अष्टलक्ष्मी अवतार और अष्टवैभव रहस्य क्या?

By पं. नरेंद्र शर्मा

महालक्ष्मी के आठ दिव्य स्वरूप जन्म कुंडली के आठ भाव और अखंड वैभव का संपूर्ण वैदिक रहस्य

अष्टलक्ष्मी अवतार कथा और कुंडली के आठ भाव

अष्टलक्ष्मी पूजन मुहूर्त और शास्त्रीय विधान

सनातन वैदिक परंपरा और श्रीसूक्त के पावन दर्शन में साक्षात आद्याशक्ति भगवती महालक्ष्मी के आठ विशिष्ट विस्तार स्वरूपों में पूजित माता अष्टलक्ष्मी का प्राकट्य मानव जीवन के आठों आयामों में अखंड ऐश्वर्य पोषण और आत्मिक पूर्णता का सर्वोच्च शिखर है। वैदिक ज्योतिष तथा तत्व विज्ञान के अंतर्गत जन्म कुंडली के आठ प्रमुख भावों प्रथम द्वितीय चतुर्थ पंचम सप्तम नवम दशम और एकादश भाव के दोषों को शांत करने तथा धन सौंदर्य के कारक शुक्र देव व ज्ञान के अधिपति देवगुरु बृहस्पति की संयुक्त कृपा जाग्रत करने के लिए अष्टलक्ष्मी उपासना को सर्वश्रेष्ठ माना गया है। जब जातक की जन्म कुंडली में दरिद्र योग केमद्रुम योग अथवा षष्ठ व द्वादश भाव की पीड़ा से संचित धन नष्ट हो रहा हो व्यापार में मंदी हो अथवा जीवन के किसी भी क्षेत्र में अभाव बना रहता हो तब माता महालक्ष्मी के इन आठ पावन स्वरूपों की शरण में जाने से जीवन के समस्त रिक्त स्थान भर जाते हैं। कार्तिक मास की अमावस्या दीपावली पर्व शरद पूर्णिमा अथवा प्रत्येक मास के शुक्ल पक्ष के शुक्रवार के पावन अनुष्ठान का संपूर्ण शास्त्रीय विवरण नीचे दी गई तालिका में स्पष्ट रूप से प्रस्तुत किया गया है।

शास्त्रीय आयाम अनुष्ठान विवरण और ज्योतिषीय मान्यता
प्रमुख पावन तिथि कार्तिक कृष्ण अमावस्या दीपावली आश्विन शरद पूर्णिमा अथवा प्रत्येक शुक्रवार
दैनिक पूजन समय प्रातः कालीन सूर्योदय वेला अथवा सायंकालीन गोधूलि प्रदोष काल
अधिष्ठाता स्वरूप अष्ट दिव्य रूपों में कमल पुष्प अमृत कलश गदा चक्र वरद और अभय मुद्रा धारिणी महालक्ष्मी
ज्योतिषीय ग्रह व भाव संबंध भाव 1 2 4 5 7 9 10 11 धन कारक शुक्र देव और ज्ञान कारक देवगुरु बृहस्पति
मुख्य पूजन सामग्री शुद्ध गाय का घी कमल पुष्प कमलगट्टे की माला अष्टगंध केसर युक्त खीर और लाल रेशमी वस्त्र
प्रधान वैदिक अनुष्ठान श्री अष्टलक्ष्मी स्तोत्र पाठ ऋग्वैदिक श्री सूक्त और ॐ श्रीं ह्रीं क्लीं अष्टलक्ष्म्यै नमः जप
अपेक्षित फल अष्टविध ऐश्वर्य प्राप्ति जन्मकुंडली के आठ भावों का संतुलन और दरिद्रता का समूल नाश

महालक्ष्मी का अष्टधा विस्तार और सनातन मर्म

विष्णु पुराण और पद्म पुराण के अत्यंत गोपनीय आध्यात्मिक आख्यानों के अनुसार जब सृष्टि के सृजन और पालन का दायित्व देवाधिदेव भगवान श्री हरि विष्णु ने संभाला तब उनकी नित्य आह्लादिनी और पोषक शक्ति भगवती महालक्ष्मी ने विचार किया कि मानव जीवन केवल भौतिक स्वर्ण अथवा धन के ढेर से पूर्ण नहीं हो सकता। यदि किसी मनुष्य के पास अपार स्वर्ण हो किंतु उसके पास उत्तम स्वास्थ्य न हो तो वह धन व्यर्थ हो जाता है। यदि किसी के पास धन और स्वास्थ्य हो किंतु उसके कुल में वंश वृद्धि करने वाली संतान न हो अथवा उसके भीतर संकटों का सामना करने का धैर्य न हो तो उसका जीवन अंधकारमय हो जाता है।

