अश्वत्थामा अवतार और मंगल रहस्य क्या?

By पं. सुव्रत शर्मा

द्रोणाचार्य का घोर तप मस्तक की दिव्य मणि और मंगल के अजेय पराक्रम का संपूर्ण वैदिक ज्योतिषीय रहस्य

अश्वत्थामा अवतार कथा और मंगल ग्रह रहस्य

अश्वत्थामा पूजन विधान और ज्योतिषीय नियम

सनातन वैदिक परंपरा में देवाधिदेव भगवान शिव के परम तेजस्वी रुद्रावतार और अष्टचिरंजीवियों में प्रमुख योद्धा के रूप में पूजित भगवान अश्वत्थामा का प्राकट्य अमोघ शारीरिक बल युद्ध कौशल और अमरता का सर्वोच्च शिखर है। वैदिक ज्योतिष के अंतर्गत सौरमंडल के सेनापति मंगल देव के अजेय पराक्रम बाहुबल और रक्त तत्व को जाग्रत करने तथा जन्म कुंडली में मंगल की प्रतिकूल स्थिति को संतुलित करने के लिए भगवान अश्वत्थामा का स्मरण अत्यंत फलदायी माना गया है। जब जातक की जन्म कुंडली में मंगल ग्रह नीच का होकर अत्यधिक कायरता रक्त विकार दुर्घटना का भय अथवा शत्रुओं के सम्मुख पराजय का योग निर्मित करता है तब अश्वत्थामा स्वरूप का ध्यान चेतना को अदम्य साहस प्रदान करता है। इस पावन अनुष्ठान की तिथि समय और शास्त्रीय घटकों का संपूर्ण विवरण नीचे दी गई तालिका में स्पष्ट रूप से प्रस्तुत किया गया है।

शास्त्रीय आयामअनुष्ठान विवरण और ज्योतिषीय मान्यता
प्रमुख पावन तिथिप्रत्येक मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी अथवा मंगलवार और शिवरात्रि
दैनिक पूजन समयप्रातः कालीन ब्रह्म मुहूर्त अथवा दोपहर का अभिजित मुहूर्त
अधिष्ठाता स्वरूपमस्तक पर दिव्य मणि धारण किए हुए धनुर्धारी चिरंजीवी रुद्रावतार
ज्योतिषीय ग्रह संबंधअदम्य पराक्रम के स्वामी मंगल देव तृतीय भाव और षष्ठ भाव
मुख्य पूजन सामग्रीरक्त चंदन लाल पुष्प शुद्ध गाय का घी तांबे का पात्र और दूर्वा
प्रधान वैदिक अनुष्ठानशिव तांडव स्तोत्र पाठ रुद्राभिषेक और ॐ नमो भगवते अश्वत्थाम्ने नमः जप
अपेक्षित फलमंगल दोष निवारण भय मुक्ति शारीरिक बल वृद्धि और अजेय पराक्रम

द्रोणाचार्य का घोर तप और रुद्रावतार प्राकट्य

द्वापर युग के आरंभ में जब कौरवों और पांडवों के कुलगुरु भारद्वाज नंदन महर्षि द्रोणाचार्य का विवाह कृपाचार्य की बहन परम विदुषी माता कृपी के साथ संपन्न हुआ तब उन्होंने एक अत्यंत तेजस्वी और कालजयी पुत्र की कामना की। महर्षि द्रोणाचार्य स्वयं अस्त्र शस्त्र विद्या के अद्वितीय आचार्य थे किंतु वे जानते थे कि आने वाले युग में अधर्म का प्रसार रोकने के लिए एक ऐसे बालक की आवश्यकता होगी जिसके भीतर भगवान शिव का साक्षात संहारक तेज विद्यमान हो। इस पावन संकल्प की सिद्धि हेतु महर्षि द्रोणाचार्य ने हिमालय की सुरम्य गुफाओं में जाकर देवाधिदेव महादेव की अत्यंत कठोर और उग्र तपस्या आरंभ की।

