चंदन यात्रा (Chandan Yatra): जगन्नाथ पुरी में 42 दिनों का चंदन उत्सव और नरेंद्र सरोवर की नौका विहार

By पं. अभिषेक शर्मा

अक्षय तृतीया चंदन यात्रा, बाहर व भीतर चंदन, नरेंद्र सरोवर चांप लीला, नंदा-भद्रा नौका और रथ काष्ठ पूजन

चंदन यात्रा जगन्नाथ पुरी: 42 दिवसीय उत्सव, नौका विहार व रहस्य

पंचांग विवरण एवं चंदन यात्रा की खगोलीय पृष्ठभूमि

सनातन वैदिक पंचांग, उत्कल खंड, स्कंद पुराण के 'पुरुषोत्तम क्षेत्र माहात्म्य' और श्री जगन्नाथ मंदिर (पुरी) के स्वत्व लिपि (रिकॉर्ड ऑफ राइट्स) के अनुसार वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि-अर्थात अक्षय तृतीया-से महाप्रभु श्री जगन्नाथ जी की 42 दिवसीय विश्वविख्यात 'चंदन यात्रा' (Chandan Yatra) का दिव्य शुभारंभ होता है। यह पावन अनुष्ठान संपूर्ण भारतवर्ष के समस्त देवालयों में आयोजित होने वाला सबसे लंबा और विस्तृत ग्रीष्मकालीन जल-विहार उत्सव है।

खगोलीय दृष्टिकोण से अक्षय तृतीया वह स्वर्णिम कालखंड है जब भुवन भास्कर भगवान सूर्य देव मेष राशि में और चंद्रमा वृषभ राशि में एक साथ अपनी परम उच्च स्थिति (Deep Exaltation) में गोचर करते हैं। इस खगोलीय संयोग के साथ ही पृथ्वी के उत्तरी गोलार्ध में प्रचंड ग्रीष्म ऋतु का पदार्पण होता है। महाप्रभु श्री जगन्नाथ 'दारुब्रह्म' (काष्ठ विग्रह) रूप में विराजते हैं और मानवीय लीला का आचरण करते हैं। अतः ग्रीष्मकाल के भीषण ताप, तपन और उमस से महाप्रभु, उनके ज्येष्ठ भ्राता भगवान बलभद्र और बहन देवी सुभद्रा को शीतलता प्रदान करने के लिए इस दिन से लगातार 42 दिनों तक सुगंधित मलयगिरि चंदन, कपूर, कस्तूरी और केसर का शीतल लेप किया जाता है तथा पवित्र नरेंद्र सरोवर में नौका विहार (चांप लीला) कराया जाता है।

पंचांग व उत्सव घटक शास्त्रीय, ज्योतिषीय व मंदिर परंपरा विवरण
उत्सव आरंभ तिथि वैशाख शुक्ल तृतीया (अक्षय तृतीया) | 42 दिवसीय महापर्व
उत्सव विभाजन प्रथम 21 दिन: 'बाहर चंदन' (नरेंद्र सरोवर में जल-विहार) | अंतिम 21 दिन: 'भीतर चंदन' (श्रीमंदिर गर्भगृह में)
मुख्य आराध्य सत्ता महाप्रभु श्री जगन्नाथ, भगवान बलभद्र, देवी सुभद्रा एवं सुदर्शन चक्र
जल-विहार प्रतिनिधि विग्रह मदनमोहन, राम, कृष्ण, भूदेवी, श्रीदेवी एवं 'पंच पांडव' (पंच महादेव)
जल-विहार स्थल नरेंद्र सरोवर (पवित्र चंदन पुष्करणी, श्रीक्षेत्र पुरी)
नौकाओं के नाम 'नंदा' (लाल व श्वेत नौका - मदनमोहन हेतु) एवं 'भद्रा' (श्वेत व हरित नौका - पंच महादेव हेतु)
प्रमुख शीतलीकरण द्रव्य मलयगिरि श्वेत चंदन, भीमसेनी कपूर, कस्तूरी, जाफरानी केसर, गुलाब जल
ऐतिहासिक शुभारंभ इसी दिन रथयात्रा के विशाल रथों (तालध्वज, दर्पदलन, नंदीघोष) के काष्ठ पूजन का आरंभ
अभीष्ट आध्यात्मिक फल कायिक-मानसिक ताप का शमन, प्रेम-भक्ति की प्राप्ति, मोक्ष एवं वैकुंठ वास

