By पं. अमिताभ शर्मा
ऋग्वैदिक आप्री सूक्त कालिदास की काव्य प्रतिभा और द्वितीय तृतीय पंचम भाव का संपूर्ण ज्योतिषीय रहस्य

सनातन वैदिक परंपरा और ऋग्वेद की पावन संहिताओं के दर्शन में आद्याशक्ति भगवती महासरस्वती के परम पावन वाङ्मय स्वरूप के रूप में पूजित माता भारती का प्राकट्य संपूर्ण ब्रह्मांड में ज्ञान चेतना साहित्य और काव्य रस के संचरण का सर्वोच्च शिखर है। वैदिक ज्योतिष तथा तत्व विज्ञान के अंतर्गत वाणी अभिव्यक्ति और संवाद के कारक बुध देव ज्ञान विवेक और दर्शन के अधिपति देवगुरु बृहस्पति तथा कला व सौंदर्य रस के अधिपति शुक्र देव के दुर्लभ समन्वय को जाग्रत करने के लिए माता भारती की आराधना को सर्वश्रेष्ठ माना गया है। जब जातक की जन्म कुंडली में द्वितीय भाव वाक् स्थान तृतीय भाव लेखन व पराक्रम स्थान अथवा पंचम भाव काव्य प्रतिभा व बुद्धि स्थान पाप ग्रहों से पीड़ित होकर अभिव्यक्ति में अवरोध रचनात्मक शून्यता लेखनी में अवरोध अथवा वाणी की जड़ता उत्पन्न कर रहा हो तब माँ भारती की शरण में जाने से अमोघ शब्द सिद्धि और काव्य रस की प्राप्ति होती है। माघ मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि वसंत पंचमी शारदीय नवरात्र की सरस्वती पूजा अथवा प्रत्येक मास के शुक्ल पक्ष के बुधवार और गुरुवार के पावन अनुष्ठान का संपूर्ण शास्त्रीय विवरण नीचे दी गई तालिका में स्पष्ट रूप से प्रस्तुत किया गया है।
| शास्त्रीय आयाम | अनुष्ठान विवरण और ज्योतिषीय मान्यता |
|---|---|
| प्रमुख पावन तिथि | माघ मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी वसंत पंचमी अथवा प्रत्येक बुधवार व गुरुवार |
| दैनिक पूजन समय | प्रातः कालीन ब्रह्म मुहूर्त अथवा सूर्योदय वेला |
| अधिष्ठाता स्वरूप | श्वेत कमल पर विराजमान वीणा पुस्तक अक्षमाला और चिन्मय मुद्रा धारिणी माँ भारती |
| ज्योतिषीय ग्रह व भाव संबंध | द्वितीय भाव तृतीय भाव पंचम भाव वाणी कारक बुध ज्ञान कारक गुरु और रस कारक शुक्र |
| मुख्य पूजन सामग्री | श्वेत पुष्प केसर युक्त श्वेत चंदन अष्टगंध भोजपत्र अनार की कलम और गाय का कच्चा दूध |
| प्रधान वैदिक अनुष्ठान | ऋग्वैदीय आप्री सूक्त पाठ सरस्वती वंदना और ॐ ऐं ह्रीं श्रीं भारती देव्यै नमः जप |
| अपेक्षित फल | लेखनी में सिद्धि काव्य रस प्रस्फुटन वाक् शक्ति जागरण और पत्रकारिता में प्रतिष्ठा |
सनातन धर्म के प्राचीनतम ग्रंथ ऋग्वेद के विभिन्न मंडलों में प्राप्त होने वाले पावन आप्री सूक्त अत्यंत गूढ़ और रहस्यमयी वैदिक स्तुतियां हैं। इन सूक्तों में यज्ञ की वेदी पर तीन परम दिव्य देवियों सरस्वती इला और भारती का एक साथ आवाहन किया जाता है। वैदिक तत्व दर्शन में इन तीनों देवियों को चेतना की त्रिविध धारा माना गया है जहां इला पृथ्वी और अंतःकरण की भूमि की अधिष्ठात्री हैं सरस्वती अंतः प्रवाह की देवी हैं और माता भारती संपूर्ण ब्रह्मांडीय ज्ञान चेतना का भरण पोषण करने वाली परम पराशक्ति हैं।
संस्कृत भाषा में भारती शब्द की निष्पत्ति भरत धातु से हुई है जिसका अर्थ होता है पोषण करना अथवा धारण करना। माता भारती साक्षात वह पराशक्ति हैं जो संपूर्ण भारतवर्ष की आध्यात्मिक आत्मा को अपने ज्ञान रस से निरंतर सींचती रहती हैं।
