By पं. नीलेश शर्मा
लंका विजय से पूर्व श्री राम द्वारा किया गया पावन व्रत

फाल्गुन मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी तिथि को सनातन पंचांग में विजया एकादशी के पावन नाम से जाना जाता है। यह पवित्र तिथि महाशिवरात्रि से ठीक पूर्व आती है और साधक को जीवन के समस्त आंतरिक तथा बाह्य संघर्षों पर विजय प्राप्त करने का आत्मिक बल प्रदान करती है। वैदिक ज्योतिष के अनुसार यह समय शीत ऋतु के अंतिम चरण और वसंत के पदार्पण का संधिकाल होता है, जब सूर्य देव कुंभ राशि में संचरण करते हैं। इस दिन भगवान लक्ष्मीनारायण के संयुक्त विग्रह की पूजा सप्तधान्य की वेदी पर मंगल कलश स्थापित करके करने का विधान शास्त्रों में प्रस्तुत किया गया है।
| पंचांग घटक | शास्त्रीय विवरण |
|---|---|
| मास एवं पक्ष | फाल्गुन मास, कृष्ण पक्ष |
| पावन तिथि | कृष्ण पक्ष एकादशी तिथि |
| अधिष्ठाता देवता | भगवान लक्ष्मीनारायण व श्री रामचंद्र |
| प्रमुख व्रत विधान | सप्तधान्य वेदी निर्माण, मंगल कलश स्थापन, अहोरात्र उपवास |
| प्रमुख नैवेद्य | ऋतु फल, माखन मिश्री, पंचामृत और तुलसी दल |
| व्रत का मुख्य फल | समस्त शत्रुओं का शमन, मुकदमों में विजय और मोक्ष |
विजया एकादशी का संपूर्ण आध्यात्मिक और भौतिक फल प्राप्त करने के लिए प्रत्येक साधक को दशमी तिथि की संध्या से ही शास्त्रीय मर्यादाओं का निष्ठापूर्वक पालन करना चाहिए।
स्कंद पुराण और पद्म पुराण में विजया एकादशी के प्रादुर्भाव और उसकी महत्ता का अत्यंत विशद आख्यान प्राप्त होता है। जब मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्री रामचंद्र माता सीता की खोज करते हुए दक्षिण समुद्र के तट पर पहुंचे, तब उनके समक्ष उस अगाध और भयंकर जलराशि को पार करने की विकट चुनौती खड़ी थी। रावण की विशाल राक्षस सेना और लंका के अजेय दुर्ग को देखकर सुग्रीव, लक्ष्मण और संपूर्ण वानर सेना महाबली समुद्र को पार करने के उपाय को लेकर अत्यंत चिंतित थे।
उस समय भगवान श्री राम ने निकट ही निवास करने वाले त्रिकालदर्शी महर्षि बकदालभ्य के आश्रम में जाकर उनका मार्गदर्शन प्राप्त किया। महर्षि बकदालभ्य ने हाथ जोड़कर प्रभु से कहा कि यद्यपि आप स्वयं साक्षात परब्रह्म नारायण हैं और आपकी केवल भृकुटि विलास से संपूर्ण ब्रह्मांड का लय हो सकता है, तथापि लौकिक मर्यादा की रक्षा और भावी संतानों को मार्ग दिखाने के लिए आपको फाल्गुन कृष्ण एकादशी का विधिवत व्रत अनुष्ठान करना चाहिए। महर्षि के आदेशानुसार भगवान श्री राम ने अपनी समस्त वानर और भालू सेना के साथ समुद्र तट पर कलश स्थापित करके विजया एकादशी का उपवास रखा।
इस व्रत के पुण्य प्रभाव से समुद्र देव ने प्रकट होकर भगवान श्री राम को सेतु निर्माण का मार्ग प्रशस्त किया। नल और नील के माध्यम से पत्थरों पर राम नाम अंकित करके रामसेतु का निर्माण हुआ और अंततः धर्म की अधर्म पर, सत्य की असत्य पर और श्री राम की रावण पर ऐतिहासिक विजय ध्वजा फहराई गई। यह प्रसंग यह प्रमाणित करता है कि जब परिस्थितियां अत्यंत विषम हों और मानव के संपूर्ण भौतिक प्रयास निष्फल प्रतीत होने लगें, तब एकादशी का यह आध्यात्मिक अनुष्ठान असंभव को भी संभव बना देता है।
वैदिक ज्योतिष में एकादशी तिथि का अधिष्ठाता स्वयं भगवान विष्णु को माना गया है और इस दिन चंद्रमा का एकादश स्थान साधक के मन को इंद्रियों के भटकाव से खींचकर आत्मा में स्थिर करने में सहायता करता है। जीवन में जब किसी व्यक्ति की जन्म कुंडली में षष्ठ भाव अर्थात रोग, ऋण और शत्रु का भाव अत्यधिक पीड़ित हो जाए, अथवा दशमेश और लग्नेश निर्बल होकर कार्यों में पराजय देने लगें, तो विजया एकादशी का व्रत एक अभेद्य रक्षा कवच का निर्माण करता है।
यह व्रत व्यक्ति के मन में छिपे हुए आंतरिक शत्रुओं काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद और मत्स्य का शमन करता है। जब आंतरिक दुर्गुण शांत हो जाते हैं, तो बाह्य संसार के विरोधी स्वतः प्रभावहीन होने लगते हैं। कोर्ट कचहरी के उलझे हुए मुकदमों, पैतृक संपत्ति के विवादों, प्रतियोगी परीक्षाओं के तनाव और प्रशासनिक अड़चनों से मुक्ति पाने के लिए इस दिन भगवान श्री राम के समक्ष विजय स्तोत्र और रामरक्षा स्तोत्र का 11 बार पाठ करना अचूक उपाय सिद्ध होता है।
