By पं. नीलेश शर्मा
रंगों के विसर्जन से आत्मिक नव-जागरण और नववर्ष का स्वागत

सनातन वैदिक काल गणना और ब्रह्मांडीय ज्योतिर्विज्ञान के अनुसार फाल्गुन मास संपूर्ण संवत्सर चक्र का द्वादश, अंतिम और परम विश्राम स्थल है। यह कालखंड केवल एक कैलेंडर माह की समाप्ति नहीं है, अपितु यह कालपुरुष के एक पूर्ण जीवन चक्र का महा-विसर्जन और पुनरागमन की पावन संधि है। वैदिक पंचांग के अनुसार यह वह विशिष्ट समय है जब सूर्य देव कुंभ राशि के वायु तत्त्वीय क्षेत्र से निकलकर देवगुरु बृहस्पति के आधिपत्य वाली मीन राशि के अगाध जल तत्त्व में प्रवेश करते हैं, जिसे 'मीन संक्रांति' कहा जाता है। सौरमंडल की यह खगोलीय गति संपूर्ण जीव जगत में एक गहन मनोवैज्ञानिक, जैविक और आध्यात्मिक संक्रांति उत्पन्न करती है।
वैदिक संहिताओं, शतपथ ब्राह्मण और उपनिषदों में स्पष्ट उल्लेख मिलता है कि काल एक सीधी रेखा नहीं है, अपितु काल एक शाश्वत चक्र (संवत्सर चक्र) है जिसका न कोई आदि है और न कोई अंत। जिस प्रकार एक बीज भूमि में विलीन होकर, सड़कर और अपने अस्तित्व को मिटाकर एक विशाल वटवृक्ष को जन्म देता है, ठीक उसी प्रकार फाल्गुन मास में संपूर्ण वर्ष की स्मृतियां, अनुभव, संचित कर्म, सुख और दुख विसर्जित होकर आगामी चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा को 'नव संवत्सर' के रूप में पुनर्जीवित होते हैं। फाल्गुन मास का चरमोत्कर्ष रंगों का वह पावन विसर्जन है जहां सृष्टि का प्रत्येक भेद मिटकर अद्वैत में लीन हो जाता है।
| पंचांग व दार्शनिक घटक | शास्त्रीय व आध्यात्मिक विवरण |
|---|---|
| संवत्सर चक्र में स्थिति | द्वादश एवं अंतिम मास (चांद्र संवत्सर की पूर्णाहुति) |
| खगोलीय संधिकाल | मीन संक्रांति, उत्तरायण सूर्य का तीव्र प्रकाश विस्तार |
| अधिष्ठाता युगल सत्ता | देवाधिदेव महादेव शिव (महाकाल) व श्री राधा कृष्ण (रसराज) |
| मूल दार्शनिक तत्त्व | अद्वैत वेदांत, सांख्य दर्शन, विसर्जन और पुनर्जन्म |
| अंतिम पावन अनुष्ठान | होलिका की पावन अग्नि में अहंकार दहन व धुलेंडी पर धूलि वंदन |
| पंच महाभूत समन्वय | अग्नि तत्त्व (होलिका) और जल तत्त्व (धुलेंडी) का अद्वैत संगम |
| सर्वोच्च आध्यात्मिक फल | जीव भाव की मुक्ति, ब्रह्म भाव की प्राप्ति और नवजीवन का उदय |
फाल्गुन मास के इस अंतिम दार्शनिक निष्कर्ष को अपने अंतर्मन में स्थापित करने और आगामी नव संवत्सर में एक निष्कलंक, जाग्रत और रूपांतरित चेतना के साथ प्रवेश करने हेतु साधक को ब्रह्म मुहूर्त से ही विशिष्ट वैदिक मर्यादाओं का निष्ठापूर्वक पालन करना चाहिए।
फाल्गुन मास का सबसे अधिक दृश्यमान और उल्लासमय पर्व 'होली' है। परंतु सामान्य जन इसे केवल एक दूसरे पर रंग फेंकने का भौतिक खेल मान लेते हैं, जो इसके परम गूढ़ आध्यात्मिक स्वरूप के प्रति घोर अज्ञानता है। वैदिक तत्वमीमांसा के अनुसार रंग केवल प्रकाश की परावर्तित किरणें नहीं हैं, अपितु रंग मानव मन की विभिन्न भावनाओं, प्रवृत्तियों और चेतना के विभिन्न स्तरों के प्रतीक हैं।
