By पं. नीलेश शर्मा
वैशाख शुक्ल तृतीया, द्वि-उच्च खगोल विज्ञान, स्वर्ण क्रय रहस्य, युगादि पर्व और बद्रीनाथ कपाट

सनातन वैदिक पंचांग, सूर्य सिद्धांत, निर्णयसिंधु, धर्मसिंधु और भविष्य पुराण में वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को 'अक्षय तृतीया' (लोकभाषा में 'आखा तीज') के महापर्व के रूप में प्रतिष्ठा प्राप्त है। संस्कृत व्याकरण के अनुसार 'अक्षय' शब्द का निर्वचन है-"न क्षीयते इति अक्षयः" (जिसका कभी क्षय, विनाश अथवा ह्रास न हो)। यह तिथि संपूर्ण ब्रह्मांडीय कालगणना में वर्ष का सबसे बड़ा 'स्वयं-सिद्ध अबूझ मुहूर्त' (Unblemished Auspicious Window) मानी जाती है।
खगोलीय और ज्योतिषीय दृष्टि से यह संपूर्ण संवत्सर का वह अद्वितीय दिन होता है जब सौरमंडल के दो सबसे तेजस्वी और प्रभावशाली ग्रह-समस्त आत्माओं व जगत के अधिपति भगवान सूर्य देव और मन व अमृत तत्त्व के अधिष्ठाता चंद्रमा-एक साथ अपने-अपने परम उच्चांश (Deepest Exaltation) पर संचरण करते हैं:
सूर्य और चंद्रमा का यह 'द्वि-उच्च' (Double Exaltation) योग ब्रह्मांड में सात्विक ऊर्जा, जीवन-शक्ति और स्थायित्व का चरम प्रवाह उत्पन्न करता है। इस दिन प्रारंभ किया गया कोई भी शुभ कार्य, नूतन उद्यम, व्यापार, विवाह, विद्यारंभ अथवा गृह-प्रवेश काल के थपेड़ों से कभी नष्ट नहीं होता। इसी कारण पुराणों में इस तिथि को 'युगादि तिथि' (Yugadi Tithi) स्वीकार किया गया है, क्योंकि इसी दिन सतयुग और त्रेतायुग का आविर्भाव हुआ था।
| पंचांग व खगोलीय घटक | शास्त्रीय, ज्योतिषीय व पौराणिक विवरण |
|---|---|
| मास एवं पक्ष | वैशाख मास | शुक्ल पक्ष (Waxing Fortnight) |
| तिथि संज्ञा | तृतीया (अक्षय तृतीया / आखा तीज / युगादि तृतीया) |
| खगोलीय सौर स्थिति | सूर्य देव का मेष राशि में परम उच्च संचरण (10° Exalted Sun in Aries) |
| चांद्र खगोलीय स्थिति | चंद्रमा का वृषभ राशि में रोहिणी नक्षत्र युक्त परम उच्च संचरण (Exalted Moon in Taurus) |
| अधिष्ठाता देवता | भगवान श्री लक्ष्मीनारायण, भगवान परशुराम, मां अन्नपूर्णा एवं धनाध्यक्ष कुबेर |
| युगादि संधिकाल | सतयुग (Krita Yuga) और त्रेतायुग (Treta Yuga) का प्राकट्य दिवस |
| प्रमुख ऐतिहासिक घटनाएं | वेदव्यास जी द्वारा महाभारत लेखन का आरंभ, बद्रीनाथ धाम के कपाट खुलना |
| मुख्य धार्मिक कृत्य | स्वर्ण/रजत क्रय, जौ व जलपात्र दान, सत्तू भोग, श्रीयंत्र पूजन, पितृ-तर्पण |
| अभीष्ट फल | अक्षय पुण्य, स्थायी लक्ष्मी वास, दारिद्र्य नाश, व्यापारिक उन्नति, मोक्ष |
