By पं. अभिषेक शर्मा
पूर्णिमांत एवं अमांत प्रणाली की संपूर्ण तुलना

यह लेख चंद्र राशि के आधार पर तैयार किया गया है। वैदिक ज्योतिष में चंद्र राशि आपकी मानसिक एवं भावनात्मक प्रकृति को दर्शाती है। अपनी चंद्र राशि जानने के लिए आपको अपनी जन्म तिथि, सटीक जन्म समय और जन्म स्थान की आवश्यकता होती है, जिसे किसी विश्वसनीय पंचांग या ऑनलाइन चंद्र राशि कैलकुलेटर के माध्यम से ज्ञात किया जा सकता है।
पंचांग भारतीय संस्कृति का अभिन्न अंग है जो धार्मिक अनुष्ठानों, त्योहारों, मुहूर्त निर्धारण तथा दैनिक जीवन की गतिविधियों का मार्गदर्शन करता है। परंतु भारत के विशाल भूभाग में पंचांग की दो प्रमुख परंपराएं प्रचलित हैं - उत्तर भारतीय पंचांग एवं दक्षिण भारतीय पंचांग। यद्यपि दोनों वैदिक सिद्धांतों पर आधारित हैं तथा पंच अंग अर्थात् पांच तत्वों (तिथि, वार, नक्षत्र, योग, करण) की गणना करते हैं, फिर भी चंद्र मास की परिभाषा में मूलभूत अंतर के कारण इनमें महत्वपूर्ण विभिन्नताएं देखने को मिलती हैं। इस लेख में हम इन दोनों पंचांग प्रणालियों के मध्य के अंतरों को विस्तार से समझेंगे।
उत्तर एवं दक्षिण भारतीय पंचांगों के मध्य सबसे प्रमुख अंतर यह है कि चंद्र मास की समाप्ति अमावस्या पर होती है या पूर्णिमा पर। यह अंतर मास की गणना पद्धति को मूलभूत रूप से परिवर्तित कर देता है।
पूर्णिमांत का अर्थ है पूर्णिमा पर समाप्त होने वाला। इस प्रणाली में चंद्र मास पूर्णिमा के दिन समाप्त होता है तथा अगले दिन से नया मास आरंभ होता है। यह प्रणाली मुख्यतः उत्तर एवं पश्चिमोत्तर भारत में प्रचलित है। पूर्णिमांत प्रणाली वैदिक युग की मूल प्रणाली मानी जाती है तथा यह ऐतिहासिक रूप से प्राचीन परंपरा है।
प्रमुख राज्य: बिहार, छत्तीसगढ़, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश, जम्मू एवं कश्मीर, झारखंड, मध्य प्रदेश, ओडिशा, पंजाब, राजस्थान, उत्तराखंड तथा उत्तर प्रदेश। नेपाल भी पूर्णिमांत पंचांग का अनुसरण करता है।
संरचना: इस प्रणाली में मास का आरंभ पूर्णिमा के अगले दिन से होता है। प्रथम पखवाड़ा कृष्ण पक्ष (क्षयमान चंद्र) होता है तथा द्वितीय पखवाड़ा शुक्ल पक्ष (वर्धमान चंद्र) होता है। इस प्रकार मास कृष्ण पक्ष से आरंभ होकर शुक्ल पक्ष पर समाप्त होता है।
संबद्ध कैलेंडर: विक्रम संवत पूर्णिमांत प्रणाली से जुड़ा है। विक्रम संवत का आरंभ 57 ईसा पूर्व में हुआ था, जो ग्रेगोरियन कैलेंडर से लगभग 56-57 वर्ष आगे है।
अमांत का अर्थ है अमावस्या पर समाप्त होने वाला। इस प्रणाली में चंद्र मास अमावस्या के दिन समाप्त होता है तथा अगले दिन से नया मास आरंभ होता है। यह प्रणाली मुख्यतः दक्षिण एवं पूर्वी भारत में प्रचलित है। अमांत प्रणाली वेदोत्तर काल में विकसित हुई तथा बाद की अनुकूलन मानी जाती है।
प्रमुख राज्य: आंध्र प्रदेश, असम, गुजरात, गोवा, कर्नाटक, केरल, महाराष्ट्र, तमिलनाडु, तेलंगाना, त्रिपुरा तथा पश्चिम बंगाल।
