By पं. संजीव शर्मा
भार्गव कुलभूषण प्राकट्य, सहस्रार्जुन वध, मंगल-शुक्र तात्विक समन्वय, अष्टचिरंजीवी और महेंद्रगिरि

सनातन वैदिक पंचांग, श्रीमद्भागवत महापुराण, विष्णु पुराण और ब्रह्मांड पुराण के अनुसार वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि (अक्षय तृतीया) के पावन प्रदोष काल में भगवान श्रीहरि विष्णु के छठे पूर्णावतार भगवान परशुराम का प्रादुर्भाव हुआ था। भगवान परशुराम भार्गव गोत्र के कुलभूषण, महर्षि जमदग्नि और माता रेणुका के परम तेजस्वी पंचम पुत्र के रूप में अवतरित हुए।
खगोलीय और ज्योतिषीय दृष्टि से यह अवतार काल अत्यंत विलक्षण है। अक्षय तृतीया वह स्वर्णिम दिन है जब ब्रह्मांड के दो प्रमुख ज्योतिर्मय ग्रह-सूर्य (मेष राशि में 10°) और चंद्रमा (वृषभ राशि में 3°)-परम उच्चांश पर होते हैं। इसके साथ ही, भगवान परशुराम का प्राकट्य मंगल (Mars) के अदम्य पराक्रम, युद्ध-कौशल व तेज तथा भृगु कुल के अधिपति शुक्र (Venus) के तप, ज्ञान, सौंदर्य और आध्यात्मिक शुद्धि के अद्भुत समन्वय का प्रतिनिधित्व करता है। भगवान परशुराम में जहाँ एक ओर भृगुवंशी ब्राह्मण का ब्रह्म-तेज और वेद-ज्ञान विद्यमान है, वहीं दूसरी ओर अन्याय का संहार करने वाला क्षात्र-धर्म और अपार बाहुबल सुशोभित है। वे हिंदू धर्म के अष्टचिरंजीवियों (Eight Immortals) में प्रमुख हैं और आज भी महेंद्रगिरि पर्वत पर ध्यानस्थ रहकर भावी कल्कि अवतार के गुरु पद की प्रतीक्षा कर रहे हैं।
| पंचांग व अवतरण घटक | शास्त्रीय, ज्योतिषीय व पौराणिक विवरण |
|---|---|
| प्राकट्य तिथि व काल | वैशाख मास | शुक्ल पक्ष तृतीया (अक्षय तृतीया) | प्रदोष काल |
| अवतार क्रम व संज्ञा | भगवान श्रीहरि विष्णु के षष्ठम (6वें) आवेश / पूर्णावतार |
| माता-पिता व कुल | माता रेणुका एवं महर्षि जमदग्नि | भार्गव (भृगु) वंश |
| मुख्य अस्त्र-शस्त्र | भगवान शिव द्वारा प्रदत्त दिव्य 'परशु' (फरसा) एवं विजया धनुष |
| ज्योतिषीय ऊर्जा समन्वय | शुक्र (भार्गव ज्ञान व तपस्या) एवं मंगल (अग्नि, पराक्रम व युद्ध कौशल) |
| चिरंजीवी स्थिति | अष्टचिरंजीवी (चिरंजीवी रूप में महेंद्रगिरि पर्वत पर तपस्यारत) |
| मुख्य ऐतिहासिक कृत्य | 21 बार पृथ्वी से अत्याचारी राजाओं का संहार, कामधेनु की रक्षा, शस्त्र-शास्त्र समन्वय |
| शिष्य परंपरा | पितामह भीष्म, गुरु द्रोणाचार्य, दानवीर कर्ण एवं भावी कल्कि अवतार |
| अभीष्ट फल | शत्रुओं पर विजय, अदम्य साहस, अन्याय से मुक्ति, ब्रह्मतेज एवं ओजस्विता |
भगवान परशुराम जयंती के पावन अवसर पर उनके ब्रह्म-तेज और क्षात्र-पराक्रम को अपने अंतःकरण में जाग्रत करने हेतु साधक को शास्त्रोक्त विधि का निष्ठापूर्वक पालन करना चाहिए:
