By पं. अमिताभ शर्मा
कारक ग्रह क्या होता है, लग्न आधारित योगकारक ग्रह, ग्रह शक्ति, दशा गोचर और राजयोग से भाग्य समझने की सरल गहरी व्याख्या

जीवन की घटनाएँ अचानक नहीं घटतीं। बाहर से लगे कि सब कुछ एक ही पल में बदल गया, फिर भी पीछे बहुत दिन की तैयारी, सोच और अदृश्य संकेत काम कर रहे होते हैं। वैदिक ज्योतिष इन्हीं संकेतों को भाषा देता है, ताकि समझा जा सके कि भाग्य कब साथ खड़ा है और कब धैर्य की परीक्षा ले रहा है।
बहुत लोग शनि की साढ़ेसाती, गुरु का गोचर या राहु की दशा से डरते या उम्मीद जोड़ते हैं। पर वास्तविकता यह है कि किसी एक ग्रह की चाल अकेले सब कुछ तय नहीं करती। भाग्य का ताला तीन चाबियों से खुलता है।
यही कारण है कि ‘भाग्य’ को समझने से पहले यह जानना जरूरी है कि योगकारक ग्रह क्या होते हैं, कारक ग्रह क्या होता है और योगकारक और मारक ग्रह कैसे जानें ताकि भ्रम हटे और दृष्टि साफ हो।
भारत में अधिकतर लोग अपनी चंद्र राशि को ही अपनी राशि मान लेते हैं। चंद्रमा जिस राशि में हो, वही मानसिक दुनिया की नींव बनाता है। भावनाएँ, भीतर की सुरक्षा, मूड और प्रतिक्रिया चंद्र राशि से समझी जा सकती है।
पर जब प्रश्न होता है करियर, विवाह, संतान, धन लाभ या बड़े जीवन मोड़ों का तब केवल चंद्र राशि पर्याप्त नहीं रहती। यहाँ लग्न अधिक महत्वपूर्ण हो जाता है। लग्न वह राशि है जो जन्म के समय पूर्वी क्षितिज पर उदित होती है।
इसीलिए जब बात आती है yogkarak grah for lagna की, तो गणना हमेशा लग्न से शुरू की जाती है, न कि केवल चंद्र राशि से।
karak grah kya hota hai यह समझे बिना कोई भी कुंडली-पाठ अधूरा रहता है। कारक ग्रह वह होता है जो किसी विशेष जीवन-विषय का संकेतक है। जैसे सूर्य आत्मा और अधिकार के कारक हैं, चंद्र मन और माता के, गुरु ज्ञान और संतान के। जब कोई शुभ ग्रह किसी विषय का कारक भी हो और कुंडली में बलवान भी हो, तो जीवन में उस क्षेत्र में स्वाभाविक प्रगति दिखाई देती है।
नीचे तालिका में नवग्रहों के प्रमुख कारक तत्व रखे जा सकते हैं।
| ग्रह | मुख्य प्रतिनिधित्व | संभावित चुनौती |
|---|---|---|
| सूर्य | आत्मा, आत्मविश्वास, नेतृत्व, सरकारी सहयोग | अहंकार, अत्यधिक गर्व, पिता से दूरी |
| चंद्र | माता, मन की शांति, भावनाएँ, कल्पना | चंचलता, मानसिक अस्थिरता, जल्दी निर्णय |
| मंगल | ऊर्जा, साहस, पराक्रम, भूमि, संघर्ष क्षमता | क्रोध, आवेश, अनियंत्रित आक्रामकता |
| बुध | बुद्धि, संचार, व्यापार, तर्क, लेखन | घबराहट, अत्यधिक विश्लेषण, अस्थिर वाणी |
| गुरु | ज्ञान, धर्म, संतान, सम्मान, विस्तार | आलस्य, अतिआशावाद, वजन बढ़ना |
| शुक्र | प्रेम, सौंदर्य, कला, धन, भौतिक सुख | भोग में अति, दिखावा, आराम पर अत्यधिक जोर |
| शनि | कर्म, न्याय, धैर्य, दीर्घायु, जिम्मेदारी | देरी, निराशा, भय, अकेलापन |
| राहु | महत्वाकांक्षा, अचानक लाभ, तकनीक, विदेश | लालच, भ्रम, असंतोष |
| केतु | त्याग, वैराग्य, शोध, आध्यात्मिकता | अलगाव, संदेह, उद्देश्य में धुंधलापन |
