By पं. अभिषेक शर्मा
वैशाख शुक्ल एकादशी, समुद्र मंथन अमृत वितरण, धृष्टबुद्धि उद्धार कथा, पूजन विधि और पारण नियम

सनातन वैदिक पंचांग, कूर्म पुराण, पद्म पुराण तथा निर्णयसिंधु के अनुसार वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि को 'मोहिनी एकादशी' (Mohini Ekadashi) के नाम से जाना जाता है। यह पावन व्रत समस्त एकादशियों में सर्वाधिक सौम्य, चित्ताकर्षक और मनोविकारों का शमन करने वाला माना गया है। खगोलीय दृष्टिकोण से यह वह कालखंड है जब भुवन भास्कर भगवान सूर्य देव अपनी उच्च राशि मेष (Aries) में अंतिम चरणों में संचरण कर रहे होते हैं और चंद्रमा कन्या अथवा हस्त नक्षत्र के प्रभाव में आकर मन की चंचलता को नियंत्रित करने का संकेत देता है।
वैशाख मास के इस प्रचंड ग्रीष्म संधिकाल में जब सूर्य का आग्नेय प्रभाव प्रकृति में चरम पर होता है तब मानव चेतना में काम, क्रोध, लोभ और अंधी आसक्ति (मोह) के विकार तीव्र हो जाते हैं। 'मोहिनी' का शाब्दिक अर्थ है-"जो मोह को आकर्षित कर उसका रूपांतरण कर दे"। पौराणिक मान्यता के अनुसार, समुद्र मंथन के उपरांत जब असुर अमृत कलश छीनकर भाग गए थे तब देवताओं की रक्षा और धर्म की पुनर्प्रतिष्ठा हेतु भगवान श्रीहरि विष्णु ने इसी वैशाख शुक्ल एकादशी को अद्वितीय रूप-सौंदर्य से संपन्न 'मोहिनी स्वरूप' धारण किया था। यह व्रत साधक को सांसारिक मोह-जाल, अविद्या और काम-वासना के भटकाव से मुक्त कर आत्म-ज्ञान एवं वैकुंठ की प्राप्ति कराता है।
| पंचांग व व्रतीय घटक | शास्त्रीय, ज्योतिषीय व पौराणिक विवरण |
|---|---|
| मास एवं पक्ष | वैशाख मास | शुक्ल पक्ष (Waxing Fortnight) |
| तिथि संज्ञा | एकादशी (11वीं तिथि) | मोहिनी एकादशी |
| खगोलीय सौर स्थिति | सूर्य का मेष राशि में उच्च संचरण (Exalted Sun in Aries) |
| अधिष्ठाता देव | भगवान श्रीहरि विष्णु (दिव्य 'मोहिनी' स्वरूप) |
| व्रत का मुख्य स्वरूप | पूर्ण निराहार, जलाहार अथवा फलाहार उपवास | मनोविकार शमन |
| ऐतिहासिक प्रसंग | समुद्र मंथन, अमृत वितरण एवं भस्मासुर का मान-मर्दन |
| मुख्य पूजन द्रव्य | पीत चंदन, श्वेत कमल, तुलसी दल, गंगाजल, पंचामृत, ऋतु-फल |
| पारण का नियम | द्वादशी तिथि के सूर्योदयोपरांत (हरिवासर समाप्त होने पर) |
| अभीष्ट आध्यात्मिक फल | मोह-बंधन से मुक्ति, मेधा शक्ति की वृद्धि, काम-वासना शमन, मोक्ष |
मोहिनी एकादशी के व्रत का पूर्ण आध्यात्मिक फल प्राप्त करने तथा अंतःकरण को शुद्ध करने हेतु साधक को दशमी तिथि की संध्या से ही ब्रह्मचर्य और सात्विक आचार संहिता का निष्ठापूर्वक पालन करना चाहिए:
श्रीमद्भागवत महापुराण के आठवें स्कंध तथा विष्णु पुराण के अनुसार, जब देवों और दानवों ने मिलकर क्षीरसागर का मंथन किया, तो अंत में भगवान धन्वंतरि अमृत से भरा स्वर्ण कलश लेकर प्रकट हुए:
जैसे ही अमृत कलश प्रकट हुआ, असुरों ने बलपूर्वक उसे छीन लिया। असुरों में अमृत पीने को लेकर परस्पर विवाद होने लगा। देवता अत्यंत भयभीत और निराश होकर भगवान श्रीहरि नारायण की शरण में पहुंचे, क्योंकि यदि असुर अमर हो जाते, तो तीनों लोकों में अधर्म और आतंक का साम्राज्य स्थापित हो जाता।
देवताओं की आर्त पुकार सुनकर वैशाख शुक्ल एकादशी के दिन भगवान विष्णु ने एक ऐसी अप्रतिम सुंदरी का रूप धारण किया, जिसके सौंदर्य की तुलना संपूर्ण ब्रह्मांड में नहीं थी:
मोहिनी रूपी भगवान ने देवताओं और असुरों को दो अलग-अलग पंक्तियों में बैठाया।
पद्म पुराण में इस एकादशी के संदर्भ में महर्षि वशिष्ठ द्वारा राजा रामचंद्र जी को सुनाई गई राजा द्युतिमान की कथा का विशेष उल्लेख मिलता है:
सरस्वती नदी के पावन तट पर भद्रावती नाम की एक सुंदर नगरी थी, जहाँ चंद्रवंशी राजा द्युतिमान राज्य करते थे। उसी नगर में 'धनपाल' नाम का एक अत्यंत धनी वैश्य रहता था। वह अत्यंत धर्मात्मा, दानवीर और विष्णु-भक्त था। उसने नगर में अनेक कुएं, बावड़ियां, प्याऊ और धर्मशालाएं बनवाई थीं।
धनपाल के पांच पुत्र थे-सुमना, सद्बुद्धि, मेधावी, सुकृत और सबसे छोटा 'धृष्टबुद्धि'।
एक बार भूख, प्यास और व्याधियों से तड़पता हुआ धृष्टबुद्धि वन में भटक रहा था। वह वैशाख मास की चिलचिलाती दोपहरी में महर्षि कौंडिन्य के आश्रम में पहुंचा।
महर्षि कौंडिन्य ने दयालु होकर कहा:
"हे भद्र! तुम वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की 'मोहिनी एकादशी' का विधिपूर्वक व्रत करो। यह व्रत मनुष्यों के सुमेरु पर्वत जैसे विशाल पापों को भी भस्म कर देने वाला है।"
धृष्टबुद्धि ने महर्षि के निर्देशानुसार वैशाख शुक्ल एकादशी का निर्जला व्रत रखा, रात्रि जागरण किया और द्वादशी को पारण किया। इस व्रत के प्रभाव से उसके जन्म-जन्मांतरों के समस्त पाप धुल गए। उसका अंतःकरण दिव्य हो गया और अंत समय में वह गरुड़ पर सवार होकर भगवान विष्णु के परम धाम (वैकुंठ) को प्राप्त हुआ।
मोहिनी एकादशी की पूजा अत्यंत सात्विक, एकाग्र और भावपूर्ण होनी चाहिए:
मोहिनी एकादशी का आध्यात्मिक संदेश बाह्य अनुष्ठान से कहीं अधिक चेतना के रूपांतरण का विषय है:
संसार में समस्त दुखों की जड़ 'मोह' है। गीता में भगवान कृष्ण कहते हैं कि आसक्ति से कामना उत्पन्न होती है और कामना में बाधा आने से क्रोध पैदा होता है, जिससे बुद्धि का नाश हो जाता है।
वैदिक ज्योतिष में एकादशी तिथि का सीधा संबंध मानव मस्तिष्क के 'चंद्रमा' (मन के कारक) से होता है। एकादशी के दिन शरीर में जल तत्त्व और पाचन अग्नि का नियमन करने से मन की एकाग्रता बढ़ती है। जो जातक मानसिक तनाव, अवसाद, अनिद्रा अथवा अत्यधिक काम-वासना से पीड़ित हैं, उनके लिए मोहिनी एकादशी का व्रत एक अचूक आध्यात्मिक औषधि का कार्य करता है।
