आदि शंकराचार्य जयंती (वैशाख शुक्ल पंचमी): अद्वैत वेदांत के पुनरुद्धारक और चार पीठों के संस्थापक

By पं. अमिताभ शर्मा

वैशाख शुक्ल पंचमी, अद्वैत वेदांत दर्शन, चार आम्नाय पीठ, प्रस्थानत्रयी भाष्य और कनकधारा स्तोत्र

आदि शंकराचार्य जयंती: अद्वैत वेदांत, चार पीठ व जीवन दर्शन

पंचांग विवरण एवं आदि शंकराचार्य प्राकट्य की खगोलीय पृष्ठभूमि

सनातन वैदिक पंचांग, माधवीय शंकर दिग्विजय और अद्वैत संप्रदाय के प्रामाणिक ग्रंथों के अनुसार वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को संपूर्ण भारतवर्ष में 'जगतगुरु आदि शंकराचार्य जयंती' के रूप में मनाया जाता है। आदि शंकराचार्य सनातन धर्म के इतिहास में वे अद्वितीय युगपुरुष हैं जिन्हें भगवान देवाधिदेव महादेव (शिव) का साक्षात पूर्णावतार माना गया है: "शंकरः शंकरः साक्षात्"।

खगोलीय और ज्योतिषीय दृष्टि से वैशाख शुक्ल पंचमी का कालखंड अत्यंत तेजस्वी माना जाता है। इस अवधि में भुवन भास्कर भगवान सूर्य देव अपनी परम उच्च राशि मेष (Aries) में गोचर कर रहे होते हैं और चंद्रमा पुनर्वसु अथवा पुष्य नक्षत्र में स्थित होकर ज्ञान और विवेक की लहरों का विस्तार करता है। केरल के कालड़ी (Kalady) ग्राम में नम्बूदरी ब्राह्मण शिवगुरु और माता आर्याम्बा के तप के फलस्वरूप अवतरित हुए बालक शंकर ने मात्र 32 वर्ष की अल्पायु में वह अभूतपूर्व कार्य कर दिखाया जो सहस्रों वर्षों में संभव नहीं था।

उस समय भारत में सनातन वैदिक धर्म छिन्न-भिन्न हो रहा था, वेद-विरोधी मत, पाखंड और कुरीतियां चरम पर थीं। आदि शंकराचार्य ने बाल्यकाल में संन्यास ग्रहण कर ओंकारेश्वर में नर्मदा तट पर गोविंद भगवत्पाद से दीक्षा ली और संपूर्ण भारत की पैदल परिक्रमा कर शास्त्रार्थ के माध्यम से अवैदिक तर्कों का खंडन किया। उन्होंने प्रस्थानत्रयी (उपनिषद, ब्रह्मसूत्र और श्रीमद्भगवद्गीता) पर अमर भाष्य लिखकर 'अद्वैत वेदांत' (Non-Dualism) की पुनः प्रतिष्ठा की और भारत की चारों दिशाओं में चार आम्नाय पीठों की स्थापना कर राष्ट्रीय और सांस्कृतिक एकता का अखंड सूत्र निर्मित किया।

पंचांग व प्राकट्य घटक शास्त्रीय, ज्योतिषीय व ऐतिहासिक विवरण
प्राकट्य तिथि व काल वैशाख मास | शुक्ल पक्ष पंचमी (वैशाख शुक्ल पंचमी)
अवतार स्वरूप साक्षात भगवान सदाशिव के पूर्णावतार (शंकरः शंकरः साक्षात्)
जन्म स्थल व कुल कालड़ी (पूर्णा नदी तट, केरल) | नम्बूदरी ब्राह्मण (कृष्ण यजुर्वेदीय)
माता-पिता माता आर्याम्बा एवं विप्र शिवगुरु
संन्यास दीक्षा गुरु स्वामी गोविंद भगवत्पाद (ओंकारेश्वर, नर्मदा तट)
दार्शनिक सिद्धांत केवल अद्वैत वेदांत (ब्रह्म सत्यं जगन्मिथ्या जीवो ब्रह्मैव नापरः)
प्रमुख ग्रंथ रचनाएं प्रस्थानत्रयी भाष्य (उपनिषद, गीता, ब्रह्मसूत्र), विवेकचूड़ामणि, उपदेशसाहस्री
प्रमुख स्तोत्र साहित्य सौंदर्य लहरी, शिवानंद लहरी, भज गोविंदम्, कनकधारा स्तोत्र, निर्वाणषट्कम्
चार आम्नाय पीठ शृंगेरी (दक्षिण), द्वारका (पश्चिम), पुरी (पूर्व) एवं ज्योतिर्मठ बद्रीनाथ (उत्तर)
अभीष्ट आध्यात्मिक फल अविद्या व भ्रम का नाश, आत्म-साक्षात्कार, अद्वैत बोध, ज्ञान-प्राप्ति

