By पं. सुव्रत शर्मा
वैशाख पूर्णिमा कूर्म जयंती, समुद्र मंथन मंदराचल आख्यान, शनि ग्रह स्थिरता और श्री कूर्मम मंदिर

सनातन वैदिक पंचांग, लिंग पुराण, पद्म पुराण तथा श्रीमद्भागवत महापुराण के अनुसार वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा तिथि को भगवान श्रीहरि विष्णु के द्वितीय प्रादुर्भाव 'कूर्म अवतार' (Kachhapa / Kurma Jayanti) के रूप में अत्यंत श्रद्धा और निष्ठा के साथ मनाया जाता है। कूर्म अवतार भगवान विष्णु का वह धैर्यशील और अविचल स्वरूप है, जिसने देव-दानवों द्वारा किए गए ऐतिहासिक समुद्र मंथन के समय रसातल में धंसते हुए विशाल मंदराचल पर्वत को अपनी विशालकाय पीठ पर धारण कर संपूर्ण सृष्टि के कल्याण का मार्ग प्रशस्त किया था।
खगोलीय और ज्योतिषीय दृष्टिकोण से वैशाख पूर्णिमा का कालखंड सौर और चांद्र शक्तियों के पूर्ण संतुलन का दिन है। इस समय भुवन भास्कर भगवान सूर्य देव अपनी उच्च राशि मेष (Aries) की अंतिम संक्रांति सीमा पर विराजमान रहते हैं, जबकि चंद्रमा अपनी पूर्ण 16 कलाओं से युक्त होकर विशाखा अथवा अनुराधा नक्षत्र में स्थित होता है। विशाखा नक्षत्र के स्वामी देवगुरु बृहस्पति हैं तथा अनुराधा नक्षत्र के अधिपति कर्मफलदाता शनि देव (Saturn) हैं। वैदिक ज्योतिष में कूर्म अवतार को साक्षात शनि ग्रह का अधिष्ठाता माना गया है। जिस प्रकार कछुआ अपनी समस्त इंद्रियों को समेटकर शांत, स्थिर, सुदृढ़ और दीर्घजीवी रहता है, उसी प्रकार कूर्म अवतार की उपासना कुंडली के अशांत शनि, अत्यधिक मानसिक चंचलता, आर्थिक अस्थिरता और व्यापारिक अवरोधों को समूल शांत कर जीवन में अचल आधार और स्थिरता प्रदान करती है।
| पंचांग व प्राकट्य घटक | शास्त्रीय, ज्योतिषीय व पौराणिक विवरण |
|---|---|
| पावन तिथि व काल | वैशाख मास | शुक्ल पक्ष पूर्णिमा (15वीं तिथि) | प्रदोष व्यापिनी |
| नक्षत्र व खगोलीय योग | विशाखा / अनुराधा नक्षत्र | सूर्य मेष में, पूर्ण चंद्र विशाखा/अनुराधा में |
| अवतार क्रम व संज्ञा | भगवान श्रीहरि विष्णु का द्वितीय (2nd) पूर्णावतार (कूर्म / कच्छप अवतार) |
| अधिष्ठाता ग्रह | कर्मफलदाता शनि देव (Saturn - स्थिरता, दीर्घायु, धैर्य व संतुलन के कारक) |
| अवतार का मुख्य स्वरूप | लाखों योजन विस्तीर्ण, वज्र-समान कठोर पीठ युक्त दिव्य कछुआ |
| मुख्य ऐतिहासिक घटना | क्षीरसागर मंथन, मंदराचल पर्वत का आधार बनना, 14 रत्नों का प्राकट्य |
| मुख्य पूजन द्रव्य | श्वेत/पीत चंदन, तुलसी दल, गंगाजल, पंचामृत, काले तिल, जौ, दूर्वा |
| संबद्ध प्रमुख मंदिर | श्री कूर्मम मंदिर (श्रीकाकुलम, आंध्र प्रदेश - एकमात्र प्राचीन कूर्म पीठ) |
| अभीष्ट आध्यात्मिक फल | शनि दोष शमन, वास्तु दोष निवारण, व्यापार व जीवन में स्थिरता, दीर्घायु |
कूर्म जयंती के पावन अवसर पर भगवान कूर्म की अचल कृपा प्राप्त करने, जीवन के तनाव को दूर करने और शनि देव की क्रूर दृष्टि को शांत करने हेतु साधक को ब्रह्म मुहूर्त से ही निम्नलिखित शास्त्रोक्त नियमों का निष्ठापूर्वक पालन करना चाहिए:
श्रीमद्भागवत महापुराण के आठवें स्कंध, कूर्म पुराण और विष्णु पुराण के अनुसार, दुर्वासा ऋषि के शाप के कारण जब देवराज इंद्र और समस्त देवता श्री-हीन (तेज और वैभव से रहित) हो गए तब दैत्यों ने स्वर्ग पर अधिकार कर लिया।
भगवान विष्णु के परामर्श पर देवताओं और असुरों ने मिलकर अमृत प्राप्ति हेतु क्षीरसागर (दूध के सागर) का मंथन करने का निश्चय किया।
भक्तों की करुण पुकार सुनते ही भगवान श्रीहरि विष्णु ने एक लाख योजन विस्तीर्ण, अत्यंत विशाल और वज्र से भी अधिक कठोर पीठ वाले 'विराट कूर्म' (कच्छप) का रूप धारण किया:
वैदिक ज्योतिष में भगवान कूर्म की आराधना जीवन के उतार-चढ़ाव को स्थिर करने का सबसे शक्तिशाली माध्यम है:
वास्तु शास्त्र में घर और व्यावसायिक प्रतिष्ठानों की नींव को 'कूर्म पृष्ठ' (Tortoise Energy) से जोड़ा जाता है:
| ज्योतिषीय व वास्तु घटक | भगवान कूर्म से संबंध | साधक के जीवन में प्राप्त होने वाला फल |
|---|---|---|
