By पं. नरेंद्र शर्मा
वैशाख पूर्णिमा, बुद्ध त्रिविध पावन काल, चार आर्य सत्य, अष्टांगिक मार्ग, पीपल पूजन और खीर भोग

सनातन वैदिक पंचांग, बौद्ध परंपरा, निर्णयसिंधु और स्कंद पुराण के 'वैशाख माहात्म्य' के अनुसार वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की अंतिम तिथि यानी वैशाख पूर्णिमा संपूर्ण संवत्सर की सर्वाधिक दिव्य, ऊर्जावान और कल्याणकारी पूर्णिमा तिथियों में शीर्ष स्थान रखती है। सनातन परंपरा में इसे 'पीपल पूर्णिमा' और बौद्ध दर्शन में 'बुद्ध पूर्णिमा' (Vesak / Buddha Purnima) के नाम से जाना जाता है।
खगोलीय दृष्टिकोण से यह वह पावन क्षण होता है जब भुवन भास्कर भगवान सूर्य देव अपनी उच्च राशि मेष (Aries) के अंतिम तेजस्वी अंशों पर विराजमान रहते हैं और मन के कारक चंद्रमा अपनी पूर्ण 16 कलाओं से युक्त होकर विशाखा अथवा अनुराधा नक्षत्र में वृश्चिक/तुला के संधिकाल पर अपनी पूर्णता को प्राप्त करते हैं। विशाखा नक्षत्र के स्वामी देवगुरु बृहस्पति और इंद्राग्नि हैं। सूर्य की प्रखर आत्म-ऊर्जा और पूर्ण चंद्रमा की अमृतमयी किरणें जब पृथ्वी पर एक साथ पड़ती हैं, तो यह जल, वनस्पति और मानव चेतना को आध्यात्मिक आनंद से आप्लावित कर देती हैं।
भगवान तथागत बुद्ध के जीवन के तीन परम ऐतिहासिक और आध्यात्मिक पड़ाव-जन्म (लुम्बिनी), सम्बोधि/ज्ञान प्राप्ति (बोधगया) और महापरिनिर्वाण (कुशीनगर)-इसी वैशाख पूर्णिमा की रात्रि में घटित हुए थे, जिसके कारण इसे 'त्रिविध पावन दिवस' (Thrice-Blessed Day) कहा जाता है। इसके साथ ही सनातन परंपरा में इसी दिन भगवान विष्णु के द्वितीय अवतार कूर्म अवतार का प्राकट्य हुआ था और महर्षि वेदव्यास के वचनानुसार पीपल वृक्ष की विशेष अर्चना की जाती है।
| पंचांग व खगोलीय घटक | शास्त्रीय, ज्योतिषीय व ऐतिहासिक विवरण |
|---|---|
| पावन तिथि व काल | वैशाख मास | शुक्ल पक्ष पूर्णिमा (15वीं तिथि) | अहोरात्र |
| प्रमुख नक्षत्र योग | विशाखा / अनुराधा नक्षत्र (Visakha Nakshatra) |
| खगोलीय स्थिति | सूर्य मेष राशि में, पूर्ण चंद्र विशाखा युक्त | 180° समसप्तक योग |
| सनातन अवतार संबंध | भगवान श्रीहरि विष्णु का द्वितीय 'कूर्म अवतार' (कच्छप प्राकट्य) |
| बौद्ध ऐतिहासिक आयाम | भगवान बुद्ध का त्रिविध पावन काल (जन्म, संबोधि एवं महापरिनिर्वाण) |
| पूज्य पवित्र वृक्ष | अश्वत्थ वृक्ष (पीपल / Ficus religiosa) | बोधिवृक्ष |
| मुख्य धार्मिक कृत्य | पवित्र नदी महास्नान, सत्यनारायण व्रत कथा, दीपदान, जल-कुंभ दान, शील पालन |
| मुख्य भोग व प्रसाद | गाय के दूध की खीर (पायसम), सत्तू, मिश्री, मौसमी फल, पंचामृत |