इसी कारण दयामयी जगन्माता ने मानव जीवन के समस्त अभावों को जड़ से मिटाने हेतु स्वयं को आठ स्वतंत्र और परिपूर्ण शक्तियों में रूपांतरित किया जिन्हें संपूर्ण चराचर जगत में अष्टलक्ष्मी के नाम से जाना गया।

यह अष्टधा विस्तार वास्तव में चेतना के उस समग्र विकास का प्रतीक है जहां आत्मा अपने भौतिक और आध्यात्मिक दोनों पक्षों को एक साथ आलोकित करती है। महालक्ष्मी का प्रत्येक स्वरूप प्रकृति के एक विशिष्ट तत्व का संचालन करता है। जब साधक इन आठों देवियों की संयुक्त उपासना करता है तो उसके जीवन में केवल धन की वर्षा नहीं होती अपितु उसका चरित्र उसका ज्ञान और उसका सामाजिक प्रभाव भी एक राजा के समान तेजस्वी हो जाता है।

अष्टलक्ष्मी के आठ दिव्य स्वरूपों की महिमा

माता महालक्ष्मी के आठों पावन स्वरूप मानव जीवन की मूलभूत आवश्यकताओं और आत्मा के सर्वोच्च पुरुषार्थों का प्रतिनिधित्व करते हैं जिनका विस्तृत विवरण इस प्रकार है।

  • आदिलक्ष्मी यह भगवती महालक्ष्मी का सबसे प्राचीन सनातन और मूल स्वरूप है जिन्हें ऋषि मुनि चार भुजाओं वाली और कमल पर विराजमान रूप में पूजते हैं जो साधक को जीवन की मूल चेतना निरोगी काया और आध्यात्मिक मोक्ष का वरदान देती हैं।
  • धान्यलक्ष्मी यह कृषि वनस्पति अन्न और प्रकृति के समस्त पोषक तत्वों की अधिष्ठात्री हैं जिनके आठ हाथों में धान की बालियां गन्ना केला और कमल सुशोभित हैं जो संसार से भुखमरी और अन्न संकट को समाप्त करती हैं।
  • धैर्यलक्ष्मी जिन्हें वीर लक्ष्मी भी कहा जाता है यह असीम साहस मानसिक दृढ़ता और विपरीत परिस्थितियों में अडिग रहने का आत्मबल प्रदान करती हैं जिनके हाथों में चक्र शंख धनुष और तलवार विद्यमान हैं।
  • गजलक्ष्मी समुद्र मंथन से प्रकट यह देवी दो श्वेत हाथियों द्वारा स्वर्ण कलश से अभिषिक्त हैं जो राजसी ठाट बाट सुंदर वाहन पशुधन और सामाजिक प्रतिष्ठा का आशीर्वाद प्रदान करती हैं।
  • संतानलक्ष्मी यह कुल की निरंतरता उत्तम संस्कारों से युक्त संतति और मातृत्व का वरदान देने वाली छह भुजाओं वाली देवी हैं जो अपनी गोद में एक सुंदर शिशु को धारण किए हुए हैं।
  • विजयलक्ष्मी जिन्हें जयलक्ष्मी भी कहा जाता है यह जीवन के प्रत्येक युद्ध वाद विवाद न्यायालय और व्यापारिक प्रतिस्पर्धा में अमोघ विजय व यश की पताका फहराने वाली शक्ति हैं।
  • विद्यालक्ष्मी यह केवल पुस्तकीय ज्ञान नहीं अपितु 64 कलाओं वेदों के गूढ़ रहस्य और ब्रह्म विद्या को जाग्रत करने वाली देवी हैं जो बुद्धि को निर्मल और प्रज्ञा को प्रखर बनाती हैं।
  • धनलक्ष्मी यह स्वर्ण आभूषण चल अचल संपदा और मुद्रा के रूप में भौतिक वैभव की स्वामिनी हैं जिनके करकमलों से निरंतर स्वर्ण मुद्राओं की अविरल वर्षा होती रहती है।

क्या जन्म कुंडली के आठ प्रमुख भाव अष्टलक्ष्मी हैं?

