By पं. नरेंद्र शर्मा
शिव और मोहिनी के पुत्र अयप्पा की कथा महिषी मर्दन और शबरीमला

सनातन वैदिक परंपरा में भगवान अयप्पा को त्याग, अखंड ब्रह्मचर्य और आत्मसंयम का सर्वोच्च विग्रह माना गया है। जब किसी जातक की जन्म कुंडली में शनि की साढ़ेसाती, ढैया, मंगल दोष अथवा सूर्य और शनि के परस्पर द्वंद्व के कारण जीवन में भीषण अशांति, पारिवारिक विघटन और घोर प्रारब्ध कष्ट उपस्थित होते हैं तब भगवान हरिहरपुत्र की साधना समस्त बाधाओं को भस्म कर देती है। शबरीमला की पावन यात्रा और उनका 41 दिवसीय मंडल व्रत मनुष्य के अहंकार को समूल नष्ट कर उसकी आत्मा को शुद्ध चैतन्य से भर देता है। इस विशिष्ट अनुष्ठान को संपन्न करने के लिए कठोर नियमों और वैदिक मर्यादाओं का पालन करना अनिवार्य होता है।
| अनुष्ठान अंग | वैदिक नियम और शास्त्रोक्त निर्देश |
|---|---|
| पावन काल और मास | वृश्चिक मास की प्रथम तिथि से प्रारंभ होकर 41 दिनों का मंडल काल अथवा मकर संक्रांति काल |
| अधिष्ठाता देवता | भगवान हरिहरपुत्र अयप्पा (शिव और मोहिनी रूपी श्रीहरि के दिव्य अंश) |
| सिद्ध महामंत्र | स्वामीये शरणम अयप्पा अथवा ॐ श्री हरिहरपुत्राय नमः |
| पूजन सामग्री | तुलसी अथवा रुद्राक्ष माला, काले या नीले वस्त्र, घी से भरा नारियल, कपूर, चंदन और भस्म |
| आध्यात्मिक फल | शनि साढ़ेसाती के ताप का शमन, घोर प्रारब्ध कर्मों की निवृत्ति, इंद्रिय संयम और मोक्ष प्राप्ति |
इस साधना को प्रारंभ करने के लिए कार्तिक अथवा वृश्चिक मास के आरंभ में किसी योग्य गुरु स्वामी के करकमलों से तुलसी अथवा रुद्राक्ष की माला धारण की जाती है। माला धारण करते ही साधक सांसारिक प्रपंचों से विरक्त होकर अयप्पा रूप बन जाता है। इस व्रत में प्रत्येक साधक को स्वामी कहकर संबोधित किया जाता है जो आत्मा और परमात्मा के अद्वैत भाव को दर्शाता है।
इस कठोर तपस्या का पालन करने से साधक के शरीर और मन के समस्त विकार शांत होने लगते हैं। यह अनुष्ठान मनुष्य को सिखाता है कि जब तक वासनाओं और अहंकार का दमन नहीं होगा तब तक ईश्वर का साक्षात्कार संभव नहीं है।
प्राचीन काल में भस्मासुर नामक दैत्य ने भगवान देवाधिदेव महादेव की घोर तपस्या की। उसकी कठोर साधना से संतुष्ट होकर आशुतोष शिव ने उसे वरदान दिया कि वह जिसके भी सिर पर अपना हाथ रखेगा वह तत्क्षण भस्म होकर राख का ढेर बन जाएगा। वरदान प्राप्त करते ही उस कुटिल असुर के मन में काम वासना जाग उठी और उसने स्वयं भगवान शिव को ही भस्म कर माता पार्वती को प्राप्त करने का दुस्साहस किया।
भगवान शिव उस असुर के भय से भागने लगे और संपूर्ण ब्रह्मांड में हाहाकार मच गया। तब जगत के पालनहार भगवान श्रीहरि विष्णु ने अपने परम सखा शिव की रक्षा हेतु मोहिनी नामक अत्यंत सम्मोहक और रूपवती स्त्री का रूप धारण किया। मोहिनी का लावण्य देखकर भस्मासुर अपने सारे होश खो बैठा और उनके चरणों में गिर पड़ा। मोहिनी ने उसे नृत्य करने की शर्त रखी। नृत्य करते करते जब भस्मासुर ने मोहिनी की भांति अपना हाथ अपने ही सिर पर रखा तो वह अपने ही वरदान की ज्वाला में जलकर भस्म हो गया।