संरचना: इस प्रणाली में मास का आरंभ अमावस्या के अगले दिन से होता है। प्रथम पखवाड़ा शुक्ल पक्ष (वर्धमान चंद्र) होता है तथा द्वितीय पखवाड़ा कृष्ण पक्ष (क्षयमान चंद्र) होता है। इस प्रकार मास शुक्ल पक्ष से आरंभ होकर कृष्ण पक्ष पर समाप्त होता है।
संबद्ध कैलेंडर: शालिवाहन शक संवत अमांत प्रणाली से जुड़ा है। शालिवाहन शक का आरंभ 78 ईस्वी में हुआ था तथा इसे 1957 में भारत के राष्ट्रीय कैलेंडर के रूप में अपनाया गया।
| पहलू | पूर्णिमांत (उत्तर भारत) | अमांत (दक्षिण भारत) |
|---|---|---|
| मास की समाप्ति | पूर्णिमा पर | अमावस्या पर |
| मास का आरंभ | पूर्णिमा के अगले दिन | अमावस्या के अगले दिन |
| प्रथम पखवाड़ा | कृष्ण पक्ष (क्षयमान) | शुक्ल पक्ष (वर्धमान) |
| द्वितीय पखवाड़ा | शुक्ल पक्ष (वर्धमान) | कृष्ण पक्ष (क्षयमान) |
| चक्र | पूर्णिमा से पूर्णिमा तक | अमावस्या से अमावस्या तक |
| उत्पत्ति | वैदिक मूल, प्राचीन प्रणाली | वेदोत्तर अनुकूलन |
| संबद्ध संवत | विक्रम संवत | शालिवाहन शक संवत |
पक्षों की संरचना में महत्वपूर्ण अंतर है। अमांत कैलेंडर में प्रथम 15 दिन शुक्ल पक्ष होते हैं जिसके पश्चात् अगले 15 दिन कृष्ण पक्ष होते हैं। इसके विपरीत पूर्णिमांत कैलेंडर में कृष्ण पक्ष प्रथम आता है जिसके पश्चात् शुक्ल पक्ष आता है।
भिन्न समाप्ति बिंदुओं के कारण मास के नामों में लगभग 15 दिन का अंतर हो जाता है। पूर्णिमांत कैलेंडर में मास का नाम एक पक्ष (पखवाड़ा) पहले बदल जाता है जबकि अमांत कैलेंडर में यह बाद में बदलता है।
उदाहरण: जब अमांत परंपरा में चैत्र मास अभी आरंभ हो रहा होता है, तो पूर्णिमांत परंपरा पहले ही चैत्र मास में एक पूर्ण पक्ष आगे बढ़ चुकी होती है। अमांत परंपरा में जिसे फाल्गुन अमावस्या कहा जाता है, उसे पूर्णिमांत परंपरा में चैत्र अमावस्या कहा जाता है।
यह स्थिति उत्पन्न करता है जिसमें एक ही तिथि पर उत्तर एवं दक्षिण भारतीय पंचांग भिन्न मास के नाम प्रदर्शित कर सकते हैं, यद्यपि वे एक ही चंद्र चक्र को ट्रैक कर रहे हों। परंतु यह अंतर केवल नामकरण संबंधी है तथा मास परिवर्तन के समय से संबंधित है।
| चंद्र स्थिति | पूर्णिमांत मास | अमांत मास | अंतर |
|---|---|---|---|
| चैत्र कृष्ण पक्ष | चैत्र | फाल्गुन | 15 दिन का अंतर |
| चैत्र शुक्ल पक्ष | चैत्र | चैत्र | समान नाम |
| वैशाख कृष्ण पक्ष | वैशाख | चैत्र | 15 दिन का अंतर |
| वैशाख शुक्ल पक्ष | वैशाख | वैशाख | समान नाम |
जैसा कि तालिका में दिखाया गया है, कृष्ण पक्ष के दौरान मास के नाम भिन्न होते हैं परंतु शुक्ल पक्ष के दौरान समान होते हैं। यह 15 दिन का अंतर पूरे वर्ष जारी रहता है।
15 दिन के मास आरंभ अंतर के बावजूद उत्तर एवं दक्षिण भारतीय पंचांगों में त्योहारों की तिथियों में कोई अंतर नहीं होता। त्योहार विशिष्ट चंद्र अवस्था (तिथि) के आधार पर मनाए जाते हैं न कि कैलेंडर तिथियों के आधार पर, जो क्षेत्रों में एकरूपता सुनिश्चित करता है।
