बगलामुखी जयंती (वैशाख शुक्ल अष्टमी): दसमहाविद्याओं में पीताम्बरा का प्राकट्य और शत्रु स्तम्भन

By पं. सुव्रत शर्मा

वैशाख शुक्ल अष्टमी, दसमहाविद्या पीताम्बरा, हरिद्रा सरोवर प्राकट्य, मंगल-गुरु समन्वय और स्तम्भन रहस्य

बगलामुखी जयंती: पीताम्बरा प्राकट्य, शत्रु स्तम्भन व मंत्र

सामग्री तालिका

पंचांग विवरण एवं माँ बगलामुखी प्राकट्य की खगोलीय पृष्ठभूमि

सनातन वैदिक पंचांग, शाक्त तंत्र, 'स्वतंत्र तंत्र', 'बगलामुखी रहस्य' तथा 'रुद्रयामल' के अनुसार वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि को 'माँ बगलामुखी जयंती' (Bagalamukhi Jayanti) के रूप में अत्यंत श्रद्धा और तांत्रिक निष्ठा के साथ मनाया जाता है। भगवती बगलामुखी सनातन हिंदू धर्म की सर्वोच्च दस महाविद्याओं में आठवीं महाविद्या हैं। इन्हें 'पीताम्बरा' (पीले वर्ण के वस्त्र धारण करने वाली), 'ब्रह्मास्त्र विद्या' तथा 'स्तम्भनकारिणी' के नाम से जाना जाता है।

खगोलीय और ज्योतिषीय दृष्टि से वैशाख शुक्ल अष्टमी का कालखंड अत्यंत उग्र, तेजस्वी और संकल्प-सिद्धि का संधिकाल माना गया है। इस समय भुवन भास्कर भगवान सूर्य देव अपनी परम उच्च राशि मेष (Aries) में गोचर कर रहे होते हैं। अग्नि-तत्त्वीय मेष राशि में सूर्य का यह संचरण वातावरण में प्रचंड आग्नेय ऊर्जा का विस्तार करता है। अष्टमी तिथि की अधिष्ठात्री स्वयं माँ दुर्गा (शक्ति) हैं। ज्योतिषीय दृष्टि से माँ बगलामुखी मंगल (Mars - पराक्रम, शस्त्र, रक्त, विजय) और देवगुरु बृहस्पति (Jupiter - पीला वर्ण, ज्ञान, दैवीय कृपा, विवेक) के संयुक्त तेज का साक्षात प्रतीक हैं। जहाँ मंगल शत्रुओं के संहार का बाहुबल देता है, वहीं गुरु की कृपा साधक की बुद्धि को स्थिर कर वाक-सिद्धि प्रदान करती है। इस पावन निशा (रात्रि) में हल्दी की माला से बगलामुखी मंत्र का अनुष्ठान करने से न्यायालयीन विवाद (Court Cases), घोर शत्रु-बाधा, तंत्र-दोष और षड्यंत्रों का तत्काल स्तम्भन हो जाता है।

पंचांग व साधना घटक शास्त्रीय, ज्योतिषीय व तांत्रिक विवरण
पावन तिथि व काल वैशाख मास | शुक्ल पक्ष अष्टमी (बगलामुखी जयंती) | महानिशा काल
महाविद्या क्रम दसमहाविद्याओं में 8वीं महाशक्ति (अष्टम महाविद्या)
अवतार संज्ञा व स्वरूप पीताम्बरा, ब्रह्मास्त्र रूपिणी, स्तम्भन शक्ति, षट्कर्म अधिष्ठात्री
प्राकट्य तीर्थ स्थल हरिद्रा सरोवर (सौराष्ट्र / गुजरात क्षेत्र) | मुख्य पीठ: नलखेड़ा, दतिया, बनखंडी
अधिष्ठाता ग्रह योग मंगल (अग्नि, पराक्रम, विजय) एवं देवगुरु बृहस्पति (पीला वर्ण, ज्ञान, नीति)
मुख्य तात्विक प्रभाव अग्नि तत्त्व (Tejas) द्वारा वायु और जल के अनियंत्रित वेग का स्तम्भन
साधना का प्रधान वर्ण पीत वर्ण (पीले वस्त्र, पीला आसन, पीला पुष्प, पीला चंदन, हल्दी)
जप माला शुद्ध हरिद्रा माला (हल्दी की 108 गांठों वाली अभिमंत्रित माला)
अभीष्ट फल शत्रु-पराभव, मुकदमों में विजय, वाक-स्तम्भन, भय-मुक्ति, आकर्षण

