श्री रामानुजाचार्य जयंती (वैशाख शुक्ल षष्ठी): विशिष्टाद्वैत के प्रणेता और समरसता के अग्रदूत

By पं. नीलेश शर्मा

वैशाख शुक्ल षष्ठी, विशिष्टाद्वैत वेदांत दर्शन, गोपुरम अष्टाक्षर मंत्र क्रांति और सामाजिक समरसता

श्री रामानुजाचार्य जयंती: विशिष्टाद्वैत, गोपुरम कथा व दर्शन

पंचांग विवरण एवं श्री रामानुजाचार्य प्राकट्य की खगोलीय पृष्ठभूमि

सनातन वैदिक पंचांग, श्री संप्रदाय की गुरु-परंपरा और वैष्णव धर्मशास्त्रों के अनुसार वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि को जगद्गुरु 'श्री रामानुजाचार्य जयंती' (Ramanujacharya Jayanti) के रूप में अत्यंत श्रद्धा और उल्लास के साथ मनाया जाता है। श्री रामानुजाचार्य सनातन दर्शन के वे तेजस्वी प्रकाश-स्तंभ हैं जिन्हें भगवान श्रीहरि विष्णु के अनन्य सेवक साक्षात शेषनाग (अनंत देव) अथवा लक्ष्मण जी का पूर्णावतार स्वीकार किया गया है।

खगोलीय और ज्योतिषीय दृष्टि से वैशाख शुक्ल षष्ठी का समय सौर और चांद्र शक्तियों के अद्भुत संतुलन का काल है। इस समय भुवन भास्कर भगवान सूर्य देव अपनी परम उच्च राशि मेष (Aries) में गोचर कर रहे होते हैं और चंद्रमा आर्द्रा अथवा पुनर्वसु नक्षत्र के संधिकाल पर मिथुन राशि में स्थित होता है। संवत 1074 (1017 ईस्वी) में तमिलनाडु के श्रीपेरंबदूर (Sriperumbudur) में एक परम विद्वान वडमा ब्राह्मण परिवार में कांति मती और केशव सोमायाजी के घर बालक 'इलाया पेरुमल' (लक्ष्मण) के रूप में जन्मे इस महापुरुष ने भारतीय समाज और दर्शन को एक नई दिशा प्रदान की।

उस समय समाज जहाँ एक ओर शुष्क मायावाद और अद्वैत के जटिल तर्कों में उलझा हुआ था, वहीं दूसरी ओर वर्ण-व्यवस्था की कठोरता, अस्पृश्यता और सामाजिक भेदभाव के कारण पतन की ओर अग्रसर था। श्री रामानुजाचार्य ने ब्रह्मसूत्र, उपनिषद और भगवद्गीता पर अद्वितीय भाष्य लिखकर 'विशिष्टाद्वैत' (Vishishtadvaita Vedanta) दर्शन की स्थापना की। उन्होंने सिद्ध किया कि जीव और यह दृश्य जगत मिथ्या नहीं बल्कि साक्षात परब्रह्म नारायण के ही शरीर (अंग) हैं। इसके साथ ही, उन्होंने सामाजिक क्रांति का शंखनाद करते हुए मंदिर के ऊंचे गोपुरम पर चढ़कर समूचे समाज को नारायण का मुक्तिदायक अष्टाक्षर महामंत्र प्रदान किया।

