By पं. अमिताभ शर्मा
ग्रीष्म ऋतुचर्या, जठराग्नि की मंदता, सत्तू का औषधीय विज्ञान, 5 शीतल पेय और डाइट चार्ट

सनातन वैदिक पंचांग और आयुर्वेद के आधारभूत ग्रंथों-महर्षि चरक कृत 'चरक संहिता' (तस्याशितीय अध्याय), महर्षि सुश्रुत कृत 'सुश्रुत संहिता' तथा वाग्भट विरचित 'अष्टांग हृदयम्'-में वैशाख मास को 'आदान काल' (Adana Kala / सौम्य-क्षय काल) का सबसे संवेदनशील चरण माना गया है। काल-चक्र के अनुसार जब भुवन भास्कर भगवान सूर्य देव मेष राशि में परम उच्च होकर अपनी प्रचंड आग्नेय किरणों से पृथ्वी को तपाते हैं तब वायुमंडल से आर्द्रता (स्निग्धता) समाप्त होने लगती है और शुष्कता (Rukshata) का साम्राज्य स्थापित होता है।
आयुर्वेदीय शरीर-क्रिया विज्ञान के अनुसार, वैशाख मास में अत्यधिक बाहरी गर्मी के कारण मानव शरीर का प्राकृतिक बल (Ojas), स्निग्धता और जल-तत्त्व तेजी से घटने लगता है। इस ऋतु में सूर्य और वायु मिलकर प्राणियों के शारीरिक ओज को सोख लेते हैं। इस प्रचंड संधिकाल में शरीर के भीतर त्रिदोषीय असंतुलन-मुख्यतः कफ का पूर्ण शमन, पित्त का तीव्र संचय (Pitta Sanchaya) और वात का प्रकोपन-आरंभ हो जाता है। प्रकृति के इस भीषण तापीय आघात से रक्षा करने, जठराग्नि को बुझने से बचाने और लू (सनस्ट्रोक) से बचने के लिए आयुर्वेद ने वैशाख मास हेतु एक अत्यंत वैज्ञानिक 'ग्रीष्म ऋतुचर्या' (Summer Regimen) का विधान किया है।
| पंचांग व आयुर्वेदिक घटक | शास्त्रीय, जैविक व ऋतुचर्या विवरण |
|---|---|
| मास एवं काल विभाजन | वैशाख मास | आदान काल (उत्तरायण कालीन सौर संचरण) |
| वातावरणीय गुण | उष्ण (Hot), तीक्ष्ण (Sharp), रूक्ष (Dry), लघु (Light) |
| शारीरिक दोष स्थिति | पित्त दोष का संचय (Accumulation of Bile/Heat), वात की वृद्धि, कफ क्षीण |
| जठराग्नि की अवस्था | मन्द जठराग्नि (Hypo-functioning Digestive Fire / अग्नि साद) |
| प्रमुख आहार रस (Tastes) | मधुर (Sweet), तिक्त (Bitter), कषाय (Astringent), शीत वीर्य द्रव्य |
| पूर्णतः वर्जित रस | कटु (Pungent), अम्ल (Sour), लवण (Salty) तथा अत्यधिक उष्ण वीर्य |
| मुख्य पारम्परिक औषधीय आहार | जौ-चने का सत्तू, बेल का शर्बत, आम पना, मट्ठा (छाछ), तरबूज, मिश्री |
| दैनिक जीवनशैली नियम | प्रातः शीतल जल स्नान, दिवास्वप्न का सीमित विधान, सूती वस्त्र, चंदन लेपन |
| अभीष्ट स्वास्थ्य फल | डिहाइड्रेशन से रक्षा, जठराग्नि संतुलन, पित्त शमन, संक्रामक ज्वर मुक्ति |
वैशाख मास में अपने शरीर की रोग-प्रतिरोधक क्षमता (Immunity) को अक्षुण्ण रखने और मौसमी व्याधियों से सुरक्षित रहने हेतु प्रत्येक व्यक्ति को प्रातः काल से ही विशिष्ट आयुर्वेदिक दिनचर्या का पालन करना चाहिए:
जन-सामान्य में यह भ्रांति पाई जाती है कि बाहर जितनी गर्मी होगी, पेट की अग्नि (जठराग्नि) भी उतनी ही प्रदीप्त होगी। परंतु महर्षि चरक ने इसके ठीक विपरीत एक अत्यंत सूक्ष्म शरीर-क्रियात्मक सिद्धांत प्रतिपादित किया है:
शरत्काले च जाते तु दीप्तेऽग्नौ मारुतेऽपि च।