चंदन यात्रा के इस पावन कालखंड में महाप्रभु जगन्नाथ की कृपा प्राप्त करने और अपने चित्त को शीतल व शांत रखने हेतु प्रत्येक भक्त को ब्रह्म मुहूर्त से ही निम्नलिखित शास्त्रीय नियमों का निष्ठापूर्वक पालन करना चाहिए:

  • प्रातः काल सूर्योदय से पूर्व शीतल जल में गंगाजल अथवा किसी पवित्र तीर्थ का जल मिलाकर स्नान करना।
  • स्नान के पश्चात पूर्व दिशा की ओर मुख करके उदीयमान सूर्य नारायण को तांबे के पात्र से जल और लाल चंदन का अर्घ्य समर्पित करना।
  • घर के पूजा स्थल पर भगवान श्री कृष्ण, जगन्नाथ जी अथवा शालिग्राम शिला को पंचामृत से स्नान कराकर गंगाजल से शुद्ध करना।
  • ग्रीष्म ऋतु के संताप को शांत करने के लिए भगवान के मस्तक, वक्षस्थल और चरणों पर मलयगिरि चंदन, केसर और गुलाब जल का शीतल लेप लगाना।
  • भगवान को शीतल जल में सुवासित खस और तुलसी दल डालकर अर्पित करना; ऋतु-फल जैसे तरबूज, खरबूजा, खीरा और आम का भोग लगाना।
  • जौ और चने के सत्तू में घी और खांड मिलाकर बनाए गए सत्तू के लड्डुओं का विशेष नैवेद्य समर्पित करना।
  • प्रतिदिन "हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे, हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे" अथवा "ॐ नमो भगवते वासुदेवाय" महामंत्र का शांत चित्त से 108 बार जप करना।
  • ग्रीष्मकाल की इस अवधि में किसी भी प्यासे प्राणी को जल पिलाना, पक्षियों के लिए परिंडे बांधना और अहंकार व कटु वचनों का सर्वथा त्याग करना।

42 दिवसीय चंदन यात्रा का शास्त्रीय विभाजन: बाहर चंदन और भीतर चंदन

श्री जगन्नाथ मंदिर की सदियों पुरानी परंपरा के अनुसार 42 दिनों तक चलने वाली इस चंदन यात्रा को दो स्पष्ट चरणों में विभाजित किया गया है:

1. बाहर चंदन (प्रथम 21 दिन)

अक्षय तृतीया से आरंभ होकर ज्येष्ठ मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि तक चलने वाले पहले 21 दिनों को 'बाहर चंदन' कहा जाता है:

  • इस अवधि में मुख्य श्रीमंदिर के भीतर से महाप्रभु जगन्नाथ जी के प्रतिनिधि चल-विग्रह 'मदनमोहन', भगवान बलराम के प्रतिनिधि 'राम' और 'कृष्ण', तथा श्रीदेवी व भूदेवी को भव्य पालकियों (विमान) में विराजित किया जाता है।
  • इनके साथ पुरी के पांच प्राचीन स्वयंभू शिव विग्रह-जिन्हें 'पंच पांडव' कहा जाता है (लोकनाथ, यमेश्वर, कपालमोचन, मार्कंडेश्वर और नीलकंठ महादेव)-भी अपनी-अपनी पालकियों में सवार होकर भव्य शोभायात्रा के साथ श्रीमंदिर से नरेंद्र सरोवर की ओर प्रस्थान करते हैं।
  • नरेंद्र सरोवर में इन सभी विग्रहों को सुगंधित चंदन के जल से स्नान कराया जाता है और सुसज्जित नौकाओं में बैठाकर संध्या और रात्रि के समय नौका विहार (चांप) कराया जाता है।

2. भीतर चंदन (अंतिम 21 दिन)

ज्येष्ठ कृष्ण नवमी से आरंभ होकर ज्येष्ठ पूर्णिमा (स्नान पूर्णिमा) से ठीक एक दिन पूर्व तक चलने वाले शेष 21 दिनों को 'भीतर चंदन' कहा जाता है:

  • यह उत्सव पूरी तरह से श्री जगन्नाथ मंदिर के मुख्य गर्भगृह और 'रत्नसिंहासन' के समीप संपन्न होता है।
  • इस दौरान बाहर कोई शोभायात्रा नहीं निकलती बल्कि मंदिर के भीतर बने चार विशेष जल कुंडों में महाप्रभु और अन्य विग्रहों को गुप्त रूप से जल-क्रीड़ा और चंदन अभिषेक कराया जाता है।
नरेंद्र सरोवर में सुसज्जित नौका पर महाप्रभु जगन्नाथ के प्रतिनिधि विग्रहों का नौका विहार

