चारधाम यात्रा का शुभारंभ: अक्षय तृतीया पर गंगोत्री, यमुनोत्री, केदारनाथ और बद्रीनाथ के कपाट

By पं. सुव्रत शर्मा

अक्षय तृतीया कपाटोद्घाटन, डोली यात्रा, बद्रीनाथ अखंड ज्योति, यात्रा क्रम और पर्यावरण मर्यादा

चारधाम यात्रा शुभारंभ: अक्षय तृतीया, कपाट उद्घाटन व नियम

सामग्री तालिका

पंचांग विवरण एवं चारधाम कपाटोद्घाटन की खगोलीय पृष्ठभूमि

सनातन वैदिक परंपरा, स्कंद पुराण के केदारखंड व मानसखंड, तथा उत्तराखंड के तीर्थ विधानों के अनुसार वैशाख मास का पदार्पण हिमालयी तीर्थाटन का स्वर्णिम काल माना गया है। वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि-अर्थात अक्षय तृतीया-उत्तराखंड के उच्च हिमालयी गढ़वाल क्षेत्र में अवस्थित पावन 'छोटा चारधाम' (यमुनोत्री, गंगोत्री, केदारनाथ और बद्रीनाथ) की वार्षिक महायात्रा के औपचारिक शुभारंभ का पावन दिवस है।

खगोलीय दृष्टि से अक्षय तृतीया वह क्षण है जब जगत की आत्मा भगवान सूर्य अपनी परम उच्च राशि मेष (Aries) में और मन के कारक चंद्रमा अपनी परम उच्च राशि वृषभ (Taurus) में विराजमान होते हैं। इस द्वि-उच्च योग के प्रभाव से हिमालय की हिमाच्छादित चोटियों पर जमी बर्फ पिघलने लगती है, प्राकृतिक मार्ग सुगम होते हैं और छह महीने की शीतकालीन निद्रा के बाद देवभूमि की चेतना पुनः जाग्रत होती है। अक्षय तृतीया के शुभ मुहूर्त पर यमुना महारानी के धाम यमुनोत्री तथा भागीरथी गंगा के पावन स्थल गंगोत्री के कपाट वैदिक मंत्रोच्चार के साथ श्रद्धालुओं के लिए खोले जाते हैं। इसके तुरंत बाद वैशाख शुक्ल पंचमी अथवा षष्ठी को द्वादश ज्योतिर्लिंगों में सर्वोच्च बाबा केदारनाथ तथा वैशाख शुक्ल पक्ष के निर्धारित शुभ लग्न में वैकुंठ धाम श्री बद्रीनाथ के कपाट खुलते हैं।

पंचांग व यात्रा घटक शास्त्रीय, ज्योतिषीय व भौगोलिक विवरण
यात्रा शुभारंभ तिथि वैशाख मास | शुक्ल पक्ष तृतीया (अक्षय तृतीया)
भौगोलिक क्षेत्र गढ़वाल हिमालय (उत्तराखंड), समुद्र तल से 3,133 मी. से 3,584 मी. की ऊंचाई
प्रथम उद्घाटित धाम यमुनोत्री धाम (कालिंदी तट) एवं गंगोत्री धाम (भागीरथी तट)
शिव व विष्णु धाम उद्घाटन श्री केदारनाथ धाम (रुद्रप्रयाग) एवं श्री बद्रीनाथ धाम (चमोली)
शीतकालीन निवास स्थल खरसाली (यमुना), मुखबा (गंगा), ओंकारेश्वर मंदिर उखीमठ (केदारनाथ), नृसिंह मंदिर जोशीमठ (बद्रीनाथ)
प्रमुख ज्योति दर्शन श्री बद्रीनाथ के गर्भगृह में 6 महीने तक निरंतर प्रज्वलित 'अखंड ज्योति'
तात्विक संतुलन जल तत्त्व (गंगा-यमुना), अग्नि/ऊर्जा तत्त्व (केदार ज्योतिर्लिंग), आकाश/सत्य तत्त्व (बद्रीनारायण)
अभीष्ट फल भवबंधन से मुक्ति, मोक्ष प्राप्ति, कायिक-मानसिक पापों का प्रक्षालन