इस संकट के टलने के पश्चात जब भगवान शिव को ज्ञात हुआ कि श्रीहरि ने किस प्रकार मोहिनी बनकर उनकी रक्षा की, तो उनके मन में उस अलौकिक रूप के साक्षात दर्शन की तीव्र इच्छा जाग्रत हुई। देवाधिदेव शिव वैकुंठ पहुंचे और उन्होंने श्रीहरि से पुनः मोहिनी रूप प्रकट करने का विनम्र आग्रह किया।
भगवान विष्णु ने मंद मुस्कान के साथ अपनी योगमाया का विस्तार किया। क्षण भर में संपूर्ण प्रकृति का सौंदर्य एक ओर सिमट गया और भगवान विष्णु ने उस परम सम्मोहक मोहिनी रूप को प्रकट किया जिसकी आभा से तीनों लोकों के मुनि और गंधर्व भी समाधि से विचलित हो सकते थे। उस अनिर्वचनीय रूप को देखकर भगवान शिव के भीतर भी एक दिव्य आध्यात्मिक कंपन उत्पन्न हुआ।
उस पावन क्षण में शिव तत्व और विष्णु तत्व का एक अत्यंत गोपनीय और ऊर्जावान आध्यात्मिक मिलन घटित हुआ। शिव साक्षात संहार और पुरुष तत्व के प्रतीक हैं जबकि विष्णु मोहिनी रूप में साक्षात पालन और प्रकृति की परम माया के प्रतीक हैं। इन दोनों सर्वोच्च शक्तियों के दिव्य तेज के सम्मिलन से एक अत्यंत तेजस्वी बालक का प्राकट्य हुआ। दोनों देवताओं के नाम के समन्वय से इस दिव्य बालक को हरिहरपुत्र कहा गया।
देवताओं के निर्देश पर उस नवजात शिशु को केरल की पावन पम्पा नदी के तट पर एक प्रस्तर खंड पर स्थापित कर दिया गया। बालक के गले में एक अत्यंत सुंदर स्वर्ण की घंटी सुशोभित थी।
उसी समय पंढलम के निसंतान राजा राजशेखर उस सघन वन में आखेट हेतु आए हुए थे। वे धर्मपरायण और न्यायप्रिय राजा थे किंतु कोई संतान न होने के कारण निरंतर मानसिक संताप से ग्रसित रहते थे। जब राजा ने जल पीने हेतु पम्पा नदी का रुख किया तो उन्हें एक नवजात शिशु के रोने की अत्यंत मधुर ध्वनि सुनाई दी। राजा जब उस ध्वनि का पीछा करते हुए पहुंचे तो उन्होंने देखा कि एक अद्भुत कांति वाला बालक अपने नन्हें पैरों को चला रहा है और उसके गले में स्वर्ण की घंटी जगमगा रही है।
राजा आश्चर्यचकित होकर उस बालक को देखने लगे। तभी वहां एक तेजस्वी संन्यासी प्रकट हुए और उन्होंने राजा से कहा कि हे राजन, यह कोई साधारण बालक नहीं है अपितु ईश्वर का साक्षात वरदान है। गले में स्वर्ण घंटी होने के कारण इसका नाम मणिकंदन रखो और इसे अपने महल ले जाकर राजकुमार की भांति इसका पालन करो। जब यह बालक 12 वर्ष का होगा तब तुम्हें इसके वास्तविक ईश्वरीय स्वरूप का बोध हो जाएगा। राजा राजशेखर हर्षित होकर उस बालक को अपने राजमहल ले आए और संपूर्ण पंढलम राज्य में उत्सव मनाया जाने लगा।
राजमहल में मणिकंदन का लालन पालन अत्यंत स्नेह और राजसी वैभव के साथ होने लगा। कुछ ही वर्षों में बालक ने समस्त वेद, उपनिषद, धनुर्विद्या और युद्ध कला में अद्वितीय निपुणता प्राप्त कर ली। उनकी बुद्धि और दयालुता देखकर प्रजा उनसे अगाध प्रेम करने लगी। इसी बीच महारानी ने भी एक पुत्र को जन्म दिया जिसका नाम राजा राजन रखा गया। राजा राजशेखर अत्यंत प्रसन्न थे और वे मणिकंदन को ही अपना ज्येष्ठ पुत्र मानकर राज्य का अगला उत्तराधिकारी घोषित करना चाहते थे।