ग्रीष्मे वह्निबले हीने रसादीनां विवर्धनात्॥
वैशाख मास में सनातन परंपरा और आयुर्वेद दोनों ने सत्तू (Roasted Grain Flour) को सर्वोत्कृष्ट प्राण-रक्षक आहार घोषित किया है। सत्तू केवल एक भोजन नहीं, अपितु ग्रीष्म ऋतु की संपूर्ण औषधि है।
सत्तू मुख्य रूप से भुने हुए जौ (Barley) और चने (Bengal Gram) से तैयार किया जाता है:
आयुर्वेद में सत्तू ग्रहण करने के कड़े नियम बताए गए हैं जिनका उल्लंघन करने पर यह लाभ के स्थान पर हानि पहुंचा सकता है:
| घटक | पोषक व औषधीय गुण | शरीर पर होने वाला शारीरिक प्रभाव |
|---|---|---|
| जौ (Barley) | बीटा-ग्लूकेन, शीतल प्रकृति, उच्च घुलनशील फाइबर | आंतों की जलन शांत करना, रक्तचाप नियंत्रण, शीतलता |
| चना (Roasted Gram) | पादप प्रोटीन, आयरन, कैल्शियम, कम ग्लाइसेमिक इंडेक्स | दिनभर ऊर्जा बनाए रखना, मांसपेशियों की कमजोरी दूर करना |
| भुना जीरा व काला नमक | दीपन-पाचन गुण, वातनाशक, सोडियम संतुलन | मंद जठराग्नि को सक्रिय करना, गैस व अफरा रोकना |
| पुदीना व नींबू | सिट्रिक एसिड, मेंथॉल, एंटीऑक्सीडेंट्स | लू से सुरक्षा, यकृत (Liver) की शुद्धि, ताजगी |
आयुर्वेद में फ्रिज के कृत्रिम बर्फ वाले पानी को जठराग्नि का संहारक माना गया है। इसके स्थान पर वैशाख में निम्नलिखित 5 प्राकृतिक शीतल पेयों का सेवन अमृत तुल्य है:
पका हुआ बेल आंतों का परम रक्षक है। इसके गूदे को पानी में मथकर मिश्री और थोड़ा भुना जीरा मिलाकर पीने से आंतों की सूजन (IBS), गर्मी के दस्त और पेट के अल्सर में तत्काल राहत मिलती है। यह आमाशय पर एक स्निग्ध सुरक्षा कवच बना देता है।
कच्चे आम को मंद आंच पर भूनकर अथवा उबालकर उसका गूदा निकाला जाता है। इसमें काला नमक, पुदीना, हींग और भुना जीरा मिलाकर बनाया गया पना शरीर से पसीने द्वारा बहे सोडियम और पोटेशियम को तत्काल रीचार्ज करता है। यह सनस्ट्रोक (लू) का अचूक मारक है।
दही को जल मिलाकर मथने और मक्खन निकालने के बाद जो 'तक्र' बनता है, उसे आयुर्वेद में धरती का अमृत कहा गया है: "तक्रं शक्रस्य दुर्लभम्"। दोपहर के भोजन के अंत में भुना जीरा और सेंधा नमक युक्त मट्ठा पीने से मंद पड़ी जठराग्नि प्रदीप्त होती है और भारीपन नहीं होता।
श्वेत चंदन और खस की जड़ का पानी मस्तिष्क के हाइपोथैलेमस (तापमान नियंत्रक केंद्र) को शांत करता है। यह रक्त में पित्त की अति-उष्णता को मिटाकर त्वचा के चकत्तों, घमौरियों और पेशाब की जलन को दूर करता है।
रात को एक चम्मच सौंफ और आधा चम्मच मिश्री मिट्टी के कुल्हड़ में भिगो दें। प्रातः इसे छानकर पीने से आंतों की तपन, एसिडिटी और मुंह के छालों से शत-प्रतिशत मुक्ति मिलती है।
| समय / प्रहर | अनुशंसित आहार व पेय | क्या न खाएं (वर्जित सूची) |
|---|---|---|
| प्रातः काल (06:00 - 07:00 AM) | उषापान (मटके का जल), भीगी मुनक्का/सौंफ का पानी | चाय, कॉफी, अत्यधिक गर्म काढ़ा |
| अल्पाहार (08:30 - 09:30 AM) | तरबूज, खरबूजा, खीरा, अंकुरित मूंग या जौ की दलिया | समोसा, पकोड़े, पराठे, ब्रेड-बटर |
