By पं. सुव्रत शर्मा
वृषभ संक्रांति खगोल विज्ञान, रोहिणी नक्षत्र प्रवेश, नौतपा रहस्य, 12 राशियों पर प्रभाव और महादान

सनातन वैदिक पंचांग, सूर्य सिद्धांत तथा निर्णयसिंधु के अनुसार जब ग्रहों के राजा भुवन भास्कर भगवान सूर्य देव अपनी उच्च राशि मेष (Aries) से निकलकर दैत्यगुरु शुक्र की स्थिर व पृथ्वी-तत्वीय राशि वृषभ (Taurus) में प्रवेश करते हैं, तो इस खगोलीय संक्रमण को 'वृषभ संक्रांति' (Vrishabha Sankranti) कहा जाता है। यह संक्रांति वैशाख मास के उत्तरार्ध अथवा ज्येष्ठ मास के आरंभिक संधिकाल में, ग्रेगोरियन कैलेंडर के अनुसार प्रतिवर्ष 14 या 15 मई के आसपास घटित होती है।
खगोलीय और तात्विक दृष्टि से वृषभ संक्रांति अत्यंत महत्वपूर्ण संक्रमण काल है। सूर्य देव चर-अग्नि तत्व (मेष) से निकलकर स्थिर-पृथ्वी तत्व (वृषभ) में प्रवेश करते हैं। इस संक्रांति के कुछ ही दिनों बाद जब सूर्य देव चंद्रमा के प्रिय रोहिणी नक्षत्र में गोचर करते हैं तब ग्रीष्म ऋतु का सबसे भयानक और तप्त कालखंड आरंभ होता है, जिसे लोकभाषा में 'नौतपा' (Nautapa) कहा जाता है। सूर्य के इस गोचर से वातावरण में भीषण उमस, भूमिगत जल का वाष्पीकरण और ग्रीष्मकालीन वायु का वेग बढ़ जाता है। धर्मशास्त्रों के अनुसार संक्रांति के समय किया गया स्नान, गोदान, जल-कुंभ दान और पितरों के निमित्त तर्पण अक्षय फल प्रदान करता है तथा सूर्य जनित समस्त ताप व ग्रह-दोषों का शमन करता है।
| पंचांग व खगोलीय घटक | शास्त्रीय, ज्योतिषीय व मौसमी विवरण |
|---|---|
| संक्रांति संज्ञा | वृषभ संक्रांति (Vrishabha Sankranti) |
| खगोलीय सौर संक्रमण | सूर्य देव का मेष राशि से वृषभ राशि में प्रवेश (Sun enters Taurus) |
| राशि स्वामी व तत्व | शुक्र देव (Venus) | स्थिर-पृथ्वी तत्व (Fixed Earth Sign) |
| नक्षत्र संचरण व प्रभाव | कृतिका से रोहिणी नक्षत्र में प्रवेश | 'नौतपा' का आगमन |
| संक्रांति पुण्य काल | संक्रांति क्षण से 16 घटी (लगभग 6 घंटे 24 मिनट) पूर्व और पश्चात |
| मुख्य आराध्य देव | भगवान सूर्य नारायण, भगवान शिव (ऋषभ रूप) एवं कामधेनु गौमाता |
| प्राथमिक दान सामग्री | शीतल जल से भरा घड़ा, सत्तू, पंखा, छाता, खरबूजा, गौ-ग्रास |
| प्रमुख आध्यात्मिक कृत्य | तीर्थ स्नान, सूर्य अर्घ्य, पितृ तर्पण, गोदान एवं आदित्य हृदय स्तोत्र पाठ |
| अभीष्ट फल | सूर्य दोष शांति, आरोग्य लाभ, पितृ तृप्ति, धन-धान्य वृद्धि, ताप से रक्षा |
वृषभ संक्रांति के पावन अवसर पर पुण्य काल का लाभ उठाने तथा सूर्य नारायण की कृपा प्राप्त करने हेतु साधक को निम्नलिखित शास्त्रोक्त नियमों का निष्ठापूर्वक पालन करना चाहिए:
वृषभ संक्रांति के पश्चात जब सूर्य वृषभ राशि में 10° से 23°20' के मध्य संचरण करते हैं, तो वे रोहिणी नक्षत्र में प्रवेश करते हैं:
रोहिणी नक्षत्र के अधिपति स्वयं चंद्रमा और प्रजापति ब्रह्मा हैं। चंद्रमा शीतल जल तत्त्व का प्रतिनिधित्व करते हैं, जबकि सूर्य प्रचंड अग्नि तत्त्व हैं।
भारतीय मौसम विज्ञान और वाराहमिहिर कृत 'बृहत्संहिता' के अनुसार, नौतपा का प्रचंड तपना आने वाले वर्षा ऋतु के लिए परम आवश्यक होता है:
| नौतपा घटक | ज्योतिषीय व मौसमी आधार | प्रकृति व मानव जीवन पर प्रभाव |
|---|---|---|
| सूर्य-रोहिणी युति | अग्नि व जल तत्त्व का संघर्ष | चरम ग्रीष्म, जलस्रोतों का तीव्र वाष्पीकरण |
| निम्न वायुदाब निर्माण | भूमि का अत्यधिक तपना | मानसूनी पवनों का आकर्षण, उत्तम वर्षा की भूमिका |
| नौतपा का तपना | 9 दिनों तक प्रचंड धूप | फसलों के बीजों की शुद्धि, कीट-पतंगों का प्राकृतिक नाश |
| नौतपा का गलना | समयपूर्व वर्षा/आंधी | मौसम चक्र में असंतुलन, आगामी अनावृष्टि की आशंका |
स्कंद पुराण के 'काशी खंड' और मत्स्य पुराण के अनुसार संक्रांति के पुण्य काल में किया गया दान साधक को जन्मांतरों तक दरिद्रता से मुक्त रखता है:
सूर्य के वृषभ राशि में प्रवेश का प्रभाव सभी 12 राशियों के जातकों के जीवन, करियर और स्वास्थ्य पर विभिन्न रूपों में पड़ता है:
वृषभ संक्रांति का यह खगोलीय पर्व मानव जीवन को प्रकृति का एक शाश्वत सत्य सिखाता है:
"अग्नि की गतिशीलता आवश्यक है, परंतु पृथ्वी की स्थिरता और सहनशीलता के बिना कोई भी सृजन संभव नहीं है।"
वृषभ राशि बैल (ऋषभ) का प्रतीक है, जो कठोर परिश्रम, धैर्य और मौन रहकर भार उठाने का परिचायक है। सूर्य का वृषभ में आना हमें यह संदेश देता है कि जीवन में जब भी कठिनाइयों और प्रतिकूलताओं की भीषण धूप (तपन) आए, तो विचलित होने के बजाय पृथ्वी की भांति स्थिर, गंभीर और सहनशील बने रहें।
तपकर ही सोना कुंदन बनता है और तपकर ही ग्रीष्म की धरती आने वाले वर्षा काल में हरियाली का उत्सव मनाती है।
आइए, वृषभ संक्रांति के इस पावन पर्व पर हम भगवान सूर्य नारायण को नमन करें, प्रकृति के इस मौसम परिवर्तन को सहज स्वीकार करें, जल-संरक्षण का संकल्प लें और दीन-दुखियों की सेवा कर पुण्य के भागी बनें।
वृषभ संक्रांति किसे कहते हैं और यह कब होती है?
जब सूर्य देव मेष राशि से निकलकर वृषभ राशि में प्रवेश करते हैं, तो इसे वृषभ संक्रांति कहते हैं; यह प्रतिवर्ष 14 या 15 मई के आसपास घटित होती है।
वृषभ संक्रांति के बाद 'नौतपा' कब आरंभ होता है?
वृषभ राशि में गोचर करते हुए जब सूर्य देव रोहिणी नक्षत्र में प्रवेश करते हैं तब उसके प्रथम 9 दिनों को 'नौतपा' कहा जाता है, जिसमें भीषण गर्मी पड़ती है।
नौतपा का तपना अच्छी वर्षा के लिए क्यों आवश्यक माना जाता है?
वैज्ञानिक और ज्योतिषीय दृष्टि से अत्यधिक गर्मी से निम्न वायुदाब का क्षेत्र बनता है, जो समुद्र से मानसूनी हवाओं को खींचकर लाता है और उत्तम वर्षा का आधार बनता है।
वृषभ संक्रांति के दिन किन वस्तुओं का दान करना सर्वाधिक पुण्यदायी है?
इस दिन शीतल जल से भरा मिट्टी का नया घड़ा (कुंभ), खरबूजा, तरबूज, जौ का सत्तू, हाथ का पंखा, छाता और गाय के लिए हरा चारा दान करना सर्वश्रेष्ठ माना गया है।
वृषभ संक्रांति पर सूर्य के अशुभ प्रभाव से बचने के लिए किस स्तोत्र का पाठ करना चाहिए?
इस दिन भगवान सूर्य देव की कृपा प्राप्त करने और स्वास्थ्य रक्षा हेतु 'आदित्य हृदय स्तोत्र' का पाठ करना परम लाभकारी माना गया है।
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