By पं. नरेंद्र शर्मा
योगिनी दशा क्या है, आठ योगिनियों का महत्व, चंद्र आधारित गणना, योगिनी दशा के प्रभाव और कठिन काल में उपाय की विस्तृत व्याख्या

ज्योतिष की दुनिया में बहुत लोग यह जानते हैं कि विंशोत्तरी महादशा कितनी कारगर है, पर वही लोग अक्सर यह पूछते हैं कि योगिनी दशा क्या है और इसे इतना खास क्यों माना जाता है। जीवन की घटनाएँ कई बार बहुत तेज और लगातार बदलती हैं, ऐसे समय में योगिनी दशा का प्रभाव साफ देखा जा सकता है।
योगिनी दशा को वर्तमान युग के लिए अत्यंत प्रभावी समय प्रणाली माना गया है। इसका पूरा चक्र केवल 36 वर्ष का होता है, जबकि विंशोत्तरी दशा 120 वर्षों का है। छोटी अवधि होने की वजह से योगिनी दशा अक्सर तेज और स्पष्ट घटना संकेत देती है। चंद्रमा जिस नक्षत्र में जन्म के समय स्थित हो, वही इस पूरी प्रणाली की नींव बनता है।
जो व्यक्ति यह समझना चाहता है कि उसकी वर्तमान स्थिति पर कौन सा सूक्ष्म समय प्रभाव डाल रहा है, उसके लिए योगिनी दशा के प्रभाव समझना बहुत उपयोगी हो सकता है। इसी पर आगे पूरा लेख विस्तार से बात करेगा।
योगिनी दशा का पूरा चक्र 36 वर्षों का माना जाता है, जिसमें कुल आठ योगिनी आती हैं। हर योगिनी की अवधि अलग है और हर योगिनी का एक ग्रह स्वामी होता है। ये सभी ग्रह वही नौ ग्रह हैं, जिनसे संपूर्ण वैदिक ज्योतिष का ढांचा खड़ा होता है।
नीचे सारणी में आठों योगिनी दशाओं का क्रम, स्वामी ग्रह और अवधि एक साथ रखा गया है।
| योगिनी | स्वामी ग्रह | अवधि (वर्ष) | सामान्य स्वभाव |
|---|---|---|---|
| मंगला | चंद्र | 1 | सुख, संबंध, भावुकता, आकर्षण |
| पिंगला | सूर्य | 2 | संघर्ष, अहं, अधिकार, परीक्षा |
| धान्या | गुरु | 3 | धन, सुख, विस्तार, अवसर |
| भ्रामरी | मंगल | 4 | यात्रा, अस्थिरता, साहस, टकराव |
| भद्रिका | बुध | 5 | सम्मान, संपर्क, बुद्धि, प्रगति |
| उल्का | शनि | 6 | चुनौती, देरी, अनुशासन, कठोर अनुभव |
| सिद्धा | शुक्र | 7 | सुख, संबंध, उन्नति, शुभ समाचार |
| संकटा | राहु | 8 | कठिन परीक्षा, भ्रम, बदलाव |
इन आठों योगिनियों की उपदशाएँ भी होती हैं, जिन्हें अंतर्दशा कहा जाता है। इसलिए किसी भी समय जीवन में दो स्तर पर समय काम करता है। मुख्य योगिनी दशा और उसके भीतर चल रही योगिनी अंतर्दशा। यही संयोजन तय करता है कि योगिनी दशा के प्रभाव शुभ रहें या मिलाजुला अनुभव दें।
योगिनी दशा पूरी तरह चंद्रमा की स्थिति पर आधारित होती है, इसलिए चंद्रमा को इस प्रणाली का केंद्र माना जा सकता है। जन्म के समय चंद्रमा जिस नक्षत्र में होता है, उसी के आधार पर प्रारम्भिक योगिनी दशा तय की जाती है।
चंद्रमा मन, भावनाएँ और दिनचर्या की प्रतिक्रिया को दर्शाता है। जब समय की पूरी प्रणाली इसी आधार पर बनी हो, तो स्पष्ट है कि योगिनी दशा मन के स्तर पर बहुत तेज असर देती है। व्यक्ति अपने भीतर बदलाव को जल्दी महसूस करता है, चाहे घटना छोटी हो या बड़ी।
इसीलिए जो लोग बार बार पूछते हैं कि क्या योगिनी दशा सटीक होती है, उनके लिए एक सरल उत्तर यह है कि यदि चंद्रमा की भूमिका और नक्षत्रों की स्थिति को सही तरह से समझा जाए, तो योगिनी दशा जीवन की सूक्ष्म दिशा को बहुत अच्छी तरह दिखा सकती है। केवल तारीखें नहीं बल्कि अनुभव का स्वाद बदल जाता है।