नरेंद्र सरोवर में नौका विहार: 'नंदा' और 'भद्रा' का अलौकिक दृश्य

पुरी का ऐतिहासिक नरेंद्र सरोवर चंदन यात्रा का मुख्य लीला स्थल है। इस सरोवर के मध्य में एक सुंदर द्वीप-मंदिर (चंदन मंडप) स्थित है:

1. दो दिव्य नौकाएं: नंदा और भद्रा

नरेंद्र सरोवर के जल में दो विशाल पारंपरिक हंस-आकार नौकाएं तैरती हैं:

  • नंदा नौका: यह लाल और श्वेत रंग के वस्त्रों तथा फूलों से सजी होती है। इसमें मदनमोहन, राम, कृष्ण, लक्ष्मी जी और सरस्वती जी विराजते हैं।
  • भद्रा नौका: यह श्वेत और हरित रंग के वस्त्रों से सुसज्जित होती है। इसमें पुरी के पांचों प्रमुख शिव विग्रह (पंच पांडव) विराजते हैं।

2. दिन और रात के दो चांप (Bhirana & Ratri Chapa)

प्रत्येक दिन नौका विहार के दो सत्र होते हैं:

  • दिन का चांप (दिवा चांप): अपराह्न काल में नौका सरोवर के चारों ओर धीमी गति से घूमती है, जबकि सेवायत चंवर और पंखा झलते हैं और पारंपरिक ओडिसी संगीत व मृदंग की ध्वनि गूंजती है।
  • रात्रि का चांप (निशा चांप): रात्रि में नौकाओं पर सैकड़ों दीप प्रज्वलित किए जाते हैं। सरोवर के जल में तैरते हुए दीपकों के प्रतिबिंब के मध्य जब महाप्रभु नौका विहार करते हैं, तो दृश्य वैकुंठ लोक के समान प्रतीत होता है। नौका विहार के पश्चात विग्रहों को चंदन मंडप में ले जाकर सुवासित शीतल जल के कुंड में जल-क्रीड़ा कराई जाती है।
नौका का नाम रंग व सज्जा विराजित होने वाले विग्रह आध्यात्मिक भाव
नंदा (Nanda) लाल व श्वेत, स्वर्ण छत्र मदनमोहन, राम-कृष्ण, श्रीदेवी, भूदेवी वैष्णव माधुर्य रस, रासलीला व जल-क्रीड़ा
भद्रा (Bhadra) श्वेत व हरित, रजत छत्र पंच पांडव (पंच शिव: लोकनाथ, यमेश्वर आदि) हरि-हर समन्वय, शिव का कृष्ण-प्रेम

अक्षय तृतीया पर रथ निर्माण का शुभारंभ: 'रथ काष्ठ अनुकूल'

चंदन यात्रा के आरंभ दिवस यानी अक्षय तृतीया का एक अन्य अत्यंत महत्वपूर्ण और ऐतिहासिक आयाम है-विश्वप्रसिद्ध रथयात्रा के विशाल रथों के निर्माण का शुभारंभ।

  1. काष्ठ पूजन (Ratha Katha Anukula): दशपल्ला और नयागढ़ के वनों से लाए गए विशेष 'धौरा' और 'असन' के विशाल काष्ठ लट्ठों (लकड़ियों) की विधिवत पूजा श्रीमंदिर के मुख्य कार्यालय के सम्मुख की जाती है।
  2. राजपुरोहितों द्वारा संकल्प: मंदिर के मुख्य राजपुरोहित वैदिक मंत्रोच्चार के साथ तीनों रथों-नंदीघोष (जगन्नाथ जी), तालध्वज (बलभद्र जी) और दर्पदलन (सुभद्रा जी)-के निर्माण का संकल्प करवाते हैं।
  3. स्वर्ण कुल्हाड़ी से प्रथम प्रहार: महाप्रभु की आज्ञामाल (आज्ञा-माला) प्राप्त करने के पश्चात मुख्य बढ़ई (विश्वकर्मा सेवक) को सोने की कुल्हाड़ी भेंट की जाती है। वह उस स्वर्ण कुल्हाड़ी से काष्ठ पर प्रतीकात्मक प्रथम प्रहार करता है, जिसके बाद रथ निर्माण का महायज्ञ अनवरत आरंभ हो जाता है।