बगलामुखी जयंती के पावन पर्व पर माँ पीताम्बरा की सात्विक कृपा प्राप्त करने और जीवन के समस्त अवरोधों को स्तम्भित करने हेतु साधक को निम्नलिखित नियमों का निष्ठापूर्वक पालन करना चाहिए:

  • प्रातः काल सूर्योदय से पूर्व उठकर शीतल जल में गंगाजल और चुटकी भर हल्दी मिलाकर स्नान करना।
  • स्नान के पश्चात केवल पीले रंग के स्वच्छ सूती अथवा रेशमी वस्त्र धारण करना; काले अथवा नीले वस्त्रों का पूर्ण त्याग करना।
  • पूजा स्थल को स्वच्छ कर लकड़ी की चौकी पर पीला रेशमी वस्त्र बिछाना और उस पर 'बगलामुखी यंत्र' अथवा भगवती के चित्र की स्थापना करना।
  • माता को पीले कनेर के पुष्प, गेंदे के फूल, पीला चंदन, हल्दी की गांठें, अक्षत और पीले वस्त्र अर्पित करना।
  • भोग के रूप में बेसन के लड्डू, केसरिया खीर, चने की दाल अथवा हल्दी युक्त मीठा हलवा अर्पित करना।
  • रात्रि काल (विशेषकर 09:00 PM से 12:00 AM के मध्य) में पूर्व अथवा उत्तर दिशा की ओर मुख करके पीले आसन पर बैठना।
  • शुद्ध गाय के घी अथवा तिल/सरसों के तेल का दीपक जलाना; दीपक में चुटकी भर हल्दी अथवा पीली सरसों डालना।
  • हरिद्रा (हल्दी) की माला से माँ बगलामुखी के बीज मंत्र अथवा मूल मंत्र का एकाग्रचित्त होकर कम से कम 108 बार (1 माला) अथवा 11 माला जप करना।
  • साधना काल में पूर्ण मौन, सत्य भाषण और ब्रह्मचर्य का पालन करना; किसी के प्रति व्यक्तिगत दुर्भावना या बदले की भावना से तंत्र का दुरुपयोग न करना।

पौराणिक इतिहास: सौराष्ट्र का हरिद्रा सरोवर और मदनसुर की जीभ का स्तम्भन

'स्वतंत्र तंत्र' और 'नारद पांचरात्र' में माँ बगलामुखी के प्राकट्य की कथा का अत्यंत विशद और रोमांचक वर्णन प्राप्त होता है:

प्राचीन काल में सतयुग के आरंभ में संपूर्ण ब्रह्मांड में एक प्रलयंकारी आंधी-तूफान (Cosmic Deluge) उठा। वायु और जल के उस भीषण वेग से समस्त लोक, पर्वत, ऋषि-मुनियों के आश्रम और ग्रह-नक्षत्र डोलने लगे। सृष्टि के अस्तित्व पर गहरा संकट मंडराने लगा।

माँ बगलामुखी का दिव्य चतुर्भुज विग्रह, एक हाथ में गदा और दूसरे से दैत्य की जीभ खींचे हुए