इन्हीं कारक तत्वों के साथ जब ग्रह किसी लग्न में शुभ भावों के स्वामी बनते हैं तब वे yogkarak grah की दिशा में बढ़ते हैं या कुछ लग्नों में marak grah की सख्त परीक्षा भी दे सकते हैं।
किसी भी ग्रह का फल उसकी शक्ति पर निर्भर रहता है। उच्च, नीच और मूलत्रिकोण की अवस्थाएँ यह दिखाती हैं कि ग्रह की ऊर्जा कितनी सहजता से बह रही है।
| ग्रह | उच्च राशि | नीच राशि | मूलत्रिकोण |
|---|---|---|---|
| सूर्य | मेष | तुला | सिंह (लगभग 0°-20°) |
| चंद्र | वृषभ | वृश्चिक | वृषभ (लगभग 4°-30°) |
| मंगल | मकर | कर्क | मेष (लगभग 0°-12°) |
| बुध | कन्या | मीन | कन्या (लगभग 0°-15°) |
| गुरु | कर्क | मकर | धनु (लगभग 0°-10°) |
| शुक्र | मीन | कन्या | तुला (लगभग 0°-15°) |
| शनि | तुला | मेष | कुंभ (लगभग 0°-20°) |
जब कोई ग्रह उच्च या मजबूत मूलत्रिकोण में हो, शुभ भावों का स्वामी भी हो और दशा उसके पक्ष में हो तब वही ग्रह जीवन में ‘भाग्य मोड़ने’ जैसा अनुभव दे सकता है।
अब आता है सबसे महत्वपूर्ण सिद्धांत, जिसे अक्सर लोग खोजते हैं - yogkarak grah, yogkarak aur marak grah kaise jane और yogkarak aur marak grah jane in kundli in hindi।
सरल भाषा में, योगकारक वह ग्रह है जो आपकी कुंडली में दो प्रकार के सबसे शुभ भावों को एक साथ संभालता है।
जब कोई ग्रह एक केंद्र और एक त्रिकोण दोनों का स्वामी बन जाता है, तो वह योगकारक ग्रह कहलाता है। यही ग्रह जब महादशा या अंतरदशा में सक्रिय होता है और साथ में गोचर से महत्वपूर्ण भावों को छूता है तब व्यक्ति को लगता है कि जीवन की दिशा अचानक ऊपर उठ गई है।
| लग्न | योगकारक ग्रह | कारण |
|---|---|---|
| वृषभ | शनि | शनि 9वें (भाग्य) और 10वें (कर्म) भाव का स्वामी है |
| तुला | शनि | शनि 4वें (सुख) और 5वें (ज्ञान, लक्ष्मी) भाव का स्वामी है |
| कर्क | मंगल | मंगल 5वें (ज्ञान, संतान) और 10वें (कर्म) भाव का स्वामी है |
| सिंह | मंगल | मंगल 4वें (सुख) और 9वें (भाग्य) भाव का स्वामी है |
| मकर | शुक्र | शुक्र 5वें (ज्ञान, रचनात्मकता) और 10वें (कर्म) भाव का स्वामी है |
| कुंभ | शुक्र | शुक्र 4वें (सुख) और 9वें (भाग्य) भाव का स्वामी है |
इन छह लग्नों में योगकारक ग्रह को माना जाता है कि वह सही समय पर व्यक्ति के जीवन में विशेष उछाल दे सकता है, यदि कुंडली में उसे पर्याप्त बल मिला हो।
हर लग्न के लिए हमेशा एक स्पष्ट योगकारक ग्रह नहीं बनता। ऐसे लग्नों में 5वें, 9वें और 10वें भाव के स्वामी ग्रह ही सबसे बड़े शुभ माने जाते हैं और वही व्यावहारिक रूप से भाग्य संचालक की भूमिका निभाते हैं।
| लग्न | 5वें भाव का स्वामी | 9वें भाव का स्वामी | 10वें भाव का स्वामी |
|---|---|---|---|
| मेष | सूर्य | गुरु | शनि |
| मिथुन | शुक्र | शनि | गुरु |
| कन्या | शनि | शुक्र | बुध |
| वृश्चिक | गुरु | चंद्र | सूर्य |
| धनु | मंगल | सूर्य | बुध |
| मीन | चंद्र | मंगल | गुरु |
