By पं. नरेंद्र शर्मा
वैशाख शुक्ल पंचमी, महाप्रभु वल्लभाचार्य दीक्षा, वात्सल्य रस सम्राट, भ्रमरगीत और पारसौली महाप्रयाण

सनातन वैदिक पंचांग, पुष्टिमार्गीय वैष्णव संप्रदाय, चौरासी वैष्णवन की वार्ता और ब्रज साहित्य के अनुसार वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को 'महाकवि संत सूरदास जयंती' के रूप में मनाया जाता है। वैशाख शुक्ल पंचमी की यह पावन तिथि सनातन इतिहास में दो महान विभूतियों के एक साथ स्मरण का दिन है-जहाँ एक ओर ज्ञान-मार्ग के शिखर जगतगुरु आदि शंकराचार्य का प्राकट्य हुआ, वहीं दूसरी ओर प्रेम-भक्ति और वात्सल्य रस के शिरोमणि संत सूरदास का आविर्भाव हुआ।
खगोलीय दृष्टि से यह समय भुवन भास्कर सूर्य के मेष राशि में उच्च संचरण और चंद्रमा के मिथुन/कर्क राशि में गुरु व बुध के प्रभाव में आने का कालखंड है। इस संधिकाल में ज्ञान और भाव का अनूठा संगम घटित होता है। संवत 1535 (1478 ईस्वी) में दिल्ली के निकट सीही ग्राम (अथवा रुनकता, आगरा) में एक निर्धन सारस्वत ब्राह्मण परिवार में जन्मे सूरदास जी जन्मांध (नेत्रहीन) थे। बाह्य दृष्टि न होने के उपरांत भी भगवान श्रीकृष्ण की अनुकंपा से उन्हें वह अलौकिक 'दिव्य अंतर्दृष्टि' (Divine Inner Vision) प्राप्त थी, जिसके बल पर उन्होंने बाल-कृष्ण की सूक्ष्म से सूक्ष्म बाल-लीलाओं, रूप-सौंदर्य और माता यशोदा के वात्सल्य का ऐसा सजीव चित्रण किया जो विश्व साहित्य में अप्रतिम है। वे अष्टछाप कवियों के सिरमौर थे और उन्होंने गोवर्धन स्थित श्रीनाथजी मंदिर में महाप्रभु वल्लभाचार्य के शिष्य के रूप में जीवनपर्यंत कीर्तन सेवा की।
| पंचांग व प्राकट्य घटक | शास्त्रीय, पुष्टिमार्गीय व साहित्यिक विवरण |
|---|---|
| प्राकट्य तिथि व काल | वैशाख मास | शुक्ल पक्ष पंचमी (वैशाख शुक्ल पंचमी) |
| ऐतिहासिक प्राकट्य संवत | संवत 1535 (1478 ईस्वी) | सीही (फरीदाबाद) अथवा रुनकता (आगरा) |
| संप्रदायिक दीक्षा परंपरा | पुष्टिमार्ग (वल्लभ संप्रदाय) | अष्टछाप के प्रधान कीर्तनकार |
| दीक्षा गुरु | जगद्गुरु महाप्रभु श्री वल्लभाचार्य जी महाराज |
| प्रमुख काव्य रस | वात्सल्य रस (सम्राट), श्रृंगार रस एवं शांत/दास्य भाव |
| अमर काव्य रचनाएं | सूरसागर, सूरसारावली, साहित्य-लहरी |
| प्रमुख साधना स्थली | गऊघाट (आगरा), श्रीनाथजी मंदिर (गोवर्धन) एवं पारसौली (चंद्रसरोवर) |
| काव्य भाषा | विशुद्ध, प्रांजल एवं माधुर्य-युक्त ब्रजभाषा |
| अभीष्ट आध्यात्मिक फल | अंतःकरण में अनन्य कृष्ण-प्रेम, वात्सल्य भाव, मानसिक शांति व दिव्य दृष्टि |
संत सूरदास जयंती के पावन अवसर पर उनके द्वारा गाए गए भक्ति-भाव को आत्मसात करने और भगवान श्रीकृष्ण के बाल स्वरूप की कृपा प्राप्त करने हेतु साधक को निम्नलिखित नियमों का पालन करना चाहिए:
सूरदास जी के जीवन का सबसे युगांतकारी मोड़ आगरा और मथुरा के बीच यमुना तट पर स्थित गऊघाट पर आया, जहाँ उनका मिलन शुद्धाद्वैत दर्शन के प्रणेता महाप्रभु वल्लभाचार्य से हुआ।
महाप्रभु से मिलने से पूर्व सूरदास जी अत्यंत दीनता, पश्चाताप और दास्य भाव के पद गाया करते थे, जैसे-"प्रभु हौं सब पतितन कौ टीको"। जब वल्लभाचार्य जी गऊघाट पहुंचे, तो उन्होंने सूरदास जी से भगवद्-यश सुनाने को कहा। सूरदास जी ने अपना दीनता-भरा पद सुनाया।
यह सुनकर महाप्रभु वल्लभाचार्य ने उन्हें झकझोरते हुए कहा:
"सूर ह्वै कै ऐसो घिघियात काहे कौ है? कछु भगवल्लीला वर्णन करि।"
(अर्थात: तुम तो 'सूर' (शूरवीर) हो, फिर इस प्रकार दीन-हीन होकर क्यों गिड़गिड़ा रहे हो? भगवान की दिव्य बाल-लीलाओं और आनंद का गान करो!)