अब एक एक योगिनी दशा की प्रकृति को उस भाषा में समझ लेते हैं, जो जीवन की जमीन पर महसूस होती है। ध्यान रहे कि यह सामान्य संकेत हैं। असली परिणाम हमेशा पूरी कुंडली, अन्य दशा और गोचर के साथ देखे जाते हैं।
मंगला योगिनी पूरी श्रृंखला की पहली दशा मानी जाती है और इसकी अवधि 1 वर्ष की होती है। इसका स्वामी ग्रह चंद्र है। इस दशा को शास्त्रों में अक्सर मंगलकारी बताया गया है, क्योंकि यह जीवन में सौम्यता, आकर्षण और भावनात्मक संतुलन लाने की क्षमता रखती है।
इस समय में व्यक्ति को भौतिक सुख, घर परिवार की सुविधाएँ और संबंधों में निकटता का अनुभव हो सकता है। विपरीत लिंग की ओर आकर्षण बढ़ सकता है, विवाह के योग मजबूत हो सकते हैं या पहले से चले संबंध में और गहराई आ सकती है। यदि मंगला दशा के साथ शुभ अंतर्दशा भी जुड़ी हो तो यह वर्ष कई इच्छाओं की पूर्ति करा सकता है।
साथ ही, चंद्रमा के कारण मन अधिक संवेदनशील भी हो सकता है। इसलिए छोटी बातों पर भी मन प्रभावित होता है। जिनकी कुंडली में चंद्र कमजोर हो, उन्हें इस समय भावनात्मक संतुलन पर अधिक ध्यान रखने की जरूरत रहती है।
उपाय और संकेत
पिंगला योगिनी दशा क्रम में दूसरे स्थान पर आती है और इसकी अवधि 2 वर्ष की होती है। इसका स्वामी ग्रह सूर्य है, जिसे क्रूर ग्रह माना जाता है, पर वही दीर्घकालिक दृष्टि और आत्मबल भी देता है।
इस योगिनी दशा में अक्सर व्यक्ति को संघर्ष की स्थितियाँ, सम्मान की परीक्षा, अहं से जुड़ी स्थितियाँ और अधिकार के टकराव देखने पड़ सकते हैं। शारीरिक थकान, मन में द्वंद, धन हानि, जमीन से जुड़े विवाद या घर परिवार से कुछ दूरी जैसा अनुभव बन सकता है। दो वर्ष की पूरी अवधि एक समान नहीं रहती, क्योंकि भीतर अंतर्दशा के स्तर पर शुभ और अशुभ योगिनियाँ आ जा सकती हैं।
इस समय का बड़ा सबक यह रहता है कि निर्णय बिना सोचे न लिए जाएँ। आवेश में किए गए काम धन हानि या रिश्तों में खटास ला सकते हैं। सूर्य पुरुष का प्रतीक है, इसलिए पिता या घर के पुरुष सदस्यों की सेहत और परिस्थितियों पर विशेष ध्यान देना उपयोगी है।
उपाय और संकेत
धान्या योगिनी तीसरी दशा है। इसकी अवधि 3 वर्ष की होती है और स्वामी ग्रह गुरु है। नाम से स्पष्ट है कि यह दशा व्यक्ति के जीवन में कई प्रकार की समृद्धि, सुविधा और अवसर ला सकती है।
जब धान्या दशा सक्रिय होती है तब अक्सर पुराने रुके कार्य गति पकड़ते हैं। व्यापार में वृद्धि, करियर में तरक्की, आय का बढ़ना, नई जिम्मेदारी और सम्मान जैसे संकेत दिखाई दे सकते हैं। जो लोग लंबे समय से नौकरी की तलाश में हों, उन्हें इस अवधि में उपयुक्त अवसर मिलने की संभावना बढ़ जाती है, बशर्ते कुंडली का बाकी भाग सहयोग कर रहा हो।
भाग्य का अच्छा होना केवल आकस्मिक लाभ नहीं है। इस दशा की अच्छी अंतर्दशाएँ व्यक्ति को अंदर से भी सकारात्मक बनाती हैं। यात्रा, लोगों से सहयोग, विचारों का विस्तार और धार्मिक या आध्यात्मिक रुचि में भी बढ़ोतरी देखी जा सकती है।
उपाय और संकेत
भ्रामरी योगिनी चौथी दशा है, अवधि 4 वर्ष और स्वामी मंगल। इसका नाम ही संकेत देता है कि यह समय अक्सर भ्रमण और हलचल से भरा हो सकता है।
