By पं. अभिषेक शर्मा
मेष संक्रांति खगोल विज्ञान, सुनहरी फसल उत्सव, 1699 खालसा सृजन और पंच प्यारे दर्शन

सनातन वैदिक पंचांग, सौर सिद्धांत और भारत की कृषि संस्कृति में बैसाखी (वैशाखी) का महापर्व केवल एक ऋतु-उत्सव नहीं, अपितु खगोलीय कालगणना, कृषि समृद्धि और ऐतिहासिक-आध्यात्मिक चेतना का महा-संगम है। प्रतिवर्ष अंग्रेजी कैलेंडर के अनुसार यह पर्व 13 अथवा 14 अप्रैल को मनाया जाता है। पंचांगीय दृष्टि से यह वह पावन क्षण होता है जब भुवन भास्कर भगवान सूर्य देव देवगुरु बृहस्पति की जल-तत्त्वीय राशि मीन (Pisces) की अंतिम सीमा को पार कर अपने मित्र मंगल की चर-अग्नि राशि मेष (Aries) के 0° पर प्रविष्ट होते हैं। इस खगोलीय घटना को 'मेष संक्रांति' (Mesha Sankranti) कहा जाता है।
मेष संक्रांति के साथ ही सौर नववर्ष (Solar New Year) का शुभारंभ होता है और उत्तर तथा मध्य भारत में सौर वैशाख मास की प्रतिष्ठा होती है। सूर्य के मेष राशि में प्रवेश करते ही संपूर्ण प्रकृति में नव-जीवन और नव-ऊर्जा का संचार होता है। खेतों में रबी की प्रमुख फसल-विशेषकर सोने जैसी सुनहरी गेहूं-पककर तैयार हो जाती है। यह समय कृषकों के अथक परिश्रम के फलीभूत होने का उत्सव है। इसके साथ ही, सिख इतिहास में संवत 1756 (1699 ईस्वी) की बैसाखी के दिन दसवें गुरु, गुरु गोबिंद सिंह जी ने आनंदपुर साहिब की पावन भूमि पर 'खालसा पंथ' की स्थापना कर भारतीय चेतना को स्वाभिमान, शौर्य और धर्म-रक्षा का अमर कवच प्रदान किया था।
| पंचांग व खगोलीय घटक | शास्त्रीय, ज्योतिषीय व ऐतिहासिक विवरण |
|---|---|
| पर्व का नाम व काल | बैसाखी / वैशाखी (प्रतिवर्ष 13 या 14 अप्रैल / सौर वैशाख आरंभ) |
| खगोलीय सौर घटना | सूर्य का मीन से मेष राशि में 0° पर प्रवेश (मेष संक्रांति / महाविषुव संधिकाल) |
| कृषि का संदर्भ | रबी की फसल (गेहूं, जौ, चना, सरसों) की कटाई और अन्न-समृद्धि का पर्व |
| ऐतिहासिक-धार्मिक आयाम | दशमेश गुरु गोबिंद सिंह जी द्वारा 'खालसा पंथ' का सृजन (आनंदपुर साहिब, 1699 ई.) |
| अधिष्ठाता देवता / सत्ता | भुवन भास्कर सूर्य, अन्नपूर्णा माता, वाहेगुरु, पंच प्यारे |
| प्रमुख खाद्य पदार्थ व प्रसाद | कड़ाह प्रसाद, मक्के की रोटी-सरसों का साग, गुड़ की खीर, सत्तू व आम पना |
| मुख्य अनुष्ठान व परंपराएं | पवित्र सरोवरों/नदियों में महास्नान, नगर कीर्तन, भांगड़ा-गिद्दा, अमृत संचार |
| भारत के विभिन्न रूप | सतुआनी (बिहार/पूर्वांचल), पोइला बैशाख (बंगाल), बिहू (असम), पुथंडु (तमिलनाडु), विशु (केरल) |
| अभीष्ट जीवन फल | कृषि समृद्धि, अन्याय से लड़ने का शौर्य, नव-चेतना, सामाजिक समरसता |
बैसाखी के इस पावन पर्व पर सौर नववर्ष का स्वागत करने, नवीन अन्न की प्रतिष्ठा करने और खालसा के शौर्य को आत्मसात करने हेतु साधक को शास्त्रोक्त विधि का निष्ठापूर्वक पालन करना चाहिए:
सनातन ज्योतिष में मेष संक्रांति को 'महाविषुव संक्रांति' (Maha Vishuva Sankranti) का आधार माना गया है:
| क्षेत्र / प्रांत | पर्व का नाम | मुख्य सांस्कृतिक व धार्मिक परंपरा |
|---|---|---|
| पंजाब व हरियाणा | बैसाखी | गुरुद्वारा अर्चन, नगर कीर्तन, भांगड़ा, फसल कटाई का उल्लास |
| बिहार व पूर्वांचल | सतुआनी व जुड़शीतल | सत्तू और टिकोले का प्राशन, जल-कुंभ दान, तुलसी में जल सिंचन |
| पश्चिम बंगाल | पोइला बैशाख | बांग्ला नववर्ष, 'हालखाता' (नवीन बहीखाता पूजन), लक्ष्मी-गणेश पूजा |
| असम | बोहाग बिहू (रोंगाली बिहू) | असमिया नववर्ष, गो-पूजा, बिहू नृत्य, ढोल और पेपा वादन |
| केरल | विशु (Vishu) | 'विशुकणि' दर्शन (अन्न, स्वर्ण, आईना दर्शन), विशु कैनीतम (सिक्का दान) |
| तमिलनाडु | पुथंडु (Puthandu) | तमिल सौर नववर्ष, 'कन्नी' दर्शन, नीम-पुष्प युक्त आम पचड़ी का सेवन |
बैसाखी भारत की उस महान कृषि संस्कृति का दर्पण है जो अन्न को साक्षात ब्रह्म मानती है: "अन्नं वै प्राणः" (अन्न ही जीवन का प्राण है)।