| अभीष्ट आध्यात्मिक फल | अविद्या व तृष्णा से मुक्ति, पितृ तृप्ति, जन्म-मरण चक्र से शांति, अक्षय पुण्य |
वैशाख पूर्णिमा के पावन अवसर पर आत्म-चेतना के जागरण, सत्यनारायण पूजन और तथागत बुद्ध के धर्मचक्र का स्मरण करने हेतु साधक को ब्रह्म मुहूर्त से ही निम्नलिखित शास्त्रोक्त नियमों का पालन करना चाहिए:
विश्व इतिहास में भगवान गौतम बुद्ध एकमात्र ऐसे महापुरुष हैं जिनके जीवन की तीन सर्वोच्च घटनाएं एक ही चंद्र तिथि-वैशाख पूर्णिमा-पर घटित हुईं:
शाक्य गणराज्य की राजधानी कपिलवस्तु के राजा शुद्धोधन की महारानी मायादेवी जब अपने मायके देवदह जा रही थीं तब मार्ग में मनोरम लुम्बिनी उपवन (वर्तमान नेपाल) में साल वृक्षों के नीचे वैशाख पूर्णिमा के दिन बालक 'सिद्धार्थ' का जन्म हुआ। जन्म लेते ही बालक ने सात कदम बढ़ाए और घोषणा की कि यह उनका अंतिम जन्म है और वे संसार के दुखों के निवारण हेतु अवतरित हुए हैं।
संसार के जरा, व्याधि और मृत्यु के दुखों को देखकर 29 वर्ष की आयु में सिद्धार्थ ने राजमहलों का त्याग कर दिया। 6 वर्षों की कठोर तपस्या के बाद, जब उन्होंने मध्य मार्ग को समझा तब सेनानी की पुत्री सुजाता द्वारा लाई गई खीर का प्राशन किया। इसके उपरांत गया में निरंजना (फल्गु) नदी के तट पर एक पीपल वृक्ष के नीचे ध्यानस्थ हो गए। वैशाख पूर्णिमा की धवल चांदनी रात्रि में उन्हें परम सत्य का साक्षात्कार हुआ, उनकी अविद्या नष्ट हुई और वे सिद्धार्थ से 'बुद्ध' (The Awakened One) बन गए। वह पीपल वृक्ष तब से 'बोधिवृक्ष' कहलाया।
संबोधि प्राप्त करने के बाद 45 वर्षों तक तथागत ने सारनाथ से लेकर संपूर्ण भारतवर्ष में धर्मचक्र प्रवर्तन किया और दुखों से मुक्ति का मार्ग दिखाया। 80 वर्ष की आयु में मल्ल गणराज्य के कुशीनगर में हिरण्यवती नदी के तट पर, दो शाल वृक्षों के मध्य लेटे हुए, वैशाख पूर्णिमा की ही रात्रि में उन्होंने अपने भौतिक शरीर का त्याग कर 'महापरिनिर्वाण' प्राप्त किया।
| जीवन घटना | ऐतिहासिक स्थल | प्राकृतिक साक्षी | आध्यात्मिक उपलब्धि |
|---|---|---|---|
| जन्म (Birth) | लुम्बिनी उपवन (नेपाल) | प्रस्फुटित साल वृक्ष | बोधिसत्व का धराधाम पर अवतरण |
| संबोधि (Enlightenment) | बोधगया (बिहार) | निरंजना तट, पीपल वृक्ष | चार आर्य सत्य व अष्टांगिक मार्ग का साक्षात्कार |
| महापरिनिर्वाण (Passing) | कुशीनगर (उत्तर प्रदेश) | युगल शाल वृक्ष | जन्म-मरण के भवचक्र से शाश्वत मुक्ति |
वैशाख पूर्णिमा की संबोधि में तथागत ने जिस सत्य का साक्षात्कार किया, वह चार आर्य सत्य (Four Noble Truths) और अष्टांगिक मार्ग (Noble Eightfold Path) के रूप में प्रतिष्ठित हुआ:
बुद्ध ने न तो अत्यधिक भोग-विलास का समर्थन किया और न ही शरीर को सुखाने वाली अति-कठोर तपस्या का; उन्होंने वीणा के तारों की भांति 'मध्यम मार्ग' (Middle Path) दिया:
वैदिक और पौराणिक ग्रंथों में वैशाख पूर्णिमा को 'पीपल पूर्णिमा' कहा गया है। पद्म पुराण और स्कंद पुराण के अनुसार, पीपल का वृक्ष संपूर्ण ब्रह्मांड का लघु रूप है:
अश्वत्थाय वरेण्याय सर्वपापप्रणाशिने।
त्रिदेवरूपिणे तुभ्यं नमो वृक्षाय पावनाय॥
वैशाख पूर्णिमा के दिन घर-घर में भगवान सत्यनारायण की कथा का श्रवण और पूजन किया जाता है:
वैशाख पूर्णिमा का महापर्व मानव सभ्यता को सनातन और बौद्ध दर्शन का सर्वोच्च संदेश देता है: "अपने भीतर का प्रकाश स्वयं बनो (अप्प दीपो भव / Be a light unto yourself)।"
संसार के सारे अंधकार बाहर के दीपकों से नहीं मिट सकते; जब तक मनुष्य के भीतर प्रज्ञा (विवेक), शील (सदाचार) और करुणा (दया) का दीप नहीं जलता तब तक वह दुखों के भवसागर में भटकता रहेगा।
भगवान बुद्ध का त्याग और सनातन धर्म का पीपल पूजन हमें यह सिखाते हैं कि प्रकृति का सम्मान, समस्त प्राणियों के प्रति अकारण करुणा और मन की समता ही जीवन का परम ध्येय है।
आइए, वैशाख पूर्णिमा के इस पावन त्रिविध दिवस पर हम अपने अहंकार और तृष्णा का विसर्जन करें, सत्य और अहिंसा के मार्ग पर चलें और अपने जीवन को प्रेम और प्रज्ञा के दिव्य प्रकाश से आलोकित करें।
वैशाख पूर्णिमा को बुद्ध पूर्णिमा क्यों कहा जाता है?
क्योंकि इसी पावन तिथि पर भगवान गौतम बुद्ध का जन्म (लुम्बिनी), ज्ञान प्राप्ति (बोधगया) और महापरिनिर्वाण (कुशीनगर) संपन्न हुआ था।
वैशाख पूर्णिमा को सनातन धर्म में 'पीपल पूर्णिमा' क्यों कहते हैं?
क्योंकि इस दिन त्रिदेवों (ब्रह्मा, विष्णु, शिव) के साक्षात स्वरूप पीपल के वृक्ष की विशेष पूजा, जल-सिंचन और परिक्रमा की जाती है, जिससे पितृ तृप्त होते हैं।
भगवान बुद्ध द्वारा प्रतिपादित चार आर्य सत्य कौन-से हैं?
चार आर्य सत्य हैं: दुःख है, दुःख का कारण (तृष्णा) है, दुःख का अंत (निरोध) संभव है और दुःख निवारण का अष्टांगिक मार्ग है।
वैशाख पूर्णिमा के दिन किस विशेष नैवेद्य का भोग लगाया जाता है?
इस दिन मुख्य रूप से गाय के दूध की खीर (पायसम), सत्तू, मिश्री, मौसमी फल (खरबूजा, तरबूज) और पंचामृत का भोग लगाया जाता है।
वैशाख पूर्णिमा के दिन दीपदान का क्या महत्व है?
पूर्णिमा की संध्या को पवित्र नदियों, जलाशयों अथवा पीपल के समीप दीपदान करने से अज्ञानांधकार दूर होता है, पितृ-दोष शांत होता है और घर में सुख-समृद्धि का वास होता है।
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