By पं. अमिताभ शर्मा
गोचर क्या होता है और दैनिक जीवन पर उसका गहरा प्रभाव

आकाश में हर पल चल रही ग्रहों की चाल दूर से भले ही शांत दिखती हो पर अंदर से बहुत कुछ बदल रही होती है। कभी अचानक मन हल्का और उत्साहित हो जाता है तो कभी बिना कारण बेचैनी बढ़ जाती है। कई बार पुराने रिश्तों की यादें उभर आती हैं या अचानक काम में नया जोश आ जाता है। ऐसे उतार चढ़ाव को केवल मूड स्विंग कहकर छोड़ देना आसान है पर वैदिक ज्योतिष बताता है कि इनके पीछे ग्रहों के गोचर की लहरें भी सक्रिय रहती हैं।
गोचर क्या होता है यह प्रश्न हर उस व्यक्ति के मन में आता है जो जानना चाहता है कि जन्म कुंडली में लिखे योग किन स्थितियों में सचमुच फल देते हैं। जन्म के समय ग्रह जिस स्थान पर होते हैं वह जन्म कुंडली में स्थिर रह जाता है। जीवन भर उसी नक्शे को देखा जाता है। इसके ऊपर जो ग्रह प्रतिदिन आकाश में आगे बढ़ते हैं ग्रहों का यही वर्तमान संचरण ग्रह गोचर कहलाता है। यही गोचर बताता है कि कब कौन सा योग जागेगा और कौन सा ग्रह किस जीवन क्षेत्र को छूने वाला है।
ग्रह गोचर क्या होता है इसका सरल अर्थ है आकाश में किसी ग्रह की वास्तविक वर्तमान स्थिति और उसका जन्म कुंडली के भावों तथा ग्रहों से बनने वाला संबंध। उदाहरण के लिए शनि जब जन्म चंद्र से बारहवें पहले या दूसरे भाव से गुजरता है तो साढ़ेसाती की बात होती है। इसी तरह जब गुरु किसी विशेष भाव से गुजरता है तो उस भाव से जुड़े विषयों में विस्तार और अवसर दिखाई देते हैं।
गोचर का प्रभाव तीन स्तरों पर महसूस होता है।
जन्म कुंडली मूल बीज की तरह है और ग्रहों का गोचर उस बीज पर पड़ती धूप पानी और मौसम की तरह। बीज वही रहता है पर मौसम के बदलने से उसके फल और गति बदल जाते हैं।
ग्रहों का गोचर कैसे होता है यह खगोल और ज्योतिष दोनों दृष्टि से समझा जा सकता है।
इन अलग अलग गति वाले ग्रह जब जन्म कुंडली के अलग अलग भावों पर से गुजरते हैं तो हर बार नया योग बनता है। धीमी गति वाले ग्रह जैसे शनि राहु केतु और गुरु लंबी अवधि तक प्रभाव देते हैं और जीवन में गहरे परिवर्तन कर सकते हैं। तेज ग्रह जैसे चंद्र मंगल बुध मनोदशा और रोजमर्रा के निर्णयों को तीव्रता से प्रभावित करते हैं पर उनका असर जल्दी बदल भी जाता है।
वैदिक ज्योतिष ग्रहों के गोचर को केवल विश्वास का विषय नहीं मानता बल्कि इस विचार को स्वीकार करता है कि आकाश में घूमते पिंड पृथ्वी के वातावरण और मनुष्य के भीतर के रसायन तंत्र को प्रभावित कर सकते हैं। आधुनिक खगोल विज्ञान भी यह मानता है कि हर ग्रह का गुरुत्वाकर्षण क्षेत्र होता है जो आसपास की वस्तुओं को खींचता है।
हमारा शरीर भी एक सूक्ष्म ब्रह्मांड है। तंत्रिकातंत्र हार्मोन और मस्तिष्क के संकेत बाहरी लय से गहरे रूप से जुड़े होते हैं। जब किसी ग्रह का गोचर किसी संवेदनशील बिंदु पर आता है तो कभी नींद के पैटर्न बदलते हैं कभी भूख या ऊर्जा स्तर बदलता है और कभी सोचने का तरीका ही अलग हो जाता है।
चंद्रमा पृथ्वी के ज्वार भाटा को नियंत्रित करता है। समुद्र की लहरें उसकी स्थिति के अनुसार उठती और शांत होती हैं। शरीर का बड़ा भाग जल से बना है। इसलिए चंद्रमा के गोचर से मन के ज्वार भाटा में परिवर्तन होना स्वाभाविक माना जाता है।
पूर्णिमा के समय कई लोग अनुभव करते हैं कि भावनाएं अधिक तीव्र हो जाती हैं। किसी बात का असर जल्दी दिल पर ले लेते हैं। अमावस्या के आसपास एक अलग तरह की थकान या भीतर से खालीपन महसूस हो सकता है। जिस दिन चंद्र कुंडली के संवेदनशील भावों जैसे प्रथम चौथे आठवें या बारहवें भाव से गुजरता है उस दिन मन पर उसका प्रभाव और गहरा हो सकता है।