महत्वपूर्ण बिंदु: दोनों प्रणालियां एक ही चंद्र अवस्थाओं को ट्रैक करती हैं, अतः वास्तविक तिथि, नक्षत्र, योग तथा करण की गणना समन्वित रहती है। त्योहार दोनों कैलेंडरों में एक ही तिथि पर आते हैं, यद्यपि उस तिथि से संबद्ध मास का नाम लगभग 15 दिन भिन्न हो सकता है।
| त्योहार | तिथि | पूर्णिमांत मास | अमांत मास | वास्तविक तिथि |
|---|---|---|---|---|
| दीपावली | अमावस्या | कार्तिक | अश्विन | समान |
| होली | पूर्णिमा | फाल्गुन | फाल्गुन | समान |
| रक्षाबंधन | पूर्णिमा | श्रावण | श्रावण | समान |
| जन्माष्टमी | कृष्ण पक्ष अष्टमी | भाद्रपद | श्रावण | समान |
| महाशिवरात्रि | कृष्ण पक्ष त्रयोदशी | फाल्गुन | माघ | समान |
जैसा कि तालिका से स्पष्ट है, त्योहारों से संबद्ध मास के नाम भिन्न हो सकते हैं परंतु वास्तविक तिथि एवं उत्सव का दिन समान रहता है।
दोनों पंचांग प्रणालियों में शुभ मुहूर्त एवं अशुभ काल की गणना भी समान होती है क्योंकि ये तिथि, नक्षत्र, योग तथा करण पर आधारित होते हैं जो दोनों में एक समान हैं। राहु काल, यमगंड, गुलिक काल, अभिजित मुहूर्त आदि सभी की गणना समान सूत्रों के आधार पर होती है।
पूर्णिमांत परंपरा वैदिक युग में प्रचलित थी तथा मूल प्रणाली का प्रतिनिधित्व करती है। यह बाद में प्रथम शताब्दी ईसा पूर्व से पूर्व अमांत परंपरा द्वारा प्रतिस्थापित हुई। 57 ईसा पूर्व में राजा विक्रमादित्य ने उत्तरी क्षेत्रों में वैदिक जड़ों की ओर लौटने के लिए पूर्णिमांत परंपरा को पुनः स्थापित किया, यद्यपि अमांत प्रणाली दक्षिणी क्षेत्रों में जारी रही।
राजा विक्रमादित्य उज्जैन के महान सम्राट थे जिन्होंने शकों पर विजय प्राप्त करने के पश्चात् 57 ईसा पूर्व में विक्रम संवत का आरंभ किया। उन्होंने वैदिक परंपराओं को पुनर्जीवित करने के उद्देश्य से पूर्णिमांत प्रणाली को प्रोत्साहित किया। यह निर्णय धार्मिक एवं सांस्कृतिक महत्व का था क्योंकि पूर्णिमा को शुभ माना जाता है तथा मास का शुक्ल पक्ष में समाप्त होना अधिक शुभदायक माना गया।
इसके विपरीत दक्षिण भारत में शालिवाहन राजा ने 78 ईस्वी में शालिवाहन शक की स्थापना की। इस संवत में अमांत प्रणाली का अनुसरण किया गया जो दक्कन क्षेत्र की प्राचीन परंपरा थी। शालिवाहन शक भारत के राष्ट्रीय कैलेंडर के रूप में स्वीकृत है तथा सरकारी दस्तावेजों में इसका उपयोग होता है।
यह ध्यान रखना महत्वपूर्ण है कि दक्षिण भारत के कुछ राज्य शुद्ध चंद्र प्रणाली के स्थान पर सौर कैलेंडर का अनुसरण करते हैं। सौर कैलेंडर में मास सूर्य की राशि संक्रमण पर आधारित होते हैं न कि चंद्र अवस्थाओं पर।
तमिल कैलेंडर एक सौर कैलेंडर है जिसमें मास सूर्य की राशि चक्र में गति पर आधारित होते हैं। मास के नाम (चित्तिरै, वैकाशी, आनी, आडी, आवनी, पुरट्टाशी, ऐप्पशी, कार्तिगै, मार्गझी, तै, माशी, पंगुनी) मानक चंद्र मास नामों से भिन्न हैं। ये तमिल मास वास्तव में सौरमान (सौर) राशियां हैं तथा इन्हें मेष, वृषभ आदि राशियों से संबद्ध किया जाना चाहिए। तमिल नववर्ष (पुथांडु) चित्तिरै मास के प्रथम दिन मनाया जाता है जो सामान्यतः 14 अप्रैल के आसपास आता है।
