By पं. अमिताभ शर्मा
अशुभ कालों को समझें और शुभ समय चुनें

यह लेख चंद्र राशि के आधार पर तैयार किया गया है। अपनी चंद्र राशि जानने के लिए अपने जन्म समय पर चंद्रमा की स्थिति देखें। चंद्र राशि जन्म कुंडली में चंद्रमा जिस राशि में स्थित होता है, वही आपकी चंद्र राशि होती है। यह लग्न राशि से भिन्न हो सकती है।
वैदिक ज्योतिष में किसी भी महत्वपूर्ण कार्य को प्रारंभ करने से पहले शुभ मुहूर्त का चयन अत्यंत आवश्यक माना जाता है। मुहूर्त का अर्थ होता है वह विशेष समय जब ग्रहों की स्थिति अनुकूल हो और कार्य की सफलता सुनिश्चित हो सके। प्राचीन ऋषियों ने समझा था कि समय केवल घड़ी की सुइयों का खेल नहीं है बल्कि प्रत्येक क्षण ब्रह्मांड की विशेष ऊर्जा से भरा होता है। जब हम अपने कार्यों को इस ब्रह्मांडीय लय के साथ समन्वित कर लेते हैं तब सफलता स्वाभाविक रूप से मिलती है। परंतु मुहूर्त निर्धारण में सबसे पहला और महत्वपूर्ण कदम होता है अशुभ समय खंडों को पहचानना और उनसे बचना। इन अशुभ कालों में राहु काल और गुलिका काल सबसे प्रमुख माने जाते हैं।
राहु काल प्रतिदिन लगभग डेढ़ घंटे का एक विशेष समय खंड होता है जो छाया ग्रह राहु के शासन में आता है। वैदिक ज्योतिष में राहु को स्वाभाविक रूप से अशुभ ग्रह माना गया है क्योंकि यह भ्रम, धोखा, अस्पष्टता और अप्रत्याशित बाधाओं का कारक होता है। राहु का स्वभाव माया और छल से भरा होता है जिसके कारण इसके काल में शुरू किया गया कोई भी नया कार्य अपने इच्छित परिणाम तक नहीं पहुंच पाता। प्राचीन मान्यता के अनुसार राहु काल में यदि कोई वस्तु खो जाए तो वह कभी नहीं मिलती। इस समय में लिए गए निर्णय भ्रामक होते हैं और आगे चलकर पश्चाताप का कारण बनते हैं।
गुलिका काल भी प्रतिदिन लगभग डेढ़ घंटे का एक विशेष समय खंड है जो शनि के उपग्रह गुलिक के अधीन माना जाता है। गुलिक को शनि का पुत्र कहा जाता है और शनि चूंकि धीमी गति, विलंब, कठिनाई और पुनरावृत्ति का कारक ग्रह है इसलिए गुलिका काल में शुरू किया गया कोई भी कार्य दोबारा होने की संभावना रखता है। उदाहरण के लिए यदि कोई व्यक्ति गुलिका काल में ऋण लेता है तो उसे बार बार कर्ज में फंसने की स्थिति आ सकती है।
राहु काल और गुलिका काल के अतिरिक्त यमगंडम या यम घंटा भी एक अशुभ काल खंड है जिसे मुहूर्त चयन में टालना चाहिए। यह समय यमराज के अधीन माना जाता है और अनुकूल परिणाम नहीं देता।
राहु काल और गुलिका काल की गणना के लिए सबसे पहले स्थानीय सूर्योदय और सूर्यास्त का समय जानना आवश्यक होता है। यह समय हर दिन और हर स्थान के लिए भिन्न होता है क्योंकि यह भौगोलिक स्थिति और ऋतु पर निर्भर करता है।
राहु काल और गुलिका काल की गणना की पारंपरिक विधि यह है कि सूर्योदय से सूर्यास्त तक के समय को आठ समान भागों में विभाजित किया जाता है। प्रत्येक भाग लगभग नब्बे मिनट का होता है लेकिन यह ऋतु के अनुसार थोड़ा घट या बढ़ सकता है।
