By पं. नीलेश शर्मा
वैशाख कृष्ण चतुर्थी, विकट अवतार, कामासुर वध, 21 दूर्वा अर्पण, चंद्र अर्घ्य मंत्र व बुध-केतु शांति

सनातन वैदिक पंचांग, गणेश पुराण के 'उपासना खंड', मुद्गल पुराण तथा निर्णयसिंधु के अनुसार वैशाख मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि को 'विकट संकष्टी चतुर्थी' (Vikata Sankashti Chaturthi) के नाम से जाना जाता है। संकष्टी का शाब्दिक अर्थ है-"संकटों का हरण करने वाली"। यह पावन व्रत प्रत्येक मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को रखा जाता है, परंतु वैशाख मास में पड़ने वाली संकष्टी चतुर्थी का आध्यात्मिक और मनोवैज्ञानिक महत्व अद्वितीय है।
खगोलीय और ज्योतिषीय दृष्टिकोण से वैशाख मास वह कालखंड है जब भुवन भास्कर भगवान सूर्य देव अपनी परम उच्च राशि मेष (Aries) में संचरण करते हैं। मेष राशि एक चर-अग्नि तत्वीय राशि है, जिसके स्वामी मंगल ग्रह हैं। जब सूर्य और मंगल की सम्मिलित आग्नेय ऊर्जा संपूर्ण वातावरण को तपा रही होती है तब कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि को चंद्रमा ज्येष्ठा अथवा मूल नक्षत्र के प्रभाव में आकर वृश्चिक/धनु राशि में संचरण करता है। ज्योतिष में चतुर्थी तिथि को 'रिक्ता' तिथि माना गया है, जिसके स्वामी साक्षात विघ्नहर्ता भगवान श्री गणेश हैं। ग्रीष्म ऋतु के इस प्रचंड संधिकाल में जब बाह्य ताप के कारण मानव मस्तिष्क में आलस्य, अधीरता, मानसिक भटकाव और काम-वासना के विकार जाग्रत होने लगते हैं तब भगवान गणेश के 'विकट' स्वरूप की उपासना बुद्धि को अचल स्थिरता, इंद्रिय-निग्रह और लक्ष्यभेदी एकाग्रता प्रदान करती है।
| पंचांग व साधना घटक | शास्त्रीय, ज्योतिषीय व पौराणिक विवरण |
|---|---|
| विहित तिथि व कालखंड | वैशाख मास | कृष्ण पक्ष चतुर्थी (4th Lunar Day) | चंद्रोदय व्यापिनी |
| सौर खगोलीय स्थिति | सूर्य देव का मेष राशि में परम उच्च संचरण (चर-अग्नि तत्व) |
| मुख्य आराध्य स्वरूप | भगवान श्री गणेश का 'विकट' अवतार (कामासुर-मर्दन स्वरूप) |
| दिव्य वाहन | मयूर (मोर / Peacock) | सौंदर्य, संयम और विष-शमन का प्रतीक |
| मुख्य अर्चन द्रव्य | 21 दूर्वा दल (दूर्वांकुर), लाल सिंदूर, मोदक, लाल गुड़हल पुष्प, श्वेत मदार |
| विशिष्ट व्रत नियम | दिनभर पूर्ण उपवास/फलाहार | रात्रि में चंद्र दर्शन व अर्घ्य के पश्चात पारण |
| ज्योतिषीय ग्रह शमन | बुध (बुद्धि व वाणी) और केतु (मोक्ष व आकस्मिक बाधा निवारण) का संतुलन |
| संबद्ध पौराणिक प्रसंग | मुद्गल पुराण वर्णित कामासुर वध एवं देवों को काम-विकार से मुक्ति |
| अभीष्ट फल | भीषण संकटों से मुक्ति, बुद्धि की कुशाग्रता, काम-वासना शमन, व्यापारिक उन्नति |