वैदिक ज्योतिष के महान आधार ग्रंथ बृहत् पराशर होरा शास्त्र में जन्म कुंडली के 12 भावों का मानव जीवन के विभिन्न अंगों के साथ गहरा संबंध स्थापित किया गया है। ऋषियों ने यह अत्यंत गूढ़ रहस्य उद्घाटित किया है कि जन्म कुंडली के 8 प्रमुख भाव सीधे तौर पर अष्टलक्ष्मी के आठ स्वरूपों की ऊर्जा से संचालित होते हैं।

जब किसी जातक की कुंडली में इन विशिष्ट भावों पर शुभ ग्रहों का प्रभाव होता है तो संबंधित लक्ष्मी का आशीर्वाद स्वतः प्राप्त होता है किंतु जब यह भाव पाप ग्रहों से पीड़ित होते हैं तो व्यक्ति जीवन भर उस विशेष क्षेत्र में दरिद्रता और अपमान झेलता है।

  • जन्म कुंडली का प्रथम भाव जिसे लग्न भाव कहा जाता है सीधे तौर पर आदिलक्ष्मी से जुड़ा है जो व्यक्ति के शरीर आत्मा तेज और समग्र स्वास्थ्य को नियंत्रित करता है।
  • जन्म कुंडली का द्वितीय भाव धन और कुटुंब का स्थान है जहां धनलक्ष्मी की ऊर्जा विद्यमान होती है जो संचित पूंजी स्वर्ण और परिवार की सुख शांति का निर्धारण करती है।
  • जन्म कुंडली का चतुर्थ भाव सुख और गृह भाव है जो गजलक्ष्मी के अधीन है जिससे जातक को अपने घर सुंदर वाहन और भूमि का सुख प्राप्त होता है।
  • जन्म कुंडली का पंचम भाव बुद्धि और संतान का स्थान है जहां संतानलक्ष्मी का वास होता है जो वंश वृद्धि और पूर्व जन्म के पुण्यों को जाग्रत करती हैं।
  • जन्म कुंडली का सप्तम भाव दांपत्य और दैनिक पोषण का केंद्र है जो धान्यलक्ष्मी की कृपा से संचालित होता है जिससे परिवार का पोषण और दांपत्य जीवन सुखी रहता है।
  • जन्म कुंडली का नवम भाव भाग्य धर्म और उच्च ज्ञान का स्थान है जहां विद्यालक्ष्मी की कृपा से जातक को शास्त्रों का ज्ञान और गुरु की कृपा सुलभ होती है।
  • जन्म कुंडली का दशम भाव कर्म और सत्ता का स्थान है जहां विजयलक्ष्मी विराजमान होती हैं जो मनुष्य को उसके कार्यक्षेत्र में अद्वितीय विजय और यश दिलाती हैं।
  • जन्म कुंडली का एकादश भाव लाभ और समस्त इच्छाओं की पूर्ति का स्थान है जहां धैर्यलक्ष्मी की स्थिरता से व्यक्ति को निरंतर आर्थिक लाभ और धैर्य प्राप्त होता है।

अष्टलक्ष्मी और कुंडली के आठ भावों का ज्योतिषीय संबंध

अष्टलक्ष्मी स्वरूप जन्म कुंडली भाव अधिष्ठाता ग्रह सांसारिक और आध्यात्मिक प्रभाव
आदिलक्ष्मी प्रथम भाव लग्न आत्मा कारक सूर्य देव दीर्घायु शारीरिक तेज और आत्मिक चेतना का जागरण
धनलक्ष्मी द्वितीय भाव कोष वाणी कारक बुध देव संचित धन स्वर्ण संपदा और मधुर वाणी का वरदान
गजलक्ष्मी चतुर्थ भाव सुख सुख कारक शुक्र देव भव्य भवन वाहन सुख और राजसी मान सम्मान
संतानलक्ष्मी पंचम भाव संतति ज्ञान कारक देवगुरु बृहस्पति सुयोग्य संतान वंश वृद्धि और तीव्र बुद्धि विवेक
धान्यलक्ष्मी सप्तम भाव पोषण पोषण कारक चंद्र देव अन्न धान्य की प्रचुरता और दांपत्य सुख का विस्तार
विद्यालक्ष्मी नवम भाव धर्म धर्म कारक देवगुरु बृहस्पति आध्यात्मिक ज्ञान उच्च विद्या और ईश्वरीय अनुग्रह
विजयलक्ष्मी दशम भाव कर्म पराक्रम कारक मंगल देव कार्यक्षेत्र में सफलता राजपक्ष से लाभ और कीर्ति
धैर्यलक्ष्मी एकादश भाव लाभ स्थिरता कारक शनि देव संकटों में अचल धैर्य आय की निरंतरता और सिद्धि

क्या अष्टलक्ष्मी साधना से जीवन का प्रत्येक अभाव मिटता है?