भारतीय इतिहास और धर्म-रक्षा के इतिहास में 13 अप्रैल 1699 की बैसाखी स्वर्ण अक्षरों में अंकित है। यह वह दिन था जब दसवें पातशाह श्री गुरु गोबिंद सिंह जी ने आनंदपुर साहिब के केशगढ़ साहिब में एक विशाल सभा का आह्वान किया था।
उस समय देश मुग़ल आक्रांताओं के अत्याचार, धार्मिक उत्पीड़न और रूढ़ियों के अंधकार में फंसा हुआ था। समाज निर्बल और भयभीत हो चुका था।
गुरु जी ने उन पांचों को नव-वस्त्र पहनाकर सभा के सामने प्रस्तुत किया और उन्हें 'पंच प्यारे' की संज्ञा दी।
| पंच प्यारे | मूल नाम | जाति / पृष्ठभूमि | मूल निवास स्थल | सिख धर्म में प्रदान किया गया नाम |
|---|---|---|---|---|
| प्रथम प्यारा | दया राम जी | खत्री | लाहौर (पंजाब) | भाई दया सिंह जी |
| द्वितीय प्यारा | धर्म दास जी | जाट | हस्तिनापुर (उत्तर प्रदेश) | भाई धर्म सिंह जी |
| तृतीय प्यारा | हिम्मत राय जी | झीवर (कहार) | जगन्नाथ पुरी (ओडिशा) | भाई हिम्मत सिंह जी |
| चतुर्थ प्यारा | मोहकम चंद जी | छीपा (दर्जी) | द्वारका (गुजरात) | भाई मोहकम सिंह जी |
| पंचम प्यारा | साहिब चंद जी | नाई | बीदर (कर्नाटक) | भाई साहिब सिंह जी |
गुरु गोबिंद सिंह जी ने खालसा पंथ की स्थापना के साथ प्रत्येक सिख के लिए 'पांच ककार' धारण करना अनिवार्य किया, जो केवल बाह्य प्रतीक नहीं बल्कि आंतरिक चरित्र के पांच सर्वोच्च स्तंभ हैं:
बैसाखी का महापर्व मानव समाज को सनातन जीवन दर्शन के तीन सर्वोच्च मूल्य एक साथ सिखाता है:
१. श्रम की महत्ता (किरत करो): किसान की भांति पसीना बहाकर धरती से अन्न उत्पन्न करना और उस अन्न को ईश्वर का उपहार मानकर नतमस्तक होना।
२. सामाजिक समरसता (ना कोई बैरी नहीं बेगाना): भारत के चारों कोनों (उत्तर, दक्षिण, पूर्व, पश्चिम) और समाज के विभिन्न वर्गों से आए पंच प्यारों को एक बाटे में अमृत छकाकर गुरु जी ने जाति-पाति के संकीर्ण भेदों को हमेशा के लिए मिटा दिया।
३. स्वाभिमान और धर्म-रक्षा (संत-सिपाही): एक हाथ में माला (भक्ति) और दूसरे हाथ में कृपाण (शक्ति) धारण कर अधर्म और अत्याचार के विरुद्ध खड़े होना।
आइए, बैसाखी के इस पावन पर्व पर हम सूर्य के मेष प्रवेश के साथ अपनी चेतना में नव-ऊर्जा का संचार करें, अन्न के प्रति कृतज्ञ बनें और अपने भीतर निर्भयता, सेवा और स्वाभिमान की दिव्य ज्योति प्रज्वलित करें।
बैसाखी का पर्व प्रतिवर्ष 13 या 14 अप्रैल को ही क्यों पड़ता है?
क्योंकि यह पर्व सौर गणना पर आधारित है; इस दिन सूर्य देव मीन राशि से निकलकर मेष राशि में प्रवेश करते हैं (मेष संक्रांति), जो प्रतिवर्ष 13 या 14 अप्रैल को ही घटित होती है।
खालसा पंथ की स्थापना किस वर्ष और कहाँ हुई थी?
खालसा पंथ की स्थापना संवत 1756 (13 अप्रैल 1699 ईस्वी) को आनंदपुर साहिब (पंजाब) में तख्त श्री केशगढ़ साहिब की पावन भूमि पर दसवें सिख गुरु, श्री गुरु गोबिंद सिंह जी द्वारा की गई थी।
'पंच प्यारे' कौन थे और उनका क्या महत्व है?
पंच प्यारे वे पांच समर्पित भक्त थे जिन्होंने धर्म और मानवता की रक्षा के लिए गुरु गोबिंद सिंह जी के आह्वान पर अपने शीश भेंट किए थे; वे भारत के विभिन्न क्षेत्रों और सामाजिक वर्गों से आए थे जो अखंड राष्ट्रीय एकता के प्रतीक बने।
सिख धर्म के 'पांच ककार' कौन-से हैं?
पांच ककार हैं: केश (अनकटे बाल), कंघा (लकड़ी की कंघी), कड़ा (लोहे का कंगन), कछैरा (सूती अंतःवस्त्र) और कृपाण (रक्षा हेतु छोटी तलवार)।
पूर्वी भारत में बैसाखी के दिन कौन-सा पर्व मनाया जाता है?
बिहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश में बैसाखी के दिन 'सतुआनी' मनाई जाती है, जिसमें नए सत्तू, कच्चे आम के टिकोले और गुड़ का सेवन किया जाता है तथा घड़े और पंखे का दान किया जाता है।
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