चारधाम यात्रा के शुभारंभ अवसर पर मानसिक रूप से अथवा साक्षात रूप से इस पावन तीर्थ यात्रा का पुण्य प्राप्त करने हेतु साधक को शास्त्रोक्त नियमों का निष्ठापूर्वक पालन करना चाहिए:

  • प्रातः काल सूर्योदय से पूर्व ब्रह्म मुहूर्त में शीतल जल में गंगाजल मिलाकर स्नान करना और मानसिक रूप से चारों धामों के पावन शिखरों का ध्यान करना।
  • स्नान के पश्चात पूर्व दिशा की ओर मुख करके उदीयमान सूर्य नारायण को तांबे के पात्र से जल, रोली और अक्षत का अर्घ्य समर्पित करना।
  • पूजा घर में चार दीपक प्रज्वलित कर चारों धामों (यमुनोत्री, गंगोत्री, केदारनाथ, बद्रीनाथ) के नाम से समर्पित करना।
  • भगवान बद्रीनारायण को शीतल चंदन, तुलसी मंजरी और मक्खन-मिश्री का भोग लगाना।
  • बाबा केदारनाथ के निमित्त शिवलिंग पर शीतल जलधारा अर्पित कर 'रुद्राष्टकम' अथवा 'ॐ नमः शिवाय' का 108 बार जप करना।
  • मां गंगा और मां यमुना के पवित्र जल का आचमन कर पाप-मुक्ति का संकल्प लेना।
  • यात्रा पर निकलने वाले तीर्थयात्रियों के लिए मार्ग में जल, छाया, औषधि अथवा भोजन (भंडारे) की व्यवस्था में यथाशक्ति सहयोग करना।
  • यात्रा काल में पूर्ण सात्विकता, अहिंसा, मौन और इंद्रिय संयम का संकल्प लेना; हिमालय की पावन प्रकृति और पर्यावरण को किसी भी प्रकार की हानि न पहुंचाना।

चारों धामों के शीतकालीन प्रवास और डोली यात्रा की परंपरा

दीपावली, भाईदूज और कार्तिक पूर्णिमा के आसपास जब हिमालय में भीषण बर्फबारी आरंभ होती है तब इन चारों धामों के कपाट शीतकाल के लिए बंद कर दिए जाते हैं। शीतकाल के छह महीने इन विग्रहों की पूजा इनके निचले शीतकालीन गद्दीस्थलों पर संपन्न होती है:

1. यमुनोत्री और गंगोत्री की डोली विदाई

  • यमुना जी: शीतकाल में यमुना जी की उत्सव मूर्ति खरसाली (खुशीमठ) में विराजमान रहती हैं। अक्षय तृतीया की प्रातः काल खरसाली से मां यमुना की भव्य डोली पारंपरिक वाद्ययंत्रों (ढोल-दमाऊं) की गूंज के साथ यमुनोत्री धाम के लिए प्रस्थान करती है।
  • गंगा जी: मां गंगा का शीतकालीन प्रवास मुखबा गांव में होता है। अक्षय तृतीया से एक दिन पूर्व मुखबा से मां गंगा की भोग-मूर्ति उत्सव डोली में सवार होकर भैरव घाटी पहुंचती है और अक्षय तृतीया के दिन गंगोत्री मंदिर के गर्भगृह में वैदिक विधि से पुनः प्रतिष्ठित की जाती है।

2. केदारनाथ की पंचमुखी डोली और उखीमठ

द्वादश ज्योतिर्लिंगों में सर्वोच्च बाबा केदारनाथ की पंचमुखी चल-विग्रह उत्सव डोली उनके शीतकालीन गद्दीस्थल ओंकारेश्वर मंदिर, उखीमठ से पैदल यात्रा करते हुए फाटा और गौरीकुंड होते हुए केदारनाथ धाम पहुंचती है। पुजारियों (रावलों) द्वारा मंदिर के कपाट खोलते ही संपूर्ण केदार घाटी 'हर-हर महादेव' के जयघोष से गुंजायमान हो उठती है।

