By पं. संजीव शर्मा
वर्ष के अंतिम महीने में पुरानी कड़वाहटों को भुलाने का संदेश

सनातन वैदिक काल गणना में संवत्सर केवल सौर और चांद्र गति का साधारण पैमाना नहीं है, अपितु यह कालपुरुष का साक्षात देह स्वरूप माना जाता है। फाल्गुन मास की पूर्णिमा तिथि और तत्पश्चात कृष्ण पक्ष का अवसान चांद्र संवत्सर का बारहवां तथा अंतिम चरण होता है। वैदिक पंचांग के अनुसार यह कालखंड संपूर्ण ब्रह्मांडीय ऊर्जा के एक चक्र की पूर्णता और नवीन संवत्सर के प्राकट्य के मध्य का अत्यंत संवेदनशील महा संधिकाल है। ऋग्वेद, शतपथ ब्राह्मण और काल विधान ग्रंथों में स्पष्ट उल्लेख मिलता है कि जिस प्रकार दिन के अवसान पर संध्या वेला में आत्म शुद्धि और गायत्री उपासना का विधान है, उसी प्रकार संपूर्ण वर्ष के अवसान पर फाल्गुन मास में संपूर्ण वर्ष के कर्मों के शोधन, प्रायश्चित और आत्म मंथन का विधान शास्त्रों ने अनिवार्य किया है।
| पंचांग व दार्शनिक घटक | शास्त्रीय विवरण |
|---|---|
| संवत्सर संधिकाल | फाल्गुन मास का अंतिम पक्ष (द्वादश मास का समापन) |
| खगोलीय स्थिति | सूर्य देव का कुंभ से मीन राशि में गमन व वर्ष की अंतिम पूर्णिमा |
| अधिष्ठाता सत्ता | कालपुरुष, महाकाल, अग्नि देव और सत्यनारायण |
| तात्विक स्वरूप | विसर्जन, क्षमा, संचित कर्म शोधन और नवीन सृजन का बीज |
| प्रधान साधना | आत्म मंथन, मौन ध्यान, क्षमा याचना, प्रायश्चित और दान |
| मुख्य धार्मिक अनुष्ठान | होलिका अग्नि में दुर्भावनाओं का हवन और धूलि वंदन |
| आध्यात्मिक फल | चित्त के भार से मुक्ति, आभामंडल का शुद्धिकरण और नवजीवन |
वर्ष के इस पावन समापन काल में अपने अंतःकरण को कलुष से मुक्त करने और आगामी नव संवत्सर के स्वागत हेतु साधक को ब्रह्म मुहूर्त से ही विशिष्ट वैदिक अनुशासन का निष्ठापूर्वक पालन करना चाहिए।
फाल्गुन मास में जब प्रकृति की ओर दृष्टि जाती है, तो संपूर्ण वनस्पति जगत एक परम गूढ़ और मूक उपदेश देता हुआ प्रतीत होता है। इस मास में वृक्ष अपने संपूर्ण पुराने, पीले, सूखे और जीर्ण पत्तों को बिना किसी संकोच, प्रतिरोध अथवा शोक के धरती पर गिरा देते हैं। इसे सामान्य भाषा में पतझड़ कहा जाता है, परंतु वैदिक दर्शन में इसे त्याग और विसर्जन की सर्वोच्च अवस्था स्वीकार किया गया है।
वृक्ष भली भांति जानते हैं कि यदि वे उन पुराने और सूखे पत्तों से मोह बनाए रखेंगे, तो उन पर वसंत की ताजी, हरी और कोमल कोपलों का प्रस्फुटन कभी नहीं हो सकेगा। जब तक पुरानी ऊर्जा का विसर्जन नहीं होता तब तक नवीन दिव्य ऊर्जा के लिए स्थान नहीं बनता।
दुर्भाग्यवश मनुष्य प्रकृति के इस सहज नियम को भूल जाता है। मनुष्य वर्षों पुरानी कड़वाहटों, अपमानों, पारिवारिक विवादों और कटु स्मृतियों को अपने अवचेतन मन में एक भारी शिला की भांति बांधकर ढोता रहता है। फाल्गुन का संवत्सर समापन मनुष्य को यह आह्वान करता है कि वह भी वृक्षों की भांति अपने मन के उन सभी सूखे और सड़े हुए विचारों को झाड़कर फेंक दे जिन्होंने उसके अंतःकरण को विषाक्त बना रखा है। जब हृदय इन मानसिक कूड़े करकट से खाली होगा, तभी आगामी चैत्र मास के नववर्ष में ईश्वरीय आनंद और प्रेम के नवीन पुष्प खिल सकेंगे।
