By पं. संजीव शर्मा
मंत्र, ध्यान एवं आध्यात्मिक साधना द्वारा राहु ऊर्जा का रूपांतरण

यह लेख चंद्र राशि के आधार पर तैयार किया गया है। वैदिक ज्योतिष में चंद्र राशि आपकी मानसिक एवं भावनात्मक प्रकृति को दर्शाती है। अपनी चंद्र राशि जानने के लिए आपको अपनी जन्म तिथि, सटीक जन्म समय और जन्म स्थान की आवश्यकता होती है, जिसे किसी विश्वसनीय पंचांग या ऑनलाइन चंद्र राशि कैलकुलेटर के माध्यम से ज्ञात किया जा सकता है।
राहु काल को पारंपरिक रूप से केवल एक अशुभ काल माना जाता है जिससे बचना चाहिए, परंतु वैदिक ज्ञान में ऐसे शक्तिशाली उपाय एवं ध्यान विधियां हैं जो इस काल की विघ्नकारी ऊर्जा को संतुलित कर सकती हैं। केवल इस डेढ़ घंटे के समय की प्रतीक्षा करने के स्थान पर व्यक्ति विशिष्ट मंत्रों, ध्यान एवं उपचारों के माध्यम से सक्रिय रूप से इसकी ऊर्जा को आध्यात्मिक संरेखण एवं आंतरिक शांति के अवसर में परिवर्तित कर सकता है। राहु काल के प्रभाव को केवल निष्क्रिय रूप से सहन करने के स्थान पर इसे रूपांतरण का अवसर बनाना वैदिक ज्योतिष की गहन समझ को दर्शाता है।
राहु काल में महारत का सर्वोच्च स्तर केवल परिहार नहीं अपितु इसकी ऊर्जा का सचेत रूपांतरण है। राहु भ्रम, भौतिक इच्छा तथा कर्म बंधन का प्रतिनिधित्व करता है, परंतु जब जागरूकता एवं आध्यात्मिक अनुशासन के साथ इसका सामना किया जाए तो यही गुण जागरण के उत्प्रेरक बन जाते हैं। राहु की प्रकृति छाया ऊर्जा की है जो छिपे हुए कारणों, अपरिचित प्रतिमानों तथा कर्म पाठों को प्रकट करती है। वृहत् पराशर होरा शास्त्र में राहु को माया का स्वामी बताया गया है जो मनुष्य को भ्रमित करता है परंतु साथ ही आध्यात्मिक जिज्ञासा भी जगाता है।
| राहु का पहलू | नकारात्मक प्रभाव | सकारात्मक रूपांतरण |
|---|---|---|
| मानसिक स्थिति | भ्रम, अनिश्चितता, चिंता | गहन अंतर्दृष्टि, आत्म जागरूकता |
| निर्णय क्षमता | अस्पष्टता, त्रुटियां | विवेकशीलता, धैर्य |
| कर्म पाठ | छिपी हुई बाधाएं | कर्म शुद्धि, आध्यात्मिक विकास |
| ऊर्जा प्रवाह | बाह्य गतिविधियों में रुकावट | आंतरिक साधना के लिए उत्तम समय |
राहु काल के उपायों एवं ध्यान का उद्देश्य राहु की छाया प्रभाव को कम करना, भ्रम को दूर करना तथा मानसिक केंद्रीकरण एवं ऊर्जा को स्पष्टता तथा सुरक्षा के लिए संरेखित करना है। ये उपाय भौतिक, ऊर्जात्मक, मनोवैज्ञानिक तथा आध्यात्मिक अनेक स्तरों पर कार्य करते हैं।
मंत्र ध्वनि कंपन हैं जो ऊर्जात्मक वातावरण को परिवर्तित कर सकते हैं। राहु काल के दौरान विशिष्ट मंत्रों का जाप राहु को शांत करने तथा इसके दुष्प्रभावों को कम करने का सशक्त उपाय है।
राहु बीज मंत्र राहु की ऊर्जा को संतुलित करने की सर्वाधिक प्रत्यक्ष एवं प्रभावशाली विधि है। यह मंत्र राहु के मूल स्वरूप को संबोधित करता है तथा उसकी अशुभता को शांत करता है।
मंत्र: ॐ भ्रां भ्रीं भ्रौं सः राहवे नमः
उच्चारण मार्गदर्शिका:
ॐ: सार्वभौमिक ध्वनि, ब्रह्म का प्रतीक
भ्रां: राहु के सार का आह्वान करने वाला बीज अक्षर