भारतीय साहित्य का इतिहास इस सत्य का साक्षात प्रमाण है कि संसार का कोई भी महान ग्रंथ केवल बौद्धिक श्रम से नहीं रचा जा सकता जब तक कि उसके पीछे माँ भारती की साक्षात प्रेरणा न हो। त्रेतायुग में जब महर्षि वाल्मीकि ने तमसा नदी के तट पर क्रौंच पक्षी के जोड़े में से एक को व्याध द्वारा मारे जाने पर तड़पते देखा तब उनके अंतःकरण से उपजा शोक अनायास ही एक छंदबद्ध श्लोक के रूप में फूट पड़ा।
मा निषाद प्रतिष्ठां त्वमगमः शाश्वतीः समाः। यत्क्रौञ्चमिथुनादेकमवधीः काममोहितम्॥
महर्षि वाल्मीकि का यह प्रथम श्लोक वस्तुतः माता भारती की वाणी का ही साक्षात अवतार था जिसने संपूर्ण रामायण महाकाव्य की नींव रखी। शोक को श्लोक में बदल देने की यह सामर्थ्य केवल माँ भारती के रस स्वरूप से ही संभव हो सकी।
इसी प्रकार द्वापर युग में महर्षि कृष्ण द्वैपायन वेदव्यास ने जब संपूर्ण वेदों का विभाजन किया और 18 पुराणों तथा 1 लाख श्लोकों वाले महाभारत महाकाव्य की रचना की तब उन्होंने माता भारती की वंदना कर अपनी लेखनी को उनके चरणों में समर्पित किया था।
संस्कृत साहित्य के शिरोमणि महाकवि कालिदास के जीवन की कथा संपूर्ण संसार को यह ज्ञान देती है कि माँ भारती की कृपा से क्या घटित हो सकता है। बाल्यकाल और युवावस्था में अत्यंत मंदबुद्धि समझे जाने वाले कालिदास जब देवी की शरण में पहुंचे तब माता भारती ने उनकी जिह्वा पर साक्षात विद्या के बीज अक्षरों को अंकित कर दिया।
वैदिक ज्योतिष के महान आधार ग्रंथ बृहत् पराशर होरा शास्त्र में जन्म कुंडली के प्रत्येक भाव और ग्रहों के सूक्ष्म साहित्यिक प्रभावों का अत्यंत विस्तृत विवेचन मिलता है। ज्योतिषीय दृष्टिकोण से माता भारती सीधे तौर पर जन्म कुंडली के द्वितीय भाव तृतीय भाव और पंचम भाव की स्वामिनी हैं।
जन्म कुंडली का द्वितीय भाव वाक् स्थान कहलाता है जो व्यक्ति की वाणी की मिठास शब्दों के चयन स्वर की गंभीरता और वाक् सिद्धि का निर्धारण करता है।
जन्म कुंडली का तृतीय भाव पराक्रम और बाहुबल के साथ साथ हाथों के कौशल मुद्रण लेखन कला और जनसंचार का मुख्य स्थान होता है। जो व्यक्ति पत्रकारिता साहित्य लेखन अथवा संपादन के क्षेत्र में कार्य करते हैं उनका तृतीय भाव अत्यधिक सक्रिय होना आवश्यक होता है।
जन्म कुंडली का पंचम भाव बुद्धि प्रज्ञा मौलिक कल्पनाशक्ति और काव्य प्रतिभा का सर्वोच्च केंद्र होता है।
आधुनिक युग में संचार माध्यमों समाचार पत्रों और डिजिटल साहित्य का महत्व अत्यधिक बढ़ चुका है। अनेक लेखक पत्रकार और वक्ता वर्षों तक परिश्रम करते हैं किंतु उनकी रचनाओं में वह प्राण नहीं आ पाता जो पाठकों के अंतःकरण को झकझोर सके। कई बार लेखकों को राइटर्स ब्लॉक जैसी गंभीर मानसिक शून्यता का सामना करना पड़ता है जहां उनकी कल्पना शक्ति पूरी तरह अवरुद्ध हो जाती है।
इसी प्रकार जनसभाओं को संबोधित करने वाले प्रवक्ताओं और वक्ताओं को मंच पर जाते ही अज्ञात भय और शब्दों के अभाव का संताप झेलना पड़ता है। वैदिक तत्व दर्शन के अनुसार यह स्थिति वाणी और साहित्य की अधिष्ठात्री माँ भारती की कृपा के अभाव का संकेत है।
