By अपर्णा पाटनी
नर नारायण के नर रूप अर्जुन की कथा और गीता रहस्य

सनातन वैदिक परंपरा में भगवान श्रीकृष्ण और अर्जुन के संवाद को समस्त सांसारिक संशयों, मानसिक अवसादों और आंतरिक संघर्षों के शमन का परम साधन स्वीकार किया गया है। जब किसी जातक के जीवन में असमंजस, कर्तव्य पथ से भटकाव, भीषण मानसिक तनाव अथवा अपनों से उपजे मोह के कारण पौरुष क्षीण होने लगे तब पार्थ साधना और गीता के नियमित स्वाध्याय का विधान शास्त्रों में बताया गया है। यह साधना मनुष्य के भीतर सुप्त पड़े आत्मबल को पुनः जाग्रत कर उसे अपने धर्म पथ पर अडिग बनाती है। इस अनुष्ठान को संपन्न करने हेतु विशिष्ट तिथियां, शुद्ध पूजन सामग्री और एकाग्र चित्त की आवश्यकता होती है।
| साधना अंग | वैदिक विधान और अनुष्ठान निर्देश |
|---|---|
| शुभ काल और तिथि | शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि विशेषकर मोक्षदा एकादशी अथवा गुरुवार और रविवार |
| अधिष्ठाता देवता | योगेश्वर भगवान श्रीकृष्ण और उनके सखा धनुर्धर अर्जुन |
| सिद्ध बीज मंत्र | ॐ क्लीं कृष्णाय नमः अथवा ॐ पार्थाय नमः |
| पूजन सामग्री | शुद्ध ताम्र पात्र, गंगाजल, पीले पुष्प, श्वेत चंदन, तुलसी पत्र, धूप और शुद्ध गोघृत |
| आध्यात्मिक फल | मानसिक विषाद का निवारण, निर्णय क्षमता में वृद्धि, पराक्रम का जागरण और ईश्वरीय कृपा |
इस साधना को प्रारंभ करने के लिए प्रातःकाल ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नानादि नित्यकर्म से निवृत्त होना चाहिए। श्वेत अथवा पीले रंग के स्वच्छ वस्त्र धारण कर पूर्व अथवा उत्तर दिशा की ओर मुख करके बैठें। पूजा वेदी पर भगवान श्रीकृष्ण और अर्जुन के दिव्य रथ का चित्र अथवा विग्रह स्थापित करें।
नियमित रूप से इस अनुष्ठान का पालन करने से चित्त की चंचलता समाप्त होती है। यह साधना साधक को सिखाती है कि जीवन के प्रत्येक युद्ध में जब मनुष्य अपने संपूर्ण अहंकार को त्यागकर ईश्वर के प्रति समर्पित होता है तब विजय स्वतः सुनिश्चित हो जाती है।
सृष्टि के आरंभिक काल से ही भगवान श्रीहरि विष्णु ने धर्म की स्थापना और आसुरी शक्तियों के दलन हेतु बदरिकाश्रम में नर और नारायण के रूप में तपस्वी युगल अवतार धारण किया था। ये दोनों ऋषि युगल सनातन सखा हैं जो संपूर्ण ब्रह्मांड में भक्ति और ज्ञान के शाश्वत संतुलन का प्रतिनिधित्व करते हैं। द्वापर युग में जब पृथ्वी अधर्म के भार से पीड़ित हुई तब भगवान नारायण ने साक्षात श्रीकृष्ण के रूप में जन्म लिया और उनके अभिन्न सखा नर ऋषि ने पांडु पुत्र अर्जुन के रूप में अवतार ग्रहण किया।
महाराज पांडु जब महर्षि किंदम के शापवश वन में तपस्वी जीवन व्यतीत कर रहे थे तब कुरुवंश की रक्षा और श्रेष्ठ संतान की प्राप्ति हेतु उन्होंने अपनी धर्मपत्नी कुंती से देव आह्वान का अनुरोध किया। कुंती को महर्षि दुर्वासा द्वारा दिए गए दिव्य मंत्र की शक्ति प्राप्त थी। धर्मराज यम से युधिष्ठिर और वायु देव से भीमसेन को प्राप्त करने के उपरांत महाराज पांडु ने कुंती से एक ऐसे पुत्र की याचना करने को कहा जो समस्त लोकों में सर्वश्रेष्ठ, पराक्रमी और अजेय हो।