इस दशा में व्यक्ति देश विदेश की यात्राएँ कर सकता है। कई बार ये यात्राएँ लाभकारी होंगी, कई बार थकाने वाली। हर यात्रा का परिणाम एक जैसा शुभ हो, यह जरूरी नहीं। कभी वित्तीय हानि, कभी संबंधों में दूरी और कभी कामकाज से जुड़े तनाव भी पैदा हो सकते हैं।
मंगल के प्रभाव से नौकरी या कार्यक्षेत्र में बदलाव, शहर बदलने की स्थिति या घर से दूर जाकर काम करने की स्थिति बन सकती है। लगातार चुनौतियों के कारण स्वभाव चिड़चिड़ा या विवादप्रिय भी हो सकता है, यदि व्यक्ति अपनी ऊर्जा को सही दिशा में न लगाए।
उपाय और संकेत
भद्रिका योगिनी पांचवीं दशा है, अवधि 5 वर्ष और स्वामी बुध। भद्रिका शब्द ही कल्याण का संकेत देता है। बुध का स्वभाव प्रायः शुभ माना जाता है, इसलिए इस दशा को भी सामान्य रूप से कल्याणकारी समझा जाता है।
इस अवधि में समाज में अच्छा स्थान मिल सकता है। प्रभावशाली व्यक्तियों से संपर्क के अवसर बढ़ सकते हैं। जो लोग संवाद, लेखन, शिक्षा, व्यापार या विश्लेषणात्मक कार्य में हों, उनके लिए यह समय विशेष रूप से उपयोगी हो सकता है।
साथ ही, बुध की चंचलता गलत दिशा भी दे सकती है यदि व्यक्ति गलत संगति या गलत कार्यों की ओर आकर्षित हो जाए। इसलिए यह समय जितना अवसर देता है उतनी ही जागरूकता भी माँगता है।
उपाय और संकेत
उल्का योगिनी छठी दशा है, अवधि 6 वर्ष, स्वामी शनि और स्वभाव चुनौतीपूर्ण। शनि की छाया वाले समय को लोग स्वभाव से ही कठिन मान लेते हैं, पर वही समय जीवन को गहराई से बदल भी सकता है।
इस अवधि में अनेक क्षेत्रों में परीक्षा आ सकती है। काम में बाधा, स्वास्थ्य से जुड़ी चिंताएँ, रिश्तों की कसौटी या आर्थिक दबाव जैसी स्थितियाँ सामने आ सकती हैं। फिर भी यह सच है कि उल्का दशा हमेशा अशुभ नहीं रहती। अंतर्दशा में यदि शुभ योगिनी सक्रिय हों तो मजबूत नींव रखने वाले अवसर भी बनते हैं।
शनि का संदेश हमेशा एक ही रहता है। संयम, सत्य और कर्म अनुशासन। जो व्यक्ति इन तीन बातों पर ध्यान रखता है, वह कठिन समय को प्रशिक्षण की तरह जी पाता है, न कि केवल सजा की तरह।
उपाय और संकेत
सिद्धा योगिनी सातवीं दशा है, अवधि 7 वर्ष और स्वामी शुक्र। शुक्र की कृपा होने पर जीवन में सहज आनंद, सौंदर्य और आकर्षण की वृद्धि देखी जाती है।
इस दशा में नए कार्य शुरू करना, महत्वपूर्ण निर्णय लेना और संबंधों को मजबूत करना सामान्य रूप से शुभ माना जाता है। रोजगार में उन्नति, आय वृद्धि, पदोन्नति या नए अवसर मिलने की संभावना बढ़ जाती है। परिवार में विवाह, संतान सुख या कोई अन्य शुभ समाचार इस समय में मिल सकता है।
जो लोग कला, डिजाइन, संगीत, मनोरंजन या लग्जरी से जुड़े कार्य करते हैं, उनके लिए यह अवधि विशेष रूप से लाभकारी हो सकती है, बशर्ते शुक्र कुंडली में भी सहयोगी हो।
उपाय और संकेत
संकटा योगिनी अंतिम और आठवीं दशा है। इसकी अवधि 8 वर्ष की होती है और स्वामी राहु। इस नाम से ही स्पष्ट है कि यह अवधि अक्सर चुनौतियों, भ्रम और अप्रत्याशित घटनाओं से घिरी रहती है।
राहु को दुर्भाग्य, भ्रम और अचानक मोड़ से जोड़ा जाता है, इसलिए इस दशा में करियर, स्वास्थ्य, रिश्तों या मानसिक शांति से जुड़ी कठिन स्थितियाँ आ सकती हैं। कार्यक्षेत्र में वरिष्ठों से मतभेद, लक्ष्य प्राप्त करने में सहयोग की कमी या संगठनात्मक बदलाव जैसी बातें तनाव का कारण बन सकती हैं।