पंचांग व प्राकट्य घटक शास्त्रीय, संप्रदायिक व ऐतिहासिक विवरण
प्राकट्य तिथि व काल वैशाख मास | शुक्ल पक्ष षष्ठी (तिरुवातिराई/आर्द्रा नक्षत्र योग)
ऐतिहासिक प्राकट्य संवत संवत 1074 (1017 ईस्वी) | श्रीपेरंबदूर (तमिलनाडु)
अवतार स्वरूप साक्षात शेषनाग / लक्ष्मण जी के पूर्णावतार (अनंतावतार)
माता-पिता व कुल माता कांति मती एवं पिता केशव सोमायाजी | हारित गोत्र
संप्रदायिक पीठ श्री संप्रदाय (लक्ष्मी-नारायण परंपरा) | त्रिदंडी संन्यास
प्रमुख दार्शनिक सिद्धांत विशिष्टाद्वैत वेदांत (जीव-अजीव-विशिष्ट ब्रह्म)
अमर भाष्य व रचनाएं श्रीभाष्य (ब्रह्मसूत्र भाष्य), गीता भाष्य, वेदार्थ संग्रह, गद्यत्रयम्
प्रमुख कर्मभूमि व मंदिर श्रीरंगम (श्री रंगनाथ स्वामी), कांचीपुरम, मेलकोट (तिरु नारायणपुरम)
सामाजिक योगदान शूद्रों व अंत्यजों को 'तिरुक्कुलथार' (पवित्र कुल) नाम देकर मंदिर प्रवेश का अधिकार
अभीष्ट आध्यात्मिक फल शरणागति (प्रपत्ति), भक्ति का जागरण, समरसता, मोक्ष एवं वैकुंठ वास

श्री रामानुजाचार्य जयंती के पावन अवसर पर उनके विशिष्टाद्वैत दर्शन, शरणागति भाव और सामाजिक समरसता को अपने अंतःकरण में जाग्रत करने हेतु साधक को शास्त्रोक्त विधि का निष्ठापूर्वक पालन करना चाहिए:

  • प्रातः काल सूर्योदय से पूर्व ब्रह्म मुहूर्त में उठकर शीतल जल में गंगाजल अथवा कावेरी जल मिलाकर स्नान करना।
  • स्नान के पश्चात स्वच्छ श्वेत अथवा पीले वस्त्र धारण कर ललाट पर श्री संप्रदाय का ऊर्ध्वपुंड्र (श्वेत तिरुमणि और मध्य में लाल/पीली श्रीचूर्ण रेखा) धारण करना।
  • पूजा स्थल पर चौकी पर पीला वस्त्र बिछाकर भगवान श्री लक्ष्मीनारायण तथा श्री रामानुजाचार्य जी के चित्र अथवा विग्रह की स्थापना करना।
  • भगवान नारायण और आचार्य जी का षोडशोपचार पूजन करना; उन्हें श्वेत चंदन, तुलसी दल, पीले पुष्प और पंचामृत से स्नान कराना।
  • वैशाख के ग्रीष्म संताप को शांत करने हेतु ठाकुर जी को सत्तू के लड्डू, शीतल पना, खीर और मक्खन-मिश्री का भोग लगाना।
  • श्री रामानुजाचार्य जी द्वारा रचित 'शरणगति गद्यम्' अथवा आलवार संतों के दिव्य प्रबंधम् का पाठ करना।
  • कमलगट्टे अथवा तुलसी की माला पर नारायण के अष्टाक्षर महामंत्र "ॐ नमो नारायणाय" का कम से कम 108 बार शांत चित्त से जप करना।
  • किसी भी निर्धन, वंचित अथवा उपेक्षित व्यक्ति के प्रति आदर भाव रखना, उन्हें भोजन, वस्त्र और शीतल जल भेंट कर सामाजिक समरसता का संकल्प लेना।

विशिष्टाद्वैत दर्शन: जीव और जगत ब्रह्म के ही शरीर हैं

आदि शंकराचार्य के 'केवल अद्वैत' (जहाँ जगत को मिथ्या और माया माना गया) के विपरीत, श्री रामानुजाचार्य ने उपनिषदों के समन्वय से 'विशिष्टाद्वैत' (Qualified Non-Dualism) की अमर आधारशिला रखी:

1. तत्वत्रय (The Three Realities)

रामानुजाचार्य जी ने तीन सनातन तत्वों का प्रतिपादन किया:

  • चित् (Jiva): असंख्य चेतन जीवात्माएं जो ज्ञानवान और भोक्ता हैं।
  • अचित् (Prakriti): जड़ प्रकृति और यह भौतिक ब्रह्मांड जो निरंतर परिवर्तनशील है।
  • ईश्वर (Brahman/Narayana): साक्षात परब्रह्म श्रीमन्नारायण, जो समस्त शक्तियों के स्वामी, स्वतंत्र और सर्वव्यापी हैं।

2. शरीर-शरीरी भाव (The Organic Unity)

रामानुजाचार्य जी के अनुसार, जिस प्रकार एक मानव शरीर में अनेक अंग (हाथ, पैर, आंखें) होते हैं और वे शरीर की आत्मा के अधीन रहकर कार्य करते हैं, ठीक उसी प्रकार यह संपूर्ण जड़ प्रकृति (अचित्) और समस्त जीवात्माएं (चित्) परब्रह्म नारायण का 'शरीर' हैं और भगवान नारायण इस संपूर्ण ब्रह्मांड की 'अंतरात्मा' (शरीरी) हैं।

  • अतः यह संसार मिथ्या (झूठा) नहीं है; यह भगवान नारायण का ही सजीव रूप है।
  • ईश्वर निर्गुण या निराकार शून्य नहीं हैं बल्कि वे समस्त कल्याणकारी गुणों से युक्त 'सगुण साकार पुरुषोत्तम' हैं।
दार्शनिक घटक विशिष्टाद्वैत की मान्यता व्यावहारिक जीवन में प्रभाव
ईश्वर का स्वरूप सगुण, साकार, दयामय श्रीमन्नारायण ईश्वर से व्यक्तिगत प्रेम और भक्ति संभव है
जगत की स्थिति सत्य, वास्तविक और ईश्वर का प्रत्यक्ष शरीर प्रकृति और पर्यावरण का आदर व संरक्षण
मुक्ति का साधन केवल शुष्क ज्ञान नहीं, अपितु अनन्य 'भक्ति' और 'प्रपत्ति' (शरणागति) समस्त जीवों के लिए मोक्ष का द्वार खुला होना

गोपुरम की ऐतिहासिक घटना: समरसता और अष्टाक्षर महामंत्र की क्रांति

श्री रामानुजाचार्य केवल एक कक्ष में बैठकर शास्त्रार्थ करने वाले संन्यासी नहीं थे; वे सनातन धर्म के इतिहास के सबसे बड़े समाज सुधारक थे। इसका सबसे प्रमाणिक उदाहरण तिरुक्कोष्टियूर (Thirukoshtiyur) के मंदिर के गोपुरम की अमर घटना है:

रामानुजाचार्य जी ने अपने गुरु गोष्ठीपूर्ण (तंबूरंबी) से भगवान नारायण के परम गोपनीय और मुक्तिदायक अष्टाक्षर मंत्र-"ॐ नमो नारायणाय" की दीक्षा प्राप्त करने के लिए 18 बार पैदल यात्रा की।

  • गुरु ने कठोर परीक्षा के उपरांत अत्यंत गुप्त रूप से मंत्र दिया और चेतावनी दी: "रामानुज! यह मंत्र अत्यंत गोपनीय है। यदि तुमने इसे किसी अन्य को बताया, तो सुनने वाले तो मुक्त हो जाएंगे, परंतु गुरु की आज्ञा तोड़ने के कारण तुम्हें घोर नर्क की प्राप्ति होगी।"
  • रामानुजाचार्य जी ने गुरु से मंत्र ग्रहण किया, परंतु मंदिर से बाहर निकलते ही उनके हृदय में करुणा का ज्वार उमड़ पड़ा। उन्होंने सोचा: "यदि मेरे अकेले के नर्क जाने से हजारों-लाखों नर-नारियों को वैकुंठ और मुक्ति मिल सकती है, तो ऐसा नर्क मुझे सहस्रों बार स्वीकार है!"
  • वे तुरंत तिरुक्कोष्टियूर मंदिर के सबसे ऊंचे गोपुरम (शिखर) पर चढ़ गए और उन्होंने नगर के समस्त नर-नारियों, बच्चों, वृद्धों और तथाकथित अछूतों को एकत्र होने का आह्वान किया।
  • उन्होंने गोपुरम से दोनों हाथ उठाकर संपूर्ण जनता के सम्मुख उच्च स्वर में गर्जना की: "ॐ नमो नारायणाय!" और सबको मुक्ति का मार्ग प्रदान कर दिया।