श्रीमद्भागवत के नवम स्कंध के अनुसार, त्रेतायुग के संधिकाल में महिष्मती का प्रतापी राजा कार्तवीर्य अर्जुन (सहस्रार्जुन) अपने अहंकार के मद में चूर होकर संपूर्ण पृथ्वी पर अत्याचार कर रहा था। उसे भगवान दत्तात्रेय की कृपा से एक सहस्र भुजाओं और अपराजेय होने का वरदान प्राप्त था।
एक बार सहस्रार्जुन अपनी विशाल चतुरंगिणी सेना के साथ शिकार खेलते हुए महर्षि जमदग्नि के आश्रम में पहुंचा। महर्षि ने अपनी दिव्य कामधेनु गाय (सुरभि) के प्रभाव से कुछ ही पलों में राजा और उसकी संपूर्ण सेना को छप्पन भोग और दिव्य ऐश्वर्य से तृप्त कर दिया।
परशुराम जी ने हाथ में अपना दिव्य 'परशु' उठाया और अकेले ही महिष्मती जा पहुंचे:
वैदिक ज्योतिष में भगवान परशुराम का स्वरूप दो सर्वथा विपरीत ग्रहों के मिलन का प्रतीक है:
जब कुंडली में शुक्र और मंगल का संतुलन बिगड़ता है, तो मनुष्य या तो कायर और भोगी बन जाता है अथवा अनियंत्रित रूप से क्रोधी और हिंसक। भगवान परशुराम यह सिखाते हैं कि जब शुक्र के 'विवेक' का अंकुश मंगल के 'पराक्रम' पर होता है, तभी समाज में धर्म और न्याय की स्थापना संभव होती है।
| ग्रह | तात्विक गुण | भगवान परशुराम में अभिव्यक्ति | साधक को मिलने वाला लाभ |
|---|---|---|---|
| शुक्र (Venus) | जल/पृथ्वी, भृगु नीति, वेद-ज्ञान | महर्षि जमदग्नि के संस्कार, घोर तपस्या | बुद्धि, संयम और नीति-कुशलता |
| मंगल (Mars) | अग्नि, बाहुबल, अस्त्र-शस्त्र | भगवान शिव से प्राप्त परशु, सहस्रार्जुन वध | भय-मुक्ति, आत्म-रक्षा, अदम्य साहस |
| सूर्य (Sun) | आत्मा, तेज, उच्च स्थिति | अक्षय तृतीया पर उच्च सूर्य का ब्रह्म-तेज | मान-सम्मान, नेतृत्व क्षमता, ओजस्विता |
परशुराम जयंती के दिन प्रदोष काल (सूर्यास्त के आसपास का समय) में पूजा का विशेष महत्व है:
ॐ जमदग्निसुताय विद्महे महावीराय धीमहि।
तन्नः परशुरामः प्रचोदयात्॥
ॐ रां रां ॐ रां रां ॐ परशुहस्ताय नमः॥
सनातन परंपरा में आठ ऐसे महापुरुष हैं जो काल के प्रभाव से परे होकर आज भी सदेह विद्यमान हैं:
अश्वत्थामा बलिर्व्यासो हनुमांश्च विभीषणः।
कृपः परशुरामश्च सप्तैते चिरजीविनः॥
सप्तैतान् संस्मरेन्नित्यं मार्कण्डेयमथाष्टमम्।
जीवेद्वर्षशतं सोऽपि सर्वव्याधिविवर्जितः॥
भगवान परशुराम ने जब पृथ्वी को 21 बार जीतकर अधर्मियों का नाश कर दिया, तो उन्होंने कश्यप ऋषि को संपूर्ण पृथ्वी दान कर दी और स्वयं संन्यास लेकर दक्षिण भारत के महेंद्रगिरि पर्वत पर तपस्या हेतु चले गए।
