अश्विनी कुमार अवतार का रहस्य क्या है?

By पं. अभिषेक शर्मा

सूर्य और संज्ञा के दिव्य मिलन से जन्मे देव वैद्यों की कथा

अश्विनी कुमार अवतार और नक्षत्र का संपूर्ण रहस्य

आरोग्य अनुष्ठान और दैनिक वैदिक साधना विधि

वैदिक परंपरा में अश्विनी कुमारों को संपूर्ण ब्रह्मांड का प्रथम और सर्वोपरि चिकित्सक माना गया है। इनकी उपासना केवल दैहिक व्याधियों का निवारण नहीं करती, अपितु यह मनुष्य की चेतना में प्राण ऊर्जा का तीव्र संचार कर चित्त को ओजस्वी बनाती है। जब भी किसी जातक को असाध्य रोगों, स्नायु दुर्बलता अथवा प्राण शक्ति के क्षय का सामना करना पड़ता है, तब वैदिक ऋषि अश्विनी साधना का आश्रय लेने का निर्देश देते हैं। इस अनुष्ठान को संपन्न करने के लिए शुभ मुहूर्त, शुद्ध सामग्री और निश्चित नियमों का परिपालन अनिवार्य है।

साधना अंगवैदिक विधान और अनुष्ठान निर्देश
शुभ काल और मुहूर्तअश्विनी नक्षत्र से युक्त शुक्ल पक्ष प्रतिपदा अथवा मंगलवार और रविवार
अधिष्ठाता देवताभगवान सूर्य नारायण और दिव्य अश्विनी कुमार युगल
बीज मंत्र जपॐ अश्विनावे नमः अथवा ॐ नासत्याभ्यां नमः
पूजन सामग्रीशुद्ध गोघृत, तांबे का कलश, लाल चंदन, दूर्वा, त्रिफला और अश्वगंधा
आध्यात्मिक फलदीर्घायु, जटिल व्याधियों का शमन, स्नायु तंत्र की पुष्टि और प्राण शुद्धि

इस साधना को प्रारंभ करने के लिए सूर्योदय से पूर्व ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नानादि से निवृत्त होना चाहिए। तांबे के एक शुद्ध पात्र में जल भरकर उसमें लाल चंदन, अक्षत और दूर्वा अर्पित करें। इसके उपरांत पूर्व दिशा की ओर मुख करके बैठें और सूर्य देव को अर्घ्य प्रदान करते हुए दोनों अश्विनी कुमारों का ध्यान करें।

  • शुद्ध ताम्र पात्र में स्थापित जल के सम्मुख अश्विनी बीज मंत्र का 108 बार जप करें
  • जप काल में मन के समस्त संशयों और नकारात्मक विचारों को त्यागकर शरीर के भीतर दिव्य तेज के प्रवेश की भावना करें
  • मंत्र जप पूर्ण होने के पश्चात उस अभिमंत्रित जल का आधा भाग स्वयं औषधि रूप में ग्रहण करें और आधा भाग तुलसी के पौधे में अर्पित करें
  • इस अनुष्ठान के दिनों में तामसिक भोजन, कटु वाणी और अनैतिक आचरण से पूर्णतः दूर रहें
  • प्रातःकाल खुली वायु में प्राणायाम करते हुए सूर्य की प्रथम रश्मियों को अपने मस्तक और नेत्रों पर धारण करें

नियमित रूप से इस साधना का पालन करने पर व्यक्ति की रोग प्रतिरोधक क्षमता में अप्रत्याशित वृद्धि होती है। स्नायु दुर्बलता और रक्त विकार शांत होने लगते हैं। यह साधना मनुष्य को मात्र शारीरिक रूप से ही सबल नहीं बनाती, अपितु उसे मानसिक अवसाद और भय से मुक्त कर नवजीवन का आभास कराती है।