शनि अनुशासन धैर्य और कर्मफल का ग्रह है। जब शनि किसी मुख्य भाव से गोचर करता है तो अक्सर जीवन की गति धीमी महसूस होती है। काम वही रहते हैं पर उनके लिए अधिक प्रयास करना पड़ता है। कई बार जिम्मेदारियां बढ़ जाती हैं और पहले से बचाई जा रही समस्याएं सामने आकर समाधान मांगती हैं।
शनि की साढ़ेसाती इसके प्रभाव का प्रसिद्ध उदाहरण है। यह समय कई लोगों के लिए चुनौतीपूर्ण होता है पर साथ ही गहरी परिपक्वता भी देता है। जिन वर्षों में शनि परीक्षा लेता है उन वर्षों में स्वीकार्यता और मेहनत बढ़ाने से आगे चलकर जीवन की नींव मजबूत हो सकती है।
मंगल ऊर्जा साहस और कार्यक्षमता का ग्रह है। मंगल का गोचर जब मजबूत स्थिति में चलता है तो व्यक्ति के भीतर एक अलग तरह की आग जागती है। लंबे समय से टल रहे काम अचानक पूरे होने लगते हैं।
पर यही मंगल यदि संवेदनशील भावों से अशांत रूप में गुजरे तो गुस्सा जल्द बढ़ सकता है। छोटी बात पर वाद विवाद हो सकता है या जल्दबाजी में निर्णय लेकर बाद में पछतावा हो सकता है। इसलिए मंगल के गोचर के समय ऊर्जा को दिशा देना बहुत जरूरी होता है जैसे व्यायाम योग या किसी रचनात्मक काम में समय देना।
बुध का संबंध सोचने समझने शिक्षा और संचार से है। जब बुध अनुकूल गोचर में होता है तो विचार स्पष्ट होते हैं। बोलने में आत्मविश्वास आता है। लेखन इंटरव्यू और व्यापार वार्ता में अच्छा प्रदर्शन होता है।
बुध के प्रतिकूल गोचर विशेषकर जब वह वक्री हो तो चीजें उलझी हुई लग सकती हैं। मोबाइल या संचार से जुड़े साधनों में समस्या आ सकती है। गलतफहमी की संभावना बढ़ जाती है। ऐसे समय में लिखित काम को दो बार पढ़ना और बातों को बहुत साफ तरीके से रखना मददगार साबित होता है।
सूर्य आत्मा और पहचान का प्रतिनिधि है। हर महीने सूर्य एक राशि से दूसरी राशि में प्रवेश करता है और उस घर के विषयों को उजागर कर देता है। जब सूर्य अनुकूल भाव से गुजरता है तो आत्मविश्वास बढ़ता है। नेतृत्व की भूमिकाएं मिल सकती हैं।
यदि सूर्य किसी अशुभ भाव या कमजोर स्थिति से गुजर रहा हो तो स्वयं पर भरोसा कम हो सकता है। आलोचना संवेदनशील बना सकती है। ऐसे समय में अहंकार और जिद से बचकर वास्तविक क्षमता पर ध्यान देना बेहतर रहता है।
नीचे सारणी में कुछ मुख्य ग्रहों के गोचर और उनके सामान्य प्रभावों को संक्षेप में रखा जा सकता है।
| ग्रह | गोचर की सामान्य भूमिका | संभावित सकारात्मक प्रभाव | संभावित चुनौती |
|---|---|---|---|
| चंद्र | भावनाएं, मनोदशा | सहानुभूति, अंतर्ज्ञान | भावनात्मक उतार-चढ़ाव |
| मंगल | ऊर्जा, साहस | काम में तेजी, लक्ष्यपूर्ति | क्रोध, दुर्घटना, जल्दबाजी |
| बुध | सोच और संचार | स्पष्टता, सीखने की क्षमता | भ्रम, गलतफहमी |
| गुरु | विस्तार, ज्ञान | अवसर, भाग्य, सहयोग | आलस्य या अति आशावाद |
| शनि | कर्म और अनुशासन | स्थिरता, गहरी समझ | रुकावट, बोझ का भाव |
अब प्रश्न उठता है कि रोजमर्रा की दिनचर्या में गोचर का असर कैसे दिखता है। केवल बड़े योग ही नहीं छोटे स्तर पर भी इसकी अनुभूति होती है।
करियर में गोचर का प्रभाव इस रूप में दिखता है कि किस समय प्रमोशन या प्रोजेक्ट का मौका मिलता है और कब प्रयास के बावजूद परिणाम धीमे आते हैं। रिश्तों में गोचर यह दिखाते हैं कि कब किसी नए व्यक्ति से मुलाकात होती है या कब पुराने मुद्दे फिर से सामने आते हैं। मानसिक स्वास्थ्य के स्तर पर कोई गोचर बेचैनी को बढ़ा सकता है तो कोई ध्यान और योग की ओर खिंचाव बढ़ा सकता है।