पुराणों के अनुसार, कलियुग के अंत में जब धर्म का लोप होगा और भगवान श्रीहरि का 'कल्कि अवतार' होगा तब भगवान परशुराम ही कल्कि भगवान को प्रकट होकर समस्त वेदों, नीतियों और दिव्य अस्त्र-शस्त्रों की दीक्षा प्रदान करेंगे।
भगवान परशुराम का जीवन मानव सभ्यता को सनातन धर्म का सबसे व्यावहारिक और अमर संदेश देता है:
"अकेला शास्त्र तब तक सुरक्षित नहीं है जब तक उसके पीछे शस्त्र का बल न हो; और अकेला शस्त्र तब तक सुरक्षित नहीं है जब तक उसके नियंत्रण के लिए शास्त्र का विवेक न हो।"
यदि किसी समाज के पास केवल शास्त्र (ज्ञान) हो और आत्म-रक्षा के लिए शस्त्र (पराक्रम) न हो, तो दुष्ट और आततायी शक्तियां उसके ज्ञान और संस्कृति को नष्ट कर देती हैं। इसके विपरीत, यदि किसी समाज के पास केवल शस्त्र (सैन्य बल) हो और नीति व शास्त्र का विवेक न हो, तो वह समाज स्वयं विनाशकारी और अत्याचारी बन जाता है।
भगवान परशुराम हमें सिखाते हैं कि एक हाथ में वेद (ज्ञान) और दूसरे हाथ में परशु (शौर्य) होना चाहिए। जब ज्ञान और पराक्रम का यह संतुलन हमारे जीवन में स्थापित होता है, तभी हम अपने परिवार, समाज और राष्ट्र की रक्षा करने में समर्थ हो पाते हैं।
भगवान परशुराम का जन्म किस तिथि और नक्षत्र में हुआ था?
भगवान परशुराम का प्राकट्य वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि (अक्षय तृतीया) को प्रदोष काल में पुनर्वसु अथवा रोहिणी नक्षत्र के संधिकाल पर हुआ था।
भगवान परशुराम के माता-पिता कौन थे और वे किस वंश से संबंधित थे?
वे सप्तऋषियों में श्रेष्ठ महर्षि जमदग्नि और माता रेणुका के पुत्र थे तथा भृगु ऋषि के पावन भार्गव वंश से संबंधित थे।
भगवान परशुराम को उनका दिव्य 'परशु' (फरसा) किसने प्रदान किया था?
भगवान परशुराम की घोर तपस्या से प्रसन्न होकर देवाधिदेव भगवान शिव ने उन्हें यह अमोघ और दिव्य परशु तथा समस्त युद्ध कलाओं का ज्ञान प्रदान किया था।
भगवान परशुराम ने पृथ्वी को 21 बार किनसे मुक्त कराया था?
उन्होंने क्षत्रिय जाति से नहीं बल्कि अपने पिता के हत्यारे सहस्रार्जुन के वंशजों और उस काल के अत्याचारी, अधर्मी और मदोन्मत्त राजाओं से पृथ्वी को 21 बार मुक्त कराया था।
कलियुग में भगवान परशुराम की क्या भूमिका बताई गई है?
भगवान परशुराम अष्टचिरंजीवियों में से एक हैं और आज भी महेंद्रगिरि पर तपस्यारत हैं; कलियुग के अंत में वे भगवान विष्णु के दसवें अवतार 'कल्कि' के गुरु बनकर उन्हें शस्त्र-शास्त्र की दीक्षा देंगे।
पाएं अपनी सटीक कुंडली
कुंडली बनाएं
अनुभव: 20
इनसे पूछें: Family Planning, Career
इनके क्लाइंट: Punjab, Haryana, Delhi
इस लेख को परिवार और मित्रों के साथ साझा करें
WELCOME TO
Right Decisions at the right time with ZODIAQ