| मध्याह्न पूर्व (11:00 AM - 12:00 PM) | जौ-चने का सत्तू (नमकीन/मीठा) अथवा बेल का शर्बत | बाजार के कोल्ड ड्रिंक्स, कृत्रिम आइसक्रीम |
| दोपहर का भोजन (01:00 - 02:00 PM) | लौकी, तोरई, परवल की पतली सब्जी, गेहूं-जौ की रोटी, छाछ | उड़द की दाल, बैंगन, अरबी, अत्यधिक लाल मिर्च |
| अपराह्न (04:30 - 05:30 PM) | आम पना, नारियल पानी, मौसमी का ताजा रस | समोसा, चाट-पकोड़ी, पैकेज्ड स्नैक्स |
| रात्रि भोज (07:30 - 08:30 PM) | मूंग दाल की पतली खिचड़ी, दलिया, उबली सब्जियां | मांसाहार, राजमा, छोले, भारी पनीर, दही (रात्रि में) |
| सोते समय (09:30 - 10:00 PM) | मिट्टी के मटके का सामान्य जल, आवश्यकता पर सौंफ दूध | फ्रिज का चिल्ड पानी, खट्टे फल |
वैशाख मास के ये आयुर्वेदिक नियम केवल रोग निवारण का माध्यम नहीं हैं बल्कि यह उस सनातन सत्य का साक्षात्कार हैं कि "पहला सुख निरोगी काया"।
शरीर ही वह साधन है जिसके माध्यम से हम धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष की साधना करते हैं: "शरीरमाद्यं खलु धर्मसाधनम्"। जब हमारा शरीर ग्रीष्म ऋतु के प्रचंड ताप में संतुलित, शीतल और स्वस्थ रहेगा, तभी हमारा मन शांत होगा और हम वैशाख मास की पावन भक्ति, जप और सेवा में अपना ध्यान केंद्रित कर सकेंगे।
आयुर्वेद हमें प्रकृति के विरुद्ध लड़ना नहीं सिखाता बल्कि प्रकृति की लय (Rhythm) के साथ तालमेल बिठाकर जीना सिखाता है। वैशाख के आहार नियमों को अपनाकर हम अपनी जठराग्नि की रक्षा करें, सत्तू और शीतल पेय से अपने शरीर को ऊर्जावान रखें और इस पावन महीने में तन और मन दोनों को शीतल बनाकर आध्यात्मिक आनंद का अनुभव करें।
वैशाख मास में जठराग्नि क्यों कमजोर हो जाती है?
अत्यधिक बाहरी तापमान के कारण शरीर अपनी आंतरिक ऊर्जा को त्वचा की ओर मोड़ देता है ताकि पसीने से शरीर ठंडा रह सके, जिससे आमाशय में पाचक रसों का स्राव घट जाता है और जठराग्नि मंद हो जाती है।
वैशाख मास में सत्तू खाने का सबसे सही समय और तरीका क्या है?
सत्तू सदैव दिन के समय (प्रातः 10 बजे से दोपहर 1 बजे तक) पानी में पतला घोलकर, जीरा-नमक अथवा मिश्री मिलाकर पीना चाहिए; रात्रि में इसका सेवन पूर्णतः वर्जित है।
गर्मी में फ्रिज का पानी पीने से आयुर्वेद क्यों मना करता है?
फ्रिज का अत्यधिक ठंडा पानी पेट की जठराग्नि को अचानक बुझा देता है, रक्त नलिकाओं को सिकोड़ता है, कब्ज पैदा करता है और गले व फेफड़ों में कफ का अवरोध उत्पन्न करता है।
लू (सनस्ट्रोक) से बचने के लिए कौन-सा प्राकृतिक पेय सबसे लाभकारी है?
भुने हुए कच्चे आम का पना, जिसमें पुदीना और भुना जीरा मिला हो, लू से बचाव और शरीर में लवणों की आपूर्ति के लिए सर्वोत्तम है।
वैशाख में कौन-से तीन रस (Tastes) आहार में प्रमुख होने चाहिए?
वैशाख में मधुर (मीठा), तिक्त (कड़वा/नीम आदि) और कषाय (हल्का कसैला) रस प्रधान आहार लेना चाहिए; तीखा, खट्टा और अत्यधिक नमकीन भोजन वर्जित है।
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