मलयगिरि चंदन लेपन का आध्यात्मिक व तात्विक विज्ञान

स्कंद पुराण के अनुसार, ग्रीष्म ऋतु में भगवान विष्णु को चंदन का लेप करना समस्त सांसारिक संतापों को भस्म करने का सर्वोत्तम साधन है:

चन्दनेन विलिप्ताङ्गो वैशाखे मधुसूदनः।
दृष्टः प्रपूजितो वापि सर्वपापैः प्रमुच्यते॥

अर्थात: वैशाख मास में जो मनुष्य मलयगिरि चंदन से सुशोभित भगवान मधुसूदन के दर्शन करता है अथवा स्वयं उन्हें चंदन समर्पित करता है, वह जन्म-जन्मांतर के समस्त पापों से मुक्त हो जाता है।

चंदन, कपूर और कस्तूरी का तात्विक रहस्य

  • मलयगिरि श्वेत चंदन: यह पृथ्वी और जल तत्त्व का प्रतीक है। इसकी शीतल तासीर आग्नेय ऊर्जा को शांत कर चित्त में सौम्यता लाती है।
  • भीमसेनी कपूर: यह वायु तत्त्व का प्रतीक है जो नकारात्मक ऊर्जा और सूक्ष्म जीवाणुओं का नाश कर वातावरण को दिव्य सुगंध से भर देता है।
  • जाफरानी केसर: यह तेज और कांति का कारक है, जो भगवान के श्रीअंग को स्वर्णिम आभा प्रदान करता है।

दार्शनिक निष्कर्ष: मानवीय लीला में ईश्वर का प्रेम रस

जगन्नाथ पुरी की चंदन यात्रा सनातन दर्शन के उस अनूठे सिद्धांत को उद्घाटित करती है जिसे 'नर-लीला' कहा जाता है।

श्री जगन्नाथ जी केवल किसी दूरस्थ आकाश में बैठे हुए कठोर और अगम्य ईश्वर नहीं हैं बल्कि वे अपने भक्तों के अत्यंत निकट, उनके परिवार के मुखिया की तरह सुख-दुःख का अनुभव करते हैं। यदि बाहर चिलचिलाती धूप है और मनुष्य गर्मी से व्याकुल हो रहा है, तो उसके भगवान भी उस ताप को महसूस करते हैं। भक्त अपने प्रभु की तपन मिटाने के लिए उन्हें चंदन लगाते हैं, शीतल जल में नौका विहार कराते हैं और पंखा झलते हैं।

यह यात्रा हमें सिखाती है कि भक्ति कोई शुष्क कर्मकांड नहीं है बल्कि परमात्मा के साथ एक अत्यंत आत्मीय, कोमल और जीवंत प्रेम संबंध है। जब हम दूसरों के जीवन के संताप को अपनी करुणा और शीतलता से शांत करते हैं, तो हम वास्तव में महाप्रभु की ही चंदन यात्रा का विस्तार कर रहे होते हैं।


FAQ

जगन्नाथ पुरी में चंदन यात्रा कुल कितने दिनों तक चलती है?
जगन्नाथ पुरी में चंदन यात्रा कुल 42 दिनों तक चलती है, जिसे 21 दिन 'बाहर चंदन' और 21 दिन 'भीतर चंदन' के रूप में विभाजित किया गया है।

चंदन यात्रा का शुभारंभ किस पावन तिथि पर होता है?
चंदन यात्रा का शुभारंभ प्रतिवर्ष वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि यानी अक्षय तृतीया के दिन होता है।

बाहर चंदन उत्सव के दौरान नौका विहार किस सरोवर में होता है?
बाहर चंदन के 21 दिनों तक नौका विहार श्रीक्षेत्र पुरी के पावन नरेंद्र सरोवर (चंदन पुष्करणी) में संपन्न होता है।

चंदन यात्रा में प्रयुक्त होने वाली दो प्रमुख नौकाओं के क्या नाम हैं?
उन दो पारंपरिक हंस-आकार नौकाओं के नाम 'नंदा' (मदनमोहन जी हेतु) और 'भद्रा' (पंच पांडव शिवजी हेतु) हैं।

अक्षय तृतीया के दिन चंदन यात्रा के साथ कौन-सा अन्य बड़ा कार्य आरंभ होता है?
अक्षय तृतीया के दिन ही पुरी की विश्वप्रसिद्ध रथयात्रा के लिए तीनों विशाल रथों (नंदीघोष, तालध्वज, दर्पदलन) के निर्माण हेतु काष्ठ पूजन (रथ काष्ठ अनुकूल) का औपचारिक शुभारंभ होता है।

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लेखक

पं. अभिषेक शर्मा

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