महर्षि द्रोणाचार्य ने सहस्रों वर्षों तक केवल वायु का भक्षण करके भगवान शिव के अघोर स्वरूप का ध्यान किया। उनकी अनन्य भक्ति और निष्काम तपस्या से संतुष्ट होकर भगवान आशुतोष शिव ने उन्हें साक्षात दर्शन दिए और वरदान मांगने को कहा। महर्षि द्रोणाचार्य ने करबद्ध होकर प्रार्थना की कि हे देवाधिदेव मुझे आपके ही समान एक अजेय अमर और वीर पुत्र की प्राप्ति हो। भगवान शिव ने तथास्तु कहकर वरदान दिया कि वे स्वयं अपने उग्र रुद्र अंश से उनके गृह में पुत्र रूप में जन्म लेंगे।

कुछ समय पश्चात माता कृपी के गर्भ से भगवान शिव के अंशावतार के रूप में एक अत्यंत अलौकिक बालक का जन्म हुआ। जब उस बालक का जन्म हुआ तब उसने सामान्य बालकों की भांति रोने के स्थान पर उच्चैःश्रवा अश्व के समान एक अत्यंत गंभीर और ओजस्वी हिनहिनाहट की ध्वनि उत्पन्न की। उस दिव्य ध्वनि से संपूर्ण दिशाएं गूंज उठीं। आकाश से देववाणी हुई कि इस बालक की ध्वनि अश्व के समान प्रतापी है इसलिए इसका नाम अश्वत्थामा होगा। यह बालक जन्म से ही महादेव के क्रोध यम के संहारक बल और भगवान विष्णु के तेज से समन्वित था।

मस्तक की दिव्य मणि और अष्टचिरंजीवी स्वरूप

भगवान अश्वत्थामा का विग्रह अन्य साधारण मनुष्यों जैसा नश्वर नहीं था। उनके जन्म के साथ ही उनके मस्तक के मध्य भाग में एक अत्यंत दुर्लभ और अलौकिक दिव्य मणि विद्यमान थी। यह मणि केवल कोई रत्न नहीं थी अपितु वह भगवान शिव के परम अनुग्रह का साक्षात कवच थी।

उस दिव्य मणि के प्रभाव से अश्वत्थामा को कभी भी भूख प्यास शारीरिक थकावट अथवा व्याधियों का कष्ट नहीं होता था। संसार का कोई भी अस्त्र शस्त्र गदा बाण अथवा ब्रह्मास्त्र भी उस मणि के रहते अश्वत्थामा के शरीर को स्पर्श नहीं कर सकता था। देवताओं दानवों नागों और यक्षों में से कोई भी शक्ति उन्हें युद्ध में परास्त करने में असमर्थ थी।

सनातन धर्म के शास्त्रों में 8 ऐसे महापुरुषों का वर्णन मिलता है जो काल के चक्र से परे होकर आज भी सदेह इस पृथ्वी पर विद्यमान हैं जिन्हें अष्टचिरंजीवी कहा जाता है।

  • महर्षि वेदव्यास जिन्होंने वेदों का विभाजन किया।
  • राजा बलि जो पाताल लोक के अधिपति और दानवीर हैं।
  • पवनपुत्र हनुमान जो अजर अमर रामदूत हैं।
  • लंकापति विभीषण जो धर्म के रक्षक हैं।
  • कृपाचार्य जो महाभारत के अमर महारथी हैं।
  • भगवान परशुराम जो भगवान विष्णु के आवेशावतार हैं।
  • महर्षि मार्कंडेय जिन्होंने मृत्यु को भी जीत लिया।
  • भारद्वाज पुत्र अश्वत्थामा जो साक्षात रुद्रावतार हैं।

पौराणिक मान्यताओं के अनुसार भगवान अश्वत्थामा आज भी हिमालय के घने वनों नर्मदा के पावन तटों और मध्य भारत के प्राचीन असीरगढ़ दुर्ग के शिव मंदिर में प्रतिदिन प्रातः काल भगवान शिव की प्रथम पूजा करने आते हैं। उनकी अमरता यह प्रमाणित करती है कि शिव का संकल्प काल की सीमाओं में नहीं बंधता।

महाभारत युद्ध और अजेय योद्धा का पराक्रम

महाभारत के महासमर में अश्वत्थामा कौरव सेना के एक ऐसे महारथी थे जिनकी तुलना केवल अर्जुन और कर्ण से ही की जा सकती थी। उन्होंने अपने पिता द्रोणाचार्य से धनुर्वेद की समस्त गूढ़ विधाएं सीखी थीं और स्वयं भगवान शिव से अत्यंत विध्वंसक नारायणास्त्र और आग्नेयास्त्र प्राप्त किए थे। कुरुक्षेत्र के युद्ध में जब पांडवों की विशाल सेना ने कौरव सेना को क्षत विक्षत कर दिया तब अश्वत्थामा का पराक्रम देखकर स्वयं भगवान श्री कृष्ण भी सावधान हो गए थे।