संसार में प्रत्येक व्यक्ति अपने एक विशिष्ट रंग (व्यक्तित्व, जाति, पद, धन, रूप और ज्ञान के अहंकार) में रंगा हुआ घूमता है। कोई व्यक्ति स्वयं को विद्वान मानकर अहंकार के पीले रंग में बंधा है, कोई स्वयं को शक्तिशाली मानकर क्रोध के लाल रंग में जल रहा है, कोई कामुकता के गुलाबी रंग में लिप्त है, तो कोई ईर्ष्या और अज्ञान के काले रंग में डूबा हुआ है। जब तक मनुष्य अपने इन व्यक्तिगत रंगों को पकड़कर रखता है तब तक वह खंडित, एकाकी और अशांत रहता है।
| रंग का स्वरूप | मानसिक व आध्यात्मिक प्रतीक | तात्विक गुण | विसर्जन के उपरांत प्राप्त होने वाली अवस्था |
|---|---|---|---|
| लाल (रक्त वर्ण) | शक्ति, पराक्रम, तेज व विशुद्ध प्रेम | अग्नि तत्त्व | काम और क्रोध का निष्काम प्रेम में रूपांतरण |
| पीला (पीत वर्ण) | ज्ञान, विवेक, तपस्या व सत्य | पृथ्वी व आकाश | संकीर्ण बौद्धिकता का ब्रह्म ज्ञान में विलय |
| श्वेत (अबीर) | परम शांति, सात्विकता व चित्त शुद्धि | जल व आकाश | समस्त द्वंद्वों का शमन व अद्वैत की प्राप्ति |
| हरा (हरित वर्ण) | नवजीवन, प्रकृति, सृजन व आनंद | पृथ्वी तत्त्व | हृदय चक्र का प्रस्फुटन व संपूर्ण प्रकृति से तादात्म्य |
| नीला (श्याम वर्ण) | अनंत आकाश, गंभीरता व कृष्ण प्रेम | आकाश व जल | व्यक्तिगत चेतना का अनंत परमात्मा में समा जाना |
| काला (कृष्ण वर्ण) | अज्ञान, तमोगुण, काल व संहार | तमोगुण | अहंकार की पूर्ण आहुति व परम शून्य का साक्षात्कार |
धुलेंडी के दिन जब सभी लोग एक दूसरे पर विविध रंग डालते हैं, तो कुछ ही घंटों के भीतर एक अत्यंत विस्मयकारी और आध्यात्मिक घटना घटित होती है। सभी के व्यक्तिगत रंग धुल जाते हैं, चेहरे पर लगा हुआ लाल, पीला, हरा और नीला रंग मिलकर अंत में एक ही भूरे अथवा मटमैले रंग में विलीन हो जाता है।
उस समय राजा और रंक, सुंदर और कुरूप, ज्ञानी और मूर्ख का समस्त बाह्य भेद समाप्त हो जाता है। कोई किसी को पहचान नहीं पाता कि यह कौन है; केवल एक मानव दिखाई देता है। यही अद्वैत दर्शन का चरमोत्कर्ष है। जब मनुष्य का व्यक्तिगत अहंकार मिटता है, तभी वह उस परम चेतना के एक ही रंग-'हरि रंग'-में रंग जाता है। कबीर दास जी ने इसी अवस्था को गाते हुए कहा था:
लाली मेरे लाल की, जित देखूं तित लाल। लाली देखन मैं गई, मैं भी हो गई लाल॥
फाल्गुन पूर्णिमा की रात्रि में प्रज्वलित की जाने वाली होलिका की पावन अग्नि कोई सामान्य अलाव नहीं है, अपितु यह संपूर्ण संवत्सर का सबसे बड़ा महायज्ञ है। वैदिक दर्शन में अग्नि को 'पावक' कहा गया है, जिसका अर्थ है जो स्वयं पवित्र है और अपने संपर्क में आने वाली प्रत्येक वस्तु को पवित्र बना देती है।