संज्ञा का कठोर तप और उत्तर कुरु की पावन भूमि

सृष्टि के आरंभ में भगवान सूर्य का तेज इतना प्रखर और असह्य था कि उनके निकट जाना किसी भी प्राणी के लिए संभव नहीं था। देव शिल्पी विश्वकर्मा की पुत्री संज्ञा का विवाह सूर्य नारायण के साथ हुआ था। यद्यपि संज्ञा परम पतिव्रता और शीलवती थीं, तथापि वे सूर्य देव के प्रचंड ताप, जाज्वल्यमान किरणों और असहनीय ऊर्जा को सहन करने में असमर्थ हो रही थीं। उनके नेत्र सूर्य के सम्मुख आते ही झुलसने लगते थे और उनका शरीर निरंतर ताप से दग्ध होता रहता था। इस असह्य स्थिति से संज्ञा का जीवन अत्यंत कष्टकर हो गया।

संज्ञा ने विचार किया कि यदि वे इस ताप को शांत करने के लिए कोई कठोर उपाय नहीं करेंगी, तो उनका अस्तित्व ही संकट में पड़ जाएगा। उन्होंने अपने तपोबल से अपने ही शरीर के सदृश एक छाया रूपी स्त्री का निर्माण किया। इस छाया नारी का नाम उन्होंने छाया अथवा संवर्णा रखा। संज्ञा ने छाया को आदेश दिया कि वह उनकी अनुपस्थिति में भगवान सूर्य की सेवा करे और उनके तीन संतानों, वैवस्वत मनु, यम और यमी का पालन अपनी सगी संतानों की भांति करे। संज्ञा ने छाया से यह कठोर प्रतिज्ञा भी ली कि वह इस रहस्य को कभी किसी के सम्मुख प्रकट नहीं करेगी।

इसके पश्चात देवी संज्ञा अपने पिता विश्वकर्मा के भवन पहुंचीं। जब पिता ने उन्हें समझाया कि बिना पति की आज्ञा के मायके में रहना धर्मसंगत नहीं है, तब संज्ञा वहां से भी प्रस्थान कर गईं। वे उत्तर कुरु के अत्यंत शीतल, शांत और पवित्र भूभाग में चली गईं। वहां उन्होंने विचार किया कि यदि वे अपने मूल स्त्री रूप में विचरण करेंगी, तो कोई भी उन्हें पहचान सकता है। अतः उन्होंने एक घोटकी अर्थात अश्विनी (घोड़ी) का रूप धारण कर लिया। वे हरित तृण का भक्षण करते हुए भगवान सूर्य के ताप को शांत करने और अपनी आंतरिक शक्ति को पुनः जागृत करने के लिए घोर तपस्या में लीन हो गईं।

अश्व रूप में सूर्य का मिलन और कुमारों का प्राकट्य

इधर सूर्य लोक में छाया देवी पत्नी धर्म का निर्वाह करती रहीं। समय बीतने पर छाया के गर्भ से सावर्णि मनु, शनि देव और भद्रा (ताप्ती) का जन्म हुआ। अपनी स्वयं की संतानें होने के पश्चात छाया के मन में संज्ञा के संतानों के प्रति सौतेला भाव उत्पन्न होने लगा। एक दिन जब यमराज ने छाया के इस पक्षपातपूर्ण व्यवहार का विरोध किया, तो क्रोधित होकर छाया ने यमराज को शाप दे दिया। वैदिक धर्म का अकाट्य नियम है कि कोई भी सगी माता अपने ही पुत्र को कभी ऐसा प्राणघाती शाप नहीं दे सकती।