गोचर देखने के लिए दो चीजें महत्वपूर्ण हैं।
ज्योतिषी इन दोनों को मिलाकर यह देखता है कि कौन सा ग्रह किस भाव से गुजर रहा है और उस भाव के स्वामी के साथ क्या संबंध बना रहा है। यदि किसी ग्रह की महादशा या अंतरदशा भी उसी समय चल रही हो तो गोचर का प्रभाव और स्पष्ट हो जाता है।
साधारण पाठक के लिए यह जानना भी काफी उपयोगी है कि शनि गुरु राहु और केतु अभी किस राशि में हैं और अपनी जन्म कुंडली में वह राशि किस भाव में आती है। इससे यह संकेत मिल जाता है कि अगले कुछ महीनों या वर्षों में जीवन का कौन सा क्षेत्र अधिक सक्रिय रहने वाला है।
जब यह समझ आ जाए कि ग्रहों का गोचर कैसे होता है और किस दिशा में ले जा रहा है तो अगला प्रश्न यह होता है कि इसका सामना कैसे किया जाए। केवल डरना या सब कुछ ग्रहों पर डाल देना समाधान नहीं है। ज्योतिष का उद्देश्य जागरूकता बढ़ाना है ताकि निर्णय बेहतर लिए जा सकें।
नीचे सारणी में कुछ सरल उपाय दिए जा सकते हैं।
| ग्रह का तनावपूर्ण गोचर | सरल उपाय | जीवन में ध्यान देने योग्य बात |
|---|---|---|
| शनि | धैर्य, अनुशासन, सेवा | काम को टालना नहीं, ईमानदारी बढ़ाना |
| मंगल | व्यायाम, संयम | गुस्से में निर्णय न लेना |
| बुध | लेखन और संवाद स्पष्ट रखना | अफवाहों से दूर रहना |
| चंद्र | ध्यान और पर्याप्त नींद | भावनाओं को लिखना या साझा करना |
| राहु केतु | साधना और प्रार्थना | जल्दबाजी में बड़े परिवर्तन न करना |
जब कोई व्यक्ति पहली बार ग्रह गोचर क्या होता है यह समझता है तो मन में एक राहत भी आती है कि जीवन में जो भी उतार चढ़ाव हैं वे केवल अंदर की कमजोरी नहीं बल्कि समय की लहरों से भी जुड़े हैं। यह समझ जिम्मेदारी से भागने का रास्ता नहीं बल्कि सही दिशा में प्रयास बढ़ाने का निमंत्रण है।
ग्रहों के गोचर को यदि मौसम की तरह स्वीकार किया जाए तो हर समय का उपयोग अलग ढंग से किया जा सकता है।
इस तरह गोचर केवल भविष्य बताने का माध्यम नहीं रहता बल्कि अपने आप को समझने की कला का हिस्सा बन जाता है।
गोचर और दशा में क्या अंतर होता है
दशा जन्म कुंडली के आधार पर चलने वाली लंबी समयरेखा है जो यह बताती है कि किस ग्रह का वर्चस्व चल रहा है। गोचर उस समय आकाश में ग्रहों की वास्तविक चाल है। दोनों एक दूसरे के साथ मिलकर परिणाम देते हैं।
क्या केवल गोचर देखकर भविष्य बताया जा सकता है
केवल गोचर देखने से सामान्य संकेत मिल सकते हैं पर सटीक फल के लिए जन्म कुंडली और दशा दोनों को साथ में देखना आवश्यक होता है। गोचर दिशा दिखाते हैं और कुंडली बताती है कि उस दिशा में व्यक्ति की क्षमता कितनी है।
ग्रहों का गोचर कितने समय में असर दिखाता है
तेज ग्रह जैसे चंद्र मंगल बुध कुछ दिनों या हफ्तों में असर दिखा सकते हैं। गुरु शनि राहु और केतु का गोचर कई महीने या वर्ष तक चलकर धीरे धीरे जीवन में परिवर्तन लाता है।
क्या अच्छे गोचर होने पर भी कठिनाइयां आ सकती हैं
हाँ। यदि व्यक्ति स्वयं प्रयास न करे या पुराने कर्मों के कारण कोई स्थिति अधिक गहन हो तो अच्छे गोचर भी केवल सीमित मदद ही कर पाते हैं। ग्रह अवसर देते हैं पर चुनाव हमेशा मनुष्य के हाथ में रहता है।
ग्रहों के गोचर से डरना चाहिए या उसे मार्गदर्शन की तरह लेना चाहिए
डरने से कुछ नहीं बदलता। गोचर को मार्गदर्शन की तरह देखने से व्यक्ति समय की भाषा को पढ़ना सीखता है और वही समझ जीवन को संतुलित करने में सबसे बड़ा सहारा बनती है।
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