आधुनिक मनोविज्ञान जिसे आत्म निरीक्षण और मानसिक विरेचन कहता है, सनातन वैदिक ऋषियों ने सहस्रों वर्ष पूर्व उसे आत्म मंथन और आत्म समीक्षा की संज्ञा दी थी। फाल्गुन मास का यह अंतिम पड़ाव अपनी आत्मा की अदालत में खड़े होकर स्वयं का निष्पक्ष न्याय करने का समय है।
| आत्म मंथन का आयाम | सामान्य सांसारिक स्थिति | संवत्सर समापन पर शोधन की विधि | प्राप्त होने वाला आध्यात्मिक रूपांतरण |
|---|---|---|---|
| वाचिक कर्म (वाणी के पाप) | कटु वचन, चुगली, असत्य भाषण | मौन व्रत धारण करना व क्षमा प्रार्थना | वाणी में सौम्यता व वाक् शुद्धि |
| मानसिक कर्म (मन के विचार) | ईर्ष्या, द्वेष, दूसरों का अनिष्ट सोचना | ध्यान, नाम जप व सर्वकल्याण की भावना | चित्त की शांति व मानसिक तनाव मुक्ति |
| कायिक कर्म (शरीर के कर्म) | प्रमाद, आलस्य, हिंसा व अपवित्रता | उपवास, तीर्थ स्नान व शारीरिक सेवा | शारीरिक लाघव व ओज का विस्तार |
| आर्थिक कर्म (धन का व्यवहार) | बेईमानी, संकीर्णता व लोभ | दशांश दान, निर्धनों को भोजन व वस्त्र | धन की शुद्धि व स्थिर लक्ष्मी का वास |
आत्म मंथन की शास्त्रीय विधि में साधक को रात्रि के समय एकांत में बैठकर एक श्वेत पत्र पर उन समस्त दुर्गुणों और भूलों को लिखना चाहिए जो उसने इस वर्ष में की हैं। इसके पश्चात उस पत्र को देखते हुए पश्चाताप के अश्रुओं से अपने हृदय को धोना चाहिए और अंत में उस पत्र को होलिका की पावन अग्नि में इस भाव से समर्पित कर देना चाहिए कि मेरे ये विकार अब भस्म हो चुके हैं। यह क्रिया अवचेतन मन पर पड़े हुए भारी तनाव को एक ही क्षण में समाप्त कर देती है।
सनातन धर्म में क्षमा को वीरों का सबसे बड़ा आभूषण कहा गया है। महाभारत के वन पर्व में भगवान वेदव्यास कहते हैं कि क्षमा ही धर्म है, क्षमा ही यज्ञ है, क्षमा ही सत्य है और क्षमा ही संपूर्ण ब्रह्मांड का मूल आधार है। फाल्गुन मास के संवत्सर समापन का चरमोत्कर्ष होलिका दहन और धुलेंडी के मध्य घटित होने वाला क्षमा भाव है।
होलिका दहन की पावन अग्नि में जब पुरानी दुर्भावनाएं जलकर भस्म हो जाती हैं तब धुलेंडी के पावन प्रभात पर शत्रु भी गले मिलकर एक दूसरे को रंग लगाते हैं। यह कोई साधारण औपचारिकता नहीं है। यह अंतःकरण से क्षमा करने और क्षमा मांगने का एक महा अनुष्ठान है।
जब तक मनुष्य किसी व्यक्ति के प्रति अपने मन में घृणा और प्रतिशोध की भावना पाले रहता है तब तक वह उस व्यक्ति का नहीं, अपितु स्वयं का विनाश कर रहा होता है। घृणा एक ऐसा विष है जिसे पीता स्वयं मनुष्य है और अपेक्षा यह करता है कि सामने वाला मरे।
क्षमा मांगने के लिए परम विनम्रता की आवश्यकता होती है और क्षमा करने के लिए अत्यंत विशाल हृदय की। फाल्गुन मास मनुष्य को यह सामर्थ्य प्रदान करता है कि वह कहे कि विगत वर्ष में मुझसे जाने अनजाने जो भी अपराध हुए हों, उसके लिए मैं हाथ जोड़कर क्षमा प्रार्थी हूं और जिसने मेरा अहित किया है, उसे मैं प्रभु का विधान मानकर मुक्त करता हूं। जिस क्षण यह भाव हृदय में जाग्रत होता है, उसी क्षण मनुष्य के सात जन्मों के कर्म बंधन कट जाते हैं।