| शनि ग्रह शांति | मंद गति, धैर्य, दीर्घायु का स्वरूप | साढ़ेसाती व ढैया के कष्टों का शमन, अवसाद से मुक्ति |
| वास्तु दोष निवारण | भवन के आधार का प्रतीक | घर में सकारात्मक ऊर्जा का संचार, आर्थिक स्थिरता |
| व्यापारिक सुरक्षा | अचल पीठ का सिद्धांत | व्यापार में मंदी की समाप्ति, संचित धन की रक्षा |
| इंद्रिय निग्रह | अंगों को भीतर समेटने का स्वभाव | मानसिक चंचलता का नाश, ध्यान और समाधि में सिद्धि |
कूर्म जयंती पर प्रदोष काल अथवा पूर्णिमा के पावन समय में भगवान कूर्म का पूजन अत्यंत फलदायी होता है:
हाथ में पीले पुष्प और अक्षत लेकर भगवान कूर्म के दिव्य स्वरूप का ध्यान करें:
मन्दरे भ्रमति क्षीरे कच्छपं रूपमास्थितः।
धृतवान् पृष्ठतो भूमिं कूर्मरूपाय ते नमः॥
अचलाय विशालाय लोककल्याणकारिणे।
नारायणाय शान्ताय कूर्मात्मने नमो नमः॥
समस्त प्रकार की अस्थिरता और शनि दोष के निवारण हेतु तुलसी माला से इस मंत्र का जप करें:
ॐ आं ह्रीं क्रों कूर्मासनाय नमः॥
अथवा
ॐ नमो भगवते कूर्माय धरणीधराय स्वाहा॥
मंत्र का भावार्थ:
"हे संपूर्ण पृथ्वी और ब्रह्मांड के आधार स्वरूप, शांत चित्त, मंदराचल को धारण करने वाले भगवान कूर्म! आप मेरे जीवन की अस्थिरता को दूर कर मुझे आत्म-शांति और सुदृढ़ आधार प्रदान कीजिए।"
भारतवर्ष के आंध्र प्रदेश राज्य के श्रीकाकुलम जिले में स्थित 'श्री कूर्मम मंदिर' (Sri Kurmam Temple) विश्व का एकमात्र ऐसा प्राचीन ऐतिहासिक देवालय है जो पूर्णतः भगवान विष्णु के कूर्म अवतार को समर्पित है:
श्रीमद्भगवद्गीता के द्वितीय अध्याय में भगवान श्रीकृष्ण स्थितप्रज्ञ पुरुष का लक्षण बताते हुए कछुए का ही उदाहरण देते हैं:
यदा संहरते चायं कूर्मोऽङ्गानीव सर्वशः।
इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेभ्यस्तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता॥
अर्थात: जिस प्रकार कछुआ किसी संकट अथवा बाह्य आघात के समय अपने समस्त अंगों (सिर, हाथ, पैर) को अपने कठोर कवच के भीतर समेट लेता है, ठीक उसी प्रकार जो मनुष्य संसार के भोग-विलासों और आकर्षणों से अपनी इंद्रियों को भीतर समेट लेता है, उसी की बुद्धि स्थिर और प्रतिष्ठित होती है।
कूर्म जयंती का यह महापर्व हमें सिखाता है कि जीवन में जब भी संकटों की आंधी चले, जब परिस्थितियां प्रतिकूल हों, तो अधीर होकर भटकने के बजाय कछुए की भांति अंतर्मुखी हो जाना चाहिए। अपने भीतर धैर्य की उस वज्र-शिला को जाग्रत करना चाहिए जो संसार के हर झंझावात को अपनी पीठ पर झेल सके।
आइए, वैशाख पूर्णिमा के इस पावन दिन पर हम भगवान कूर्म के चरणों में शीश नवाएं, अपने जीवन में धैर्य, स्थिरता और इंद्रिय-संयम का संकल्प लें और समस्त चराचर जगत के कल्याण की कामना करें।
कूर्म जयंती किस तिथि को मनाई जाती है?
कूर्म जयंती प्रतिवर्ष वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा तिथि (वैशाख पूर्णिमा) को मनाई जाती है।
भगवान विष्णु ने कूर्म (कच्छप) अवतार क्यों धारण किया था?
समुद्र मंथन के समय जब मथानी बना मंदराचल पर्वत धरातल के अभाव में पाताल में धंसने लगा तब उसे अपनी पीठ पर आधार प्रदान कर संभालने हेतु भगवान ने कूर्म अवतार धारण किया था।
ज्योतिष में कूर्म अवतार किस ग्रह के अधिष्ठाता माने गए हैं?
वैदिक ज्योतिष में भगवान कूर्म साक्षात शनि देव (Saturn) के अधिष्ठाता माने गए हैं, जो स्थिरता, धैर्य और दीर्घायु का प्रतिनिधित्व करते हैं।
भारत में भगवान कूर्म का एकमात्र प्रसिद्ध मंदिर कहाँ स्थित है?
भगवान कूर्म का एकमात्र प्राचीन और विश्वप्रसिद्ध मंदिर आंध्र प्रदेश के श्रीकाकुलम जिले में 'श्री कूर्मम' (Sri Kurmam Temple) के नाम से स्थित है।
कूर्म जयंती के दिन कछुओं को भोजन कराने का क्या महत्व है?
इस दिन जलाशयों में कछुओं और मछलियों को आटे की गोलियां खिलाने से कुंडली का शनि दोष, कालसर्प दोष शांत होता है और अकाल मृत्यु का भय समाप्त होकर दीर्घायु की प्राप्ति होती है।
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