जब गुरु गोष्ठीपूर्ण को यह ज्ञात हुआ, तो वे अत्यंत क्रुद्ध होकर लाठी लेकर दौड़े। परंतु जब रामानुजाचार्य जी ने उनके चरणों में गिरकर कहा कि "प्रभु! आपके शिष्यों का उद्धार हो, मेरे नर्क जाने की मुझे कोई चिंता नहीं," तो गुरु का हृदय पिघल गया। गुरु ने उन्हें गले से लगा लिया और कहा: "हे रामानुज! तुम केवल मेरे शिष्य नहीं, तुम साक्षात 'एम्पेरुमानार' (हमारे सबसे महान स्वामी) हो!"


सामाजिक क्रांति: 'तिरुक्कुलथार' और समानता का उद्घोष

रामानुजाचार्य जी ने आज से 1000 वर्ष पूर्व जातिवाद की जंजीरों को तोड़कर समाज में समरसता की जो लौ जलाई थी, वह अद्वितीय है:

  1. तिरुक्कुलथार (पवित्र कुल): उन्होंने समाज के सबसे शोषित और बहिष्कृत वर्ग को 'तिरुक्कुलथार' (भगवान के पवित्र कुल के लोग) की उपाधि दी और उन्हें मंदिरों में प्रवेश दिलाया।
  2. मेलकोट का मंदिर प्रवेश: कर्नाटक के मेलकोट (तिरु नारायणपुरम) में जब स्थानीय चेलुवनारायण स्वामी मंदिर का पुनरुद्धार हुआ, तो रामानुजाचार्य जी ने दलितों और आदिवासियों को मुख्य मंदिर के गर्भगृह तक ले जाकर दर्शन कराए और उन्हें पूजा का अधिकार दिया।
  3. कांचीपूर्ण की चरण-सेवा: कांचीपुरम में उच्च कुल में जन्मे रामानुजाचार्य जी ने तथाकथित निम्न जाति के भक्त 'कांचीपूर्ण' को अपना आध्यात्मिक मार्गदर्शक माना और उनके जूठे भोजन को महाप्रसाद मानकर ग्रहण करने का आग्रह किया।

प्रपत्ति (शरणागति): शरणागत वत्सल का आश्रय

विशिष्टाद्वैत दर्शन में मोक्ष प्राप्ति का सबसे सरल और सर्वसुलभ मार्ग 'प्रपत्ति' (पूर्ण शरणागति) बताया गया है। रामानुजाचार्य जी के अनुसार वैदिक कर्मकांड और कठोर योग हर व्यक्ति के लिए संभव नहीं हैं, परंतु भगवान के चरणों में पूर्ण समर्पण कोई भी कर सकता है:

अनुकूल्यस्य संकल्पः प्रातिकूल्यस्य वर्जनम्।
रक्षिष्यतीति विश्वासो गोप्तृत्ववरणं तथा।
आत्मनिक्षेपकार्पण्ये षड्विधा शरणागतिः॥

शरणागति के छह अंग

  1. अनुकूल्यस्य संकल्पः केवल वही कार्य करना जो ईश्वर और धर्म के अनुकूल हो।
  2. प्रातिकूल्यस्य वर्जनम् उन सभी कर्मों का त्याग करना जो अधर्म और कलह बढ़ाते हों।
  3. रक्षिष्यतीति विश्वासः यह अटूट विश्वास रखना कि भगवान नारायण प्रत्येक परिस्थिति में मेरी रक्षा करेंगे।
  4. गोप्तृत्ववरणम् ईश्वर को ही अपना एकमात्र रक्षक और स्वामी स्वीकार करना।
  5. आत्मनिक्षेपः अपने अहंकार, शरीर और कर्म-फल को पूरी तरह भगवान के चरणों में सौंप देना।
  6. कार्पण्यम् ईश्वर के सम्मुख अपनी परम दीनता और विवशता को स्वीकार करना।