आदि शंकराचार्य जयंती के पावन अवसर पर उनके ज्ञान, वैराग्य और अद्वैत बोध को अपने अंतःकरण में जाग्रत करने हेतु साधक को शास्त्रोक्त विधि का निष्ठापूर्वक पालन करना चाहिए:

  • प्रातः काल सूर्योदय से पूर्व ब्रह्म मुहूर्त में उठकर शीतल जल में गंगाजल मिलाकर स्नान करना और मन में जगतगुरु शंकराचार्य जी का ध्यान करना।
  • स्नान के पश्चात स्वच्छ श्वेत अथवा पीले वस्त्र धारण कर उदीयमान सूर्य नारायण को तांबे के पात्र से जल और लाल चंदन का अर्घ्य देना।
  • पूजा स्थल पर चौकी पर पीला वस्त्र बिछाकर आदि शंकराचार्य जी के चित्र अथवा उनकी चरण-पादुकाओं की स्थापना करना।
  • भगवान शिव और आदि शंकराचार्य जी का षोडशोपचार पूजन करना; उन्हें श्वेत चंदन, भस्म, अक्षत, बिल्वपत्र और श्वेत पुष्प अर्पित करना।
  • आदि शंकराचार्य जी द्वारा रचित 'कनकधारा स्तोत्र', 'निर्वाणषट्कम्' (चिदानन्दरूपः शिवोऽहं शिवोऽहम्) अथवा 'भज गोविंदम्' का सस्वर पाठ करना।
  • वेदांत के अद्वैत सूत्रों अथवा उपनिषदों के किसी एक अध्याय का स्वाध्याय और मनन करना।
  • किसी संन्यासी, वैदिक विद्यार्थी अथवा जरूरतमंद को शिक्षण सामग्री, अन्न और शीतल जल का दान करना।
  • दिनभर अपने मन में यह भाव बनाए रखना कि "समस्त चराचर जगत में एक ही परब्रह्म परमात्मा का वास है; किसी के प्रति द्वेष अथवा भेद-भाव न रखें।"

अद्वैत वेदांत का अमर दर्शन: 'ब्रह्म सत्यं जगन्मिथ्या'

आदि शंकराचार्य के संपूर्ण दर्शन का सार उनके द्वारा उच्चारित इस ऐतिहासिक श्लोकार्ध में समाहित है:

श्लोकार्धेन प्रवक्ष्यामि यदुक्तं ग्रन्थकोटिभिः।
ब्रह्म सत्यं जगन्मिथ्या जीवो ब्रह्मैव नापरः॥

अर्थात: करोड़ों ग्रंथों में जो रहस्य कहा गया है, उसे मैं केवल आधे श्लोक में कहता हूँ-"केवल परब्रह्म ही शाश्वत सत्य है, यह नाम-रूपात्मक दृश्य जगत मिथ्या (परिवर्तनशील व नश्वर) है और जीवात्मा वास्तव में ब्रह्म से भिन्न नहीं बल्कि साक्षात ब्रह्म ही है।"

