बांके बिहारी मंदिर में वर्ष में केवल एक बार चरण दर्शन: अक्षय तृतीया पर वृंदावन का अलौकिक उत्सव

By अपर्णा पाटनी

वृंदावन अक्षय तृतीया, स्वामी हरिदास निधिवन प्राकट्य, मलयगिरि चंदन लेपन और स्वर्ण सत्तू लड्डू

बांके बिहारी चरण दर्शन: अक्षय तृतीया, चंदन लेपन व रहस्य

पंचांग विवरण एवं श्री बांके बिहारी चरण दर्शन की आध्यात्मिक पृष्ठभूमि

सनातन वैदिक पंचांग, ब्रज-भक्ति संप्रदायों, वल्लभ और निम्बार्क-हरिदासी परंपरा में वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि-अर्थात अक्षय तृतीया-वृंदावन धाम का सबसे दुर्लभ, प्रतीक्षित और अलौकिक उत्सव माना जाता है। वृंदावन के विश्वविख्यात श्री ठाकुर बांके बिहारी जी मंदिर में संपूर्ण वर्ष भर ठाकुर जी के श्रीविग्रह के चरण-कमल भारी जरी-युक्त वस्त्रों, मखमली पोशाक और आभूषणों से ढके रहते हैं। 365 दिनों में केवल और केवल अक्षय तृतीया का ही वह एकमात्र पावन दिन होता है जब प्रातः काल से लेकर रात्रि शयन आरती तक भक्तों को ठाकुर बांके बिहारी जी के नयनाभिराम 'श्री चरण कमलों' (दिव्य पादारविंद) के साक्षात दर्शन का सौभाग्य प्राप्त होता है।

खगोलीय दृष्टि से यह वही दिन है जब सूर्य अपनी उच्च राशि मेष में और चंद्रमा अपनी उच्च राशि वृषभ में गोचर करते हैं। इस द्वि-उच्च आकाशीय संधिकाल में ब्रजमंडल में ग्रीष्म ऋतु का प्रचंड ताप आरंभ हो जाता है। स्वामी हरिदास जी द्वारा प्रतिष्ठित ठाकुर बांके बिहारी जी बाल और लाड़िले स्वरूप में विराजते हैं; अतः ग्रीष्म के संताप से ठाकुर जी को शीतलता प्रदान करने के लिए इस दिन उनके संपूर्ण श्रीअंग पर मलयगिरि श्वेत चंदन, कपूर, गुलाब जल और केसर का शीतल लेप किया जाता है। ठाकुर जी को इस दिन स्वर्ण और रजत की नूपुर (पायल) से सुसज्जित किया जाता है और उनके पावन चरणों में एक स्वर्णिम गोलाकार लड्डू (सत्तू का लड्डू) अर्पित रहता है। इस दुर्लभ दर्शन की एक झलक पाने हेतु देश-विदेश से लाखों श्रद्धालु वृंदावन की कुंज गलियों में उमड़ पड़ते हैं।

पंचांग व दर्शन घटक शास्त्रीय, संप्रदायिक व व्यावहारिक विवरण
उत्सव तिथि व काल वैशाख मास | शुक्ल पक्ष तृतीया (अक्षय तृतीया) | संपूर्ण दिन
मुख्य अधिष्ठाता विग्रह श्री ठाकुर बांके बिहारी जी महाराज (स्वामी हरिदास जी के लाड़िले)
दर्शन की अद्वितीयता वर्ष में केवल 1 दिन चरण दर्शन (364 दिन वस्त्रों से आच्छादित)
शीतलीकरण उपचार संपूर्ण श्रीअंग पर मलयगिरि श्वेत चंदन, कपूर, केसर व गुलाब जल का लेप
श्री चरण आभूषण स्वर्ण-रजत नूपुर, पेंजनी, रत्नजड़ित अंगुष्ठिका व स्वर्ण लड्डू
मुख्य विशेष नैवेद्य भुने जौ-चने व मेवे से निर्मित 'सत्तू के लड्डू', आम रस, शीतल पना
पोशाक का स्वरूप अत्यंत हल्की, बारीक श्वेत मलमल व पीतांबरी धोती (ग्रीष्मकालीन पोशाक)
आध्यात्मिक भाव वात्सल्य और माधुर्य रस (सुकुमार लाड़िले ठाकुर जी की शीतलता रक्षा)
अभीष्ट दर्शन फल जन्म-जन्मांतर के तापों का शमन, ब्रज-रज की प्राप्ति, परम भगवद्-प्रेम