यहाँ सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि जल्दबाजी में कोई भी निर्णय न लिया जाए। विशेषकर नौकरी छोड़ने, रिश्ते तोड़ने या बड़े निवेश जैसे फैसलों में धैर्य रखना जरूरी है। कभी कभी संकटा योगिनी किसी प्रियजन को खोने का दर्द भी सामने ला सकती है, इसलिए यह समय आत्मिक मजबूती और संयम की परीक्षा होता है।
उपाय और संकेत
बहुत से लोगों का सीधा प्रश्न यही रहता है कि क्या योगिनी दशा सटीक होती है। इसका उत्तर न तो केवल हाँ है, न केवल नहीं। सटीकता हमेशा इस बात पर निर्भर करती है कि कुंडली को कितनी गहराई से पढ़ा गया है और कितनी जिम्मेदारी से परिणाम बताए गए हैं।
योगिनी दशा की खास बात यह है कि इसकी अवधि छोटी है और यह सीधे चंद्र नक्षत्र से जुड़ी है। इसलिए घटना का समय अक्सर तेज और साफ दिखाई देता है, खासकर जब विंशोत्तरी दशा भी उसी दिशा में संकेत दे रही हो। इस वजह से बहुत से ज्योतिषी मानते हैं कि सही उपयोग पर योगिनी दशा कई मामलों में काफी उच्च स्तर की सटीकता दिखा सकती है।
फिर भी, किसी एक प्रणाली को पकड़कर बाकी सब को नजरअंदाज करना उचित नहीं माना जाता। सबसे बेहतर तरीका यही है कि विंशोत्तरी महादशा, गोचर, योग और फिर योगिनी दशा के प्रभाव को एक दूसरे के साथ जोड़कर समझा जाए।
जो व्यक्ति सच में जानना चाहता है कि what is yogini dasha और उसे जीवन में कैसे उपयोग किया जाए, उसके लिए कुछ सरल व्यावहारिक नियम मदद कर सकते हैं।
इस तरह योगिनी दशा केवल डराने वाला शब्द नहीं रह जाता। वह व्यक्ति को समय के साथ तालमेल बैठाने का साधन बन जाता है।
1. योगिनी दशा क्या है और कितने वर्ष की होती है
योगिनी दशा चंद्र नक्षत्र आधारित एक समय प्रणाली है, जिसमें आठ योगिनी होती हैं। मंगला से संकटा तक का पूरा चक्र 36 वर्ष का होता है, जिसमें हर योगिनी की अवधि 1 से 8 वर्ष तक अलग अलग है।
2. योगिनी दशा के प्रभाव समझने के लिए क्या जरूरी है
सबसे पहले यह समझना जरूरी है कि जन्म के समय चंद्रमा किस नक्षत्र में था। उसी आधार पर प्रारंभिक योगिनी तय होती है। इसके साथ विंशोत्तरी महादशा, गोचर और कुंडली के योग भी देखना आवश्यक है।
3. क्या योगिनी दशा हमेशा विंशोत्तरी से अलग फल देती है
बहुत बार दोनों दशाएँ एक ही दिशा का संकेत देती हैं तब सटीकता बढ़ जाती है। जब संकेत अलग दिखें तब कुंडली की गहराई से जाँच करके यह समझना पड़ता है कि कौन सा कारक ज्यादा मजबूत है।
4. क्या हर व्यक्ति को योगिनी दशा देखनी चाहिए
जो लोग घटनाओं के सूक्ष्म समय, मानसिक अनुभव और तेज बदलाव को समझना चाहते हैं, उनके लिए योगिनी दशा बहुत उपयोगी हो सकती है। फिर भी इसे हमेशा अन्य दशाओं के साथ जोड़कर ही देखना चाहिए।
5. योगिनी दशा खराब हो तो क्या करना चाहिए
कठिन योगिनी दशा में सबसे पहले जल्दबाजी से बचना चाहिए। संबंधित ग्रह के लिए मंत्र, दान और अनुशासित कर्म अपनाना उपयोगी है। सही सलाह, धैर्य और छोटी व्यावहारिक सावधानियाँ अक्सर बड़े संकट को भी संभालने में मदद देती हैं।
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