महाप्रभु ने सूरदास जी को पुष्टिमार्ग में दीक्षित किया और उन्हें श्रीमद्भागवत के दशम स्कंध की गूढ़ 'अनुग्रह लीला' (कृष्ण की प्रेममयी लीला) का रहस्य समझाया। इस दीक्षा के उपरांत सूरदास जी की चेतना का कायाकल्प हो गया। उनका संकोच और दीनता विसर्जित हो गई और वे भगवान श्रीकृष्ण को अपना सखा, लाड़िला बालक और सर्वस्व मानकर वात्सल्य और सख्य भाव के अलौकिक पदों की रचना करने लगे। इसके बाद वे गोवर्धन पर्वत पर स्थित श्रीनाथजी मंदिर में अष्टछाप के प्रधान कवि बनकर नित्य नई लीलाओं का गान करने लगे।
हिंदी और संस्कृत साहित्य के आचार्यों ने सर्वसम्मति से संत सूरदास को 'वात्सल्य रस का सम्राट' स्वीकार किया है। आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने सूरदास जी के विषय में लिखा था:
"सूरदास वात्सल्य का कोना-कोना झांक आए हैं।"
जन्मांध होने के बावजूद उन्होंने एक बालक के मनोविज्ञान, उसके नटखटपन, हठ और माता के वात्सल्य का ऐसा सजीव वर्णन किया जो नेत्रवान कवियों के लिए भी असंभव था:
माता यशोदा जब कृष्ण के बाल संवारती हैं और वे दूध पीने में आनाकानी करते हैं, तो वे अपनी माता से भोला प्रश्न करते हैं:
मैया, कबहिं बढ़ैगी चोटी?
किती बार मोहिं दूध पियत भई, यह अजहूँ है छोटी॥
माखन चोरी करते हुए रंगे हाथों पकड़े जाने पर बालक कृष्ण जिस निर्दोष चतुराई से माता के सामने सफाई देते हैं, वह सहृदय पाठक को मंत्रमुग्ध कर देता है:
मैया मोरी, मैं नहिं माखन खायो।
भोर भये गइयन के पाछे, मधुबन मोहिं पठायो॥
चारि पहर बंसीबट भटकों, साँझ परे घर आयो।
मैं बालक बहियन को छोटो, छींको किस बिधि पायो?
ग्वाल-बाल सब बैर परे हैं, बरबस मुख लपटायो॥
माता यशोदा बालक के इस भोली चतुराई पर मुस्कुराकर अपनी छड़ी फेंक देती हैं और उन्हें अपने हृदय से लगा लेती हैं। यही वात्सल्य रस की वह पराकाष्ठा है जो सांसारिक वासनाओं से परे आत्मा को परमात्मा के प्रेम में लीन कर देती है।
| काव्य पद | मुख्य प्रसंग व भाव | अंतर्निहित मनोवैज्ञानिक सत्य |
|---|---|---|
| "मैया कबहिं बढ़ैगी चोटी" | बाल-सुलभ जिज्ञासा और शिकायत | बालक को पौष्टिक आहार देने हेतु माता द्वारा किया गया बाल-मनोवैज्ञानिक प्रलोभन |
| "मैया मोरी मैं नहिं माखन खायो" | निर्दोष बहानेबाजी और आत्म-रक्षा | भय के क्षणों में बालक की असीम कल्पनाशीलता और माता का वात्सल्य-विगलित हृदय |
| "जसोदा हरि पालने झुलावै" | लोरी और शयन लीला (वात्सल्य) | शिशु के अधखुले नेत्रों और माता के हृदय की परमानंदमयी स्पंदना का सजीव चित्र |
| "कहत कत परदेसी की बात" | भ्रमरगीत (उद्धव-गोपी संवाद) | निर्गुण ज्ञान पर सगुण प्रेम और विरह की अकाट्य विजय |
सूरदास जी के महाग्रंथ 'सूरसागर' का सर्वाधिक दार्शनिक और मार्मिक अंश 'भ्रमरगीत' (Bhramargeet) है। जब भगवान श्रीकृष्ण मथुरा चले जाते हैं और गोपियां विरह में व्याकुल होती हैं तब श्रीकृष्ण अपने ज्ञानी सखा उद्धव को गोपियों को समझाने हेतु वृंदावन भेजते हैं।
ऊधौ, मन न भए दस-बीस।
एक हुतौ सो गयौ स्याम संग, को अवराधै ईस॥
(अर्थात: हे उद्धव! हमारे पास दस-बीस मन नहीं हैं; एक ही मन था जो श्यामसुंदर के साथ चला गया, अब हम तुम्हारे निराकार ईश्वर की आराधना किस मन से करें?)