राहु काल का समय सप्ताह के प्रत्येक दिन के लिए अलग होता है। सोमवार को दिन का दूसरा भाग राहु काल होता है। शनिवार को तीसरा भाग। शुक्रवार को चौथा भाग। बुधवार को पांचवां भाग। गुरुवार को छठा भाग। मंगलवार को सातवां भाग और रविवार को आठवां अंतिम भाग राहु काल होता है।
गुलिका काल भी आठ भागों वाली गणना का पालन करता है परंतु इसका क्रम राहु काल से भिन्न होता है। शनिवार को पहला भाग गुलिका काल होता है। शुक्रवार को दूसरा भाग। गुरुवार को तीसरा भाग। बुधवार को चौथा भाग। मंगलवार को पांचवां भाग। सोमवार को छठा भाग और रविवार को सातवां भाग गुलिका काल होता है।
| वार | राहु काल समय | गुलिका काल समय | यमगंडम काल समय |
|---|---|---|---|
| रविवार | सायं चार बजकर तीस मिनट से छह बजे तक | सायं तीन बजे से साढ़े चार बजे तक | दोपहर बारह बजे से डेढ़ बजे तक |
| सोमवार | प्रातः साढ़े सात बजे से नौ बजे तक | दोपहर डेढ़ बजे से तीन बजे तक | दोपहर साढ़े दस बजे से बारह बजे तक |
| मंगलवार | दोपहर तीन बजे से साढ़े चार बजे तक | दोपहर बारह बजे से डेढ़ बजे तक | प्रातः नौ बजे से साढ़े दस बजे तक |
| बुधवार | दोपहर बारह बजे से डेढ़ बजे तक | सुबह साढ़े दस बजे से बारह बजे तक | प्रातः साढ़े सात बजे से नौ बजे तक |
| गुरुवार | दोपहर डेढ़ बजे से तीन बजे तक | प्रातः नौ बजे से साढ़े दस बजे तक | प्रातः छह बजे से साढ़े सात बजे तक |
| शुक्रवार | सुबह साढ़े दस बजे से बारह बजे तक | प्रातः साढ़े सात बजे से नौ बजे तक | दोपहर तीन बजे से साढ़े चार बजे तक |
| शनिवार | प्रातः नौ बजे से साढ़े दस बजे तक | प्रातः छह बजे से साढ़े सात बजे तक | दोपहर डेढ़ बजे से तीन बजे तक |
यह सारणी केवल सामान्य संदर्भ है। वास्तविक समय के लिए स्थानीय पंचांग का उपयोग करें।
मुहूर्त चयन में सबसे पहला कदम है अपने कार्य का उद्देश्य पूर्णतः स्पष्ट करना। विभिन्न प्रकार के कार्यों के लिए अलग ग्रह स्थितियां अनुकूल मानी जाती हैं।
पंचांग में पांच प्रमुख तत्व होते हैं। तिथि, वार, नक्षत्र, योग और करण। इन पांचों तत्वों का समुचित संयोजन ही शुभ मुहूर्त बनाता है।
राहु काल, गुलिका काल और यमगंडम काल की सटीक गणना करें। इसके अलावा दुर्मुहूर्तम, वर्ज्यम, गंडांत और विष घटी को भी टालें।
शुक्ल पक्ष की तिथियां नए कार्य के लिए अनुकूल होती हैं। द्वितीया, तृतीया, पंचमी, सप्तमी, दशमी, एकादशी और पूर्णिमा शुभ मानी जाती हैं।
रोहिणी, मृगशिरा, पुष्य, उत्तरा फाल्गुनी, हस्त, चित्रा, स्वाती, अनुराधा, उत्तराषाढ़ा, श्रवण, उत्तरा भाद्रपद और रेवती जैसे नक्षत्र अधिकांश कार्यों के लिए शुभ होते हैं।
रविवार अधिकार संबंधी कार्यों के लिए, सोमवार भावनात्मक और पारिवारिक कार्यों के लिए, बुधवार व्यापार और शिक्षा के लिए, गुरुवार धार्मिक कार्यों और विवाह के लिए और शुक्रवार कला और विवाह के लिए अनुकूल है।
सिद्धि योग, अमृत योग जैसे शुभ योगों का चयन करें। बव, बालव, कौलव, तैतिल और गर करण अधिकांश कार्यों के लिए उपयुक्त हैं।
लग्न में पाप ग्रह न हों। गुरु मजबूत स्थिति में हो। चंद्रमा शुभ प्रभाव में हो। लग्नेश बली हो।
शुभ ग्रहों की होरा चुनें। शुभ, अमृत, चर और लाभ चौघड़िया में मुहूर्त रखें।