अक्षय तृतीया के इस परम मंगलकारी दिवस पर सूर्य और चंद्र के दिव्य तेज को आत्मसात करने तथा मां महालक्ष्मी व भगवान माधव की कृपा प्राप्त करने हेतु साधक को ब्रह्म मुहूर्त से ही शास्त्रीय आचार नियमों का पालन करना चाहिए:
अक्षय तृतीया केवल पंचांग की एक सामान्य तिथि नहीं है बल्कि सनातन इतिहास की युगांतकारी घटनाओं का साक्षी दिन है:
मत्स्य पुराण और नारद पुराण के अनुसार, ब्रह्मा जी ने जब सृष्टि चक्र का आरंभ किया, तो सतयुग (सत्ययुग) का प्रादुर्भाव वैशाख शुक्ल तृतीया के दिन ही हुआ था। कालान्तर में जब सतयुग पूर्ण हुआ तब त्रेतायुग का शुभारंभ भी इसी अक्षय तृतीया की पावन तिथि पर हुआ। इसी कारण इसे 'युगादि तिथि' कहा जाता है। इस दिन किए गए जप, तप, होम और दान का फल कल्प-कल्पांतरों तक कभी क्षीण नहीं होता।
महाभारत के आदिपर्व के अनुसार, कृष्ण द्वैपायन महर्षि वेदव्यास ने संपूर्ण ब्रह्मांड के सबसे महान इतिहास और ज्ञान-ग्रंथ 'महाभारत' की रचना का संकल्प इसी दिन लिया था। उन्होंने बुद्धि के अधिष्ठाता भगवान श्रीगणेश से प्रार्थना की कि वे इस महाग्रंथ के लिपिकार बनें। श्रीगणेश ने अपनी टूटी हुई दंत-लेखनी से अक्षय तृतीया के पावन मुहूर्त में ही महाभारत का प्रथम श्लोक लिपिबद्ध करना प्रारंभ किया था।
उत्तराखंड के उच्च हिमालयी क्षेत्र में स्थित भगवान विष्णु के परम धाम 'श्री बद्रीनाथ मंदिर' के कपाट छह महीने की शीतकालीन समाधि के बाद इसी अक्षय तृतीया की प्रातः काल वैदिक मंत्रोच्चार के साथ श्रद्धालुओं के लिए खोले जाते हैं। छह महीने पूर्व मंदिर के गर्भगृह में प्रज्वलित किया गया घृत-दीप (अखंड ज्योति) अक्षय तृतीया के दिन भी उसी प्रकार जलता हुआ मिलता है, जो ईश्वर की अक्षय सत्ता का प्रत्यक्ष प्रमाण है।
वर्तमान समय में अक्षय तृतीया पर सोना (Gold) खरीदने की परंपरा अत्यंत लोकप्रिय हो चुकी है, परंतु इसके पीछे गहरा तात्विक और ज्योतिषीय आधार विद्यमान है:
यदि किसी व्यक्ति के पास स्वर्ण खरीदने का सामर्थ्य नहीं है, तो उसे निराश होने की आवश्यकता नहीं है; शास्त्रों में स्वर्ण के समान ही फल देने वाले 4 विकल्प बताए गए हैं:
| क्रय वस्तु | ज्योतिषीय व तात्विक संबंध | घर-परिवार पर होने वाला स्थायी प्रभाव |
|---|---|---|
| शुद्ध स्वर्ण (Gold) | सूर्य, गुरु व मां लक्ष्मी का साक्षात तेज | स्थायी संपत्ति, मान-प्रतिष्ठा, धन-धान्य की अक्षुण्ण वृद्धि |
| जौ (Barley) | भगवान नारायण का प्रिय प्रथम धान्य | अन्नपूर्णा का वास, वंश-वृद्धि, रोगों से मुक्ति |
| श्रीयंत्र (स्फटिक/तांबा) | संपूर्ण ब्रह्मांडीय ऊर्जा का ज्यामितीय केंद्र | दरिद्रता का समूल नाश, व्यापारिक रुकावटों की समाप्ति |
| नवीन मिट्टी का कुंभ | पंचतत्वों का संतुलन और वरुण देव की कृपा | पितृ-शांति, गृह-क्लेश मुक्ति, आंतरिक शीतलता |