केरल में प्रयुक्त मलयालम कैलेंडर भी एक सौर कैलेंडर है जो कोल्लम युग का अनुसरण करता है तथा मेदम (अप्रैल-मई) से आरंभ होता है। नववर्ष सिंह संक्रांति के साथ आरंभ होता है। मलयालम कैलेंडर में विशु का त्योहार नववर्ष के रूप में मनाया जाता है।
बंगाली तथा ओडिया कैलेंडर दोनों सौर आधारित प्रणालियों का अनुसरण करते हैं। मास के नाम चंद्र मासों के समान लगते हैं परंतु वास्तव में ये सौर मास हैं। बंगाली नववर्ष (पोइला बोइशाख) तथा ओडिया नववर्ष (महाबिशुब संक्रांति) सूर्य के मेष राशि में प्रवेश के साथ मनाए जाते हैं।
वैदिक ज्योतिष की आधारशिला जन्म कुंडली का दृश्य प्रतिनिधित्व भी दोनों परंपराओं में महत्वपूर्ण रूप से भिन्न है।
उत्तर भारतीय कुंडली हीरे के आकार की होती है। भाव निश्चित स्थानों में होते हैं, जिसमें प्रथम भाव (लग्न) सदैव शीर्ष पर होता है। राशियां जन्म विवरण के आधार पर कुंडली में घूमती हैं। कुंडली वामावर्त (anticlockwise) दिशा में पढ़ी जाती है। यह प्रारूप दृश्य रूप से अद्वितीय है तथा तुरंत पहचाना जा सकता है।
विशेषताएं: भाव स्थिर रहते हैं, राशियां घूमती हैं। लग्न का अंकन त्रिभुज या विशेष चिह्न से किया जाता है। ग्रहों को उनकी राशि स्थिति के अनुसार रखा जाता है।
दक्षिण भारतीय कुंडली वर्गाकार होती है। राशियां निश्चित स्थानों में होती हैं (मेष सदैव ऊपर बाईं ओर से दूसरे बॉक्स में होता है, आदि)। भाव घूमते हैं तथा लग्न को चिह्नित कर प्रथम भाव दर्शाया जाता है। यह कुंडली दक्षिणावर्त (clockwise) दिशा में पढ़ी जाती है।
विशेषताएं: राशियां स्थिर रहती हैं, भाव घूमते हैं। लग्न को विकर्ण रेखा या "As" से चिह्नित किया जाता है। प्रत्येक राशि की स्थिति पूर्वनिर्धारित होती है जिससे राशि दृष्टि सरल हो जाती है।
पंचांग गणना की दो प्रमुख पद्धतियां प्रचलित हैं जो मुख्यतः ग्रह स्थितियों की गणना में भिन्न होती हैं।
वाक्य पंचांग पारंपरिक पद्धति है जो सूर्य सिद्धांत ग्रंथ के निश्चित श्लोक सारणियों का उपयोग करती है। यह विधि सूर्य एवं चंद्र की स्थितियों के लिए पारंपरिक सारणीगत स्थितियों का संरक्षण करती है जो आधुनिक गणनाओं से ग्रहणों एवं संक्रांतियों के लिए घंटों तक भिन्न हो सकती हैं। वाक्य पंचांग मुख्यतः तमिलनाडु में प्रचलित है जहां परंपरागत मंदिर इसी का अनुसरण करते हैं।
विशेषताएं: सूर्य सिद्धांत पर आधारित, पारंपरिक गणना पद्धति, कुछ मामलों में आधुनिक खगोलीय गणना से भिन्नता, मंदिरों में प्रचलित।
दृक या थिरुकनिथा पंचांग आधुनिक खगोलीय सारणी या राष्ट्रीय पंचांग का उपयोग करके गणितीय स्थितियों का प्रयोग करता है जबकि समान वैदिक त्योहार नियमों का अनुप्रयोग करता है। अंतर खगोलीय देशांतरों में है न कि अनुष्ठान पद्धति में। दृक पंचांग अधिक सटीक माना जाता है तथा वैज्ञानिक गणना के साथ संरेखित है।
विशेषताएं: आधुनिक खगोलीय गणना, अधिक सटीकता, ग्रहण एवं संक्रांति की सटीक गणना, व्यापक स्वीकार्यता।