भ्रीं: सशक्तीकरण का बीज अक्षर
भ्रौं: सक्रियण का बीज अक्षर
सः: चेतना का तत्व
राहवे: राहु को समर्पित
नमः: नमस्कार, समर्पण
साधना विधि एवं नियम:
प्रतिदिन रुद्राक्ष या काले हकीक की माला से 108 बार जाप करें। काली माला का उपयोग राहु की प्रकृति से मेल खाता है तथा साधना को अधिक प्रभावी बनाता है। माला को दाहिने हाथ की मध्यमा अंगुली तथा अंगूठे के मध्य रखकर जाप करें।
सर्वोत्तम समय: राहु काल के दौरान ही या सूर्यास्त के पश्चात् संध्या काल में लगभग सायं 7 बजे। राहु काल में जाप करना विशेष फलदायी माना जाता है क्योंकि उस समय राहु की ऊर्जा सर्वाधिक सक्रिय होती है।
दिशा: जाप करते समय पश्चिम दिशा की ओर मुख करें। पश्चिम दिशा राहु से संबंधित है।
अवधि: अधिकतम लाभ के लिए बिना विराम के 40 दिन तक लगातार जाप करें। यदि किसी दिन छूट जाए तो पुनः आरंभ से गणना करनी चाहिए।
पूर्ण चक्र: परंपरागत ग्रंथों में 18 हजार जप या कलियुग में 72 हजार जप का विधान है। यह दीर्घकालिक साधना राहु के गहन कर्म प्रभाव को शांत करती है।
विशेष शक्ति: सूर्य ग्रहण या चंद्र ग्रहण के समय जाप करने से मंत्र की शक्ति कई गुना बढ़ जाती है। यदि संभव हो तो ग्रहण के दिन से 40 दिवसीय साधना आरंभ करें। ग्रहण में राहु की ऊर्जा चरम पर होती है अतः उस समय की गई साधना अत्यंत प्रभावशाली होती है।
जिन्हें बीज मंत्र कठिन लगे उनके लिए एक सरल विकल्प भी उपलब्ध है जो समान भक्ति के साथ किया जा सकता है।
मंत्र: ॐ रां राहवे नमः
यह छोटा मंत्र राहु उपासना के सार को धारण करता है तथा इसे भी प्रतिदिन 108 बार जपा जा सकता है। यह विशेषकर उन साधकों के लिए उपयुक्त है जो मंत्र साधना में नए हैं या जिनके पास समय कम है।
गहन आध्यात्मिक संबंध के लिए राहु गायत्री मंत्र अत्यंत प्रभावी है।
मंत्र: ॐ नागध्वजाय विद्महे पद्महस्ताय धीमहि तन्नो राहुः प्रचोदयात्
यह मंत्र राहु को सर्प ध्वजधारी के रूप में आह्वान करता है तथा उनसे मार्गदर्शन एवं प्रकाश की याचना करता है। नागध्वज का अर्थ है सर्प को ध्वजा के रूप में धारण करने वाला, जो राहु का प्रतीक है। पद्महस्त का अर्थ है कमल हस्त, जो शुभता का संकेत है। यह मंत्र राहु के शुभ पक्ष को जागृत करता है।
राहु काल ऐसी ध्यान साधनाओं के लिए आदर्श है जो मन को स्थिर करती हैं तथा अवचेतन विक्षोभों को कम करती हैं। राहु का प्रभाव तंत्रिका तंत्र को उत्तेजित करता है तथा मन में अशांति उत्पन्न करता है, अतः ध्यान इसका सबसे प्रभावी प्रतिकार है।
राहु का प्रभाव मानसिक अशांति एवं भ्रम उत्पन्न करता है। सचेत श्वास कार्य इसका सीधा प्रतिकार करता है तथा आंतरिक ऊर्जा को स्थिर कर मन को एक दृढ़ आधार प्रदान करता है।
नाड़ी शोधन प्राणायाम: यह राहु काल के लिए सर्वाधिक उपयुक्त प्राणायाम है क्योंकि यह सौर एवं चंद्र ऊर्जाओं को संतुलित करता है, जो राहु के साथ सूर्य एवं चंद्र के शाश्वत संघर्ष को संबोधित करता है।
विधि:
रीढ़ सीधी रखते हुए सुखासन या पद्मासन में बैठें। दाहिने हाथ के अंगूठे से दाहिनी नासिका बंद करें, बायीं नासिका से 4 की गिनती तक श्वास लें। श्वास को 4 की गिनती तक रोकें। अनामिका से बायीं नासिका बंद करें, दाहिनी से 4 की गिनती तक श्वास छोड़ें। दाहिनी नासिका से 4 की गिनती तक श्वास लें। 4 की गिनती तक रोकें। बायीं नासिका से 4 की गिनती तक श्वास छोड़ें। इसे 10 से 15 मिनट तक दोहराएं।
इस अभ्यास से मन शांत होता है, तंत्रिका तंत्र संतुलित होता है तथा राहु द्वारा उत्पन्न मानसिक उथल पुथल समाप्त होती है।
चूंकि राहु छाया स्व तथा भ्रम का प्रतिनिधित्व करता है, एक विशेष ध्यान इस ऊर्जा को रूपांतरित कर सकता है। यह ध्यान राहु के मनोवैज्ञानिक सार के साथ सीधे कार्य करता है, अचेतन प्रतिमानों को सचेत जागरूकता में परिवर्तित करता है।
विधि:
राहु काल के दौरान मंद प्रकाश वाले स्थान में बैठें। सरसों के तेल से एक दीपक जलाएं। आंखें बंद करें तथा राहु की कल्पना एक काले धुंधले सर्प के रूप में करें जो आपकी रीढ़ के आधार पर कुंडलित है। प्रत्येक श्वास के साथ छाया में चेतना को खींचने की कल्पना करें। प्रत्येक निःश्वास के साथ भय, आसक्ति तथा भ्रम को मुक्त करें। मानसिक रूप से दोहराएं: मैं अपनी छायाओं को स्वीकार करता हूं, मैं अपने अंधकार को एकीकृत करता हूं, मैं संपूर्ण हो जाता हूं। 20 मिनट तक जारी रखें।
यह ध्यान राहु की गहन मनोवैज्ञानिक प्रकृति के साथ कार्य करता है तथा डर, असुरक्षा एवं छिपे हुए कर्म पाठों को सचेत स्तर पर लाता है जहां उन्हें हल किया जा सकता है।
एकाग्रता विकसित करने तथा राहु के बिखराव प्रभाव को कम करने की शक्तिशाली विधि।
विधि:
नेत्र स्तर पर 2 से 3 फीट दूरी पर एक जलता हुआ दीपक रखें। तिल या सरसों के तेल का दीपक अधिक उपयुक्त है। पलक झपकाए बिना ज्योति पर स्थिर दृष्टि रखें जितनी देर तक सुविधाजनक हो। जब आंखों में पानी आ जाए तो उन्हें बंद करें तथा आज्ञा चक्र पर ज्योति की कल्पना करें। 3 से 5 चक्र दोहराएं। राहु मंत्र के साथ समाप्त करें।
यह अभ्यास एकाग्रता को सशक्त बनाता है, राहु की मानसिक अराजकता उत्पन्न करने की प्रवृत्ति का सीधा प्रतिकार करता है। नियमित अभ्यास से मन की चंचलता समाप्त होती है तथा धारणा शक्ति बढ़ती है।
राहु काल की ऊर्जा को संतुलित करने के लिए अनेक पारंपरिक अनुष्ठान उपाय प्रभावी हैं। ये उपाय राहु को प्रसन्न करते हैं तथा उसकी अशुभता को कम करते हैं।
यह सबसे सरल किंतु अत्यंत प्रभावी उपायों में से एक है।
विधि:
मिट्टी का दीपक लें। सरसों का तेल या काले तिल का तेल भरें। राहु काल के दौरान दक्षिण पश्चिम दिशा की ओर मुख करके दीपक जलाएं। भगवान हनुमान, मां दुर्गा या भगवान भैरव को अर्पित करें। दीपक जलते समय राहु मंत्र का जाप करें।
आवृत्ति: प्रतिदिन राहु काल में या न्यूनतम शनिवार को। शनि का राहु पर विशेष प्रभाव है अतः शनिवार को यह उपाय विशेष फलदायी होता है।
लाभ: मानसिक धुंध दूर होती है, स्पष्टता तथा सकारात्मकता आमंत्रित होती है। दीपक की ज्योति अज्ञान के अंधकार को दूर करती है जो राहु का मूल प्रभाव है।
कुछ देवताओं का राहु के प्रभाव पर विशेष नियंत्रण है। इनकी उपासना राहु को शांत करने का सशक्त माध्यम है।