जीवन के अंतिम समय में सूरदास जी गोवर्धन के निकट पारसौली (चंद्रसरोवर) की पावन भूमि पर आ गए, जहाँ भगवान श्रीकृष्ण ने शरद पूर्णिमा की महारास लीला की थी।
जब महाप्रभु वल्लभाचार्य के सुपुत्र गोस्वामी विट्ठलनाथ जी को ज्ञात हुआ कि सूरदास जी लीला-प्रवेश (देह-त्याग) करने वाले हैं, तो उन्होंने वैष्णवों से कहा:
"पुष्टिमार्ग को जहाज जात है, जाकौ कछु लेनो होय सो लेउ।"
(अर्थात: पुष्टिमार्ग का विशाल जहाज आज जा रहा है, जिसे जो भगवद्-रस लेना हो, वह शीघ्र ले ले।)
विट्ठलनाथ जी और अन्य भक्तों ने सूरदास जी से पूछा कि वे इस समय किस भाव में लीन हैं? सूरदास जी ने तानपूरे के तारों को छेड़ा और अपने जीवन का अंतिम अमर पद गाया:
खंजन नैन रूप रस माते।
अतिसै चारु चपल अनियारे, पल पिंजरा न समाते॥
इस पद को गाते हुए सूरदास जी ने भगवान श्रीकृष्ण के नयनों के रस-सिंधु में अपनी चेतना को सदा-सदा के लिए लीन कर दिया और परम धाम को प्रस्थान किया।
संत सूरदास का जीवन और उनकी वाणी आधुनिक मनुष्य को यह अमर संदेश देती है कि परमात्मा को देखने के लिए चर्म-चक्षुओं (शारीरिक आंखों) की नहीं बल्कि 'हृदय की आंखों' (भाव-दृष्टि) की आवश्यकता होती है।
संसार में करोड़ों लोग आंखें रखते हुए भी अज्ञान, काम, क्रोध और स्वार्थ के अंधकार में भटकते रहते हैं। इसके विपरीत, सूरदास जी ने नेत्रहीन होकर भी उस परमात्मा का साक्षात दर्शन किया जिसे बड़े-बड़े योगी समाधि में भी नहीं देख पाते। उन्होंने यह सिद्ध किया कि जब मनुष्य अपने अंतःकरण को निष्काम प्रेम, सरलता और समर्पण से भर लेता है, तो परमात्मा स्वयं उसके सामने बालक बनकर लीलाएं करने लगते हैं।
आइए, वैशाख शुक्ल पंचमी के इस पावन दिन पर हम महाकवि संत सूरदास जी के चरणों में नमन करें और भगवान श्रीकृष्ण के प्रति उनके अनन्य, पावन और वात्सल्य-रस से परिपूर्ण प्रेम का एक कण अपने हृदय में धारण करने का संकल्प लें।
संत सूरदास जयंती प्रतिवर्ष किस तिथि को मनाई जाती है?
संत सूरदास जयंती प्रतिवर्ष वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि (वैशाख शुक्ल पंचमी) को मनाई जाती है।
संत सूरदास जी के दीक्षा गुरु कौन थे?
संत सूरदास जी के दीक्षा गुरु पुष्टिमार्ग (शुद्धाद्वैत दर्शन) के संस्थापक जगद्गुरु महाप्रभु श्री वल्लभाचार्य जी महाराज थे।
सूरदास जी को किस काव्य रस का 'सम्राट' माना गया है?
सूरदास जी को हिंदी साहित्य में 'वात्सल्य रस' (Vatsalya Rasa) और बाल मनोविज्ञान का अद्वितीय सम्राट माना गया है।
संत सूरदास के प्रमुख अमर ग्रंथ कौन-से हैं?
उनके प्रमुख अमर ग्रंथ सूरसागर, सूरसारावली और साहित्य-लहरी हैं; जिनमें 'भ्रमरगीत' सूरसागर का सर्वाधिक प्रसिद्ध अंश है।
सूरदास जी के देहावसान के समय गोस्वामी विट्ठलनाथ जी ने क्या ऐतिहासिक वाक्य कहा था?
उन्होंने कहा था: "पुष्टिमार्ग को जहाज जात है, जाकौ कछु लेनो होय सो लेउ" (पुष्टिमार्ग का जहाज जा रहा है, जिसे जो लेना हो ले ले)।
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