आदि शंकराचार्य जी का दिव्य स्वरूप, शिष्यों को उपदेश देते हुए

अद्वैत दर्शन के तीन मूलभूत स्तंभ

  1. सत्य (The Absolute Reality): जो तीनों कालों (भूत, वर्तमान, भविष्य) में कभी बाधित न हो। वह केवल 'निर्गुण, निराकार, सच्चिदानंद ब्रह्म' है।
  2. मिथ्या (The Relative Reality / Phenomenal World): संसार न तो पूर्णतः असत्य (खरगोश के सींग की तरह) है और न ही पूर्ण सत्य। यह रस्सी में सांप के भ्रम (रज्जु-सर्प भ्रम) के समान है। जब तक अज्ञान (माया) है, संसार सत्य प्रतीत होता है; ज्ञान होते ही केवल ब्रह्म शेष रह जाता है।
  3. माया (The Cosmic Illusion): माया की दो शक्तियां होती हैं-'आवरण शक्ति' (जो सत्य को ढक देती है) और 'विक्षेप शक्ति' (जो असत्य को सत्य की तरह दिखाती है)। ज्ञान की प्राप्ति से माया का यह पर्दा हट जाता है।
सत्ता का स्तर शास्त्रीय संज्ञा लक्षण व उदाहरण
पारमार्थिक सत्ता ब्रह्म (The Ultimate Truth) अविकारी, अजन्मा, नित्य, शुद्ध, बुद्ध, मुक्त स्वभाव
व्यावहारिक सत्ता सांसारिक जगत (Empirical World) जब तक जाग्रत अवस्था है तब तक नियम, कर्म और समाज सत्य हैं
प्रातिभासिक सत्ता स्वप्न व भ्रम (Apparent Reality) स्वप्न की घटनाएं अथवा सीप में चांदी और रस्सी में सांप का दिखना

चार आम्नाय पीठों की स्थापना: भारत की अखंड सांस्कृतिक एकता

आदि शंकराचार्य ने केवल दार्शनिक चिंतन नहीं दिया बल्कि उन्होंने सनातन धर्म को एक सुदृढ़ संगठनात्मक ढांचा प्रदान किया। उन्होंने भारत की चारों दिशाओं में चार प्रमुख मठों (आम्नाय पीठों) की स्थापना की, जिनमें प्रत्येक पीठ को एक विशिष्ट वेद, एक महावाक्य और संन्यास परंपरा के विशेष नाम सौंपे गए:

1. दक्षिण आम्नाय: शृंगेरी शारदा पीठ (कर्नाटक)

  • वेद व महावाक्य: यजुर्वेद | "अहं ब्रह्मास्मि" (मैं ब्रह्म हूँ)।
  • प्रथम आचार्य: आचार्य सुरेश्वराचार्य (मंडन मिश्र संन्यास उपरांत)।
  • संन्यास संप्रदाय: सरस्वती, भारती, पुरी।

2. पश्चिम आम्नाय: द्वारका शारदा पीठ (गुजरात)

  • वेद व महावाक्य: सामवेद | "तत्त्वमसि" (वह ब्रह्म तुम ही हो)।
  • प्रथम आचार्य: आचार्य हस्तामलक।
  • संन्यास संप्रदाय: तीर्थ, आश्रम।

3. पूर्व आम्नाय: गोवर्धन पीठ, पुरी (ओडिशा)

  • वेद व महावाक्य: ऋग्वेद | "प्रज्ञानं ब्रह्म" (परम ज्ञान ही ब्रह्म है)।
  • प्रथम आचार्य: आचार्य पद्मपाद।
  • संन्यास संप्रदाय: वन, अरण्य।

4. उत्तर आम्नाय: ज्योतिर्मठ, बद्रीनाथ (उत्तराखंड)