जब छल से महर्षि द्रोणाचार्य का वध कर दिया गया तब अश्वत्थामा के भीतर का रुद्रावतार प्रचंड अग्नि की भांति प्रज्वलित हो उठा। उन्होंने नारायणास्त्र का संधान किया जिससे संपूर्ण पांडव सेना में हाहाकार मच गया। केवल भगवान श्री कृष्ण के निर्देश पर अस्त्र त्यागने के कारण ही पांडव उस दिन जीवित बच सके। युद्ध के अंतिम चरण में जब दुर्योधन मृत्यु शैया पर पड़ा था तब अश्वत्थामा ने शिव की उपासना करके उनके संहारक तेज को अपने भीतर समाहित किया और पांडव शिविर पर प्रलयंकारी आक्रमण किया।

युद्ध की समाप्ति पर जब अश्वत्थामा ने ब्रह्मास्त्र का संधान किया और अर्जुन ने भी प्रत्युत्तर में ब्रह्मास्त्र छोड़ा तब संपूर्ण पृथ्वी जलने लगी। महर्षि व्यास और नारद के आदेश पर अर्जुन ने अपना अस्त्र वापस खींच लिया किंतु अश्वत्थामा अस्त्र लौटाने की विद्या से अनभिज्ञ थे इसलिए उन्होंने उस अस्त्र को उत्तरा के गर्भ की ओर मोड़ दिया। इस घोर कृत्य से कुपित होकर भगवान श्री कृष्ण ने बालक परीक्षित की रक्षा की और अश्वत्थामा के मस्तक से वह दिव्य मणि निकाल ली। भगवान श्री कृष्ण ने उन्हें शाप दिया कि वे 3000 वर्षों तक इस धरा पर घावों और पीड़ा के साथ भटकेंगे। यह शाप वस्तुतः एक महान आध्यात्मिक तपस्या थी जिसने अश्वत्थामा के अहंकार को भस्म करके उन्हें पुनः एक शांत और स्थितप्रज्ञ चिरंजीवी योगी के रूप में स्थापित कर दिया।

महर्षि पराशर अनुसार मंगल का अजेय योद्धा तत्व

वैदिक ज्योतिष के महानतम ग्रंथ बृहत् पराशर होरा शास्त्र में महर्षि पराशर ने स्पष्ट प्रतिपादित किया है कि नवग्रहों में मंगल देव को शक्ति बाहुबल साहस अस्त्र शस्त्र और युद्ध कौशल का सर्वोच्च अधिपति माना गया है। ज्योतिषीय दृष्टिकोण से भगवान अश्वत्थामा का स्वरूप सीधे तौर पर मंगल ग्रह के उस अदम्य और कभी पराजित न होने वाले योद्धा भाव का प्रतिनिधित्व करता है जो मृत्यु के भय से सर्वथा मुक्त है।

जन्म कुंडली में मंगल ग्रह अग्नि तत्व और रक्त मज्जा का स्वामी है। जब किसी जातक की कुंडली में मंगल बली होता है तो व्यक्ति निडर साहसी और विपरीत परिस्थितियों में पर्वत की भांति अडिग रहता है। कुंडली का तृतीय भाव पराक्रम और भुजाओं के बल का स्थान होता है तथा षष्ठ भाव शत्रुओं पर विजय और युद्ध कला का केंद्र होता है। जब इन भावों पर मंगल का शुभ प्रभाव पड़ता है तब जातक में अश्वत्थामा जैसी नेतृत्व क्षमता और युद्ध कौशल का विकास होता है।

परंतु जब कुंडली में मंगल निर्बल अथवा पीड़ित होता है तो मनुष्य के भीतर अत्यधिक कायरता आ जाती है वह अपने अधिकारों के लिए लड़ने का साहस खो देता है और जीवन भर दूसरों के शोषण का शिकार होता है। अश्वत्थामा का चरित्र यह सिखाता है कि आत्मरक्षा और धर्म की प्रतिष्ठा हेतु शक्ति का संचय अत्यंत आवश्यक है। जब मंगल की ऊर्जा को शिव भक्ति का संबल मिल जाता है तो वह अनियंत्रित क्रोध न बनकर एक दिव्य रक्षक शक्ति बन जाती है।

क्या शारीरिक दुर्बलता और भय से मुक्ति संभव है?