अक्षय तृतीया पर श्री बांके बिहारी जी के श्री चरणों का ध्यान करने अथवा साक्षात दर्शन प्राप्त करने हेतु साधक को ब्रज परंपरा के अनुसार ब्रह्म मुहूर्त से ही निम्नलिखित आचार नियमों का पालन करना चाहिए:

  • प्रातः काल सूर्योदय से पूर्व उठकर शीतल जल में यमुना जल अथवा गंगाजल मिलाकर स्नान करना।
  • स्नान के पश्चात मन में श्री स्वामी हरिदास जी और बांके बिहारी जी के युगल स्वरूप का ध्यान करना।
  • श्वेत अथवा हल्के पीले सूती वस्त्र धारण कर ललाट पर गोपीचंदन अथवा श्वेत चंदन का त्रिपुंड/तिलक लगाना।
  • घर के पूजा स्थल पर लड्डू गोपाल अथवा ठाकुर जी के श्रीविग्रह को पंचामृत से स्नान कराकर गंगाजल से शुद्ध करना।
  • ग्रीष्मकालीन संताप के निवारण हेतु ठाकुर जी के पादारविंद और वक्षस्थल पर मलयगिरि चंदन का लेप लगाना।
  • जौ और चने के भुने सत्तू में शुद्ध देशी घी, पिसी मिश्री, इलायची और सूखे मेवे मिलाकर सत्तू के लड्डू बनाना और तुलसी दल रखकर भोग लगाना।
  • दिनभर "श्री बांके बिहारी लाल की जय" अथवा "राधे राधे" नाम का मानसिक जप करते हुए चित्त को शांत रखना।
  • दर्शन के समय मंदिर प्रांगण में संयम, सेवा-भाव और विनम्रता बनाए रखना; भीड़ में किसी वृद्ध अथवा दुर्बल भक्त को कष्ट न पहुंचाना।

स्वामी हरिदास जी, निधिवन प्राकट्य और चरण आच्छादन का रहस्य

ठाकुर बांके बिहारी जी के प्राकट्य और उनके श्री चरणों को वर्षभर ढके रखने की परंपरा के पीछे ब्रज का अत्यंत रस-सिक्त और गूढ़ आध्यात्मिक रहस्य छिपा हुआ है:

1. निधिवन में प्राकट्य की पावन कथा

संवत 1562 के आसपास तानसेन के गुरु और संगीत-शिरोमणि स्वामी हरिदास जी निधिवन की कुंजों में तानपूरे पर ध्रुपद गायन कर प्रिया-प्रियतम (राधा-कृष्ण) की युगल उपासना में लीन रहते थे।

  • उनके दिव्य संगीत और विशुद्ध प्रेम रस से रीझकर एक दिन साक्षात श्यामा-श्याम (राधा-कृष्ण) निधिवन की लता-कुंजों से सशरीर प्रकट हो गए।
  • युगल सरकार का वह अलौकिक रूप इतना प्रकाशमान था कि साधारण सांसारिक आंखें उस तेज को सहन नहीं कर सकती थीं। स्वामी जी ने हाथ जोड़कर विनती की: "हे प्रभु! आपकी यह छवि अत्यंत दिव्य है, इसे संसार सहन नहीं कर पाएगा। आप दोनों एक रूप होकर मेरे सामने विराजें।"
  • भक्त की प्रार्थना पर राधा और कृष्ण दोनों मिलकर एक विग्रह बन गए, जिसे 'बांके बिहारी' (त्रिभंग मुद्रा में खड़े नटनागर) कहा गया।
वृंदावन में श्री बांके बिहारी जी के चरण दर्शन और चंदन श्रृंगार का विहंगम दृश्य

2. पूरे वर्ष चरण क्यों नहीं दिखते?