यही ग्रह उस लग्न के लिये व्यावहारिक yogkarak grah for lagna की तरह काम करते हैं, भले ही उनके लिए शास्त्रीय शब्द योगकारक न लिखा हो।
अब बात आती है सबसे सामान्य प्रश्न की - yogkarak aur marak grah kaise jane।
योगकारक ग्रह जानने के चरण
मारक ग्रह जानने के सामान्य नियम
जो लोग अक्सर खोजते हैं yogkarak aur marak grah jane in kundli in hindi, उन्हें यही क्रम अपनाना चाहिए, ताकि केवल डर या उम्मीद के आधार पर निष्कर्ष न निकले।
योगकारक ग्रह या शुभ ग्रहों को जान लेना केवल आधा कदम है। असली प्रश्न है - यह सब कब होगा। यहाँ दो साधन सबसे अधिक उपयोगी हैं।
दशा जीवन का मुख्य टाइमर है। विंशोत्तरी दशा के माध्यम से यह समझा जाता है कि कौन सा ग्रह कब अपनी ऊर्जा प्रकट करेगा।
जब किसी yogkarak grah या मजबूत शुभ ग्रह की महादशा या अंतरदशा चलती है तब विवाह, करियर उन्नति, घर खरीदना, संतान, बड़ा व्यवसाय जैसे दीर्घकालिक बदलाव अधिक संभावना के साथ आते हैं।
गोचर वर्तमान आसमान की स्थिति है। ग्रह किस राशि में चल रहे हैं और जन्म कुंडली के किस भाव से गुजर रहे हैं, यह गोचर से जाना जाता है।
असर तब सबसे अधिक दिखता है जब भाग्य-संचालक ग्रहों की दशा चल रही हो और उनका गोचर लग्न, पंचम, नवम या दशम भाव के आसपास हो। तब व्यक्ति को अक्सर महसूस होता है कि अचानक दरवाज़े खुलने लगे हैं।
कुछ योग ऐसे हैं जो भाग्य और कर्म के मिलन की ताकत को और बढ़ाते हैं।
धर्म कर्माधिपति राजयोग
जब 9वें और 10वें भाव के स्वामी युति, दृष्टि या राशि-परिवर्तन से जुड़े हों तब यह योग बन सकता है। इससे व्यक्ति के लिए धर्म (मूल्य, सिद्धांत) और कर्म (काम, कर्तव्य) एक दिशा में चलने लगते हैं।
गजकेसरी योग
जब गुरु और चंद्र एक ही राशि में हों या एक-दूसरे से केंद्र भावों में हों तब यह योग बन सकता है। इससे बुद्धि, प्रतिष्ठा और लोक समर्थन बढ़ सकता है, यदि बाकी कुंडली सहयोग करती हो।
इन योगों की वास्तविक ताकत भी तभी दिखती है जब दशा और गोचर उन्हें सक्रिय करें।
बहुत गलतफहमियाँ ज्योतिष के नाम पर चलती रहती हैं। कुछ मुख्य बिंदु साफ रखना जरूरी है।
मिथक: एक ग्रह अकेले पूरा भाग्य बदल देता है
सच यह है कि परिणाम हमेशा ग्रह बल, भाव स्थिति, अन्य ग्रहों की दृष्टि, दशा गोचर और व्यक्ति के कर्म का संयुक्त असर होता है।
मिथक: केवल गोचर देखकर ही सही भविष्यवाणी हो जाती है
सच यह है कि गोचर केवल सक्रियण है। यदि दशा अनुमति न दे तो गोचर के वादे भी अधूरे रह जाते हैं।
मिथक: राहु और केतु हमेशा नकारात्मक फल देते हैं
वास्तविकता यह है कि राहु केतु जिस ग्रह और भाव से जुड़े हों, उसी के अनुसार फल बदलते हैं। शुभ ग्रह से संबंध हो तो विदेश लाभ, तकनीक, अचानक उन्नति जैसे परिणाम भी दे सकते हैं।
मिथक: केवल चंद्र राशि से ही सब कुछ सही पता चल जाता है
सच यह है कि चंद्र राशि मन को दिखाती है, पर जीवन की ठोस घटनाएँ अधिकांश समय लग्न आधारित विश्लेषण से अधिक साफ दिखाई देती हैं।