| जीवन का संघर्ष क्षेत्र | संबंधित शास्त्रीय अनुष्ठान | अभीष्ट आध्यात्मिक फल |
|---|---|---|
| कोर्ट कचहरी व मुकदमा | कलश पर तांबे का सिक्का रखकर विष्णु सहस्रनाम पाठ | मुकदमों में सत्य की विजय और विवाद समाप्ति |
| प्रतियोगी परीक्षा व नौकरी | भगवान विष्णु को पीले कनेर के पुष्प और बेसन के लड्डू | बुद्धि का विकास और परीक्षा में उत्तम सफलता |
| पारिवारिक व शत्रु षड्यंत्र | ॐ नमो भगवते वासुदेवाय मंत्र का 11 माला जप | षड्यंत्रों का समूल नाश और शांति की स्थापना |
| आर्थिक संकट व ऋण भार | तुलसी दल पर पीला चंदन लगाकर श्री हरि को अर्पण | ऋणों से मुक्ति और अटूट धन संपदा की प्राप्ति |
विजया एकादशी की पूजा में षोडशोपचार विधि का विशेष महत्व है। कलश स्थापना के उपरांत भगवान को पंचामृत से स्नान कराया जाता है जिसमें दूध, दही, घी, शहद और शर्करा का मिश्रण होता है। इसके पश्चात शुद्ध जल और गंगाजल से स्नान कराकर नवीन पीले वस्त्र समर्पित किए जाते हैं। भगवान श्री हरि को गोपी चंदन का तिलक लगाकर अक्षत के स्थान पर श्वेत तिल अर्पित किए जाते हैं क्योंकि एकादशी के दिन अक्षत अर्थात चावल का स्पर्श और उपयोग शास्त्रों में पूर्णतः निषिद्ध बताया गया है।
पूजा के मध्य में विजया एकादशी की पावन व्रत कथा का श्रवण अथवा पठन अवश्य करना चाहिए। कथा सुनते समय हाथ में तिल और पुष्प रखने का विधान है। कथा की समाप्ति पर भगवान की आरती कर्पूर और गाय के घी के दीपक से की जाती है। इस दिन तुलसी पत्र का स्पर्श करना अथवा उन्हें तोड़ना वर्जित होता है, इसलिए पूजा के लिए तुलसी दल एक दिन पूर्व अर्थात दशमी को ही तोड़कर रख लेने चाहिए। जो साधक इस दिन जल का एक बूंद भी ग्रहण किए बिना निर्जल व्रत रखते हैं, उन्हें वाजपेय यज्ञ के समान महापुण्य की प्राप्ति होती है।
एकादशी व्रत की पूर्णता द्वादशी तिथि के सूर्योदय के पश्चात होने वाले पारण विधान पर निर्भर करती है। शास्त्रों के अनुसार यदि द्वादशी तिथि समाप्त होने से पूर्व पारण न किया जाए, तो एकादशी व्रत का संपूर्ण पुण्य फल निष्फल हो जाता है। पारण के दिन प्रातः काल पुनः स्नान करके भगवान विष्णु की संक्षिप्त पूजा करनी चाहिए और उसके पश्चात किसी सुपात्र विद्वान ब्राह्मण अथवा निर्धन व्यक्ति को कलश, उस पर रखे धान्य, पीले वस्त्र और यथाशक्ति दक्षिणा का दान करना चाहिए।
दान के उपरांत ही तुलसी दल मिश्रित चरणामृत और सात्विक भोजन से व्रत खोलना चाहिए। विजया एकादशी हमें यह सर्वोच्च आध्यात्मिक संदेश देती है कि संसार का कोई भी संकट, कोई भी शत्रु और कोई भी विपत्ति मनुष्य के दृढ़ आत्मबल और भगवद् विश्वास से बड़ी नहीं हो सकती। जब व्यक्ति धर्म के मार्ग पर चलते हुए ईश्वर को अपना सारथी बना लेता है, तो विजय उसका स्वाभाविक और जन्मसिद्ध अधिकार बन जाती है। यह पावन व्रत जीवन की संपूर्ण निराशा को आशा और अदम्य विजय भाव में रूपांतरित कर देता है।
विजया एकादशी का व्रत किस मुख्य प्रयोजन के लिए किया जाता है?
यह व्रत जीवन के असाध्य संकटों, कोर्ट कचहरी के मुकदमों, शत्रु बाधाओं और कठिन परीक्षाओं में निश्चित विजय प्राप्त करने के लिए किया जाता है।
भगवान श्री राम ने विजया एकादशी का व्रत किसके परामर्श पर किया था?
मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्री राम ने लंका पर चढ़ाई करने से पूर्व समुद्र तट पर महर्षि बकदालभ्य के दिव्य परामर्श पर यह व्रत रखा था।
विजया एकादशी पर सप्तधान्य और कलश स्थापना का क्या नियम है?
वेदी पर सात अन्नों को बिछाकर उन पर मंगल कलश स्थापित किया जाता है और उसके ऊपर पूर्णपात्र रखकर भगवान विष्णु की प्रतिमा पूजी जाती है।
एकादशी के दिन चावल खाना क्यों वर्जित माना गया है?
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार एकादशी के दिन महर्षि मेधा के अंश से अन्न में जीव भाव उत्पन्न होता है, इसलिए चावल का सेवन निषेध है।
विजया एकादशी के व्रत का पारण कब और कैसे करना चाहिए?
द्वादशी तिथि के समाप्त होने से पूर्व स्नान, ब्राह्मण भोजन और कलश दान संपन्न करके ही तुलसी युक्त जल से सात्विक पारण करना चाहिए।
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