पूर्णिमांत प्रणाली उत्तरी एवं पश्चिमोत्तर राज्यों जैसे उत्तर प्रदेश, राजस्थान, पंजाब, हरियाणा तथा बिहार में प्रमुख है। नेपाल के अनेक हिंदू भी इसका अनुसरण करते हैं।
अमांत प्रणाली दक्षिणी एवं पूर्वी राज्यों में प्रमुख है जिसमें महाराष्ट्र, गुजरात, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, तमिलनाडु, केरल, असम, पश्चिम बंगाल, गोवा तथा त्रिपुरा सम्मिलित हैं।
| क्षेत्र | प्रणाली | प्रमुख राज्य |
|---|---|---|
| उत्तर भारत | पूर्णिमांत | उत्तर प्रदेश, बिहार, राजस्थान, पंजाब, हरियाणा, मध्य प्रदेश |
| पूर्वी भारत | अमांत | पश्चिम बंगाल, ओडिशा, असम, त्रिपुरा |
| पश्चिम भारत | अमांत | महाराष्ट्र, गुजरात, गोवा |
| दक्षिण भारत | अमांत (चंद्र) / सौर | कर्नाटक, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, तमिलनाडु, केरल |
| हिमालयी क्षेत्र | पूर्णिमांत | जम्मू कश्मीर, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, नेपाल |
दोनों प्रणालियों के मध्य एकमात्र व्यावहारिक अंतर चंद्र मासों के नामकरण में तथा मास परिवर्तन के समय में लगभग 15 दिन की भिन्नता है। धार्मिक अनुष्ठान, मुहूर्त तथा त्योहार तिथियां संरेखित रहती हैं क्योंकि वे सार्वभौमिक चंद्र अवस्थाओं के आधार पर गणना की जाती हैं जिन्हें दोनों प्रणालियां समान रूप से ट्रैक करती हैं।
विवाह, गृह प्रवेश, व्यापार आरंभ जैसे शुभ कार्यों के लिए मुहूर्त निर्धारण में दोनों पंचांग समान सिद्धांतों का अनुसरण करते हैं। तिथि, नक्षत्र, योग, करण तथा वार के संयोजन से शुभ समय निकाला जाता है जो दोनों प्रणालियों में एक समान होता है।
व्रत तथा उपवास तिथियों पर आधारित होते हैं न कि मास नामों पर। अतः एकादशी, प्रदोष, संकष्टी चतुर्थी आदि सभी व्रत दोनों प्रणालियों में एक ही दिन मनाए जाते हैं।
ज्योतिषीय परामर्श लेते समय यह जानना आवश्यक है कि आपका ज्योतिषी किस प्रणाली का अनुसरण करता है। यद्यपि ग्रह स्थितियां समान होंगी, कुंडली का प्रारूप भिन्न हो सकता है। उत्तर भारतीय ज्योतिषी उत्तर भारतीय कुंडली का उपयोग करते हैं जबकि दक्षिण भारतीय ज्योतिषी दक्षिण भारतीय कुंडली का उपयोग करते हैं।
भारत सरकार ने इन क्षेत्रीय विभिन्नताओं को स्वीकार करते हुए राष्ट्रीय पंचांग की स्थापना की है जो शालिवाहन शक संवत पर आधारित है। राष्ट्रीय पंचांग का उपयोग सरकारी दस्तावेजों, समाचार प्रसारणों तथा आधिकारिक संचार में किया जाता है। यह आधुनिक खगोलीय सारणियों का उपयोग करता है तथा ग्रह स्थितियों में एकरूपता प्रदान करता है।
राष्ट्रीय पंचांग की विशेषताएं:
शालिवाहन शक पर आधारित, 22 मार्च (या लीप वर्ष में 21 मार्च) से आरंभ, सौर मास प्रणाली, आधुनिक खगोलीय गणना, सरकारी मान्यता प्राप्त।
दोनों पंचांग प्रणालियों को समझने के लिए कुछ महत्वपूर्ण बिंदुओं को ध्यान में रखना आवश्यक है।
एक ही वैदिक आधार: दोनों प्रणालियां वैदिक सिद्धांतों पर आधारित हैं। मूलभूत ज्योतिषीय गणना समान है।
केवल नामकरण का अंतर: मुख्य अंतर मास के नामों के समय का है न कि गणना का। तिथि, नक्षत्र आदि दोनों में समान हैं।