यमराज ने तुरंत यह वृत्तांत अपने पिता सूर्य देव को सुनाया। सूर्य नारायण ने अपनी दिव्य दृष्टि से देखा और छाया से सत्य कहने का आग्रह किया। भयभीत होकर छाया ने संपूर्ण रहस्य प्रकट कर दिया कि वास्तविक संज्ञा बहुत पहले ही तपस्या हेतु प्रस्थान कर चुकी हैं। सत्य ज्ञात होते ही भगवान सूर्य अत्यंत विचलित हुए और वे संज्ञा को खोजते हुए देव शिल्पी विश्वकर्मा के पास पहुंचे। विश्वकर्मा ने सूर्य देव के असह्य ताप को शांत करने के लिए उन्हें अपने दिव्य चक्र पर चढ़ाया और उनके तेज का आठवां भाग छीलकर कम कर दिया। उसी छांटे गए सौर तेज से विश्वकर्मा ने भगवान शिव का त्रिशूल, श्री हरि विष्णु का सुदर्शन चक्र और कार्तिकेय की शक्ति जैसे अमोघ अस्त्रों का निर्माण किया।

अब सूर्य देव का रूप अत्यंत शांत, मनोहर और सौम्य स्वर्ण आभा से युक्त हो चुका था। उन्होंने अपनी योग दृष्टि से देखा कि संज्ञा उत्तर कुरु में अश्विनी का रूप धारण कर तप कर रही हैं। अपनी प्रिय पत्नी से मिलने और उनका मान रखने के लिए सूर्य देव ने भी एक अत्यंत बलशाली, दिव्य और वेगवान अश्व (घोड़े) का रूप धारण किया। वे उस पावन भूमि पर पहुंचे जहां संज्ञा चर रही थीं।

जब उस दिव्य अश्व और अश्विनी का मिलन हुआ, तब दोनों के नासिका छिद्रों का परस्पर स्पर्श हुआ। दोनों के दिव्य प्राण वायु और सौर तेज के सम्मिश्रण से दो अत्यंत रूपवान, तेजस्वी और मनोहर बालकों का प्राकट्य हुआ। नासिका से जन्म लेने के कारण ही ज्येष्ठ भाई का नाम नासत्य पड़ा और कनिष्ठ भाई का नाम दस्र हुआ। इन दोनों जुड़वां भाइयों को सम्मिलित रूप से अश्विनी कुमार कहा जाता है। इनके अवतरित होते ही संपूर्ण दिशाएं प्रकाशित हो उठीं और स्वर्ग से देवगण पुष्प वर्षा करने लगे।

देव भिषज का पद और महर्षि च्यवन का अद्भुत कायाकल्प

अश्विनी कुमारों के जन्म के पश्चात ब्रह्मा जी ने उन्हें समस्त औषधियों, वनस्पतियों, शल्य क्रियाओं और प्राण विद्या का स्वामी बनाकर देवताओं के प्रधान चिकित्सक अर्थात देव भिषज का पद प्रदान किया। वे दोनों भाई सदा युवा, रूपवान और समस्त ब्रह्मांड में त्वरित गति से भ्रमण करने वाले हैं। वैदिक वांग्मय में महर्षि च्यवन के कायाकल्प की कथा उनके अद्भुत और चमत्कारी चिकित्सा कौशल का सबसे महान प्रमाण है।

भृगुवंशी महर्षि च्यवन एक निर्जन वन में सहस्त्रों वर्षों से समाधिस्थ थे। दीर्घकाल बीतने के कारण उनके शरीर पर दीमकों ने बांबी बना ली थी और वे लता पत्तों से पूरी तरह ढक चुके थे। केवल उनके नेत्रों के दो छिद्र उस मिट्टी के ढेर में चमकते थे। एक दिन राजा शर्याति अपनी रूपवती पुत्री सुकन्या और सेना के साथ उसी वन में आए। राजकुमारी सुकन्या ने कौतूहलवश मिट्टी की उस बांबी में चमकते हुए दो बिंदुओं को जुगनू समझकर तिनके से छेद दिया। ऐसा करते ही महर्षि च्यवन के दोनों नेत्र फूट गए और वे रक्तरंजित हो गए। इस अपराध के कारण राजा शर्याति की सेना का मल मूत्र अवरुद्ध हो गया।