पांडु के आग्रह पर देवी कुंती ने संपूर्ण देवगणों के अधिपति देवराज इंद्र का पूर्ण निष्ठा से ध्यान किया। कुंती के तपोबल और मंत्र के आह्वान से देवराज इंद्र साक्षात प्रकट हुए। इंद्र ने आशीर्वाद दिया कि उनके अंश से एक ऐसा बालक जन्म लेगा जिसका पराक्रम संपूर्ण चराचर जगत में अद्वितीय होगा।
फाल्गुन मास में उत्तराफाल्गुनी नक्षत्र के पावन संयोग में बालक का प्राकट्य हुआ जिसके कारण उनका एक नाम फाल्गुन भी पड़ा। बालक के जन्म लेते ही आकाश से दिव्य पुष्पों की वर्षा होने लगी और आकाशवाणी ने यह घोषणा की कि यह बालक समस्त क्षत्रियों का गौरव बढ़ाएगा, भगवान शिव को अपने युद्ध कौशल से प्रसन्न करेगा और धर्मराज युधिष्ठिर के लिए संपूर्ण भूमंडल की विजय सुनिश्चित करेगा।
बाल्यावस्था से ही अर्जुन की एकाग्रता और लक्ष्य संधान की क्षमता अद्वितीय थी। गुरु द्रोणाचार्य के आश्रम में जब समस्त राजकुमारों को वृक्ष पर रखी कृत्रिम चिड़िया की आंख को भेदने का आदेश दिया गया तब केवल अर्जुन ही ऐसे शिष्य थे जिन्हें वृक्ष, पत्ते अथवा पक्षी का शरीर दिखाई नहीं दिया बल्कि केवल चिड़िया की पुतली ही दृष्टिगोचर हुई। अर्जुन ने अंधकार में भी केवल ध्वनि के आधार पर बाण चलाने की सिद्धि प्राप्त की जिससे प्रसन्न होकर गुरु द्रोण ने उन्हें संसार का सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर बनने का वरदान दिया।
द्रौपदी के स्वयंवर में जब राजा द्रुपद के दरबार में घूमते हुए मत्स्य यंत्र की आंख को जल में उसकी परछाई देखकर भेदना था तब संपूर्ण विश्व के महान योद्धा असफल हो गए थे। उस समय ब्राह्मण वेश में उपस्थित अर्जुन ने अपने अद्भुत लाघव से लक्ष्य भेदकर द्रौपदी का वरण किया। खांडव वन के दाह के समय अर्जुन के पराक्रम से प्रसन्न होकर अग्नि देव ने उन्हें अक्षय तरकश और संपूर्ण ब्रह्मांड का सबसे शक्तिशाली गांडीव धनुष प्रदान किया जिसकी टंकार से तीनों लोक कांप उठते थे।
जब द्युत क्रीड़ा के पश्चात पांडवों को 12 वर्षों का वनवास और 1 वर्ष का अज्ञातवास मिला तब महर्षि वेदव्यास के परामर्श पर अर्जुन अमोघ दिव्यास्त्रों की प्राप्ति हेतु इंद्रकील पर्वत पर घोर तपस्या करने चले गए। वहां उन्होंने भगवान देवाधिदेव महादेव की कठोर आराधना आरंभ की। अर्जुन की तपस्या और उनके पराक्रम की परीक्षा लेने हेतु भगवान शिव ने एक किरात अर्थात भील शिकारी का रूप धारण किया और माता पार्वती भी भीलनी बनकर उनके साथ उपस्थित हुईं।
उसी समय मूक नामक एक भयानक असुर ने विशाल शूकर अर्थात जंगली वराह का रूप धरकर अर्जुन पर आक्रमण करना चाहा। अर्जुन और किरात रूपी शिव दोनों ने एक ही क्षण में उस शूकर पर अपने बाण चलाए जिससे वह दैत्य तत्क्षण धराशायी हो गया। दोनों बाण उस शूकर के शरीर में एक साथ धंसे थे। इस बात पर अर्जुन और उस किरात के मध्य बाण के स्वामित्व को लेकर भीषण विवाद छिड़ गया।