  • वेद व महावाक्य: अथर्ववेद | "अयमात्मा ब्रह्म" (यह आत्मा ही ब्रह्म है)।
  • प्रथम आचार्य: आचार्य तोटकाचार्य।
  • संन्यास संप्रदाय: गिरि, पर्वत, सागर।
पीठ का नाम दिशा व भौगोलिक स्थान संबद्ध वेद अधिकृत महावाक्य प्रथम पीठाधीश्वर
शृंगेरी शारदा पीठ दक्षिण (कर्नाटक) यजुर्वेद अहं ब्रह्मास्मि स्वामी सुरेश्वराचार्य
गोवर्धन पीठ पूर्व (पुरी, ओडिशा) ऋग्वेद प्रज्ञानं ब्रह्म स्वामी पद्मपादाचार्य
द्वारका शारदा पीठ पश्चिम (गुजरात) सामवेद तत्त्वमसि स्वामी हस्तामलकाचार्य
ज्योतिर्मठ पीठ उत्तर (बद्रीनाथ, उत्तराखंड) अथर्ववेद अयमात्मा ब्रह्म स्वामी तोटकाचार्य

32 वर्ष का अलौकिक जीवन: शास्त्रार्थ और प्रस्थानत्रयी भाष्य

आदि शंकराचार्य का जीवन काल केवल 32 वर्षों का था, परंतु इस अल्पावधि में उन्होंने जो उपलब्धियां अर्जित कीं, वे मानव कल्पना से परे हैं:

  • 8 वर्ष की आयु में संन्यास: बाल्यकाल में पूर्णा नदी में मगरमच्छ द्वारा पैर पकड़े जाने की लीला के माध्यम से माता से संन्यास की अनुमति प्राप्त की और समस्त वेदों में पारंगत हुए।
  • 12 वर्ष की आयु में प्रस्थानत्रयी भाष्य: ओंकारेश्वर और काशी में रहकर 12 उपनिषदों, भगवद्गीता और बादरायण कृत ब्रह्मसूत्रों पर अकाट्य भाष्यों की रचना की।
  • 16 वर्ष की आयु में दिग्विजय: संपूर्ण भारत में शास्त्रार्थ हेतु प्रस्थान। महिष्मती में कर्मकांड के प्रकांड विद्वान मंडन मिश्र और उनकी विदुषी पत्नी उभय भारती को शास्त्रार्थ में पराजित कर ज्ञान मार्ग की सर्वोच्चता सिद्ध की।
  • दशनामी संन्यास परंपरा: हिंदू संन्यासियों को संगठित करने हेतु 'दशनामी संप्रदाय' (तीर्थ, आश्रम, वन, अरण्य, गिरि, पर्वत, सागर, सरस्वती, भारती, पुरी) की स्थापना की।
  • पंचदेवोपासना: सनातन धर्म के आंतरिक मतभेदों को मिटाने हेतु शिव, विष्णु, शक्ति, सूर्य और गणेश-इन पांचों की समान रूप से पंचायतन पूजा का विधान किया।

कनकधारा स्तोत्र: करुणा से स्वर्ण आंवलों की वर्षा

आदि शंकराचार्य केवल शुष्क तार्किक दार्शनिक नहीं थे बल्कि उनके हृदय में करुणा का अगाध सागर लहराता था। इसका सबसे प्रत्यक्ष प्रमाण 'कनकधारा स्तोत्र' की अमर घटना है:

बालक शंकर जब भिक्षाटन के लिए एक अत्यंत निर्धन वृद्धा ब्राह्मणी की कुटिया पर पहुंचे, तो उस वृद्धा के घर में अन्न का एक दाना भी नहीं था। उसने अत्यंत संकोच और आंसुओं के साथ घर में रखा एकमात्र सूखा आंवला बालक शंकर की भिक्षा-पात्र में डाल दिया।

वृद्धा के इस चरम त्याग और दरिद्रता को देखकर शंकराचार्य जी का हृदय द्रवित हो उठा। उन्होंने उसी क्षण माता महालक्ष्मी की स्तुति में 21 छंदों वाले 'कनकधारा स्तोत्र' (Kanakadhara Stotram) की तात्कालिक रचना कर गान किया। माता लक्ष्मी बालक शंकर की इस निस्वार्थ करुणा से इतनी प्रसन्न हुईं कि उन्होंने उस निर्धन वृद्धा की झोपड़ी में आकाश से शुद्ध सोने के आंवलों की वर्षा कर दी।