वैदिक संहिताओं में प्रत्येक गृहस्थ के लिए प्रतिदिन पंच महायज्ञ ब्रह्म यज्ञ, देव यज्ञ, पितृ यज्ञ, भूत यज्ञ और नृ यज्ञ करने का आदेश दिया गया है। परंतु सांसारिक व्यस्तताओं, प्रमाद और अज्ञान के कारण सामान्य गृहस्थ पूरे वर्ष इन यज्ञों का विधिवत पालन नहीं कर पाता। फाल्गुन मास का समापन काल वर्षभर की इस त्रुटि की पूर्ति करने का अंतिम अवसर होता है।
इस संधिकाल में संचित कर्मों के प्रायश्चित हेतु निम्नलिखित आचार संहिता का पालन अनिवार्य बताया गया है:
इन पंच महायज्ञों के समापन से मनुष्य का कर्म चक्र संतुलित हो जाता है और वह किसी भी प्रकार के अदृश्य ऋण के बिना नवीन संवत्सर में प्रवेश करने का अधिकारी बन जाता है।
फाल्गुन का समापन केवल एक अंत नहीं है, यह एक भव्य और दिव्य नव शुभारंभ की पूर्व पीठिका है। चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि को जब सनातन नववर्ष का प्रथम सूर्य उदित होता है तब प्रकृति अपने संपूर्ण नवसृजन के साथ उपस्थित होती है। उस नवप्रभात का स्वागत वही साधक कर सकता है जिसने फाल्गुन के इस अंतिम कालखंड में अपनी संपूर्ण आंतरिक और बाह्य शुद्धि संपन्न कर ली हो।
जिस प्रकार किसी अत्यंत सम्मानित और प्रिय अतिथि के आगमन से पूर्व हम अपने संपूर्ण घर की गहन सफाई करते हैं, दीवारों का रंग रोगन करते हैं और पुराने टूटे फूटे सामान को बाहर फेंक देते हैं, उसी प्रकार नव संवत्सर रूपी दिव्य अतिथि के स्वागत के लिए हमें अपने अंतःकरण के गृह को स्वच्छ करना होगा।
अपने चित्त से काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद और मत्सर के जालों को ज्ञान के झाड़ू से साफ कर लें। अपने हृदय के आंगन को प्रेम और करुणा के जल से धो लें। अपनी वाणी को सत्य और मिठास के चंदन से सुवासित कर लें। जब ऐसा निर्मल अंतःकरण तैयार होता है तब चैत्र मास की नवरात्रि और नव संवत्सर का प्राकट्य मनुष्य के जीवन में केवल एक नया वर्ष नहीं लाता, अपितु उसके संपूर्ण जीवन का दिव्य कायाकल्प कर देता है।
संवत्सर समापन किस मास में होता है?
सनातन वैदिक पंचांग के अनुसार संपूर्ण चांद्र संवत्सर का समापन फाल्गुन मास के अंतिम पक्ष अर्थात फाल्गुन पूर्णिमा और अमावस्या के संधिकाल में होता है।
पतझड़ का आध्यात्मिक संदेश क्या है?
पतझड़ यह सिखाता है कि जिस प्रकार वृक्ष नए पत्तों के आने के लिए पुराने पत्तों को त्याग देते हैं, उसी प्रकार मनुष्य को भी नई चेतना के लिए पुरानी कड़वाहटों का विसर्जन करना चाहिए।
संवत्सर समापन पर क्षमा याचना क्यों आवश्यक मानी गई है?
वर्षभर के संचित वैमनस्य, कटु वचनों और ईर्ष्या को क्षमा के माध्यम से नष्ट करने से चित्त का भार हल्का होता है और नए वर्ष में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।
होलिका दहन में आंतरिक बुराइयों की आहुति कैसे दी जाती है?
एक कागज पर अपने दुर्गुणों और भूलों को लिखकर पश्चाताप के साथ होलिका की पावन अग्नि में यह प्रार्थना करते हुए समर्पित किया जाता है कि ये विकार सदा के लिए भस्म हो जाएं।
नव संवत्सर के स्वागत से पूर्व पंच महायज्ञ का क्या महत्व है?
पंच महायज्ञों की पूर्ति करने से वर्षभर के जाने अनजाने पाप और पांचों ऋण देव, पितृ, ऋषि, भूत और मनुष्य ऋण शांत हो जाते हैं।
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