By पं. अभिषेक शर्मा
भांग, मेवे और मसालों का संतुलन और इसका आयुर्वेदिक पक्ष

फाल्गुन मास के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा तिथि और चैत्र मास के कृष्ण पक्ष की प्रतिपदा तिथि का संधिकाल सनातन वैदिक काल गणना में अग्नि और जल के संतुलन का महापर्व माना जाता है। इस पावन अवसर पर जहाँ एक ओर होलिका दहन की प्रचंड ज्वाला के माध्यम से नकारात्मक शक्तियों और बाह्य जीवाणुओं का संहार किया जाता है, वहीं दूसरी ओर धुलेंडी के पावन रंगोत्सव पर शरीर और मन को शांत, स्निग्ध और ऊर्जावान बनाए रखने के लिए पारंपरिक वैदिक ठंडाई का सेवन किया जाता है।
वैदिक पंचांग के अनुसार फाल्गुन मास का यह अंतिम चरण शिशिर ऋतु के विसर्जन और ग्रीष्म ऋतु के आगमन का पूर्व संकेत होता है। इस समय वायुमंडल में सूर्य की किरणें अत्यंत तीक्ष्ण होने लगती हैं, जिससे शरीर का पित्त दोष कुपित होने लगता है और जठराग्नि में असंतुलन आ जाता है। आयुर्वेद के प्राचीन संहिताओं में ठंडाई को केवल एक उत्सव का पेय नहीं, अपितु एक महा-रसायन और कायाकल्प करने वाला दिव्य पेय स्वीकार किया गया है।
| पंचांग व औषधीय घटक | शास्त्रीय व वैज्ञानिक विवरण |
|---|---|
| मास एवं तिथि संयोग | फाल्गुन पूर्णिमा से चैत्र कृष्ण प्रतिपदा |
| पेय का स्वरूप | पित्त शामक, वात नाशक, बलवर्धक और मेध्य रसायन |
| आधारभूत तरल | देशी गाय का कच्चा उबाला हुआ दूध और शीतल जल |
| मधुरता का स्रोत | धागे वाली देशी मिश्री (अपरिष्कृत शर्करा) |
| तासीर व वीर्य | समशीतोष्ण (शीतल प्रभाव के साथ दीपन गुण) |
| अधिष्ठाता देवता | देवाधिदेव महादेव शिव (सोम रस प्रतीक) |
| मुख्य स्वास्थ्य फल | शारीरिक दाह का शमन, तंत्रिका तंत्र की शांति और बल वृद्धि |
होली के पावन अवसर पर ठंडाई के निर्माण और सेवन का पूर्ण आध्यात्मिक तथा शारीरिक लाभ प्राप्त करने के लिए साधक को विशिष्ट वैदिक मर्यादाओं का निष्ठापूर्वक पालन करना चाहिए।
फाल्गुन मास में ठंडाई की चर्चा भांग अर्थात विजया के उल्लेख के बिना अधूरी मानी जाती है। परंतु आधुनिक समाज ने भांग के वास्तविक औषधीय और आध्यात्मिक स्वरूप को विकृत करके उसे एक अनियंत्रित, अश्लील और घातक नशे का रूप दे दिया है। आयुर्वेद के प्रामाणिक ग्रंथ भावप्रकाश निघंटु और रसतरंगिणी में भांग को विष नहीं, अपितु उपविष और एक अत्यंत शक्तिशाली वनस्पति औषधि के रूप में वर्गीकृत किया गया है।
आयुर्वेद में भांग को 'विजया' इसलिए कहा गया है क्योंकि यह समस्त रोगों पर विजय प्राप्त करने की क्षमता रखती है। समुद्र मंथन के समय जब भगवान शिव ने हलाहल विष का पान किया था तब उनके कंठ और संपूर्ण शरीर में जो भयंकर दाह उत्पन्न हुई थी, उसे शांत करने के लिए देवी पार्वती और देवताओं ने उन्हें शीतल विजया अर्पित की थी। तभी से भगवान शिव को विजया अति प्रिय है।