किंतु पंढलम राज्य के कुटिल दीवान के मन में सत्ता का लोभ समाया हुआ था। उसने महारानी के कान भरने आरंभ किए कि यदि मणिकंदन राजा बन गया तो तुम्हारी अपनी सगी संतान सदा के लिए दासों जैसा जीवन व्यतीत करेगी। महारानी उस धूर्त दीवान की बातों में आ गईं और उनके मन में मणिकंदन के प्रति ईर्ष्या की ज्वाला धधक उठी।
महारानी और दीवान ने मिलकर एक अत्यंत भयानक षड्यंत्र रचा। महारानी ने अचानक पेट में असह्य दर्द का नाटक किया और बिस्तर पकड़ लिया। दीवान ने राजवैद्य को विपुल धन देकर अपने षड्यंत्र में मिला लिया था। जब राजा व्याकुल होकर वैद्य के पास पहुंचे तो वैद्य ने कहा कि महारानी का यह असाध्य रोग केवल एक ही औषधि से शांत हो सकता है और वह औषधि है एक जीवित शेरनी का दूध।
यह सुनकर राजा राजशेखर के पैरों तले से भूमि खिसक गई। घने बीहड़ वनों में जाकर हिंसक शेरनी का दूध निकालना साक्षात मृत्यु के मुख में प्रवेश करने के समान था। राजा को अत्यंत व्यथित देखकर 12 वर्ष के मणिकंदन ने आगे बढ़कर हाथ जोड़े और कहा कि हे पिता, मुझे अपनी माता की सेवा करने का अवसर दीजिए, मैं वन जाकर शेरनी का दूध अवश्य लेकर आऊंगा। राजा ने बहुत रोका किंतु मणिकंदन अपने संकल्प पर अडिग रहे और वे अकेले ही घने जंगलों की ओर प्रस्थान कर गए।
वास्तव में मणिकंदन का वन गमन कोई साधारण घटना नहीं थी अपितु वह उस दैवीय उद्देश्य की पूर्ति का समय था जिसके लिए उनका अवतार हुआ था। महिषासुर के वध के उपरांत उसकी बहन महिषी देवताओं से प्रतिशोध लेने के लिए व्याकुल थी। उसने ब्रह्मा जी की घोर तपस्या कर यह विचित्र वरदान प्राप्त कर लिया था कि उसका वध केवल वही कर सकता है जो भगवान शिव और भगवान विष्णु दोनों के मिलन से जन्मा हो।
महिषी जानती थी कि दो पुरुष देवताओं के मिलन से संतान का जन्म होना असंभव है, अतः वह स्वयं को अमर मानकर तीनों लोकों पर अत्याचार करने लगी। उसने स्वर्ग पर अधिकार कर लिया और देवराज इंद्र सहित समस्त देवताओं को बंदी बना लिया।
जब मणिकंदन वन में पहुंचे तो उनका सामना उस भयानक राक्षसी महिषी से हुआ। महिषी ने एक विशाल भैंस का रूप धारण कर बालक पर भीषण आक्रमण किया।
महिषी का उद्धार करने के उपरांत भगवान शिव के गणों ने मणिकंदन की सेवा में कई भयानक शेरनियां प्रस्तुत कीं। मणिकंदन स्वयं एक विशाल और हिंसक शेरनी की पीठ पर सवार हुए और उनके पीछे शेर के बच्चों का पूरा झुंड चल पड़ा। जब मणिकंदन शेरों के झुंड के साथ पंढलम नगर की सीमा में प्रविष्ट हुए तो प्रजा और सैनिक भय से थर थर कांपने लगे।
यह दृश्य देखकर महारानी और कुटिल दीवान भय से मूर्छित होने लगे। महारानी को अपनी भयानक भूल का भान हो गया और वे मणिकंदन के चरणों में गिरकर क्षमा याचना करने लगीं। राजा राजशेखर ने हाथ जोड़कर कहा कि हे प्रभु, आप साक्षात परमात्मा हैं, कृपा कर इस राज्य का सिंहासन स्वीकार करें।