दार्शनिक निष्कर्ष: विभाजन से परे अद्वैत चेतना का आह्वान

आदि शंकराचार्य जयंती का यह पावन दिवस आज के विभाजित और कलह-युक्त मानव समाज के लिए सबसे बड़ा मार्गदर्शक प्रकाश-स्तंभ है:

अद्वैत का अर्थ है-"दो नहीं, केवल एक"।

जब हम जाति, पंथ, भाषा, राष्ट्र और बाह्य संकीर्णताओं के आधार पर एक-दूसरे से घृणा करते हैं, तो हम वास्तव में 'द्वैत' (अज्ञान) के दलदल में फंसे होते हैं। शंकराचार्य जी ने हमें सिखाया कि जो चैतन्य आत्मा मेरे भीतर श्वास ले रही है, वही चैतन्य आत्मा सामने खड़े निर्धन, शत्रु, पशु और पक्षी के भीतर भी स्पंदित हो रही है।

जब मनुष्य इस आत्म-तत्व का साक्षात्कार कर लेता है, तो उसके समस्त भय, शोक और संकीर्णताएं हमेशा के लिए समाप्त हो जाती हैं: "यस्तु सर्वाणि भूतान्यात्मन्येवानुपश्यति। सर्वभूतेषु चात्मानं ततो न विजुगुप्सते॥"

आइए, वैशाख शुक्ल पंचमी के इस पावन दिन पर हम जगतगुरु आदि शंकराचार्य जी के चरणों में नतमस्तक हों, अपने भीतर के अज्ञान और अहंकार को विसर्जित करें और संपूर्ण विश्व को एक आत्म-स्वरूप मानकर प्रेम और ज्ञान का प्रकाश फैलाएं।


FAQ

आदि शंकराचार्य का जन्म किस तिथि और स्थान पर हुआ था?
आदि शंकराचार्य का जन्म वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को दक्षिण भारत के केरल राज्य स्थित कालड़ी (Kalady) ग्राम में पूर्णा नदी के तट पर हुआ था।

आदि शंकराचार्य के संन्यास गुरु कौन थे?
ओंकारेश्वर में नर्मदा नदी के तट पर परम पूज्य स्वामी गोविंद भगवत्पाद जी ने आदि शंकराचार्य जी को संन्यास की दीक्षा और वेदांत का सर्वोच्च ज्ञान प्रदान किया था।

आदि शंकराचार्य द्वारा स्थापित चार प्रमुख पीठ (मठ) कौन-से हैं?
वे चार पीठ हैं: दक्षिण में शृंगेरी शारदा पीठ, पश्चिम में द्वारका शारदा पीठ, पूर्व में गोवर्धन पीठ (पुरी) और उत्तर में ज्योतिर्मठ (बद्रीनाथ)।

अद्वैत वेदांत का मूल सिद्धांत क्या है?
अद्वैत वेदांत का मूल सिद्धांत है: "ब्रह्म सत्यं जगन्मिथ्या जीवो ब्रह्मैव नापरः" अर्थात् केवल ब्रह्म ही शाश्वत सत्य है, यह जगत परिवर्तनशील (मिथ्या) है और जीवात्मा वास्तव में परब्रह्म से भिन्न नहीं है।

आदि शंकराचार्य जी ने किस स्तोत्र की रचना कर सोने के आंवलों की वर्षा कराई थी?
एक निर्धन ब्राह्मणी की दरिद्रता दूर करने हेतु उन्होंने माता महालक्ष्मी की स्तुति में 'कनकधारा स्तोत्र' (Kanakadhara Stotra) की रचना की थी, जिससे प्रसन्न होकर मां लक्ष्मी ने स्वर्ण आंवलों की वर्षा की थी।

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लेखक

पं. अमिताभ शर्मा

पं. अमिताभ शर्मा (63)


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इनके क्लाइंट: Punjab, Haryana, Delhi

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