मां दुर्गा:
राहु शक्ति के उग्र रूपों का सम्मान करता है जो भ्रम को नष्ट करते हैं। दुर्गा सप्तशती या दुर्गा चालीसा राहु काल में पढ़ें। लाल फूल एवं धूप अर्पित करें। मां दुर्गा की आराधना राहु के नकारात्मक प्रभाव से सर्वोत्तम सुरक्षा प्रदान करती है। नवरात्रि में राहु उपाय विशेष प्रभावी होते हैं।
भगवान नरसिंह:
भगवान विष्णु का अर्ध सिंह अवतार जो भय को नष्ट करता है। सुरक्षा के लिए नरसिंह कवच का पाठ करें। तुलसी पत्र एवं पीले फूल अर्पित करें। नरसिंह भगवान की कृपा से राहु का भय समाप्त होता है तथा आत्मबल बढ़ता है।
भगवान भैरव:
भगवान शिव का उग्र रूप जो राहु की ऊर्जा से सीधे जुड़ा है। विशेषकर अष्टमी तिथि पर या संध्या काल में उपासना करें। काले तिल तथा सरसों तेल का दीपक अर्पित करें। भैरव भगवान की साधना तंत्र मार्ग में अत्यंत महत्वपूर्ण मानी जाती है तथा राहु को वश में करने के लिए प्रभावी है।
भगवान हनुमान:
राहु काल में किसी अपरिहार्य कार्य से पूर्व हनुमान चालीसा का पाठ करें। हनुमान जी के पास ऐसी विशिष्ट सिद्धियां हैं जो राहु के प्रभाव को निष्क्रिय करती हैं। गुड़ अर्पित करें तथा प्रसाद ग्रहण कर कार्य आरंभ करें। हनुमान जी की शरणागति राहु काल का सबसे सरल एवं सशक्त उपाय माना जाता है।
राहु काल में जरूरतमंदों को देने से इसकी ऊर्जा लेने से देने में रूपांतरित हो जाती है। दान कर्म बंधन को कमजोर करता है जो राहु का मूल प्रभाव क्षेत्र है।
दान की वस्तुएं:
काले तिल, काले कंबल या वस्त्र, सरसों का तेल, लोहे की वस्तुएं, गरीबों को भोजन, काली उड़द की दाल, नीले या काले रंग की वस्तुएं।
प्राप्तकर्ता: वृद्ध व्यक्तियों, शारीरिक रूप से अक्षम व्यक्तियों या दीर्घकालिक रोगों से पीड़ित लोगों को दान करें क्योंकि ये शनि के प्रभाव का प्रतिनिधित्व करते हैं जो राहु के स्वामी हैं।
समय: शनिवार को या राहु काल में दान करना सर्वाधिक फलदायी होता है। दान करते समय राहु मंत्र का स्मरण करें।
जिनकी जन्म कुंडली में राहु अशुभ स्थिति में है, उनके लिए उपयुक्त रत्न धारण करना निरंतर ऊर्जात्मक समर्थन प्रदान करता है।
रत्न: गोमेद या हेसोनाइट गार्नेट
धातु: चांदी या पंचधातु
अंगुली: दाहिने हाथ की मध्यमा अंगुली
धारण का दिन: बुधवार या शनिवार को राहु काल में ही
भार: न्यूनतम 5 रत्ती, सटीक भार के लिए ज्योतिषी से परामर्श लें
महत्वपूर्ण: रत्न उपाय केवल योग्य वैदिक ज्योतिषी से परामर्श के पश्चात् ही करना चाहिए क्योंकि अनुपयुक्त रत्न धारण करने से प्रभाव बिगड़ सकते हैं। गोमेद धारण करने से पूर्व राहु की कुंडली स्थिति, दशा, अंतर्दशा तथा राहु के भाव स्वामित्व का विश्लेषण आवश्यक है।
गोमेद के लाभ:
मानसिक भ्रम एवं अशांति में कमी, निर्णय क्षमता में सुधार, आत्मविश्वास में वृद्धि, राहु से संबंधित रोगों में राहत, अप्रत्याशित घटनाओं से सुरक्षा।
राहु की तीव्र ऊर्जा को संतुलित करने के लिए 9 मुखी रुद्राक्ष अत्यंत प्रभावी है। यह भगवान भैरव से संबंधित है जो राहु के अधिपति हैं।
लाभ:
भय, भ्रम तथा मानसिक अशांति पर विजय। स्पष्टता, साहस तथा आध्यात्मिक विकास को बढ़ावा। कर्म चुनौतियों को हल करने में सहायता। लचीलापन तथा अंतर्ज्ञान को सशक्त बनाना।
धारण विधि:
चांदी या काले धागे में पिरोएं। गले में या दाहिनी कलाई पर धारण करें। पहली बार धारण करने से पूर्व राहु मंत्र से 108 बार ऊर्जावान करें। बुधवार या शनिवार को राहु काल में धारण करें। 9 मुखी रुद्राक्ष को दूध, गंगाजल तथा शहद से स्नान कराकर प्राण प्रतिष्ठा करें।
जो व्यापक जाप करने या रत्न धारण करने में असमर्थ हैं, उनके लिए राहु यंत्र निरंतर उपचारात्मक समर्थन प्रदान करता है।
| यंत्र पहलू | विवरण | विधि |
|---|---|---|
| सामग्री | तांबे या चांदी की प्लेट पर उत्कीर्ण या भोजपत्र पर लाल स्याही से निर्मित | शुद्ध सामग्री का उपयोग महत्वपूर्ण |
| स्थापना | बुधवार को राहु काल में, दक्षिण पश्चिम दिशा की ओर मुख करके | स्थापना के समय राहु मंत्र 108 बार |
| स्थान | पूजा घर में या लॉकेट के रूप में धारण | नित्य दर्शन एवं पूजन लाभकारी |
| प्रभाव | निरंतर ऊर्जात्मक सुरक्षा, मानसिक स्पष्टता में वृद्धि | दीर्घकालिक लाभ के लिए नियमित पूजा आवश्यक |
राहु काल के दौरान तथा सामान्यतः राहु को शांत करने के लिए कुछ आहार संबंधी नियम अत्यंत लाभकारी हैं।
राहु काल के दौरान:
मांसाहार एवं मदिरा से पूर्णतः बचें। यदि भोजन करना हो तो सात्विक भोजन लें। राहु मंत्र से अभिमंत्रित जल पीएं। यदि संभव हो तो भारी भोजन से बचें, हल्का नाश्ता स्वीकार्य है।
सामान्य राहु शांति आहार:
मूली, करेला तथा हरी पत्तेदार सब्जियों का सेवन बढ़ाएं। भोजन के पश्चात् सौंफ का सेवन करें। तांबे के पात्र में रखे जल का सेवन करें। अत्यधिक मसालेदार या किण्वित खाद्य पदार्थों से बचें। काले तिल, उड़द की दाल तथा सरसों का संतुलित उपयोग राहु को संतुष्ट करता है।
यदि राहु की 18 वर्षीय महादशा चल रही है तो उपायों को तीव्र करना आवश्यक है। राहु महादशा जीवन में महत्वपूर्ण परिवर्तन लाती है तथा कर्म फलों को तीव्रता से प्रकट करती है।
दैनिक साधना:
न्यूनतम 108 बार राहु मंत्र जाप। प्रातः काल नियमित ध्यान एवं प्राणायाम। राहु यंत्र का दर्शन एवं पूजन।
साप्ताहिक साधना:
शनिवार को व्रत रखें, केवल फल एवं दूध का सेवन करें। हनुमान मंदिर में तेल दान करें। 9 मुखी रुद्राक्ष निरंतर धारण करें।
मासिक साधना:
राहु ग्रह शांति पूजा करें या कराएं। अमावस्या को विशेष दान एवं पूजा करें। राहु संबंधित वस्तुओं का नियमित दान करें।
कभी कभी परिस्थितियां राहु काल के दौरान महत्वपूर्ण कार्य करने के लिए बाध्य करती हैं। ऐसे में निम्नलिखित तुरंत उपाय करें।
शुभ पदार्थ का सेवन करें: प्रस्थान से पूर्व दही, गुड़ या मिठाई खाएं। 10 कदम पीछे चलें: मुख्य द्वार से निकलने से पूर्व पीछे की ओर चलें, यह राहु के भ्रम को भ्रमित करता है। त्वरित हनुमान चालीसा: आगे बढ़ने से पूर्व एक बार पाठ करें। कुलदेवता को प्रार्थना: पारिवारिक देवता की सुरक्षा मांगें। सुरक्षात्मक वस्तुएं धारण करें: रुद्राक्ष, कलाई पर काला धागा या छोटा राहु यंत्र।
