रकोप | नीम पत्ती व गिलोय क्वाथ का सेवन |
यदि समय रहते इस मौसमी प्रतिश्याय का उपचार न किया जाए, तो यह आगे चलकर क्रॉनिक ब्रोंकाइटिस और एलर्जिक अस्थमा का स्थाई रूप ले लेता है। अतः फाल्गुन मास में शरीर के भीतर जमे कफ को पिघलाकर बाहर निकालना ही इसका एकमात्र स्थाई समाधान है।
वैदिक ज्योतिष में मानव शरीर के प्रत्येक अंग और व्याधि का सीधा संबंध नवग्रहों की ऊर्जा से स्वीकार किया गया है। परागकण एलर्जी और श्वास नलिकाओं के रोगों में मुख्य रूप से दो ग्रहों-बुध देव और चंद्र देव-की भूमिका सर्वाधिक महत्वपूर्ण होती है।
बुध ग्रह को कालपुरुष की कुंडली में त्वचा, नासिका, श्वसन नलिकाओं और संपूर्ण स्नायु तंत्र का अधिष्ठाता माना गया है। वहीं चंद्र देव शरीर के जल तत्त्व, श्लेष्मा (कफ) और मानसिक संवेदनशीलता के कारक हैं। जब किसी जातक की जन्म कुंडली में बुध ग्रह नीच राशि मीन में स्थित हो, सूर्य के साथ अस्त हो, अथवा चंद्रमा राहु केतु के अशुभ प्रभाव से पीड़ित होकर क्षीण हो रहा हो, तो ऐसे जातक वसंत ऋतु की एलर्जी के सबसे पहले शिकार बनते हैं।
वसंतकालीन एलर्जी को जड़ से मिटाने के लिए आयुर्वेद ने कुछ अत्यंत दिव्य और निरापद औषधियों का विधान किया है, जिनमें गिलोय को 'अमृता' की संज्ञा दी गई है। गिलोय संसार की एकमात्र ऐसी वनस्पति है जो त्रिदोष शामक होने के साथ साथ शरीर के इम्यून सिस्टम को मॉड्यूलेट अर्थात संतुलित करने की अद्भुत क्षमता रखती है। यह न तो रोग प्रतिरोधक क्षमता को अत्यधिक भड़कने देती है और न ही उसे निर्बल होने देती है।
फाल्गुन मास में एलर्जी से ग्रसित रोगियों के लिए निम्नलिखित आयुर्वेदिक योग संजीवनी के समान कार्य करते हैं:
गिलोय और तुलसी का दिव्य क्वाथ:
हरिद्रा खंड और स्वर्ण दुग्ध (हल्दी दूध):
सितोपलादि चूर्ण और शहद का प्रयोग:
हठयोग प्रदीपिका और घेरंड संहिता में वर्णित षटकर्म क्रियाएं वसंत ऋतु की एलर्जी के लिए एक अचूक यौगिक अस्त्र हैं। जो व्यक्ति नित्य जलनेति और नस्य क्रिया का अभ्यास करता है, उसकी नासिका के भीतर परागकण कभी ठहर ही नहीं सकते।
जलनेति क्रिया की प्रामाणिक विधि:
नस्य कर्म (प्रतिमर्श नस्य):
आयुर्वेद का मूल सिद्धांत है कि स्वास्थ्य की रक्षा केवल दवाइयों से नहीं, अपितु ऋतु अनुकूल जीवनशैली अर्थात ऋतुचर्या के पालन से ही संभव है। वसंत ऋतु में प्रकृति के साथ एकाकार होकर जीने के कुछ मूलभूत नियम शास्त्रों में निर्धारित किए गए हैं:
जब मनुष्य इन यौगिक, आयुर्वेदिक और जीवनशैली नियमों का पालन करता है, तो वसंत ऋतु उसके लिए रोगों का कारण बनने के स्थान पर नवजीवन और आनंद का उत्सव बन जाती है। शरीर का शुद्ध प्राण प्रवाह साधक को वर्षभर निरोगी, तेजस्वी और उत्साही बनाए रखता है।
वसंत ऋतु में परागकण (पोलन) एलर्जी क्यों बढ़ जाती है?
वसंत में फूल खिलने से हवा में परागकणों की संख्या बढ़ जाती है और शरीर में पिघलता हुआ शीतकालीन कफ इन कणों के संपर्क में आकर तीव्र एलर्जी प्रतिक्रिया उत्पन्न करता है।
परागकण एलर्जी के प्रमुख लक्षण क्या हैं?
लगातार 10 से 20 छींकें आना, नाक से पतला पानी बहना, आंखों में लालिमा व खुजली, गले में खराश और सांस लेने में कठिनाई इसके मुख्य लक्षण हैं।
जलनेति क्रिया एलर्जी से कैसे बचाव करती है?
गुनगुने नमकीन जल से नासिका का प्रक्षालन करने से नासिका मार्ग में फंसे हुए सूक्ष्म परागकण और अवांछित कफ धुल कर बाहर निकल जाते हैं।
एलर्जी निवारण के लिए नस्य कर्म में किस तेल का उपयोग करना चाहिए?
नासिका में डालने के लिए शुद्ध देशी गाय का गुनगुना घी अथवा आयुर्वेद का सिद्ध अणु तेल सर्वोत्तम और सुरक्षित माना गया है।
ज्योतिष शास्त्र के अनुसार एलर्जी का संबंध किन ग्रहों से है?
एलर्जी, त्वचा और स्नायु विकारों का सीधा संबंध बुध ग्रह से तथा कफ और श्लेष्मा झिल्ली का संबंध चंद्र ग्रह के असंतुलन से होता है।
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