ज्योतिष को भाग्य का डर नहीं बल्कि समय की समझ के रूप में देखना अधिक सार्थक होता है।
योगकारक और शुभ ग्रह कहाँ हैं, यह जान लेने के बाद अगला कदम यह होता है कि उनके स्वभाव के अनुसार जीवन में सुधार कैसे हो। सामान्य रूप से हर ग्रह के लिए कुछ सरल कर्म मार्ग देखे जा सकते हैं।
| ग्रह | मंत्र (जाप) | दान / सेवा | कर्म अनुशासन |
|---|---|---|---|
| शनि | ॐ शं शनैश्चराय नमः | तिल, तेल, लोहा, श्रम सेवा | समयपालन, अनुशासन, झूठ से दूरी, मेहनती लोगों का मान |
| गुरु | ॐ गुं गुरवे नमः | पीला दान, ज्ञान और पुस्तकें, विद्या सेवा | सतत अध्ययन, सत्य बोलना, गुरुओं और वरिष्ठों का सम्मान |
| मंगल | ॐ क्रां क्रीं क्रौं सः भौमाय नमः | लाल मसूर, गुड़, भूमि सेवा | ऊर्जा का सही उपयोग, क्रोध पर नियंत्रण, नियमित व्यायाम |
| बुध | ॐ बुं बुधाय नमः | हरा चारा, पुस्तकें, लेखन सामग्री | स्पष्ट वाणी, नियमित अध्ययन और लेखन, नियमों का पालन |
| शुक्र | ॐ श्रीं श्रीये नमः | दही, चावल, सुगंध या सौंदर्य सामग्री | सौम्यता, संतुलन, स्वच्छता, नैतिक आचरण |
जो व्यक्ति अपने yogkarak grah और शुभ ग्रहों की प्रकृति समझकर, उसी दिशा में व्यवहार और निर्णय सुधारता है, वह धीरे धीरे देखता है कि अवसर मिलने पर पकड़ भी मजबूत हो रही है और गलत समय पर जोखिम लेने की आदत भी कम हो रही है।
1. क्या हर कुंडली में एक स्पष्ट योगकारक ग्रह होता है
हर लग्न में एक ही नाम से योगकारक ग्रह हो, ऐसा हमेशा नहीं होता। कुछ लग्नों में एक ग्रह स्पष्ट योगकारक होता है, जबकि अन्य लग्नों में 5वें, 9वें और 10वें भाव के स्वामी ही मुख्य भाग्य-संचालक बनते हैं।
2. योगकारक और मारक ग्रह कैसे पहचाने जाएँ
सबसे पहले लग्न देखें। फिर केंद्र और त्रिकोण भावों के स्वामियों का अध्ययन करें। जो ग्रह दोनों में भागेदार हो, वही योगकारक बन सकता है। दूसरे और सातवें भाव के स्वामी सामान्य रूप से मारक भूमिका लेते हैं, पर अंतिम निर्णय ग्रह बल और दशा देख कर ही लिया जाना चाहिए।
3. योगकारक ग्रह कब सबसे ज्यादा फल देता है जब उस ग्रह की महादशा या अंतरदशा चल रही हो और उसी समय उसका गोचर लग्न, पंचम, नवम या दशम भाव को सक्रिय कर रहा हो तब परिणाम अधिक स्पष्ट और गहरे होते हैं।
4. क्या किसी एक ग्रह से पूरा भाग्य बदल सकता है
कोई भी ग्रह अकेले सब कुछ तय नहीं करता। ग्रह बल, भाव, दृष्टि, दशा, गोचर और आपके कर्म सब मिलकर परिणाम देते हैं। योगकारक ग्रह केवल यह दिखाता है कि किस दिशा में मेहनत और समय का सबसे अच्छा मिलान हो सकता है।
5. क्या केवल मंत्र और दान से ग्रह बदल जाते हैं
मंत्र और दान मन को स्थिर करते हैं और ग्रह की ऊर्जा के साथ जुड़ने में मदद करते हैं। पर वास्तविक बदलाव तब आता है जब व्यक्ति अपने व्यवहार, आदतों और निर्णयों को भी उसी ग्रह के स्वभाव के अनुसार सुधारता है। कर्म को बदले बिना केवल उपाय से स्थायी फल की उम्मीद करना उचित नहीं माना जाता।
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