गहन राहु कष्ट या गंभीर राहु दशा से गुजर रहे साधकों के लिए। यह विधि केवल गंभीर राहु प्रभाव की स्थिति में ही करनी चाहिए।
राहु तांत्रिक साधना:
शनिवार को राहु काल में या अमावस्या की रात्रि में करें। काले ऊनी आसन पर दक्षिण पश्चिम की ओर मुख करके बैठें। सरसों तेल के 8 दीपक वृत्ताकार व्यवस्था में जलाएं। राख या सिंदूर का उपयोग कर काले कागज पर राहु यंत्र बनाएं। काली उड़द, नीले फूल, लोहे के टुकड़े अर्पित करें। राहु बीज मंत्र का 108 या 1008 बार जाप करें। लगातार 11 दिनों तक जारी रखें। तिल, जौ तथा घी से राहु हवन कर समाप्त करें।
सावधानी: तांत्रिक साधनाएं आदर्श रूप से अनुभवी तांत्रिक गुरु के मार्गदर्शन में ही करनी चाहिए। स्वयं करने पर विधि की शुद्धता एवं मानसिक तैयारी अत्यावश्यक है।
व्यापक सुरक्षा एवं ऊर्जा रूपांतरण के लिए एक दैनिक दिनचर्या का निर्माण करें।
राहु काल से 5 मिनट पूर्व:
अपने स्थान के लिए सटीक समय जांचें। सभी प्रमुख गतिविधियां रोक दें। सरसों तेल का दीपक जलाएं।
राहु काल के दौरान (90 मिनट):
प्रथम 30 मिनट: ध्यान एवं प्राणायाम। मध्य 30 मिनट: मंत्र जाप (108 पुनरावृत्तियां)। अंतिम 30 मिनट: आध्यात्मिक पठन या योजना एवं शोध।
राहु काल के पश्चात्:
सुरक्षाकारी देवताओं को कृतज्ञता व्यक्त करें। आत्मविश्वास के साथ सामान्य गतिविधियां पुनः आरंभ करें। अनुभवों को डायरी में लिखें।
इन उपायों एवं ध्यान अभ्यासों को लागू करके राहु काल भय की अवधि से आंतरिक कार्य, कर्म शुद्धि तथा सचेत विकास के लिए एक दैनिक आध्यात्मिक अवसर में रूपांतरित हो जाता है जो अंततः ज्ञान की यात्रा को गति प्रदान करता है।
प्रश्न 1: क्या राहु काल में केवल ध्यान करना ही पर्याप्त है या मंत्र जाप भी आवश्यक है?
दोनों का संयोजन सर्वाधिक प्रभावी है। ध्यान मन को शांत करता है तथा मंत्र जाप राहु की ऊर्जा को सीधे संबोधित करता है।
प्रश्न 2: यदि मैं राहु महादशा में नहीं हूं तो क्या फिर भी ये उपाय करने चाहिए?
हां, राहु काल का प्रभाव सभी पर होता है। नियमित उपाय सामान्य जीवन में भी मानसिक स्पष्टता एवं सुरक्षा प्रदान करते हैं।
प्रश्न 3: गोमेद रत्न धारण करने में क्या सावधानियां आवश्यक हैं?
योग्य ज्योतिषी से परामर्श अत्यावश्यक है। कुंडली में राहु की स्थिति के अनुसार ही रत्न धारण करें, अन्यथा विपरीत प्रभाव हो सकता है।
प्रश्न 4: राहु काल में दान करना क्यों विशेष फलदायी माना जाता है?
राहु काल में दान करना राहु की लेने की प्रवृत्ति को देने में बदलता है, जो कर्म संतुलन के लिए अत्यंत प्रभावी है।
प्रश्न 5: क्या राहु काल के उपाय शनिवार को भी किए जा सकते हैं?
हां, शनिवार राहु उपायों के लिए विशेष शुभ है क्योंकि शनि राहु के मित्र हैं तथा राहु शनि का सम्मान करता है।
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अनुभव: 15
इनसे पूछें: पारिवारिक मामले, आध्यात्मिकता और कर्म
इनके क्लाइंट: दि., उ.प्र., म.हा.
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