सभी शर्तें पूरी करने वाले दो से तीन समय खंड चुनें और सबसे उत्तम का चयन करें।
महत्वपूर्ण कार्यों के लिए अनुभवी ज्योतिषी से अवश्य परामर्श लें जो जन्म कुंडली के साथ मुहूर्त का समन्वय कर सके।
नंदा तिथियां शुक्रवार को, भद्रा तिथियां बुधवार को, जया तिथियां मंगलवार को आने पर सिद्ध योग बनता है। अमृत योग नंदा तिथियां रविवार को आने पर बनता है।
रोहिणी और शुक्रवार का संयोग विवाह के लिए श्रेष्ठ है। पुष्य और गुरुवार का संयोग धार्मिक कार्यों के लिए उत्तम है।
द्वितीया और रोहिणी का संयोग कृषि के लिए, पंचमी और मृगशिरा का संयोग शिक्षा के लिए अनुकूल है।
हनुमान चालीसा का पाठ करें। मीठा या दही का सेवन करें। दस कदम पीछे चलें। कुलदेवता को प्रार्थना करें।
चल रहे कार्य और नियमित गतिविधियां इन कालों से प्रभावित नहीं होतीं। केवल नए महत्वपूर्ण कार्यों की शुरुआत टालें।
रविवार, मंगलवार और शनिवार को राहु काल का प्रभाव अधिक तीव्र होता है।
शास्त्रीय नियमों के साथ स्थानीय मान्यताओं का भी ध्यान रखें।
ऑनलाइन पंचांग और ज्योतिष सॉफ्टवेयर का उपयोग करें परंतु महत्वपूर्ण निर्णयों के लिए ज्योतिषी से परामर्श लें।
स्थानीय सूर्योदय सूर्यास्त के अनुसार प्रतिदिन की गणना करें। स्थिर समय पर निर्भर न रहें।
चयनित मुहूर्त को अशुभ कालों के साथ बारीकी से जांचें।
अशुभ कालों से बचना पर्याप्त नहीं। सकारात्मक ग्रह योग भी आवश्यक हैं।
कार्य की शुरुआत मुहूर्त समय में होनी चाहिए न कि समाप्ति।
रात्रि में कार्य करने पर रात्रि के लिए अलग गणना करें।
वर वधू की कुंडली मिलान आवश्यक है। शुक्र और गुरु अनुकूल हों। सप्तम भाव शुद्ध हो। स्थिर लग्न हो।
बुध और गुरु बली हों। द्वितीय और एकादश भाव के स्वामी मजबूत हों। बुधवार या गुरुवार उत्तम है।
स्थिर लग्न हो। चतुर्थ भाव शुद्ध हो। गुरु अनुकूल स्थिति में हो। रविवार या गुरुवार शुभ है।
बुध और गुरु शुभ हों। पंचमी तिथि श्रेष्ठ है। बुधवार और गुरुवार अनुकूल हैं।
चर लग्न हो। मंगल और चंद्र अनुकूल हों। अश्विनी, पुष्य और हस्त नक्षत्र उत्तम हैं।
राहु काल प्रतिदिन कितने समय का होता है?
राहु काल प्रतिदिन लगभग नब्बे मिनट का होता है परंतु यह ऋतु और स्थान के अनुसार भिन्न हो सकता है।
क्या चल रहे काम राहु काल में जारी रख सकते हैं?
हां, पहले से चल रहे काम और नियमित गतिविधियां जारी रखी जा सकती हैं। केवल नए कार्यों की शुरुआत टालें।
गुलिका काल राहु काल से कैसे अलग है?
गुलिका काल पुनरावृत्ति का कारक है जबकि राहु काल भ्रम का। दोनों की गणना विधि समान है परंतु सप्ताह के दिनों का क्रम भिन्न है।
क्या सभी कार्यों के लिए ज्योतिषी आवश्यक है?
छोटे कार्यों के लिए पंचांग देखकर स्वयं चुन सकते हैं परंतु विवाह और व्यापार जैसे महत्वपूर्ण कार्यों के लिए ज्योतिषी से परामर्श लाभदायक है।
कौन से दिन राहु काल सबसे शक्तिशाली है?
रविवार, मंगलवार और शनिवार को राहु काल का प्रभाव विशेष रूप से तीव्र होता है।
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