दार्शनिक निष्कर्ष: आत्मा में कोई जाति नहीं होती

श्री रामानुजाचार्य जयंती का यह महापर्व आधुनिक मानव चेतना को सनातन धर्म का सबसे प्रामाणिक संदेश देता है:

"प्रत्येक देह नश्वर है, परंतु उस देह के भीतर बैठी आत्मा साक्षात परमात्मा का अंश है; और आत्मा की कोई जाति, वर्ण या कुल नहीं होता।"

जब हम किसी मनुष्य को उसकी जाति, रूप अथवा सामाजिक स्थिति के आधार पर हीन दृष्टि से देखते हैं, तो हम वास्तव में उस मनुष्य का नहीं बल्कि उसके भीतर विराजमान साक्षात भगवान नारायण का अपमान कर रहे होते हैं।

श्री रामानुजाचार्य जी ने अपने संपूर्ण जीवन से यह सिद्ध किया कि सच्ची विद्वत्ता पोथियों के पन्ने पलटने में नहीं बल्कि शोषितों और पीड़ितों के आंसू पोंछकर उन्हें गले लगाने में है।

आइए, वैशाख शुक्ल षष्ठी के इस पावन दिन पर हम जगद्गुरु श्री रामानुजाचार्य जी के चरणों में वंदन करें, अपने मन से जाति-पाति और भेदभाव के समस्त संकीर्ण विचारों को विसर्जित करें और संपूर्ण संसार को भगवान नारायण का पावन परिवार मानकर प्रेम, करुणा और सेवा का दीप प्रज्वलित करें।


FAQ

श्री रामानुजाचार्य का जन्म किस तिथि और स्थान पर हुआ था?
श्री रामानुजाचार्य का प्राकट्य वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि को संवत 1074 (1017 ईस्वी) में दक्षिण भारत के तमिलनाडु राज्य स्थित श्रीपेरंबदूर में हुआ था।

श्री रामानुजाचार्य को किसका पूर्णावतार माना जाता है?
श्री रामानुजाचार्य जी को भगवान श्रीहरि विष्णु के अनन्य सेवक साक्षात शेषनाग (अनंत देव) तथा त्रेतायुग के लक्ष्मण जी का पूर्णावतार माना जाता है।

श्री रामानुजाचार्य द्वारा प्रतिपादित दार्शनिक सिद्धांत कौन-सा है?
उन्होंने उपनिषदों, गीता और ब्रह्मसूत्रों के आधार पर 'विशिष्टाद्वैत वेदांत' (Vishishtadvaita Vedanta) का प्रतिपादन किया, जिसमें जीव और जगत को ब्रह्म का शरीर माना गया है।

रामानुजाचार्य जी ने मंदिर के गोपुरम पर चढ़कर किस मंत्र का उद्घोष किया था?
उन्होंने गुरु की आज्ञा और नर्क के भय की परवाह न करते हुए जन-कल्याण हेतु गोपुरम पर चढ़कर भगवान नारायण के अष्टाक्षर महामंत्र "ॐ नमो नारायणाय" का उद्घोष किया था।

रामानुजाचार्य जी के प्रमुख अमर ग्रंथ कौन-से हैं?
उनके प्रमुख ग्रंथ हैं: ब्रह्मसूत्रों पर रचित श्रीभाष्य, गीता भाष्य, वेदार्थ संग्रह, वेदांत दीप, वेदांत सार तथा शरणागति पर आधारित गद्यत्रयम्।

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लेखक

पं. नीलेश शर्मा

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