मानव जीवन की सबसे बड़ी त्रासदी यह है कि मनुष्य अपनी संपूर्ण ऊर्जा केवल धनलक्ष्मी को प्रसन्न करने में व्यर्थ कर देता है। वह दिन रात केवल कागजी मुद्रा और स्वर्ण के पीछे भागता है किंतु धान्य धैर्य और विद्या की उपेक्षा कर बैठता है। परिणाम यह होता है कि धन आने के पश्चात भी उसके घर में रोग क्लेश संतानहीनता और मानसिक अशांति का साम्राज्य स्थापित हो जाता है।

अष्टलक्ष्मी की समग्र साधना मनुष्य को यह दिव्य दृष्टि देती है कि सच्चा वैभव सर्वांगीण होता है। जब साधक के जीवन में आदिलक्ष्मी से स्वास्थ्य धान्यलक्ष्मी से अन्न धैर्यलक्ष्मी से शांति गजलक्ष्मी से वाहन संतानलक्ष्मी से कुल विजयलक्ष्मी से यश विद्यालक्ष्मी से विवेक और धनलक्ष्मी से द्रव्य का आगमन एक साथ होता है तब उसका जीवन एक पूर्ण खिले हुए कमल के समान सुवासित हो जाता है।

यह साधना अंतःकरण की संकीर्णता को मिटाकर जातक को तीनों लोकों के सुखों का स्वामी बना देती है। जो परिवार पीढ़ी दर पीढ़ी दरिद्रता और संघर्षों से जूझ रहे हैं उनके लिए अष्टलक्ष्मी की नित्य आराधना एक कल्पवृक्ष के समान सिद्ध होती है जो उनके भाग्य के बंद द्वारों को तत्काल खोल देती है।

अष्टवैभव प्राप्ति और दरिद्रता नाश के अचूक वैदिक उपाय

यदि किसी जातक की जन्म कुंडली में दरिद्र योग चल रहा हो जीवन के किसी विशेष क्षेत्र में निरंतर असफलता मिल रही हो अथवा घर में बरकत न रहती हो तो शास्त्रों में अष्टलक्ष्मी की प्रसन्नता हेतु अत्यंत प्रामाणिक उपाय बताए गए हैं।

  • प्रत्येक शुक्रवार अथवा दीपावली की रात्रि में स्नान के उपरांत पूर्व दिशा की ओर मुख करके बैठें और अष्टलक्ष्मी के दिव्य चित्र अथवा श्रीयंत्र के सम्मुख शुद्ध गाय के घी के 8 दीपक प्रज्वलित करें।
  • कमल पुष्प अथवा कमलगट्टे की माला से पावन बीज मंत्र ॐ श्रीं ह्रीं क्लीं अष्टलक्ष्म्यै नमः अथवा ॐ ह्रीं श्रीं क्रीं क्लीं श्रीं लक्ष्मी मम गृहे धनं पूरय पूरय चिंतां दूरय दूरय स्वाहा का कम से कम 108 बार शांत मन से जाप करें।
  • प्रतिदिन प्रातः काल अथवा सायंकाल महर्षि व्यास विरचित पावन श्री अष्टलक्ष्मी स्तोत्र का शुद्ध उच्चारण के साथ पाठ करें जिसमें माता के आठों स्वरूपों की दिव्य वंदना की गई है।
  • प्रत्येक शुक्रवार को देवी को केसर युक्त शुद्ध गाय के दूध से बनी चावल की खीर बताशे और मखाने का भोग लगाएं तथा उस प्रसाद को परिवार के समस्त सदस्यों में वितरित करें।
  • जातक को अपनी शारीरिक अवस्था और योग्य ज्योतिर्विद के परामर्श के अनुसार सात मुखी अथवा आठ मुखी नेपाली रुद्राक्ष चांदी के तार में पिरोकर शुक्रवार के दिन धारण करना चाहिए जो शुक्र और लक्ष्मी ऊर्जा को जाग्रत करता है।
  • प्रत्येक पूर्णिमा अथवा शुक्रवार को किसी निर्धन अनाथालय अथवा वृद्धाश्रम में अन्न वस्त्र फल और दक्षिणा का आदरपूर्वक दान करें तथा सफेद गाय को ताजी रोटी पर घी और गुड़ रखकर खिलाएं।