वैष्णव आचार्यों और हरिदासी संप्रदाय के अनुसार, बांके बिहारी जी केवल एक पाषाण विग्रह नहीं हैं बल्कि वे प्रेम के साक्षात जाग्रत बालक हैं:

  • अति-सुकुमारता का भाव: बिहारी जी अत्यंत सुकुमार (कोमल) हैं। ब्रजवासियों का ऐसा वात्सल्य भाव है कि यदि उनके चरण खुले रहेंगे, तो संसार की चंचल और तार्किक दृष्टियों से उन्हें 'नजर' लग सकती है अथवा उनके कोमल चरणों में शीत या धूल का कष्ट हो सकता है।
  • राधा रानी के अधिकार का भाव: एक अन्य गूढ़ मान्यता के अनुसार, बिहारी जी के आधे अंग में साक्षात श्री राधा रानी समाहित हैं। राधा जी के चरणों को अत्यंत गोपनीय और दुर्लभ माना गया है।
  • केवल अक्षय तृतीया पर ही क्यों?: वैशाख मास की प्रचंड गर्मी में जब पृथ्वी तवे की भांति तपने लगती है तब गोस्वामी जन वात्सल्य रस के वशीभूत होकर सोचते हैं कि हमारे लाड़िले कन्हैया को भारी वस्त्रों और आभूषणों में अत्यंत गर्मी लग रही होगी। अतः केवल इसी दिन उनके संपूर्ण वस्त्र हटाकर उन्हें सबसे हल्के मलमल की पीतांबरी पहनाई जाती है और शीतल चंदन का लेप करने हेतु उनके चरण कमलों को पूर्णतः खुला छोड़ दिया जाता है।
ऐतिहासिक व संप्रदायिक पक्ष शास्त्रीय संदर्भ आध्यात्मिक संदेश व भाव
प्राकट्य स्थल निधिवन राज (वृंदावन) शुद्ध प्रेम और अनाहत नाद (संगीत) से परमात्मा की प्राप्ति
मूल स्वरूप श्यामा-श्याम का एकाकार रूप (युगल विग्रह) राधा-कृष्ण का अद्वैत, माधुर्य रस की पराकाष्ठा
पर्दा डालने की परंपरा (झांकी दर्शन) कुछ-कुछ पलों में पर्दा डालना और हटाना बिहारी जी के नयनों के आकर्षण से भक्त को समाधिस्थ होने से बचाना
अक्षय तृतीया चरण दर्शन वैशाख शुक्ल तृतीया का दिन ग्रीष्म संताप शमन, वात्सल्य सेवा, अक्षय कृपा की वर्षा

मलयगिरि चंदन लेपन और स्वर्ण लड्डू का रहस्य

अक्षय तृतीया के दिन बांके बिहारी मंदिर की सेवा-पद्धति वर्ष के अन्य दिनों से सर्वथा भिन्न और अनूठी होती है:

1. मलयगिरि चंदन लेपन का विज्ञान

अक्षय तृतीया से कई सप्ताह पूर्व मंदिर के सेवायत गोस्वामी परिवार द्वारा शुद्ध मलयगिरि श्वेत चंदन की लकड़ियों को सिलबट्टे पर घिसना प्रारंभ किया जाता है:

  • इस चंदन में शुद्ध भीमसेनी कपूर, कस्तूरी, जाफरानी केसर और वृंदावन के बगीचों से तोड़े गए ताजे गुलाबों का अर्क (गुलाब जल) मिलाया जाता है।
  • अक्षय तृतीया की भोर में मंगला दर्शन के समय ठाकुर जी के दोनों चरण कमलों, हथेलियों, वक्षस्थल और ललाट पर इस सुगंधित चंदन का मोटा लेप लगाया जाता है।
  • यह लेप आग्नेय ग्रीष्मकाल में ठाकुर जी के सुकुमार विग्रह को शीतलता और ताजगी प्रदान करता है।

2. चरणों में स्वर्णिम लड्डू का रहस्य

चरण दर्शन के समय जो भी श्रद्धालु सामने जाते हैं, उन्हें बिहारी जी के दोनों चरणों के ठीक बीच में एक सोने का गोल लड्डू रखा हुआ दिखाई देता है:

  • सत्तू और स्वर्ण आवरण: यह मूल रूप से भुने हुए जौ और चने के सत्तू से बना एक सुस्वादु औषधीय लड्डू होता है, जिसे ऊपर से शुद्ध स्वर्ण-वर्क अथवा सोने की परत से ढका जाता है।
  • पाथेय (Travel Sustenance) का भाव: गोस्वामी परंपरा के अनुसार, कन्हैया दिनभर सखाओं और गायों के साथ वन-वन भटकते हैं। यह सत्तू का लड्डू उनके मार्ग का संबल है, ताकि खेल-खेल में जब भी उन्हें भूख लगे, वे तुरंत इसका प्राशन कर सकें। सत्तू पित्तनाशक और शीतल होता है, जो वैशाख की गर्मी में शरीर को तृप्त रखता है।

अक्षय तृतीया पर बिहारी जी के विशेष भोग और नैवेद्य

ग्रीष्म ऋतु की संक्रांति के अनुसार इस दिन ठाकुर जी के राजभोग और बालभोग में विशेष रूप से शीतलता प्रदान करने वाले पदार्थों का समर्पण किया जाता है:

  1. सत्तू का महाभोग: जौ, चना और गेहूं के भुने सत्तू में घी, खांड, काजू, बादाम और पिस्ता मिलाकर बनाए गए विविध प्रकार के पेड़े और लड्डू।
  2. आम का पना और शिकंजी: कच्चे आम को भूनकर पुदीना और भुने जीरे से तैयार किया गया खट्टा-मीठा पना तथा नींबू-मिश्री की शीतल शिकंजी।
  3. ऋतु-फल: ताजे तोड़े गए मीठे खरबूजे, तरबूज, फालसा, ककड़ी और खीरा।
  4. गुलाब जल की फुहार: मंदिर के गर्भगृह में चांदी की पिचकारियों से भक्तों और ठाकुर जी के ऊपर निरंतर सुगंधित गुलाब जल और केवड़े के जल की फुहारें छोड़ी जाती हैं, जिससे पूरा वातावरण महक उठता है।
भोग सामग्री औषधीय व आयुर्वेदिक गुण ठाकुर जी को अर्पण का भाव
सत्तू के लड्डू शीतल वीर्य, सुपाच्य, प्रोटीन युक्त ग्रीष्मकाल में जठराग्नि की रक्षा और लाड़िले का पोषण
कच्चे आम का पना प्राकृतिक इलेक्ट्रोलाइट्स, लू से सुरक्षा वन में गाय चराने वाले कन्हैया की धूप से रक्षा
खरबूजा व ककड़ी 90% जल-तत्त्व, त्रिदोष शामक कंठ और तालु को निरंतर तर और शीतल बनाए रखना
मिश्री-माखन मधुर रस, ओजवर्धक, पित्तनाशक बाल-सुलभ प्रिय आहार, मुख में तत्काल शीतलता

चरण दर्शन का फल और दर्शन की आचार-संहिता

स्कंद पुराण के मथुरा खंड और चैतन्य चरितामृत के अनुसार, भगवान के श्री चरणों के दर्शन का फल अवर्णनीय है:

कदा द्रक्ष्यामि नयने पादारविन्दं सुरार्चितम्।
रजसा यस्य संस्पृष्टा मुक्ता भवन्ति मानवाः॥

अर्थात: देवों द्वारा पूजित भगवान के उन चरण-कमलों के दर्शन मुझे कब सुलभ होंगे, जिनकी पावन रज के स्पर्श मात्र से संसारी जीव भवबंधन से मुक्त हो जाते हैं।