3. बद्रीनाथ धाम और जोशीमठ से गाडू घड़ा यात्रा

भगवान बद्रीनारायण के शीतकालीन प्रवास नृसिंह मंदिर, जोशीमठ से भगवान के सखा उद्धव जी, कुबेर जी और नारद जी की डोली पांडुकेश्वर होते हुए बद्रीनाथ धाम पहुंचती है।

  • गाडू घड़ा (तिल का तेल कलश): टिहरी राजदरबार से राजपुरोहितों द्वारा तिलों का तेल निकाला जाता है, जिसे 'गाडू घड़ा' कहा जाता है। इसी पावन तेल से छह महीने तक भगवान बद्रीनारायण का नित्य लेपन किया जाता है।
धाम का नाम समुद्र तल से ऊंचाई प्रमुख अधिष्ठाता सत्ता शीतकालीन प्रवास स्थल कपाटोद्घाटन का पावन समय
यमुनोत्री धाम 3,293 मीटर मां यमुना (सूर्य पुत्री / यम भगिनी) खरसाली गांव (खुशीमठ) अक्षय तृतीया (प्रातः काल)
गंगोत्री धाम 3,100 मीटर मां गंगा (भागीरथी स्वरूप) मुखबा गांव (उत्तरकाशी) अक्षय तृतीया (मध्याह्न पूर्व)
केदारनाथ धाम 3,584 मीटर भगवान सदाशिव (स्वयंभू ज्योतिर्लिंग) ओंकारेश्वर मंदिर (उखीमठ) वैशाख शुक्ल पंचमी / षष्ठी
बद्रीनाथ धाम 3,133 मीटर भगवान बद्रीनारायण (विष्णु जी) नृसिंह मंदिर (जोशीमठ) वैशाख शुक्ल पक्ष (शुभ मुहूर्त)

1. छह महीने तक जलने वाली 'अखंड ज्योति'

जब कार्तिक मास में शीतकाल के लिए कपाट बंद किए जाते हैं तब मंदिर के मुख्य पुजारी (रावल जी) गर्भगृह में शुद्ध गाय के घी से भरा एक विशाल दीपक प्रज्वलित करते हैं। छह महीने तक पूरा मंदिर बर्फ से ढका रहता है, बाहर -20°C तापमान होता है और मंदिर के भीतर कोई मनुष्य नहीं जा सकता।

  • मान्यता है कि शीतकाल में साक्षात देवर्षि नारद भगवान बद्रीनारायण की नित्य पूजा करते हैं।
  • अक्षय तृतीया के उपरांत जब वैशाख में कपाट पुनः खोले जाते हैं, तो वह घृत-दीप उसी प्रकार धधकता हुआ और प्रकाशमान मिलता है।
  • इस पावन दीपक के दर्शन को 'अखंड ज्योति दर्शन' कहा जाता है, जिसके दर्शन मात्र से मनुष्य के जीवन के अज्ञानांधकार और जन्म-जन्मांतर के पाप मिट जाते हैं।

2. घृत कंबल (Ghee-soaked Blanket) का प्रसाद

कपाट बंद करते समय भगवान के श्रीविग्रह को भोटिया जनजाति की कन्याओं द्वारा बुने गए कच्चे ऊन के कंबल पर शुद्ध गाय का घी लगाकर ओढ़ाया जाता है। छह महीने बाद जब यह कंबल हटाया जाता है, तो उसमें से दिव्य सुगंध आती है। इस घी और ऊन के छोटे-छोटे अंश को भक्तों में महाप्रसाद के रूप में वितरित किया जाता है, जो समस्त रोगों का नाशक माना गया है।


चारधाम यात्रा का क्रम और आध्यात्मिक तत्त्व मीमांसा

सनातन शास्त्रों के अनुसार चारधाम यात्रा का एक निश्चित और वैज्ञानिक क्रम निर्धारित है: यमुनोत्री -> गंगोत्री -> केदारनाथ -> बद्रीनाथ। यह क्रम केवल भौगोलिक सुविधा नहीं बल्कि मानव चेतना के आत्म-विकास का आध्यात्मिक सोपान है:

१. प्रथम सोपान: यमुनोत्री (कर्म शुद्धि और यम-भय मुक्ति)