अष्टलक्ष्मी साधना के आवश्यक शास्त्रीय नियम

क्या अवश्य करें किन गलतियों से सर्वथा दूर रहें
प्रतिदिन प्रातः काल उठकर अपने घर के पूजा स्थल और मुख्य द्वार को स्वच्छ रखें सूर्यास्त के समय घर में झाड़ू लगाना सोना अथवा किसी को धन देना सर्वथा वर्जित रखें
माता अष्टलक्ष्मी को सदैव ताजे कमल पुष्प गुलाब श्वेत चंदन और शुद्ध घी अर्पित करें घर की स्त्रियों अपनी माता कन्याओं और बहुओं का कभी भी अपमान न करें
शुक्रवार के दिन पूर्ण स्वच्छता ब्रह्मचर्य और सात्विक फलाहार का पालन करें तामसिक भोजन मदिरा जुआ और किसी भी प्रकार के अनैतिक कर्मों से दूर रहें
अपनी आय का दसवां अंश सदैव धर्म गौ सेवा और भूखों के भोजन में लगाएं अपने ज्ञान पद कुल अथवा धन का समाज में कभी भी झूठा अहंकार न करें
पूजा में शुद्ध गाय के घी का दीपक और कमलगट्टे की माला का ही प्रयोग करें बिना सोचे समझे किसी पर क्रोध करने अथवा अन्न का तिरस्कार करने से बचें

समग्र ऐश्वर्य और आत्मिक पूर्णता का दिव्य आलोक

भगवती अष्टलक्ष्मी का पावन प्राकट्य संपूर्ण मानव जाति को यह सनातन शिक्षा प्रदान करता है कि इस संसार में परमात्मा का ऐश्वर्य अनंत है और उसे प्राप्त करने का मार्ग केवल लोभ नहीं अपितु पात्रता है। जब मनुष्य अपने कर्मों को धर्म से अपनी वाणी को सत्य से और अपने धन को सेवा से जोड़ देता है तब माता महालक्ष्मी उसके घर में स्थायी रूप से वास करने के लिए विवश हो जाती हैं। आठों लक्ष्मियां वास्तव में जीवन के वे 8 खंभे हैं जिन पर धर्म अर्थ काम और मोक्ष का भव्य भवन खड़ा होता है। जब मनुष्य का शरीर स्वस्थ मन शांत बुद्धि निर्मल और तिजोरी समृद्ध होती है तब वह इस धरा पर साक्षात देव तुल्य जीवन व्यतीत करता है। अष्टलक्ष्मी का नित्य स्मरण मनुष्य के जीवन से समस्त प्रकार की कंगाली अज्ञान और ग्रह दोषों को समाप्त करके उसे 64 प्रकार के ऐश्वर्यों से युक्त एक तेजस्वी धर्मनिष्ठ और सम्मानित व्यक्तित्व बनाकर अंततः परम शांति की प्राप्ति कराता है।

FAQ

अष्टलक्ष्मी के अंतर्गत कौन सी आठ देवियां सम्मिलित हैं? अष्टलक्ष्मी के अंतर्गत आदिलक्ष्मी धान्यलक्ष्मी धैर्यलक्ष्मी गजलक्ष्मी संतानलक्ष्मी विजयलक्ष्मी विद्यालक्ष्मी और धनलक्ष्मी के पावन स्वरूप सम्मिलित हैं।

ज्योतिष में अष्टलक्ष्मी का संबंध जन्म कुंडली के किन प्रमुख भावों से है? वैदिक ज्योतिष में अष्टलक्ष्मी सीधे तौर पर जन्म कुंडली के आठ प्रमुख भावों 1 2 4 5 7 9 10 और 11 को संतुलित और ऊर्जावान बनाती हैं।

दरिद्रता के समूल नाश और अष्टवैभव प्राप्ति हेतु किस स्तोत्र का पाठ सर्वोत्तम है? जीवन के प्रत्येक कोने से दरिद्रता को मिटाने हेतु प्रतिदिन प्रातः काल पावन श्री अष्टलक्ष्मी स्तोत्र और कनकधारा स्तोत्र का पाठ करना सर्वोत्तम माना गया है।

अष्टलक्ष्मी की पूजा में किस विशेष माला से मंत्र जाप करना चाहिए? अष्टलक्ष्मी की कृपा शीघ्र प्राप्त करने हेतु शुद्ध कमलगट्टे की माला अथवा स्फटिक की माला से मंत्र जप करना शास्त्रों में अत्यंत प्रभावशाली बताया गया है।

गजलक्ष्मी स्वरूप का प्राकट्य किस ऐतिहासिक घटना से जुड़ा हुआ है? गजलक्ष्मी का प्राकट्य देवताओं और असुरों द्वारा किए गए क्षीरसागर के समुद्र मंथन के समय हुआ था जहां दो श्वेत गजों ने उनका अभिषेक किया था।

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लेखक

पं. नरेंद्र शर्मा

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