जब राजा को सत्य ज्ञात हुआ, तो वे अत्यंत भयभीत हुए और क्षमा याचना करने लगे। महर्षि के क्रोध को शांत करने के लिए सुकन्या ने स्वेच्छा से उन वृद्ध, नेत्रहीन और जीर्ण शीर्ण ऋषि से विवाह कर लिया। सुकन्या ने अपने पातिव्रत धर्म से वन में अत्यंत निष्ठापूर्वक महर्षि की सेवा प्रारंभ की। एक दिन दोनों अश्विनी कुमार उस आश्रम के समीप से निकले। उन्होंने सुकन्या के अनुपम सौंदर्य और एक वृद्ध नेत्रहीन ऋषि के प्रति उनकी अटूट निष्ठा को देखा। उन्होंने सुकन्या के सतीत्व की परीक्षा लेनी चाही, किंतु सुकन्या अपने धर्म पर अडिग रहीं।

सुकन्या की अनन्य भक्ति से प्रसन्न होकर अश्विनी कुमारों ने महर्षि च्यवन का अंधापन और बुढ़ापा दूर करने का वचन दिया। इसके बदले में उन्होंने प्रार्थना की कि महर्षि उन्हें देवराज इंद्र द्वारा रोके गए सोमरस का भाग यज्ञ में दिलवाएं। अश्विनी कुमारों ने महर्षि च्यवन को एक दिव्य सरोवर में प्रवेश कराया। स्वयं दोनों कुमार भी उस जल में प्रविष्ट हुए। जब तीनों जल से बाहर आए, तो तीनों का रूप, तेज और यौवन बिल्कुल एक समान था।

अश्विनी कुमारों ने सुकन्या से कहा कि वह अपने वास्तविक पति को पहचान ले। सुकन्या ने अपनी अंतर्दृष्टि और पातिव्रत के प्रभाव से महर्षि च्यवन को पहचान लिया। महर्षि च्यवन पुनः सोलह वर्ष के तेजस्वी युवक बन चुके थे और उनके नेत्रों की ज्योति लौट आई थी। इसी ऐतिहासिक घटना की स्मृति में महर्षि ने उस दिव्य रसायन का निर्माण किया, जिसे आज संसार च्यवनप्राश के नाम से जानता है।

आगे चलकर जब महर्षि च्यवन ने राजा शर्याति के यज्ञ में अश्विनी कुमारों को सोमरस का भाग प्रदान किया, तब देवराज इंद्र अत्यंत कुपित हो गए। इंद्र का तर्क था कि अश्विनी कुमार मृत्यु लोक में मनुष्यों की चिकित्सा करते हैं और वैद्यों की भांति भटकते हैं, अतः वे अपवित्र हैं और सोमरस के अधिकारी नहीं हैं। इंद्र ने महर्षि पर वज्र का प्रहार करना चाहा, किंतु महर्षि ने अपने तपोबल से इंद्र की भुजा को जड़वत स्तंभित कर दिया और मद नामक भयानक असुर को उत्पन्न किया। भयभीत होकर इंद्र ने अश्विनी कुमारों की श्रेष्ठता स्वीकार की और उन्हें यज्ञ में सोमपान का शाश्वत अधिकार प्रदान किया।

ज्योतिष शास्त्र में अश्विनी नक्षत्र का आध्यात्मिक प्रभाव क्या है?

वैदिक ज्योतिष में भचक्र के सत्ताईस नक्षत्रों में सर्वदा प्रथम स्थान अश्विनी नक्षत्र को प्राप्त है। कालपुरुष की कुंडली में यह नक्षत्र शून्य अंश से लेकर तेरह अंश बीस कला तक मेष राशि में विस्तृत रहता है। मेष राशि का स्वामी ग्रह मंगल है और अश्विनी नक्षत्र के अधिपति मोक्ष और अध्यात्म के कारक केतु देव हैं। इस नक्षत्र का स्वरूप अश्व के मुख जैसा दिखाई देता है। अश्व शक्ति, वेग, स्फूर्ति, स्वतंत्रता और अदम्य प्राण ऊर्जा का साक्षात प्रतीक है।