त्योहार समान: सभी प्रमुख त्योहार दोनों प्रणालियों में एक ही दिन मनाए जाते हैं क्योंकि वे तिथि पर आधारित होते हैं।
क्षेत्रीय परंपरा: किसी क्षेत्र विशेष में प्रचलित प्रणाली का अनुसरण करना उचित होता है। स्थानीय मंदिर एवं पंडित उसी प्रणाली का अनुसरण करते हैं।
कुंडली प्रारूप: कुंडली का प्रारूप भिन्न है परंतु ग्रह स्थितियां तथा भाव व्याख्या समान रहती है।
उत्तर एवं दक्षिण भारतीय पंचांग प्रणालियों के मध्य का अंतर भारत की सांस्कृतिक विविधता का प्रतीक है। यद्यपि चंद्र मास की परिभाषा में मूलभूत अंतर है, दोनों प्रणालियां वैदिक ज्ञान परंपरा की निरंतरता को दर्शाती हैं। ये दोनों प्रणालियां सदियों से सह-अस्तित्व में रही हैं तथा अपने अपने क्षेत्रों में धार्मिक एवं सांस्कृतिक जीवन का मार्गदर्शन करती रही हैं।
आधुनिक युग में जहां सूचना प्रौद्योगिकी ने भौगोलिक सीमाओं को धुंधला कर दिया है, इन दोनों प्रणालियों की समझ अधिक महत्वपूर्ण हो गई है। जो व्यक्ति एक क्षेत्र से दूसरे क्षेत्र में प्रवास करते हैं, उन्हें दोनों प्रणालियों की जानकारी होनी चाहिए। ज्योतिषीय परामर्श लेते समय या धार्मिक अनुष्ठान करते समय यह जानना आवश्यक है कि आप किस प्रणाली का अनुसरण कर रहे हैं।
अंततः दोनों प्रणालियों का लक्ष्य एक ही है - मनुष्य को समय की लय के साथ संरेखित करना, शुभ मुहूर्त का निर्धारण करना तथा जीवन को धार्मिक एवं आध्यात्मिक मार्ग पर अग्रसर करना। इस दृष्टि से दोनों प्रणालियां समान रूप से प्रभावी एवं पूज्य हैं।
प्रश्न 1: क्या त्योहार उत्तर एवं दक्षिण भारत में अलग दिनों में मनाए जाते हैं?
नहीं, सभी प्रमुख त्योहार दोनों क्षेत्रों में एक ही दिन मनाए जाते हैं क्योंकि वे तिथि पर आधारित होते हैं जो दोनों प्रणालियों में समान है।
प्रश्न 2: पूर्णिमांत एवं अमांत में कौन सी प्रणाली अधिक प्राचीन है?
पूर्णिमांत प्रणाली अधिक प्राचीन है तथा वैदिक युग की मूल प्रणाली मानी जाती है। अमांत प्रणाली वेदोत्तर काल में विकसित हुई।
प्रश्न 3: यदि मैं उत्तर भारत से दक्षिण भारत प्रवास करता हूं तो किस पंचांग का अनुसरण करूं?
आप अपने वर्तमान निवास स्थान के स्थानीय पंचांग का अनुसरण करें। स्थानीय मंदिर एवं समुदाय उसी प्रणाली का पालन करते हैं।
प्रश्न 4: क्या कुंडली मिलान के लिए दोनों प्रणालियों में अंतर होता है?
कुंडली मिलान की गणना पद्धति समान है। केवल कुंडली का दृश्य प्रारूप भिन्न होता है परंतु ग्रह स्थितियां तथा गुण मिलान एक समान रहता है।
प्रश्न 5: राष्ट्रीय पंचांग किस प्रणाली पर आधारित है?
राष्ट्रीय पंचांग शालिवाहन शक संवत पर आधारित है जो मूलतः दक्षिण भारतीय परंपरा से संबद्ध है परंतु यह आधुनिक सौर मास प्रणाली का उपयोग करता है।
चंद्र राशि मेरे बारे में क्या बताती है?
मेरी चंद्र राशि
अनुभव: 19
इनसे पूछें: विवाह, संबंध, करियर
इनके क्लाइंट: छ.ग., म.प्र., दि., ओडि, उ.प्र.
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