होलिका दहन का प्रसंग भक्त प्रह्लाद और उसकी बुआ होलिका की पौराणिक कथा से जुड़ा है। होलिका को वरदान था कि अग्नि उसे जला नहीं सकती, जो यह दर्शाता है कि अज्ञान और अहंकार अपने आप को अमर मान बैठते हैं। परंतु जब निष्काम भक्ति (प्रह्लाद) और आसुरी अहंकार (होलिका) एक साथ अग्नि में बैठते हैं, तो अग्नि अहंकार को जलाकर राख कर देती है और भक्ति को अखंड, शीतल और तेजस्वी बनाकर बाहर निकाल लाती है।
दार्शनिक दृष्टि से होलिका दहन का अर्थ है:
फाल्गुन मास का यह अंतिम पड़ाव ज्ञान मार्ग (अद्वैत वेदांत) और भक्ति मार्ग (माधुर्य रस) का एक ऐसा पावन संगम है जहाँ पहुंचकर ज्ञान और भक्ति में कोई भेद नहीं रह जाता।
शंकराचार्य का अद्वैत वेदांत कहता है कि 'अहं ब्रह्मास्मि' अर्थात मैं ही वह परम सत्य हूं, संसार में परमात्मा के अतिरिक्त कुछ भी नहीं है। वहीं ब्रज की रसधारा कहती है कि 'राधे कृष्ण एक हैं, दो देही एक प्रान'। जब भगवान श्री कृष्ण फाल्गुन में गोपियों और राधा जी के साथ होरी खेलते हैं, तो वह कोई सांसारिक स्त्री पुरुष का खेल नहीं होता।
जब साधक इस रहस्य को समझ लेता है, तो उसकी संपूर्ण संकीर्णताएं टूट जाती हैं। उसे अपने भीतर और संसार के प्रत्येक प्राणी के भीतर केवल वही एक रसराज परमात्मा क्रीड़ा करता हुआ दिखाई देता है। तब जीवन में कोई पराया नहीं रहता, कोई शत्रु नहीं रहता। संसार का प्रत्येक संबंध केवल उस एक परमात्मा का ही विस्तार बन जाता है। यही फाल्गुन की रस साधना का सर्वोच्च दार्शनिक शिखर है।
फाल्गुन मास का समापन सनातन काल गणना का अंत नहीं, अपितु एक दिव्य पुनर्जन्म है। मृत्यु के बिना पुनर्जन्म संभव नहीं है; विसर्जन के बिना नवीन सृजन संभव नहीं है। जब तक पुराना पत्ता शाखा को नहीं छोड़ता तब तक नई कोपल के लिए मार्ग नहीं बनता। फाल्गुन मास पूरे वर्ष के उस पुराने पत्ते को गिराने का पवित्र काल है।
फाल्गुन मास के 30 दिनों की यह साधना मनुष्य के अंतःकरण की संपूर्ण मैल को धोकर उसे एक नवजात शिशु की भांति निष्पाप, सरल, पवित्र और ऊर्जावान बना देती है।
| फाल्गुन का विसर्जन (पुराना वर्ष) | चैत्र का प्राकट्य (नवीन संवत्सर) | आध्यात्मिक रूपांतरण |
|---|---|---|
| पतझड़ में सूखे पत्तों का पतन | वृक्षों पर हरी कोपलों व बौर का प्रस्फुटन | पुराने बंधनों से मुक्ति व नई चेतना का उदय |
| होलिका में अहंकार व पापों का दहन | चैत्र शुक्ल प्रतिपदा पर नववर्ष का प्रथम सूर्य | अंतर्मन की शुद्धि व दिव्य तेज की प्राप्ति |
| रंगों का एकीकारी विसर्जन | नवरात्रि में नौ शक्तियों की आराधना | द्वैत का नाश व पराशक्ति की कृपा |
| शीत ऋतु की जड़ता का अवसान | ग्रीष्म व वसंत की जीवंत सक्रियता | आलस्य का नाश व कर्म योग में प्रवृत्त होना |
जब साधक फाल्गुन की इस संधिकाल की देहरी को पार करता है, तो वह केवल एक वर्ष से दूसरे वर्ष में प्रवेश नहीं करता, अपितु वह काल के उस चक्र को समझ जाता है जो उसे सिखाता है कि जीवन एक शाश्वत प्रवाह है। इसमें न कुछ खोता है, न कुछ नष्ट होता है; केवल रूप बदलते हैं। जो व्यक्ति इस प्रवाह के साथ बहना सीख जाता है, वह जीवन मुक्त हो जाता है।