भगवान विष्णु की घोर तपस्या और हरिद्रा सरोवर

सृष्टि की यह दुर्दशा देखकर जगत-पालक भगवान श्रीहरि विष्णु अत्यंत चिंतित हो उठे। वे तुरंत सौराष्ट्र (वर्तमान गुजरात) क्षेत्र में स्थित अत्यंत शांत और पवित्र 'हरिद्रा सरोवर' (पीले जल वाला सरोवर) के तट पर पहुंचे।

  • भगवान विष्णु ने सृष्टि की रक्षा हेतु माँ महात्रिपुरसुंदरी की घोर तपस्या आरंभ की।
  • उनकी अनन्य तपस्या और आर्त पुकार से प्रसन्न होकर वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि की आधी रात को उस हरिद्रा सरोवर के जल से एक अलौकिक, पीत वर्ण का महातेज पुंज प्रकट हुआ।
  • उस स्वर्णिम प्रकाश के मध्य से चतुर्भुज रूप में, पीले वस्त्र धारण किए हुए, हाथ में मुद्गर (गदा) लिए साक्षात 'माँ बगलामुखी' प्रकट हुईं।
  • माँ बगलामुखी ने अपने दिव्य तेज के प्रभाव से उस प्रलयंकारी जल-तूफान को एक ही क्षण में स्थिर (स्तम्भित) कर दिया, जिससे संपूर्ण चराचर जगत में शांति स्थापित हो गई।

मदनसुर का वध और जिह्वा-स्तम्भन का रहस्य

कालांतर में 'मदन' (मदनसुर) नामक एक भयंकर असुर ने अपनी कठोर तपस्या से ब्रह्मा जी से 'वाक-सिद्धि' का वरदान प्राप्त कर लिया।

  • उस वरदान के प्रभाव से मदनसुर जो कुछ भी अपनी जिह्वा से बोलता था, वह तत्काल घटित हो जाता था। वह अपने शब्दों मात्र से ऋषियों को भस्म कर देता था और देवताओं को पराजित कर देता था।
  • जब देवताओं की प्रार्थना पर माँ बगलामुखी युद्ध क्षेत्र में उतरीं, तो असुर ने जैसे ही देवताओं के संहार हेतु अपशब्द कहने के लिए अपना मुख खोला, माता ने अपनी दिव्य योग-शक्ति से उसकी जीभ (जिह्वा) को अपनी हथेली से खींच लिया और दूसरे हाथ से मुद्गर (गदा) का प्रहार कर उसके अहंकार का समूल नाश कर दिया।
  • जीभ खींचने का यह प्रतीक केवल एक दैत्य का वध नहीं है बल्कि यह मानव चेतना में असत्य, निंदा, कटुता और अहंकार की वाणी को मौन कर सत्य को जाग्रत करने का परम आध्यात्मिक संदेश है।

ज्योतिषीय विश्लेषण: मंगल और बृहस्पति का युगांतरकारी समन्वय

वैदिक ज्योतिष में माँ बगलामुखी की ऊर्जा को समझना कुंडली के सबसे जटिल दोषों के निवारण की कुंजी है:

1. मंगल (Mars) - पराक्रम, रक्त और अस्त्र

  • मंगल को देवताओं का सेनापति माना गया है। जब मंगल अशुभ हो, तो जातक को कोर्ट-कचहरी, पुलिस विवाद, रक्त विकार, दुर्घटनाएं और शत्रुओं से निरंतर भय बना रहता है।
  • माँ बगलामुखी के हाथ में सुशोभित 'मुद्गर' (गदा) और असुर पर विजय साक्षात मंगल के सकारात्मक, अनुशासित और पराक्रमी रूप का प्रतीक है।

2. देवगुरु बृहस्पति (Jupiter) - पीला वर्ण और वाक-विवेक

  • गुरु ग्रह का संबंध पीले वर्ण, ज्ञान, न्याय, न्यायालय और बुद्धि की स्थिरता से है।
  • माँ बगलामुखी को पीताम्बरा कहा जाता है। माता वाणी की अधिष्ठात्री हैं। वे मनुष्य की भटकी हुई बुद्धि को स्तम्भित कर उसे सत्य ज्ञान की ओर मोड़ती हैं।