यमुना जी सूर्य की पुत्री और यमराज की बहन हैं। यमुनोत्री के तप्तकुंड में स्नान करने से मनुष्य के भीतर से अकाल मृत्यु और यमराज का भय समाप्त हो जाता है। यह जीवात्मा के कर्म बंधनों को ढीला करने का प्रथम चरण है।

२. द्वितीय सोपान: गंगोत्री (तपस्या और चित्त शुद्धि)

भागीरथी तट पर राजा भगीरथ ने घोर तपस्या कर गंगा जी को पृथ्वी पर उतारा था। गंगोत्री में भागीरथी के शीतल पावन जल में डुबकी लगाने से साधक के अंतःकरण के संचित पाप धुल जाते हैं और चित्त निष्पाप व निर्मल हो जाता है।

३. तृतीय सोपान: केदारनाथ (अहंकार विसर्जन और शिवत्व)

निर्मल चित्त लेकर साधक जब मंदाकिनी के तट पर स्थित केदारनाथ की विषम चढ़ाई चढ़ता है, तो उसका शारीरिक अहंकार टूट जाता है। भगवान आशुतोष केदारनाथ के स्वयंभू त्रिकोणीय लिंग के दर्शन से जीव का 'अहं' विसर्जित हो जाता है और वह काम-क्रोध के संताप से मुक्त हो जाता है।

४. चतुर्थ सोपान: बद्रीनाथ (परम पद और मोक्ष प्राप्ति)

अहंकार विसर्जन के पश्चात जीव अलकनंदा तट पर बद्री विशाल के सम्मुख पहुंचता है। यह साक्षात वैकुंठ का अनुभव है जहाँ नर और नारायण की संयुक्त तपस्या स्थली है। यहाँ पहुंचकर जीव को जीवनमुक्ति और परमानंद की प्राप्ति होती है।

धाम का क्रम प्रवाहित पवित्र नदी जाग्रत होने वाला आध्यात्मिक चक्र अंतर्निहित जीवन संदेश
१. यमुनोत्री यमुना नदी (कालिंदी) मूलाधार व स्वाधिष्ठान चक्र कर्म बंधनों का क्षय, यम-भय से मुक्ति
२. गंगोत्री भागीरथी नदी (गंगा) मणिपूर चक्र चित्त की शुद्धि, तपस्या और आत्मबल
३. केदारनाथ मंदाकिनी नदी अनाहत व विशुद्ध चक्र अहंकार का विसर्जन, शिव-तत्व की प्राप्ति
४. बद्रीनाथ अलकनंदा नदी आज्ञा व सहस्रार चक्र परम शांति, श्रीहरि साक्षात्कार, मोक्ष

यात्रा के कठोर नियम एवं पर्यावरणीय मर्यादा

हिमालय कोई सामान्य पर्यटन स्थल नहीं, अपितु देव-भूमि और ऋषियों की तपोस्थली है। अतः चारधाम यात्रा पर जाने वाले प्रत्येक यात्री को निम्नलिखित शास्त्रीय और पर्यावरणीय मर्यादाओं का कड़ाई से पालन करना चाहिए:

  1. शारीरिक व मानसिक तैयारी: यात्रा से पूर्व प्राणायाम, सूर्य नमस्कार और नित्य पैदल चलने का अभ्यास करें ताकि उच्च हिमालयी न्यून-ऑक्सीजन वातावरण में श्वास न फूले।
  2. शौच व स्वच्छता की मर्यादा: पवित्र नदियों के जल में साबुन लगाकर न नहाएं, न ही नदियों में कपड़े धोएं। प्लास्टिक और अपशिष्ट पदार्थों को हिमालय की पावन भूमि पर न फेंकें।
  3. मद्य-मांसाहार का पूर्ण निषेध: संपूर्ण देवभूमि क्षेत्र में किसी भी प्रकार का मांसाहार, मद्यपान और तंबाकू का सेवन महापाप माना गया है; यात्रा में पूर्ण सात्विक फलाहार व अन्न ही ग्रहण करें।
  4. अहिंसा और सेवा भाव: मार्ग में मिलने वाले दुर्बल, वृद्ध और बीमार यात्रियों की सहायता करें; स्थानीय खच्चर, घोड़े और पशुओं पर अपनी क्षमता से अधिक भार न लादें और उनके प्रति करुणा रखें।
  5. मौन व मंत्र जप: यात्रा के दौरान अनावश्यक वार्तालाप और सांसारिक चर्चाओं के स्थान पर अपने इष्ट मंत्र अथवा "ॐ नमो नारायणाय" व "ॐ नमः शिवाय" का अनवरत जप करते रहें।