आधुनिक युग में मनुष्य की सबसे बड़ी विडंबना यह है कि वह भौतिक रूप से संपन्न होने के बाद भी आंतरिक रूप से भयभीत और दुर्बल रहता है। छोटी सी चुनौती आने पर हृदय की धड़कनें बढ़ जाना निर्णय न ले पाना अथवा शत्रुओं के भय से अवसाद में चले जाना वस्तुतः मंगल तत्व के क्षीण होने के लक्षण हैं।

भगवान अश्वत्थामा की साधना जातक के शरीर के भीतर सुप्त प्राण अग्नि को प्रज्वलित करती है। उनके मस्तक पर स्थित वह दिव्य मणि वस्तुतः आज्ञा चक्र की उस प्रसुप्त शक्ति का प्रतीक है जो जागृत होने पर मनुष्य को भूख प्यास और भय के बंधनों से मुक्त कर देती है। जब कोई साधक अश्वत्थामा के पावन स्वरूप का ध्यान करता है तो उसकी रीढ़ में स्थित कुंडलिनी शक्ति ऊपर उठने लगती है और उसके रक्त में एक नवीन ओज का संचार होता है। यह साधना मनुष्य के भीतर के हीनता बोध को समाप्त करके उसे हर परिस्थिति में विजयी बनाती है।

मंगल दोष शांति और साहस संवर्धन के अचूक उपाय

यदि किसी जातक की जन्म कुंडली में मंगल नीच राशि कर्क में स्थित हो मांगलिक दोष के कारण विवाह में बाधाएं आ रही हों अथवा जातक अत्यधिक डरपोक और शारीरिक रूप से दुर्बल हो तो शास्त्रों में इसके निवारण हेतु अत्यंत प्रामाणिक वैदिक उपाय बताए गए हैं।

  • प्रतिदिन प्रातः काल स्नान के उपरांत पूर्व दिशा की ओर मुख करके बैठें और तांबे के पात्र में रखे जल का आचमन करके भगवान अश्वत्थामा और शिवजी के उग्र स्वरूप का ध्यान करते हुए ॐ नमो भगवते अश्वत्थाम्ने नमः अथवा ॐ नमः शिवाय मंत्र का 108 बार शांत मन से जाप करें।
  • प्रत्येक मंगलवार को किसी प्राचीन शिव मंदिर में जाकर शिवलिंग पर शुद्ध गंगाजल और लाल चंदन अर्पित करें तथा भगवान शिव के सम्मुख चमेली के तेल का दीपक प्रज्वलित करें।
  • अपने भीतर अदम्य साहस और एकाग्रता जाग्रत करने के लिए नियमित रूप से महर्षि वेदव्यास रचित शिव तांडव स्तोत्र अथवा मंगल स्तोत्र का पाठ करें।
  • प्रत्येक मंगलवार को निर्धन बालकों अथवा सैनिकों व सुरक्षाकर्मियों को ताजी मीठी पूड़ी गुड़ अथवा लाल मसूर की दाल का आदरपूर्वक दान करें।
  • जातक को अपनी शारीरिक अवस्था और योग्य ज्योतिर्विद के परामर्श के अनुसार तीन मुखी नेपाली रुद्राक्ष तांबे के तार अथवा लाल रेशमी धागे में पिरोकर गले में धारण करना चाहिए जो मंगल की अग्नि को संतुलित करता है।
  • घर के पूजा स्थल पर तांबे से निर्मित त्रिशूल अथवा मंगल यंत्र स्थापित करें और नित्य उसके सम्मुख धूप दीप अर्पित करें जिससे घर के भीतर व्याप्त समस्त नकारात्मक भय और नजर दोष समाप्त हो जाते हैं।