यह दृश्य देखकर अर्जुन को तुरंत यह बोध हो गया कि उनके सम्मुख खड़ा शिकारी कोई साधारण मनुष्य नहीं बल्कि साक्षात देवाधिदेव महादेव हैं। अर्जुन लज्जित होकर शिव के चरणों में गिर पड़े। भगवान आशुतोष ने अपने वास्तविक रूप में प्रकट होकर अर्जुन को गले लगाया और उनके अद्भुत शौर्य की भूरि भूरि प्रशंसा की। भगवान शिव ने अर्जुन को अपना परम संहारक पाशुपतास्त्र प्रदान किया और तीनों लोकों में अजेय रहने का वरदान दिया। इसके पश्चात अर्जुन स्वर्ग लोक पहुंचे जहां उनके पिता देवराज इंद्र ने उन्हें वज्र सहित समस्त स्वर्गीय दिव्यास्त्रों की शिक्षा दी।
जब कौरवों ने शांति के समस्त प्रस्तावों को ठुकरा दिया और महाभारत का महायुद्ध अवश्यंभावी हो गया तब कुरुक्षेत्र की पावन भूमि पर दोनों पक्षों की विशाल सेनाएं आमने सामने खड़ी हुईं। भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन के सारथी बनना स्वीकार किया और श्वेत अश्वों से जुते दिव्य कपिध्वज रथ को दोनों सेनाओं के मध्य ले जाकर खड़ा कर दिया। अर्जुन ने जब अपने सम्मुख पूज्य पितामह भीष्म, गुरु द्रोणाचार्य, कृपाचार्य और अपने ही बंधु बांधवों को युद्ध के लिए सन्नद्ध देखा तब उनका हृदय करुणा और भीषण मोह से भर गया।
अर्जुन के हाथ कांपने लगे, उनका गांडीव धनुष फिसलने लगा और उनके शरीर में तीव्र ज्वर का संचार होने लगा। जिस अजेय योद्धा के नाम से दिशाएं थर्राती थीं वह अपने ही आत्मीयों के प्रति आसक्ति के कारण भीषण विषाद से घिर गया। अर्जुन ने युद्ध करने से मना कर दिया और रथ के पिछले भाग में अश्रुपूरित नेत्रों से बैठ गए।
उस अत्यंत गंभीर और निर्णायक घड़ी में भगवान योगेश्वर श्रीकृष्ण ने अर्जुन के माध्यम से संपूर्ण मानव जाति को भगवद्गीता का अमर अमृत रस प्रदान किया। श्रीकृष्ण ने अर्जुन को समझाया कि आत्मा कभी मरती नहीं है और न ही इसे कोई शस्त्र काट सकता है। यह शरीर केवल पुराने वस्त्रों के समान है जिसे त्यागकर आत्मा नया शरीर धारण करती है।
भगवान ने अर्जुन को निष्काम कर्मयोग का वह गूढ़ सिद्धांत सिखाया जिसके अनुसार मनुष्य का अधिकार केवल अपने कर्म पर है, कर्म के फलों पर कभी नहीं। जब अर्जुन का संशय समाप्त नहीं हुआ तब श्रीकृष्ण ने उन्हें अपने विराट रूप का साक्षात दर्शन कराया जिसमें संपूर्ण ब्रह्मांड, ग्रह, नक्षत्र, भूत, भविष्य और काल का संपूर्ण चक्र समाया हुआ था। श्रीकृष्ण के इस विश्वरूप दर्शन ने अर्जुन के भीतर के अज्ञान के संपूर्ण अंधकार को भस्म कर दिया। अर्जुन ने अपने गांडीव को पुनः उठाया और धर्म की विजय सुनिश्चित करने हेतु युद्ध में प्रवृत्त हो गए।
वैदिक ज्योतिष के गूढ़ फलित ग्रंथों में अर्जुन का संपूर्ण जीवन चरित्र तीसरे भाव अर्थात बाहुबल और नवम भाव अर्थात भाग्य और ईश्वरीय अनुग्रह के अद्भुत संयोग को दर्शाता है। जन्म कुंडली का तृतीय भाव पराक्रम, भुजाओं के बल, धनुर्विद्या, तीव्र पुरुषार्थ और छोटे भाइयों का प्रतिनिधित्व करता है। वहीं नवम भाव धर्म, तपस्या, गुरु कृपा और परमात्मा के साक्षात अनुग्रह का कारक माना गया है।
| ज्योतिषीय तत्व | अर्जुन अवतार और ग्रहों का संबंध |