वैशाख कृष्ण विकट संकष्टी चतुर्थी के व्रत का पूर्ण आध्यात्मिक फल प्राप्त करने तथा विघ्नों के समूल नाश हेतु साधक को ब्रह्म मुहूर्त से ही निम्नलिखित शास्त्रोक्त नियमों का निष्ठापूर्वक पालन करना चाहिए:
मुद्गल पुराण के अनुसार, भगवान श्री गणेश ने विभिन्न युगों में असुरों का संहार करने और धर्म की रक्षा हेतु आठ प्रमुख अवतार (अष्टविनायक स्वरूप) धारण किए। इनमें से भगवान का छठा दिव्य अवतार 'विकट अवतार' कहलाता है:
प्राचीन काल में जब भगवान शिव और माता पार्वती के विवाह के उपरांत भगवान शिव के मन में काम-भाव का उदय हुआ तब उस क्षण से एक अत्यंत बलशाली दैत्य उत्पन्न हुआ, जिसका नाम 'कामासुर' रखा गया:
समस्त पीड़ित देवताओं ने महर्षि मुद्गल की शरण ली। महर्षि मुद्गल ने देवताओं को भगवान गणेश के एकाक्षर मंत्र 'गं' की गुप्त साधना का उपदेश दिया:
संकष्टी चतुर्थी की पूजा में दूर्वा (दूब घास) और चंद्र दर्शन का विशेष शास्त्रीय विधान है, जो गहन प्राकृतिक विज्ञान पर आधारित है:
| पूजन घटक | प्रयुक्त सामग्री | आध्यात्मिक व जैविक प्रभाव |
|---|---|---|
| 21 दूर्वा दल | हरी ताजी दूब घास की गांठें | पित्त का शमन, 21 तत्वों की शुद्धि, बुद्धि में स्थिरता |
| लाल सिंदूर | शुद्ध पारा युक्त सिंदूर | आज्ञा चक्र का जागरण, नकारात्मक ऊर्जा से रक्षा |
| मोदक / लड्डू | चना दाल, गुड़ व नारियल युक्त | तृप्ति का कारक, गुरु व मंगल का तात्विक समन्वय |
| चंद्र अर्घ्य | कच्चा दूध, अक्षत, जल व चंदन | मानसिक शांति, अनिद्रा का नाश, चंद्र दोष शमन |
विकट संकष्टी चतुर्थी पर मध्याह्न व सांध्यकाल में निम्नलिखित मंत्रों का जप करना विघ्न-निवारण हेतु अचूक है:
विकटाय नमस्तुभ्यं कामासुरनिघातिने।
मयूरवाहनायैव विघ्नहर्त्रे नमो नमः॥
सर्वकामप्रदायैव बुद्धिदाय शुभप्रद।
त्राहि मां सर्वपापेभ्यः संकटेभ्यो महेश्वर॥
कम से कम 108 बार रुद्राक्ष अथवा रक्त चंदन की माला से जप करें:
ॐ गं गणपतये नमः॥
अथवा
ॐ वक्रतुण्डाय हुम्॥
रात्रि में चंद्रोदय के समय तांबे/चांदी के पात्र से तीन बार अर्घ्य देते हुए कहें:
क्षीरोदार्णवसंभूत अत्रिनेत्रसमुद्भव।
गृहाणार्घ्यं शशाङ्केश रोहिणीसहितो मम॥
ज्योत्स्नापते नमस्तुभ्यं ज्योतिषां पतये नमः।
नमस्ते रोहिणीकान्त सुधावास नमोऽस्तु ते॥
वैदिक ज्योतिष में भगवान श्री गणेश समस्त विद्या, बुद्धि, व्यापार और मोक्ष के सर्वोच्च अधिपति हैं:
| ग्रह / दोष | कुंडली में नकारात्मक प्रभाव | विकट संकष्टी व्रत से समाधान |
|---|---|---|
| बुध ग्रह दोष | व्यापार में घाटा, स्मरण शक्ति का ह्रास, हकलाना | बुद्धि की कुशाग्रता, वाणी में ओज, व्यापार में अकूत लाभ |
| केतु ग्रह पीड़ा | आकस्मिक दुर्घटना भय, त्वचा रोग, मानसिक भ्रम | गुप्त शत्रुओं का नाश, आकस्मिक विघ्नों से रक्षा, मोक्ष |