भगवान अयप्पा ने शांत भाव से उत्तर दिया कि उनका अवतरण सांसारिक भोग अथवा राज्य करने के लिए नहीं हुआ था। उनका कार्य पूर्ण हो चुका है। भगवान ने राजा से कहा कि वे एक बाण चलाएंगे और वह बाण जिस स्थान पर गिरेगा वहीं वे निवास करेंगे। भगवान ने अपना दिव्य धनुष खींचकर एक बाण छोड़ा जो शबरीमला पर्वत के शिखर पर जाकर गिरा। राजा ने देव शिल्पी विश्वकर्मा और महर्षि परशुराम के सहयोग से वहां एक भव्य मंदिर का निर्माण कराया जहां भगवान अयप्पा सदैव के लिए योग समाधि में लीन हो गए।
वैदिक ज्योतिष के गूढ़ फलित सिद्धांतों में भगवान अयप्पा का स्वरूप तीन प्रमुख शक्तिशाली ग्रहों सूर्य, मंगल और शनि के दुर्लभ सामंजस्य का प्रतीक है। सामान्यतः ज्योतिष में सूर्य और शनि एक दूसरे के घोर शत्रु माने जाते हैं तथा मंगल और शनि का संबंध भी अत्यंत विस्फोटक माना जाता है। किंतु भगवान अयप्पा की सत्ता इन तीनों विरोधी शक्तियों को एक ही केंद्र में लाकर परम कल्याणकारी बना देती है।
| ज्योतिषीय तत्व | अयप्पा साधना और ग्रहों का दिव्य प्रभाव |
|---|---|
| शनि का प्रभाव | 41 दिन का कठोर ब्रह्मचर्य, काले वस्त्र, वैराग्य, तपस्या और अहंकार का नाश |
| सूर्य का प्रभाव | पंढलम का राजसी तेज, मकर संक्रांति पर मकर ज्योति का दिव्य दर्शन और आत्मबल |
| मंगल का प्रभाव | अदम्य शौर्य, धनुर्विद्या, महिषी का वध और शत्रुओं पर पूर्ण विजय |
| शबरीमला की 18 सीढ़ियां | 5 ज्ञानेंद्रियां, 8 आंतरिक शत्रु (काम, क्रोध आदि), 3 गुण (सत्व, रज, तम) और विद्या व अविद्या |
| आध्यात्मिक योग | कुंडली के षष्ठम (शत्रु), अष्टम (आयु व संकट) और द्वादश (मोक्ष) भाव की शुद्धि |
भगवान अयप्पा का मकर संक्रांति से गहरा संबंध है। मकर संक्रांति के दिन भगवान सूर्य अपने पुत्र शनि की राशि मकर में प्रवेश करते हैं। इसी पावन संध्या पर शबरीमला के आकाश में दिव्य मकर ज्योति के दर्शन होते हैं। यह खगोलीय और आध्यात्मिक घटना पिता सूर्य और पुत्र शनि के मिलन और उनके वैर भाव के समाप्त होने का साक्षात प्रमाण है।
ज्योतिष शास्त्र यह स्पष्ट करता है कि अयप्पा की साधना किसी भय से नहीं की जाती। यह साधना मनुष्य के भीतर के तामसिक शनि को तपाकर स्वर्ण बनाती है और उसके मंगल को धर्म रक्षा की ऊर्जा में रूपांतरित करती है।
शबरीमला मंदिर के गर्भगृह के ठीक ऊपर स्वर्ण अक्षरों में एक अत्यंत पावन वैदिक महावाक्य अंकित है जिसे तत्वमसि कहा जाता है। सामवेद के छांदोग्य उपनिषद से उद्धृत इस वाक्य का सरल अर्थ है कि वह तुम ही हो। यह दर्शन उद्घोष करता है कि जिस ईश्वर को तुम बाहर वनों, पर्वतों और तीर्थों में खोज रहे हो वह कोई अन्य नहीं बल्कि तुम्हारी अपनी ही अंतरात्मा का विशुद्ध स्वरूप है।
भगवान अयप्पा का यह धाम संसार का एकमात्र ऐसा तीर्थ है जहां जाति, वर्ण, भाषा अथवा सामाजिक स्थिति का कोई भेद नहीं होता। वहां राजा और रंक दोनों समान रूप से काले वस्त्र पहनते हैं और एक दूसरे को स्वामी अयप्पा कहकर पुकारते हैं। जब एक मनुष्य दूसरे मनुष्य में ईश्वर का दर्शन करने लगता है तब समाज से समस्त द्वेष और कलह का सदा के लिए अंत हो जाता है।