| औषधीय व तांत्रिक गुण | आयुर्वेदिक क्रिया | मानव शरीर पर जैविक प्रभाव | अनियंत्रित उपयोग का दुष्परिणाम |
|---|---|---|---|
| तिक्त व कषाय रस | कफ और वात का शमन | फेफड़ों और श्वास नलिकाओं का विस्तार | मुंह का सूखना और डिहाइड्रेशन |
| उष्ण वीर्य व दीपन गुण | मंदाग्नि को प्रदीप्त करना | पाचन रसों का तीव्र और संतुलित स्राव | आमाशय में अत्यधिक जलन व अल्सर |
| मेध्य व व्यवायी प्रभाव | केंद्रीय स्नायु तंत्र को शिथिलता | गंभीर मानसिक तनाव और चिंता का नाश | मतिभ्रम, भय और स्नायु दुर्बलता |
| निद्राजनन व वेदनाहर | दर्द की संवेदनाओं का अवरोध | अनिद्रा और पुराने जोड़ों के दर्द से मुक्ति | अत्यधिक आलस्य और चेतना का क्षय |
आयुर्वेद स्पष्ट निर्देश देता है कि भांग का सेवन कभी भी कच्चा, सूखा अथवा सीधे तंबाकू की भांति धूम्रपान करके नहीं करना चाहिए। भांग को औषधीय रूप में प्रयोग करने से पूर्व उसका शास्त्रीय शोधन अनिवार्य है। इसे पहले बबूल की छाल अथवा गाय के दूध में उबाला जाता है, फिर जल से अच्छी तरह धोकर, सुखाकर और गाय के घी में हल्का सा भूनकर ही ठंडाई में अल्प मात्रा में मिलाया जाता है।
जब शोधित विजया को भारी मात्रा में बादाम, सौंफ, मगज और दूध के साथ मिलाया जाता है, तो इसके नशीले प्रभाव पूरी तरह नष्ट हो जाते हैं और केवल इसके हीलिंग अर्थात उपचारात्मक गुण ही सक्रिय रहते हैं। जो व्यक्ति इसे केवल नशे, हुड़दंग और वासना की पूर्ति के लिए ग्रहण करते हैं, वे साक्षात पाप के भागी बनते हैं और अपने स्नायु तंत्र को स्थायी रूप से नष्ट कर लेते हैं।
वैदिक ठंडाई का निर्माण केवल स्वाद के लिए नहीं किया गया था, अपितु यह मानव शरीर की सात धातुओं रस, रक्त, मांस, मेद, अस्थि, मज्जा और शुक्र को एक साथ पोषित करने वाला एक अत्यंत संतुलित बायो-केमिकल यौगिक है। इसके आठ प्रमुख अवयव शरीर के वात, पित्त और कफ को किस प्रकार संतुलित करते हैं, इसका वैज्ञानिक विवरण निम्नलिखित है:
यदि आप इस होली पर अपने परिवार और मित्रों को रासायनिक रंगों के प्रभाव से बचाकर पूर्ण स्वास्थ्य और दिव्यता प्रदान करना चाहते हैं, तो बाजार के सिंथेटिक सिरप के स्थान पर घर पर ही पारंपरिक विधि से ठंडाई का निर्माण करें।
आवश्यक सामग्री (4 व्यक्तियों के लिए):
निर्माण की शास्त्रीय विधि:
आधुनिक न्यूरोलॉजी और मनोचिकित्सा विज्ञान यह स्वीकार करते हैं कि वसंत और ग्रीष्म के संधिकाल में मानव शरीर का सर्कैडियन रिदम अर्थात जैविक घड़ी गहराई से प्रभावित होती है। इस समय दिन बड़े और रातें छोटी होने लगती हैं, जिससे मेलाटोनिन हार्मोन का स्राव असंतुलित हो जाता है। इसके परिणामस्वरूप अनिद्रा, अवसाद, ध्यान की कमी और अचानक क्रोध आने की समस्याएं उत्पन्न होती हैं।