ज्योतिषीय तत्व अश्विनी नक्षत्र का विशिष्ट स्वरूप
नक्षत्र चक्र में स्थान 1 अर्थात प्रथम नक्षत्र
राशि विस्तार मेष राशि में 0 अंश से 13 अंश 20 कला तक
नक्षत्र स्वामी ग्रह केतु (आध्यात्मिक जागरण और मोक्ष का कारक)
राशि स्वामी ग्रह मंगल (ऊर्जा, रक्त और साहस का प्रतीक)
नक्षत्र की प्रकृति क्षिप्र और लघु (शीघ्र फल देने वाला)
मुख्य प्रतीक अश्व का सिर (गति और चैतन्य प्राण शक्ति)

अश्विनी नक्षत्र को क्षिप्र अर्थात अत्यंत तीव्र गति वाला नक्षत्र माना गया है। यही कारण है कि इस नक्षत्र में प्रारंभ किए गए कार्य बहुत शीघ्रता से परिणाम देते हैं। यदि किसी व्यक्ति को नवीन व्यापार, विद्या का आरंभ, शल्य चिकित्सा, औषध सेवन, यात्रा अथवा वाहन क्रय करना हो, तो अश्विनी नक्षत्र को सर्वाधिक शुभ माना जाता है।

  • इस नक्षत्र में जन्म लेने वाले जातक साहसी, स्वाभिमानी, ऊर्जावान और अत्यंत फुर्तीले होते हैं
  • केतु के प्रभाव से इन जातकों के भीतर स्वाभाविक रूप से गूढ़ विद्याओं, प्राकृतिक चिकित्सा और मंत्र शक्ति के प्रति आकर्षण होता है
  • मंगल की राशि में स्थित होने के कारण इनकी निर्णय क्षमता अत्यंत त्वरित होती है और ये किसी भी कार्य में विलंब सहन नहीं करते
  • यदि कुंडली में अश्विनी नक्षत्र दूषित हो जाए, तो जातक को स्नायु रोग, सिरदर्द, रक्तचाप अथवा अनिद्रा की समस्या हो सकती है
  • अश्विनी नक्षत्र के जातक प्रायः शल्य चिकित्सक, सैनिक, अनुसंधानकर्ता अथवा सफल उद्यमी बनते हैं

अश्विनी नक्षत्र का प्रथम पाद मेष, द्वितीय वृषभ, तृतीय मिथुन और चतुर्थ पाद कर्क नवांश में पड़ता है। यह नक्षत्र जीवात्मा को संसार में जन्म लेकर अपने कर्मों को तीव्र गति से भोगने और चेतना को उर्ध्वगामी बनाने की प्रेरणा देता है।

चेतना की प्राण ऊर्जा और आयुर्वेद का समन्वय

अश्विनी कुमारों का रहस्य केवल एक पौराणिक कथा मात्र नहीं है, अपितु यह मानव शरीर में प्रवाहित होने वाली प्राण शक्तियों का विशुद्ध विज्ञान है। हठयोग और वैदिक दर्शन के अनुसार हमारे शरीर में दो प्रमुख नाड़ियां विद्यमान हैं, जिन्हें इड़ा और पिंगला कहा जाता है। इड़ा नाड़ी चंद्र स्वर का प्रतीक है जो शीतलता देती है, और पिंगला नाड़ी सूर्य स्वर का प्रतीक है जो उष्णता प्रदान करती है। अश्विनी कुमार वस्तुतः इन्हीं दो विरोधी शक्तियों के मध्य संतुलन स्थापित करने वाले दिव्य प्राण सूत्र हैं।

आयुर्वेद का मूल सिद्धांत वात, पित्त और कफ इन त्रिदोषों के संतुलन पर टिका है। जब शरीर में इन तीनों दोषों की साम्यावस्था बिगड़ती है, तभी व्याधियों का जन्म होता है। अश्विनी कुमार शरीर के प्राण वायु और अपान वायु का नियमन करते हैं। वे सूर्य के प्रकाश से जीवनी शक्ति खींचकर औषधियों में स्थापित करते हैं।