अयप्पा अवतार हमें सिखाता है कि जीवन का प्रत्येक संकट वास्तव में हमारी आत्मिक परीक्षा है। जिस प्रकार मणिकंदन ने अपनी सौतेली माता के विषैले षड्यंत्र को भी स्वीकार कर वन की हिंसक शेरनी को अपना वाहन बना लिया, उसी प्रकार एक सच्चे साधक को भी संसार के समस्त आघातों और अपमानों को अपने आत्मबल से पराजित करना चाहिए। भगवान अयप्पा का स्मरण मनुष्य के मन से अंधकार को मिटाकर उसे परम शांति, धर्म और मोक्ष के अमर प्रकाश की ओर अग्रसर करता है।
भगवान अयप्पा के माता पिता कौन हैं? भगवान अयप्पा देवाधिदेव महादेव शिव और भगवान विष्णु के मोहिनी रूप के दिव्य तेज के सम्मिलन से प्रकट हुए हरिहरपुत्र हैं।
भगवान अयप्पा को मणिकंदन क्यों कहा जाता है? पम्पा नदी के तट पर जब राजा राजशेखर को यह बालक मिला तब उनके गले में एक दिव्य स्वर्ण घंटी बंधी थी, जिसके कारण उनका नाम मणिकंदन पड़ा।
शबरीमला के 41 दिवसीय मंडल व्रत के मुख्य नियम क्या हैं? इस व्रत में 41 दिनों तक अखंड ब्रह्मचर्य, काले अथवा नीले वस्त्र धारण करना, भूमि शयन, दोनों समय ठंडे जल से स्नान और सात्विक आहार का नियम होता है।
भगवान अयप्पा की साधना से शनि की साढ़ेसाती कैसे शांत होती है? अयप्पा साधना में शनि के प्रिय गुण जैसे कठोर अनुशासन, सादगी और वैराग्य का पालन होता है जिससे शनि देव की क्रूर दृष्टि शांत होकर शुभ फल देती है।
शबरीमला मंदिर की 18 सीढ़ियों का क्या महत्व है? शबरीमला की 18 सीढ़ियां 5 ज्ञानेंद्रियों, 8 राग द्वेष विकारों, 3 त्रिगुणों तथा विद्या और अविद्या को पार कर आत्मसाक्षात्कार प्राप्त करने का प्रतीक हैं।
पाएं अपनी सटीक कुंडली
कुंडली बनाएं
अनुभव: 20
इनसे पूछें: Family Planning, Career
इनके क्लाइंट: Punjab, Haryana, Delhi
इस लेख को परिवार और मित्रों के साथ साझा करें
ज़ोडियाक (ZODIAQ) एक ऑनलाइन वैदिक ज्योतिष प्लेटफॉर्म है। जिन यूज़र्स को ज्योतिषीय सलाह की आवश्यकता है उन्हें ये अनुभवी ज्योतिषियों से जोड़ता है। हमारे यूज़र्स निशुल्क कुंडली भी बनाते हैं और कुंडली मिलान करते हैं। साथ ही ज़ोडियाक (ZODIAQ) ज्योतिषियों को भी कई उपयोगी सेवाएँ प्रदान करता है। ज्योतिषी ज़ोडियाक (ZODIAQ) की विभिन्न सुविधाओं का उपयोग कर अपने ग्राहकों को बेहतर सेवा प्रदान करते हैं।
अनुभवी ज्योतिषियों से सलाह लें और उनका मार्गदर्शन प्राप्त करें। आप हमारे प्लेटफॉर्म से अनुभवी ज्योतिषियों द्वारा तैयार की गई हस्तलिखित जन्म पत्रिका और जीवन भविष्यवाणी रिपोर्ट भी मंगवा सकते हैं। सटीक कुंडली बनाएं, कुंडली मिलान करें और राशिफल व मुहूर्त की जानकारी प्राप्त करें। हमारी ऑनलाइन लाइब्रेरी का उपयोग करें जहां आपको सभी जरूरी ज्योतिषीय और आध्यात्मिक जानकारी एक जगह मिलेगी।
अपने ग्राहकों के लिए सटीक कुंडली बनाएं और एक बार में 5 लोगों तक का कुंडली मिलान करें। ज़ोडियाक (ZODIAQ) की मदद से अपने ग्राहकों के लिए विस्तृत जन्म पत्रिका रिपोर्ट तैयार करें। क्लाइंट डायरेक्टरी में ग्राहकों का विवरण सेव करके किसी भी समय उन्हें एक्सेस करें। हर दिन आपने कितने लोगों को परामर्श दिया यह ट्रैक कर के अपनी प्रोडक्टिविटी बढ़ाएं।
WELCOME TO
Right Decisions at the right time with ZODIAQ