| सांसारिक विकार | मोहिनी एकादशी व्रत का प्रभाव | प्राप्त होने वाला आध्यात्मिक फल |
|---|---|---|
| अंधी आसक्ति (मोह) | सांसारिक नश्वरता का बोध | वैराग्य और चित्त की अचल स्थिरता |
| काम-वासना व चंचलता | इंद्रिय संयम और मानसिक उपवास | ब्रह्मचर्य, ओजस्विता और आंतरिक शांति |
| क्रोध व अहंकार | मोहिनी स्वरूप के सौम्य दर्शन | क्षमा, विनम्रता और वाक-शुद्धि |
| संचित पाप (प्रारब्ध) | महर्षि कौंडिन्य के वचनानुसार क्षय | अंतःकरण की निर्मलता, मोक्ष |
एकादशी व्रत का संपूर्ण पुण्य तभी प्राप्त होता है जब उसका पारण (Fast Breaking) शास्त्रोक्त नियमों के अनुसार किया जाए:
मोहिनी एकादशी हमें सनातन दर्शन का सबसे गहन रहस्य सिखाती है:
"इस नश्वर संसार के भौतिक भोग और वासनाएं केवल एक मरीचिका (भ्रम) हैं; वास्तविक अमृत केवल परमात्मा की भक्ति और आत्म-साक्षात्कार में है।"
असुर अमृत के कलश को अपने हाथों में रखते हुए भी केवल बाह्य रूप-सौंदर्य के मोह में फंसकर अमृत से वंचित रह गए। इसी प्रकार, जो मनुष्य इस मानव जीवन रूपी दुर्लभ अवसर को केवल धन, वासना और सांसारिक मोह में गंवा देता है, वह भी उन असुरों की भांति अपने हाथों में आए मुक्ति-रूपी अमृत को खो देता है।
आइए, वैशाख शुक्ल एकादशी के इस पावन पर्व पर हम भगवान विष्णु के मोहिनी स्वरूप के चरणों में नतमस्तक हों, अपने मन के समस्त मोह-बंधनों और विकारों को विसर्जित करें और ईश्वर-भक्ति के शाश्वत अमृत का पान करें।
मोहिनी एकादशी किस मास और पक्ष में आती है?
मोहिनी एकादशी प्रतिवर्ष वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि को आती है।
भगवान विष्णु ने मोहिनी रूप क्यों धारण किया था?
समुद्र मंथन के पश्चात जब असुर अमृत कलश छीनकर भाग गए थे तब असुरों को सम्मोहित कर देवताओं को अमृत पिलाने और धर्म की रक्षा हेतु भगवान ने मोहिनी रूप धारण किया था।
मोहिनी एकादशी का व्रत करने से धृष्टबुद्धि को क्या फल प्राप्त हुआ था?
महर्षि कौंडिन्य के उपदेश से मोहिनी एकादशी का व्रत करने पर पापी धृष्टबुद्धि के समस्त महापाप भस्म हो गए और उसे अंत समय में वैकुंठ लोक की प्राप्ति हुई।
मोहिनी एकादशी के दिन भगवान विष्णु को किस विशेष नैवेद्य का भोग लगाया जाता है?
इस दिन भगवान को ग्रीष्म की शीतलता हेतु माखन-मिश्री, जौ के सत्तू के लड्डू, आम, खरबूजा और पंचामृत का विशेष भोग लगाया जाता है।
एकादशी व्रत के पारण में 'हरिवासर' के समय भोजन क्यों नहीं किया जाता?
क्योंकि शास्त्रों के अनुसार द्वादशी तिथि का प्रथम चतुर्थांश भाग 'हरिवासर' (भगवान विष्णु का वास) कहलाता है और इस काल में भोजन करने से व्रत का संपूर्ण पुण्य नष्ट हो जाता है।
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