अक्षय तृतीया के दिन भगवान श्री लक्ष्मीनारायण के साथ-साथ धन के कोषाध्यक्ष कुबेर देव और अन्न की अधिष्ठात्री मां अन्नपूर्णा की संयुक्त साधना का विधान है:
ॐ यक्षाय कुबेराय वैश्रवणाय धनधान्याधिपतये।
धनधान्यसमृद्धिं मे देहि दापय स्वाहा॥
स्कंद पुराण के अनुसार अक्षय तृतीया पर दिया गया दान कभी क्षीण नहीं होता। इस दिन निम्नलिखित 5 महादान अनिवार्य रूप से करने चाहिए:
अक्षय तृतीया का पावन पर्व मानव चेतना को उपनिषदों का वह अमर सत्य सिखाता है कि संसार की समस्त भौतिक संपदाएं-चाहे वह कितना भी सोना, महल अथवा भूमि क्यों न हो-एक दिन काल के गाल में समाकर नष्ट हो जाएंगी; केवल आपका दिया हुआ दान, आपका परोपकार और आपके द्वारा अर्जित किया गया धर्म ही 'अक्षय' रहेगा।
सोना केवल धातु है; वास्तविक सोना वह शुद्ध हृदय है जो दूसरों के दुःख को देखकर पिघल जाए। अक्षय तृतीया पर सोना खरीदने का आध्यात्मिक उद्देश्य यह है कि हम अपने चरित्र को भी सोने की भांति शुद्ध, तेजस्वी और मूल्यवान बनाएं। जब हम अपने अहंकार का त्याग कर किसी निर्धन के आंसुओं को पोंछते हैं और प्यासे को शीतल जल पिलाते हैं, तो वह पुण्य काल की सीमाओं से परे होकर हमारे आत्म-कल्याण का अक्षय पाथेय बन जाता है।
अक्षय तृतीया को 'अबूझ मुहूर्त' क्यों कहा जाता है?
क्योंकि इस दिन सूर्य (मेष राशि में) और चंद्रमा (वृषभ राशि में) दोनों एक साथ अपनी परम उच्च स्थिति में होते हैं, जिससे संपूर्ण दिन दोष-रहित और स्वतः सिद्ध हो जाता है; किसी भी नए कार्य के लिए पंचांग शुद्धि देखने की आवश्यकता नहीं होती।
अक्षय तृतीया के दिन किन दो युगों का आरंभ हुआ था?
पुराणों के अनुसार अक्षय तृतीया की ही पावन तिथि पर सतयुग और त्रेतायुग का प्राकट्य (आरंभ) हुआ था, इसलिए इसे 'युगादि तृतीया' भी कहा जाता है।
यदि अक्षय तृतीया पर सोना खरीदने का सामर्थ्य न हो तो क्या खरीदना चाहिए?
यदि सोना न खरीद सकें, तो शुद्ध जौ (Barley), पीली कौड़ियां, गोमती चक्र, सेंधा नमक अथवा मिट्टी का नया घड़ा खरीदकर घर लाना स्वर्ण क्रय के समान ही शुभ फल देता है।
अक्षय तृतीया पर बद्रीनाथ धाम से संबंधित कौन-सी प्रमुख परंपरा है?
अक्षय तृतीया के दिन ही शीतकाल के छह महीने बाद भगवान श्री बद्रीनाथ मंदिर के कपाट खुलते हैं और गर्भगृह में छह महीने से निरंतर जल रही अखंड ज्योति के दर्शन होते हैं।
अक्षय तृतीया पर भगवान विष्णु को किस विशेष नैवेद्य का भोग लगाया जाता है?
इस दिन भगवान विष्णु को ग्रीष्म ऋतु की शीतलता हेतु जौ के सत्तू, मिश्री, भीगी चने की दाल, खरबूजा, तरबूज और आम का विशेष भोग लगाया जाता है।
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