|---|---|
| पराक्रम भाव | कुंडली का तृतीय भाव जो गांडीव के संधान और बाहुबल को दर्शाता है |
| धर्म एवं भाग्य भाव | नवम भाव जो श्रीकृष्ण के रूप में साक्षात ईश्वरीय सारथी और मार्गदर्शन का प्रतीक है |
| कारक ग्रह | मंगल जो अदम्य साहस का प्रतीक है और गुरु जो आध्यात्मिक ज्ञान प्रदान करता है |
| नक्षत्र संबंध | उत्तराफाल्गुनी नक्षत्र जिसके अधिष्ठाता सूर्य देव और अर्यमा हैं |
| आध्यात्मिक संदेश | केवल पौरुष अधूरा है जब तक उसे परमात्मा के अनुग्रह का संबल न मिले |
जब किसी जातक की जन्म पत्रिका में तृतीय भाव का स्वामी और नवम भाव का स्वामी एक दूसरे से युति करते हैं अथवा एक दूसरे पर दृष्टि डालते हैं तब एक अत्यंत दुर्लभ राजयोग का निर्माण होता है। अर्जुन का जीवन यह प्रमाणित करता है कि केवल गांडीव धनुष उठाना पर्याप्त नहीं है जब तक रथ की बागडोर साक्षात भगवान श्रीकृष्ण के हाथों में न हो।
अर्जुन का व्यक्तित्व यह सिखाता है कि जब तक व्यक्ति अपने कर्म को परमात्मा की पूजा समझकर करता है तब तक संसार की कोई भी नकारात्मक शक्ति उसका पराभव नहीं कर सकती।
धनुर्धर अर्जुन का पावन अवतार केवल महाभारत का एक ऐतिहासिक प्रसंग नहीं है बल्कि यह प्रत्येक मनुष्य की चेतना की वह यात्रा है जहां जीवात्मा अपने भीतर के कौरव रूपी दुर्गुणों से लड़ती है। प्रत्येक मानव मन कुरुक्षेत्र का मैदान है जहां प्रतिदिन वासना, क्रोध, लोभ और अहंकार की सेनाएं धर्म के सम्मुख खड़ी होती हैं।
अर्जुन की महानता इस बात में नहीं थी कि वे कभी भयभीत नहीं हुए बल्कि इस बात में थी कि भय के चरम क्षण में भी उन्होंने ईश्वर की शरण ली और सत्य को स्वीकार किया। उनका जीवन हमें यह संदेश देता है कि जब तक हमारे जीवन के रथ की बागडोर परमात्मा के हाथों में है तब तक संसार का कोई भी युद्ध हमें विचलित नहीं कर सकता। अर्जुन का स्मरण मनुष्य के मन से संशय का कुहासा मिटाकर उसे अपने धर्म, कर्तव्य और आत्मिक जागरण के परम प्रकाश की ओर अग्रसर करता है।
अर्जुन किसके अंशावतार थे? अर्जुन स्वर्ग के राजा देवराज इंद्र के अंशावतार थे और पूर्व जन्म के सिद्ध नर ऋषि के साक्षात मानवीय रूप थे।
अर्जुन को गांडीव धनुष किसने प्रदान किया था? अर्जुन को गांडीव धनुष और अक्षय तरकश खांडव वन दाह के समय भगवान अग्नि देव ने उपहार स्वरूप प्रदान किए थे।
भगवान शिव ने अर्जुन को कौन सा अमोघ अस्त्र दिया था? किरात रूप में युद्ध कौशल की कठोर परीक्षा लेने के उपरांत भगवान शिव ने प्रसन्न होकर अर्जुन को अपना अमोघ पाशुपतास्त्र दिया था।
श्रीमद्भगवद्गीता का उपदेश अर्जुन को किस स्थान पर दिया गया था? श्रीमद्भगवद्गीता का अमर उपदेश भगवान श्रीकृष्ण द्वारा कुरुक्षेत्र के युद्ध मैदान में दोनों सेनाओं के मध्य दिया गया था।
वैदिक ज्योतिष में अर्जुन का संबंध कुंडली के किन भावों से है? वैदिक ज्योतिष में अर्जुन का संबंध कुंडली के तृतीय भाव पराक्रम और नवम भाव ईश्वरीय कृपा व धर्म के संगम से माना गया है।
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