जब किसी जातक की जन्मकुंडली में मंगल-केतु की युति हो, शनि-मंगल का अंगारक दोष हो, अथवा गुरु चांडाल योग बन रहा हो, तो बगलामुखी जयंती पर की गई सात्विक साधना से समस्त ग्रह-दोष तत्काल शांत हो जाते हैं।

ज्योतिषीय घटक माँ बगलामुखी से संबंध साधक के जीवन में चमत्कारी प्रभाव
मंगल ग्रह गदा (शस्त्र), शत्रु-संहार, रक्त शोधन मुकदमों में जीत, भूमि विवादों का समाधान, साहस
बृहस्पति ग्रह पीला वर्ण, हरिद्रा माला, ज्ञान व वाणी विवेक की जागृति, पराजय को विजय में बदलना
राहु व केतु षड्यंत्र, गुप्त शत्रु, अकारण भय गुप्त शत्रुओं की चालों का पूर्ण स्तम्भन

प्रामाणिक पूजन विधि एवं सिद्ध मंत्र जप

माँ बगलामुखी की साधना अत्यंत संवेदनशील और शक्तिशाली होती है; अतः गृहस्थ साधकों को सदैव 'सात्विक विधि' से ही पूजन करना चाहिए:

1. माँ बगलामुखी का ध्यान मंत्र

पीले आसन पर बैठकर हाथ में पीले पुष्प और अक्षत लेकर माता के इस दिव्य स्वरूप का ध्यान करें:

सौवर्णामृतकुम्भिनीं त्रिनयनां पीताम्बरालंकृताम्,
हस्तैर्मुद्गरपाशपात्ररसनां संबिभ्रतीं सुप्रभाम्।
श्रीकाञ्चीपदकङ्कणांगदधरां पीतप्रभाभासिनीम्,
देवी भक्तविपत्तिभञ्जनकरीं वन्देऽहमुग्रेश्वरीम्॥

2. माँ बगलामुखी का एकाक्षरी बीज मंत्र

गृहस्थ साधकों के लिए मानसिक जप हेतु यह एकाक्षरी बीज मंत्र अत्यंत सुरक्षित और फलदायी है:

ॐ ह्लीं बगलामुख्यै नमः॥

3. माँ बगलामुखी का अष्टादशाक्षर मूल मंत्र

शत्रु-बाधा और घोर संकटों के निवारण हेतु हरिद्रा माला से इस मंत्र का जप किया जाता है:

ॐ ह्लीं बगलामुखि सर्वदुष्टानां वाचं मुखं पदं स्तम्भय जिह्वां कीलय बुद्धिं विनाशय ह्लीं ॐ स्वाहा॥

मंत्र का गूढ़ अर्थ:
"हे भगवती बगलामुखी! हे ह्लीं कार रूपिणी! समस्त दुष्ट, कुटिल और अनिष्टकारी शक्तियों की वाणी, मुख और चरणों को स्तम्भित (रोक) कर दीजिए; उनकी कुटिल बुद्धि का शमन कर सत्य और धर्म की रक्षा कीजिए।"


बगलामुखी के तीन ऐतिहासिक सिद्ध शक्तिपीठ

भारतवर्ष में माँ बगलामुखी के तीन ऐसे सिद्ध शक्तिपीठ हैं जहाँ दर्शन और साधना मात्र से असंभव कार्य भी संभव हो जाते हैं:

  1. नलखेड़ा (शाजापुर, मध्य प्रदेश): लखुंदर नदी के तट पर स्थित यह विश्वविख्यात मंदिर महाभारत कालीन माना जाता है। मान्यता है कि महाभारत युद्ध से पूर्व भगवान श्री कृष्ण के निर्देश पर धर्मराज युधिष्ठिर ने यहाँ माँ बगलामुखी की साधना कर कौरवों पर विजय का आशीर्वाद प्राप्त किया था। यहाँ माता त्रिशक्ति (बगलामुखी, महालक्ष्मी, महासरस्वती) रूप में विराजती हैं।
  2. पीताम्बरा पीठ (दतिया, मध्य प्रदेश): पूज्यपाद स्वामी जी महाराज द्वारा स्थापित यह पीठ भारत की राजनीतिक और आध्यात्मिक चेतना का केंद्र है। 1962 के भारत-चीन युद्ध तथा 1965 के युद्ध के समय यहाँ राष्ट्र-रक्षा हेतु किए गए तांत्रिक अनुष्ठान इतिहास-प्रसिद्ध हैं।
  3. बनखंडी (कांगड़ा, हिमाचल प्रदेश): हिमालय की शिवालिक पहाड़ियों के शांत वातावरण में स्थित यह अत्यंत प्राचीन सिद्ध पीठ है, जहाँ साधकों को त्वरित आत्म-साक्षात्कार और स्तम्भन सिद्धि की प्राप्ति होती है।

दार्शनिक निष्कर्ष: स्तम्भन का वास्तविक आध्यात्मिक रहस्य

माँ बगलामुखी की साधना को केवल बाह्य शत्रुओं को हराने का साधन समझना इस महाविद्या के प्रति भारी अज्ञान है। 'स्तम्भन' का वास्तविक दार्शनिक रहस्य अंतर्मुखी है:

मानव का सबसे बड़ा शत्रु कोई बाहरी व्यक्ति नहीं बल्कि उसके अपने भीतर का चंचल मन, अनियंत्रित जिह्वा और काम-क्रोध के विकार हैं।

जब साधक माँ बगलामुखी की शरण में जाता है, तो माता उसकी अपनी ही अनियंत्रित वाणी (व्यर्थ प्रलाप), भटके हुए विचारों और नकारात्मक वृत्तियों को 'स्तम्भित' (शांत) कर देती हैं। जब मन की वृत्तियां शांत हो जाती हैं, तो साधक निर्भय होकर परब्रह्म के साक्षात आनंद में स्थित हो जाता है।

आइए, वैशाख शुक्ल अष्टमी के इस पावन पर्व पर हम माँ पीताम्बरा के चरणों में नमन करें, अपनी वाणी और विचारों को सत्य के मार्ग पर स्थिर करें और समाज में धर्म, न्याय तथा आत्म-रक्षा का दीप प्रज्वलित करें।


FAQ

माँ बगलामुखी जयंती किस तिथि को मनाई जाती है?
माँ बगलामुखी जयंती प्रतिवर्ष वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि (वैशाख शुक्ल अष्टमी) को मनाई जाती है।

दसमहाविद्याओं में माँ बगलामुखी का कौन-सा स्थान है?
माँ बगलामुखी दसमहाविद्याओं में आठवीं महाशक्ति (8th Mahavidya) के रूप में प्रतिष्ठित हैं।

माँ बगलामुखी को 'पीताम्बरा' क्यों कहा जाता है?
क्योंकि वे सौराष्ट्र के पीले जल वाले हरिद्रा सरोवर से प्रकट हुई थीं, पीले वस्त्र और पीले आभूषण धारण करती हैं तथा उनकी साधना में पीला वर्ण ही प्रधान होता है।

माँ बगलामुखी के हाथ में असुर की जीभ (जिह्वा) होने का क्या अर्थ है?
यह वाक-स्तम्भन और सत्य की रक्षा का प्रतीक है; माता दुष्टों की अनिष्टकारी वाणी और कुटिल बुद्धि को रोककर धर्म की स्थापना करती हैं।

माँ बगलामुखी के मंत्र का जप किस माला से किया जाता है?
माँ बगलामुखी के मंत्रों का जप अनिवार्य रूप से हरिद्रा माला (हल्दी की 108 गांठों वाली अभिमंत्रित माला) से ही किया जाता है।

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लेखक

पं. सुव्रत शर्मा

पं. सुव्रत शर्मा (63)


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