अश्वत्थामा साधना के आवश्यक शास्त्रीय नियम

क्या अवश्य करेंकिन गलतियों से सर्वथा दूर रहें
प्रतिदिन प्रातः काल सूर्योदय से पूर्व शय्या का त्याग करेंसंकट के समय घबराकर अपने कर्तव्य पथ से कभी न भागें
अपने शारीरिक बल और पराक्रम का प्रयोग सदैव दुर्बलों की रक्षा हेतु करेंअपने बल विद्या अथवा पद का तनिक भी अहंकार न करें
मंगलवार के दिन पूर्णतः सात्विक और फलाहारी भोजन ग्रहण करेंमदिरा मांसाहार और तामसिक पदार्थों का सेवन सर्वथा वर्जित रखें
अपने माता पिता गुरुजनों और वीरों का सदैव सम्मान करेंकिसी भी निहत्थे असहाय अथवा अबोध बालक पर कभी वार न करें
पूजा में लाल चंदन लाल कनेर पुष्प और शुद्ध घी का प्रयोग करेंबिना कुंडली परीक्षण के मूंगा रत्न धारण करने की भूल न करें

अमोघ पराक्रम और अमर चेतना का जागरण

भगवान शिव का अश्वत्थामा अवतार संपूर्ण मानव जाति को यह सनातन सत्य सिखाता है कि इस संसार में जीवित रहना पर्याप्त नहीं है अपितु सार्थकता इस बात में है कि मनुष्य किस प्रकार अपने आत्म सम्मान और धर्म की रक्षा करता है। शक्ति विहीन भक्ति प्रायः लाचार हो जाती है और भक्ति विहीन शक्ति भयंकर विनाश का कारण बनती है। महर्षि द्रोणाचार्य के पुत्र अश्वत्थामा ने अपने तपोबल से यह सिद्ध किया कि जब मनुष्य अपने भीतर की सुप्त शक्तियों को ईश्वर के चरणों में समर्पित कर देता है तो वह काल के बंधनों से भी मुक्त हो जाता है। मंगल ग्रह का वास्तविक वरदान केवल युद्ध जीतना नहीं अपितु अपने भीतर के भय आलस्य और संशयों को समूल नष्ट करना है। भगवान अश्वत्थामा का नित्य स्मरण मनुष्य के भीतर सोए हुए शौर्य को जाग्रत करता है उसे समस्त शारीरिक और मानसिक दुर्बलताओं से मुक्त करता है और उसे इस संसार में एक तेजस्वी निडर और सम्मानित व्यक्तित्व बनाकर अंततः परम पद की प्राप्ति कराता है।

FAQ

भगवान अश्वत्थामा किसके अवतार माने जाते हैं? भगवान अश्वत्थामा देवाधिदेव भगवान शिव के उग्र ग्यारहवें रुद्रावतार के अंश माने जाते हैं जो महर्षि द्रोणाचार्य के घोर तप से उत्पन्न हुए थे।

अश्वत्थामा के मस्तक पर कौन सी दिव्य वस्तु जन्म से विद्यमान थी? भगवान अश्वत्थामा के मस्तक पर जन्म से ही एक अत्यंत अलौकिक दिव्य मणि विद्यमान थी जो उन्हें भूख प्यास अस्त्र शस्त्र और देवताओं के भय से मुक्त रखती थी।

सनातन परंपरा में अष्टचिरंजीवी किन्हें कहा जाता है? अष्टचिरंजीवी वे 8 अमर महापुरुष हैं जो काल के प्रभाव से परे होकर आज भी जीवित माने जाते हैं जिनमें अश्वत्थामा बलि व्यास हनुमान विभीषण कृपाचार्य परशुराम और मार्कंडेय सम्मिलित हैं।

ज्योतिष में अश्वत्थामा अवतार का संबंध किस ग्रह से माना गया है? वैदिक ज्योतिष में भगवान अश्वत्थामा का सीधा संबंध सौरमंडल के सेनापति उग्र अग्नि तत्व के स्वामी मंगल ग्रह और अदम्य युद्ध कौशल से माना गया है।

मंगल दोष और अत्यधिक भय से मुक्ति के लिए किस मंत्र का जाप करना चाहिए? मंगल दोष शांति और भय से मुक्ति हेतु प्रतिदिन प्रातः काल ॐ नमो भगवते अश्वत्थाम्ने नमः अथवा शिव पंचाक्षर मंत्र का 108 बार जाप करना सर्वश्रेष्ठ माना गया है।

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लेखक

पं. सुव्रत शर्मा

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