| मांगलिक / अंगारक दोष | अत्यधिक क्रोध, दांपत्य कलह, रक्त विकार | मंगल की उग्रता शांत होकर साहसी पराक्रम में रूपांतरण |
| रिक्ता तिथि दोष | कार्यों में बार-बार असफलता, ऋण का बोझ | रुके हुए कार्यों की सिद्धि, आर्थिक समृद्धि, संकट हरण |
विकट संकष्टी चतुर्थी का पावन पर्व मानव चेतना को सनातन दर्शन का सबसे गहन और व्यावहारिक मनोवैज्ञानिक सत्य सिखाता है:
"संसार का सबसे बड़ा संकट कोई बाहरी शत्रु नहीं है; मनुष्य के भीतर का अनियंत्रित काम, वासना और वासना-जनित भटकाव ही वास्तविक 'कामासुर' है।"
जब मनुष्य अपनी इंद्रियों का दास बन जाता है, तो उसकी बुद्धि, विवेक और आध्यात्मिक तेज नष्ट हो जाते हैं। भगवान गणेश का 'विकट' स्वरूप हमें यह स्मरण कराता है कि केवल कठोर तप और आत्म-संयम के बल पर ही आंतरिक वासनाओं पर विजय प्राप्त की जा सकती है।
मयूर पर सवार भगवान विकट यह संदेश देते हैं कि जिस प्रकार मोर विषैले सर्पों को निगलकर भी सुंदर रहता है, उसी प्रकार एक सच्चा साधक संसार के विषैले विकारों को अपने विवेक की अग्नि में भस्म कर जीवन को दिव्य बनाता है।
आइए, वैशाख कृष्ण चतुर्थी के इस पावन दिन पर हम भगवान विकट विनायक के चरणों में नतमस्तक हों, 21 दूर्वा दल अर्पित कर अपने समस्त आंतरिक और बाह्य संकटों का विसर्जन करें और चंद्रमा को अर्घ्य देकर अपने जीवन को शांति और प्रज्ञा के प्रकाश से आलोकित करें।
विकट संकष्टी चतुर्थी किस तिथि को मनाई जाती है?
यह व्रत प्रतिवर्ष वैशाख मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि को मनाया जाता है।
भगवान गणेश के 'विकट' अवतार का मुख्य उद्देश्य क्या था?
मुद्गल पुराण के अनुसार भगवान गणेश ने मयूर पर सवार होकर समस्त लोकों को अनियंत्रित काम-वासना के बंधन में बांधने वाले दैत्य 'कामासुर' का मर्दन करने हेतु विकट अवतार धारण किया था।
संकष्टी चतुर्थी पर चंद्रमा को अर्घ्य देना क्यों अनिवार्य माना गया है?
क्योंकि चंद्रमा मन का कारक है और चतुर्थी तिथि रिक्ता होने से मन चंचल होता है; रात्रि में चंद्र अर्घ्य देने से मानसिक तनाव मिटता है और व्रत पूर्ण माना जाता है।
भगवान गणेश को 21 दूर्वा दल ही क्यों अर्पित किए जाते हैं?
दूर्वा अमृतमयी और शीतल होती है; 21 दूर्वा मनुष्य के 21 मूल तत्वों (ज्ञानेंद्रियां, कर्मेंद्रियां, महाभूत, प्राण व अंतःकरण) के समर्पण का प्रतीक हैं, जो समस्त संतापों को शांत करती हैं।
ज्योतिषीय दृष्टि से विकट संकष्टी चतुर्थी का व्रत किन ग्रहों को शांत करता है?
यह व्रत मुख्य रूप से बुध (बुद्धि व व्यापार) और केतु (बाधा निवारण व मोक्ष) को बलवान करता है तथा सूर्य-मंगल जनित अंगारक दोष को शांत करता है।
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