चरण दर्शन से प्राप्त होने वाले फल

  • त्रिविध तापों का शमन: आधिदैविक, आधिभौतिक और आध्यात्मिक-ये तीनों सांसारिक ताप बिहारी जी के शीतल पादारविंद के दर्शन से तत्काल शांत हो जाते हैं।
  • अक्षय भक्ति की प्राप्ति: अक्षय तृतीया पर किए गए इस दर्शन का पुण्य कभी क्षीण नहीं होता; यह साधक के अंतःकरण में अविचल कृष्ण-प्रेम का बीजारोपण करता है।
  • राहु-केतु और कालसर्प दोष से मुक्ति: चरण कमलों में शंख, चक्र, गदा, पद्म, वज्र और अंकुश जैसे 19 मांगलिक चिह्न होते हैं; इनके दर्शन मात्र से कुंडली के भयानक ग्रह-दोष शांत हो जाते हैं।

दार्शनिक निष्कर्ष: साकार प्रेम का प्रत्यक्ष साक्षात्कार

श्री बांके बिहारी जी के चरण दर्शन का उत्सव हमें सनातन धर्म के उस परम शिखर का साक्षात्कार कराता है जहाँ भगवान और भक्त के बीच ऐश्वर्य और भय का संबंध समाप्त हो जाता है और केवल शुद्ध वात्सल्य व माधुर्य प्रेम शेष रह जाता है।

अन्य देवालयों में भगवान शासक, संहारक अथवा राजाधिराज के रूप में पूजे जाते हैं, जहाँ भक्त भय और श्रद्धा से कांपता हुआ खड़ा रहता है। परंतु वृंदावन में भगवान केवल एक सुकुमार बालक हैं, जिनकी गर्मी की चिंता उनके भक्तों को सताती है। भक्त भगवान को चंदन लगाते हैं, उन्हें सत्तू खिलाते हैं और पंखा झलते हैं।

अक्षय तृतीया पर बिहारी जी के खुले हुए चरण हमें यह सिखाते हैं कि परमात्मा को कठोर योग या कर्मकांड से नहीं बल्कि ऐसे ही निश्छल, सहज और कोमल प्रेम से बांधा जा सकता है। जब मनुष्य अपने हृदय को चंदन की भांति शीतल और सत्तू की भांति सरल बना लेता है, तो बांके बिहारी जी उसके हृदय-मंदिर में सदा के लिए विराज जाते हैं।


FAQ

ठाकुर बांके बिहारी मंदिर में चरण दर्शन वर्ष में कितनी बार होते हैं?
ठाकुर बांके बिहारी जी के श्री चरणों के दर्शन वर्ष में केवल एक बार, वैशाख शुक्ल तृतीया यानी अक्षय तृतीया के दिन ही होते हैं।

अक्षय तृतीया के दिन बांके बिहारी जी के चरणों में क्या रखा जाता है?
अक्षय तृतीया के दिन बिहारी जी के दोनों चरणों के मध्य भुने हुए सत्तू और मेवे से बना एक स्वर्ण-मंडित लड्डू (स्वर्ण लड्डू) रखा जाता है।

बिहारी जी के पूरे श्रीअंग पर किस विशेष सामग्री का लेप किया जाता है?
ग्रीष्म ऋतु के संताप को शांत करने के लिए उनके संपूर्ण श्रीअंग पर मलयगिरि श्वेत चंदन, भीमसेनी कपूर, केसर और गुलाब जल का शीतल लेप लगाया जाता है।

स्वामी हरिदास जी ने बांके बिहारी जी को कहाँ से प्रकट किया था?
स्वामी हरिदास जी ने अपनी अनन्य संगीत साधना और भक्ति से बांके बिहारी जी को वृंदावन के पावन निधिवन राज की कुंजों से प्रकट किया था।

अक्षय तृतीया पर बांके बिहारी जी को किस मुख्य प्रसाद का भोग लगता है?
इस दिन मुख्य रूप से जौ और चने के सत्तू के लड्डू, आम का पना, खरबूजा, ककड़ी और ठंडाई का विशेष भोग लगाया जाता है।

पाएं अपनी सटीक कुंडली

कुंडली बनाएं

क्या आपको यह पसंद आया?

लेखक

अपर्णा पाटनी

अपर्णा पाटनी (63)


अनुभव: 20

इनसे पूछें: Family Planning, Career

इनके क्लाइंट: Punjab, Haryana, Delhi

इस लेख को परिवार और मित्रों के साथ साझा करें

WELCOME TO

ZODIAQ

Right Decisions at the right time with ZODIAQ