प्रातःकाल का उषा काल वास्तव में अश्विनी कुमारों की सक्रियता का समय है। इस समय प्रकृति में एक विशेष प्रकार का चैतन्य और अमृत तत्व बिखरा होता है। जो मनुष्य इस समय निद्रा का त्याग कर शुद्ध वायु का सेवन करते हैं, उनकी काया स्वतः निरोगी होने लगती है। अश्विनी कुमार यह संदेश देते हैं कि बाह्य औषधियां केवल सहायक हैं, वास्तविक आरोग्य मनुष्य की अपनी प्राण शक्ति और उसकी आत्मिक पवित्रता पर निर्भर करता है। जब मन सत्य में स्थित होता है और जीवन प्रकृति के नियमों के अनुकूल चलता है, तब व्याधियां स्वतः पलायन कर जाती हैं।

शाश्वत आरोग्य का दिव्य प्रकाश

अश्विनी कुमार अवतार हमें सिखाता है कि सेवा, परोपकार और ज्ञान का उपयोग सदैव पीड़ित मानवता के उद्धार के लिए होना चाहिए। देवताओं के चिकित्सक होने के उपरांत भी उन्होंने मृत्यु लोक के दीन हीन प्राणियों की पीड़ा का निवारण करने में कभी संकोच नहीं किया। उनका जीवन इस सत्य का उद्घोष करता है कि सच्चा वैद्य वही है जिसके मन में करुणा और चेतना में ईश्वरीय प्रकाश हो।

संज्ञा की तपस्या और सूर्य के संयम से उत्पन्न यह दिव्य युगल आज भी नक्षत्र रूप में आकाश में स्थित होकर समस्त चराचर जगत को नवजीवन और गति प्रदान कर रहा है। जब भी कोई साधक अपनी दुर्बलताओं पर विजय प्राप्त कर अंतर्मुखी होता है, तब अश्विनी कुमारों की दिव्य ऊर्जा उसके भीतर नवचेतना का संचार करती है। उनका स्मरण मनुष्य को अज्ञान के अंधकार से मुक्त कर पूर्ण स्वास्थ्य, ओज और आत्मिक शांति के परम प्रकाश की ओर अग्रसर करता है।

FAQ

अश्विनी कुमार कौन हैं? अश्विनी कुमार भगवान सूर्य और देवी संज्ञा के अश्व रूप से जन्मे जुड़वां पुत्र नासत्य और दस्र हैं जो देवताओं के प्रधान चिकित्सक हैं।

अश्विनी नक्षत्र के अधिष्ठाता देवता कौन हैं? अश्विनी नक्षत्र के अधिष्ठाता देवता दिव्य अश्विनी कुमार युगल हैं और इस नक्षत्र का ज्योतिषीय स्वामित्व केतु ग्रह के पास है।

महर्षि च्यवन को पुनः यौवन कैसे प्राप्त हुआ? अश्विनी कुमारों ने महर्षि च्यवन को एक दिव्य सरोवर में स्नान कराकर और गोपनीय औषधीय योग द्वारा उनका अंधापन दूर कर उन्हें नवयौवन दिया।

आरोग्य और जीवन शक्ति हेतु कौन सा मंत्र उपयोगी है? आरोग्य लाभ के लिए तांबे के पात्र में जल रखकर ॐ अश्विनावे नमः अथवा ॐ नासत्याभ्यां नमः मंत्र का 108 बार जप करना अत्यंत फलदायी है।

वैदिक ज्योतिष में अश्विनी नक्षत्र का क्या महत्व है? अश्विनी नक्षत्र भचक्र का प्रथम नक्षत्र है जो मेष राशि में स्थित होकर गति, तत्काल स्वास्थ्य लाभ, स्फूर्ति और नवीन कार्यों के आरंभ का प्रतीक है।

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लेखक

पं. अभिषेक शर्मा

पं. अभिषेक शर्मा (63)


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