दार्शनिक निष्कर्ष: बाह्य तीर्थ से अंतर-तीर्थ की यात्रा

चारधाम की यह दुर्गम हिमालयी यात्रा मानव को यह परम सत्य सिखाती है कि ईश्वर की प्राप्ति का मार्ग सुगम नहीं बल्कि त्याग, तपस्या और समर्पण की विषम चढ़ाइयों से होकर गुजरता है।

जब एक तीर्थयात्री चिलचिलाती धूप, कड़ाके की ठंड, विषम पत्थरों और घटती ऑक्सीजन के बीच कदम-कदम आगे बढ़ता है, तो उसका शरीर तपता है, उसका धैर्य परखा जाता है और संसार के समस्त भौतिक पद, प्रतिष्ठा और संपदाएं शून्य हो जाती हैं।

चारों धामों के कपाट खुलने का वास्तविक अर्थ है-अपने हृदय के उन कपाटों को खोलना जो काम, क्रोध और स्वार्थ के कारण बंद पड़े थे। जब वैशाख मास में सूर्य और चंद्रमा के द्वि-उच्च तेज के बीच हम हिमालय के इन शिखरों पर नतमस्तक होते हैं, तो हमारी अंतरात्मा भी शुद्ध होकर परमात्मा के साक्षात प्रकाश से आलोकित हो उठती है।


FAQ

अक्षय तृतीया के दिन उत्तराखंड के किन दो धामों के कपाट खुलते हैं?
अक्षय तृतीया के पावन पर्व पर प्रतिवर्ष सबसे पहले यमुनोत्री धाम और गंगोत्री धाम के कपाट वैदिक मंत्रोच्चार के साथ श्रद्धालुओं के लिए खोले जाते हैं।

श्री केदारनाथ और श्री बद्रीनाथ धाम के कपाट कब खुलते हैं?
अक्षय तृतीया पर गंगोत्री-यमुनोत्री के खुलने के कुछ ही दिनों बाद वैशाख शुक्ल पंचमी अथवा षष्ठी को केदारनाथ धाम तथा वैशाख शुक्ल पक्ष के निर्धारित शुभ लग्न में बद्रीनाथ धाम के कपाट खोले जाते हैं।

बद्रीनाथ मंदिर में 'अखंड ज्योति' का क्या रहस्य है?
शीतकाल में कपाट बंद करते समय जलाया गया गाय के घी का विशाल दीपक छह महीने तक बर्फ के नीचे बंद गर्भगृह में निरंतर जलता रहता है; कपाट खुलने पर वह उसी प्रकार प्रज्वलित मिलता है।

चारधाम यात्रा का शास्त्रोक्त सही क्रम क्या है?
चारधाम यात्रा का प्रामाणिक क्रम है: सर्वप्रथम यमुनोत्री, फिर गंगोत्री, तत्पश्चात केदारनाथ और अंत में बद्रीनाथ धाम।

शीतकाल में चारों धामों के विग्रहों की पूजा कहाँ होती है?
यमुना जी की पूजा खरसाली, गंगा जी की मुखबा, केदारनाथ जी की उखीमठ (ओंकारेश्वर मंदिर) और बद्रीनारायण जी की पूजा जोशीमठ (नृसिंह मंदिर) में संपन्न होती है।

पाएं अपनी सटीक कुंडली

कुंडली बनाएं

क्या आपको यह पसंद आया?

लेखक

पं. सुव्रत शर्मा

पं. सुव्रत शर्मा (63)


अनुभव: 20

इनसे पूछें: Family Planning, Career

इनके क्लाइंट: Punjab, Haryana, Delhi

इस लेख को परिवार और मित्रों के साथ साझा करें

WELCOME TO

ZODIAQ

Right Decisions at the right time with ZODIAQ