पारंपरिक ठंडाई में उपस्थित खसखस, सौंफ और बादाम का सम्मिश्रण मस्तिष्क में सेरोटोनिन और जीएबीए (GABA) न्यूरोट्रांसमीटर्स के स्तर को प्राकृतिक रूप से बढ़ा देता है।
| मानसिक व्याधि | ठंडाई के घटकों का प्रभाव | स्नायु तंत्र में होने वाला सुधार |
|---|---|---|
| अनिद्रा व रात में बार-बार जागना | खसखस और सौंफ का शामक प्रभाव | गहरी, निर्बाध और सुखद निद्रा की प्राप्ति |
| अत्यधिक मानसिक तनाव व चिंता | बादाम के फैटी एसिड व मैग्नीशियम | कोर्टिसोल हार्मोन का शमन व तंत्रिका शांति |
| क्रोध, चिड़चिड़ापन व पित्त प्रकोप | गुलाब पंखुड़ी व मिश्री की शीतलता | रक्तचाप का नियंत्रण व मस्तिष्क को ठंडक |
| स्मरण शक्ति का क्षरण व थकान | केसर व इलायची की उत्तेजक शक्ति | न्यूरोन्स की सक्रियता व एकाग्रता का विकास |
यह पेय स्नायु तंत्र की उत्तेजना को शांत करके मनुष्य को एक गहरी मानसिक स्थिरता प्रदान करता है। जो जातक होली के हुड़दंग और धूप की तपिश से थक जाते हैं, उनके लिए यह पेय तत्काल ग्लूकोज और इलेक्ट्रोलाइट्स की आपूर्ति करके शरीर की कोशिकाओं को पुनर्जीवित कर देता है।
पारंपरिक ठंडाई यद्यपि अमृत समान गुणकारी है, तथापि इसका सेवन करते समय कुछ मूलभूत आयुर्वेदिक और सामाजिक मर्यादाओं का ध्यान रखना अत्यंत अनिवार्य है:
होली पर पारंपरिक ठंडाई पीने का मुख्य वैज्ञानिक कारण क्या है?
फाल्गुन के संधिकाल में तेजी से बढ़ते तापमान और कुपित होते पित्त को शांत करने तथा शरीर को प्राकृतिक शीतलता प्रदान करने के लिए ठंडाई पी जाती है।
पारंपरिक ठंडाई में कौन से मुख्य मेवे और मसाले मिलाए जाते हैं?
इसमें बादाम, सौंफ, खसखस, मगज (तरबूज खरबूजे के बीज), काली मिर्च, छोटी इलायची, गुलाब की पंखुड़ियां, मिश्री और केसर मिलाया जाता है।
ठंडाई में मिश्री के स्थान पर सफेद चीनी का प्रयोग क्यों नहीं करना चाहिए?
सफेद चीनी रसायनों से साफ की जाती है और अम्लीय होती है, जबकि धागे वाली देशी मिश्री की तासीर शीतल होती है जो पित्त को शांत करती है।
आयुर्वेद में भांग (विजया) को किस श्रेणी में रखा गया है?
आयुर्वेद में भांग को उपविष और एक शक्तिशाली औषधि माना गया है, जिसका शोधन करके अल्प मात्रा में प्रयोग करने पर यह दर्द और तनाव मिटाती है।
ठंडाई की घोटाई पत्थर की कुंडी और लकड़ी के घोटे से ही क्यों की जाती है?
हाथ से घोटने पर जड़ी बूटियों के प्राकृतिक वाष्पशील तेल नष्ट नहीं होते और उनके औषधीय गुण पूरी तरह दूध और जल में समाहित हो जाते हैं।
पाएं अपनी सटीक कुंडली
कुंडली बनाएं
अनुभव: 20
इनसे पूछें: Family Planning, Career
इनके क्लाइंट: Punjab, Haryana, Delhi
इस लेख को परिवार और मित्रों के साथ साझा करें
WELCOME TO
Right Decisions at the right time with ZODIAQ