इस पावन शृंखला के माध्यम से हमने वैदिक पंचांग, आयुर्वेद, ज्योतिष, तंत्र, वास्तु और दर्शन के जिन 50 गहन सूत्रों का मंथन किया है, वे केवल बौद्धिक जानकारी नहीं हैं, अपितु वे मानव जीवन को साक्षात अमृत में रूपांतरित करने की संजीवनी विद्या हैं।
हमने सीखा कि कैसे फाल्गुन के सूर्य, चंद्रमा और नवग्रह हमारी देह और मन को संचालित करते हैं। हमने देखा कि कैसे भुने चने, सोंठ, टेसू के फूल और वैदिक ठंडाई हमारे त्रिदोषों को शांत करके हमें निरोगी बनाते हैं। हमने जाना कि कैसे महाशिवरात्रि, विजया एकादशी, फुलेरा दूज और दारुण रात्रि हमारे अंतःकरण को परमात्मा से जोड़ती हैं। और अंत में, हमने यह परम सत्य पाया कि समस्त साधनाओं का मूल लक्ष्य अपने भीतर के अहंकार को विसर्जित करके प्रकृति और परमात्मा के साथ एक हो जाना है।
फाल्गुन मास का यह विदाई गीत हमारे कानों में यह अमृतवाणी घोल रहा है: उठो, अपने अतीत के समस्त दुखों, अपराध बोधों और बंधनों को विसर्जित कर दो। होलिका की भस्म को अपने मस्तक पर धारण कर अभय हो जाओ। सामने देखो, चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा की स्वर्णिम ऊषा तुम्हारा स्वागत करने के लिए बाहें फैलाए खड़ी है। नवीन संवत्सर तुम्हारे जीवन में केवल नया वर्ष नहीं, अपितु एक संपूर्ण आध्यात्मिक कायाकल्प लेकर आ रहा है।
फाल्गुन मास का मूल दार्शनिक संदेश क्या है?
फाल्गुन मास का मूल दार्शनिक संदेश त्याग, विसर्जन, क्षमा, अहंकार का दहन और आगामी नव संवत्सर हेतु चित्त की पूर्ण शुद्धि है।
होली पर विविध रंगों के मिलन का क्या आध्यात्मिक अर्थ है?
सभी रंगों का अंत में एक ही रंग में विलीन हो जाना यह दर्शाता है कि संसार के समस्त बाह्य भेद, जाति, पद और रूप का अहंकार समाप्त होकर अंततः अद्वैत ब्रह्म में लीन हो जाता है।
होलिका दहन के पश्चात भस्म धारण करने का क्या रहस्य है?
होलिका की भस्म हमें देह की नश्वरता का स्मरण कराती है, जिससे वासनाएं शांत होती हैं और यह त्वचा को नकारात्मक ऊर्जा से सुरक्षित रखती है।
फाल्गुन मास और चैत्र मास के संधिकाल को क्यों महत्वपूर्ण माना गया है?
यह चांद्र संवत्सर के समापन और नवीन संवत्सर के प्राकट्य का समय होता है, जहां पुरानी ऊर्जा विसर्जित होकर नई जीवन ऊर्जा का संचार करती है।
इस 50 आलेखों की फाल्गुन साधना का अंतिम सार क्या है?
इसका अंतिम सार यह है कि प्रकृति के नियमों के अनुकूल आहार, नित्य पूजा, ग्रह शांति और प्रेमपूर्ण भक्ति के माध्यम से मनुष्य अपने जीवन को मोक्षमय बना सकता है।
पाएं अपनी सटीक कुंडली
कुंडली बनाएंअनुभव: 20
इनसे पूछें: Family Planning, Career
इनके क्लाइंट: Punjab, Haryana, Delhi
इस लेख को परिवार और मित्रों के साथ साझा करें
WELCOME TO
Right Decisions at the right time with ZODIAQ