माता भारती साक्षात वह दिव्य स्रोत हैं जो चेतना के इस सूखेपन को काव्य रस के अमृत से भर देती हैं। जिस प्रकार माँ भारती ने कालिदास की मंदबुद्धि को दिव्य ज्ञान में बदल दिया था उसी प्रकार जो जातक श्रद्धा भाव से सरस्वती वंदना और भारती स्तुति का नियमित पाठ करता है उसकी लेखनी में साक्षात सरस्वती का वास हो जाता है।
यह साधना उन लोगों के लिए साक्षात कल्पवृक्ष है जो उपन्यासकार कवि स्तंभकार पत्रकार अथवा वक्ता के रूप में समाज में अपनी अमिट पहचान बनाना चाहते हैं। माँ भारती की कृपा से शब्दों में ऐसी चुंबकीय शक्ति आ जाती है कि श्रोता और पाठक मुग्ध होकर उस ज्ञान प्रवाह में बहने लगते हैं।
यदि किसी जातक की जन्म कुंडली में बुध अथवा गुरु निर्बल हों लेखन कार्य में निरंतर बाधाएं आ रही हों रचनात्मक विचारों का अभाव रहता हो अथवा मंच पर बोलने से भय लगता हो तो शास्त्रों में माता भारती की प्रसन्नता हेतु अत्यंत प्रामाणिक उपाय बताए गए हैं।
| क्या अवश्य करें | किन गलतियों से सर्वथा दूर रहें |
|---|---|
| प्रतिदिन प्रातः काल उठकर अपनी लेखनी पुस्तकों और माँ भारती का नमन करें | अपनी लेखनी का उपयोग कभी भी किसी की झूठी निंदा अथवा चरित्र हनन में न करें |
| अध्ययन अथवा लेखन आरंभ करने से पूर्व अपने मन को पूर्णतः शांत रखें | पुस्तकों कलम अथवा लिखे हुए कागजों पर कभी भी अपने पैर न लगाएं |
| बुधवार और गुरुवार के दिन पूर्ण स्वच्छता ब्रह्मचर्य और सात्विक आहार लें | अश्लील भ्रामक और समाज में विद्वेष फैलाने वाले साहित्य का सृजन न करें |
| अपने ज्ञान और प्रतिभा का उपयोग सदैव समाज के कल्याण और सत्य की रक्षा में करें | अपने लेखन ज्ञान अथवा साहित्यिक उपलब्धियों का कभी भी मिथ्या अहंकार न करें |
| पूजा में शुद्ध श्वेत चंदन पीतल अथवा चांदी के बर्तन और गाय के घी का प्रयोग करें | बिना स्नान किए अथवा अशुद्ध अवस्था में अध्ययन कक्ष अथवा मंदिर में जाने से बचें |
भगवती भारती का पावन अवतार संपूर्ण मानव जाति को यह सनातन शिक्षा प्रदान करता है कि शब्द केवल संवाद का साधन नहीं हैं अपितु वे साक्षात ब्रह्म का साकार स्वरूप हैं। जैसा कि शास्त्रों में उद्घोष किया गया है शब्द इति ब्रह्म अर्थात शब्द ही ईश्वर हैं। जब किसी लेखक की लेखनी सत्य धर्म और करुणा के रस से भीगकर चलती है तो वह साहित्य समाज की आत्मा बन जाता है और युगों युगों तक मानवता का पथ प्रदर्शन करता है। वाल्मीकि का श्लोक और कालिदास की कविता यह सिद्ध करती है कि भौतिक सत्ताएं और साम्राज्य समय के थपेड़ों से धूल में मिल जाते हैं किंतु माँ भारती के वरदान से रचा गया साहित्य अमर रहता है। बुध की तार्किक बुद्धि जब गुरु के पावन विवेक और शुक्र के काव्य रस से समन्वित होती है तब मनुष्य की वाणी साक्षात अमृत बन जाती है। माता भारती का नित्य स्मरण मनुष्य के जीवन से समस्त रचनात्मक जड़ता वाणी दोषों और अज्ञान को समाप्त करके उसे एक तेजस्वी यशस्वी और सम्मानित साहित्यकार बनाकर अंततः परम शांति की प्राप्ति कराता है।
माँ भारती का मूल प्राकट्य और ऋग्वैदिक स्वरूप क्या है? माँ भारती का मूल प्राकट्य ऋग्वेद के आप्री सूक्तों में सरस्वती और इला के साथ हुआ है जहां वे संपूर्ण ब्रह्मांडीय ज्ञान चेतना का भरण पोषण करने वाली शक्ति हैं।
महाकवि कालिदास को काव्य प्रतिभा किस देवी की कृपा से प्राप्त हुई थी? महाकवि कालिदास को मंदबुद्धि अवस्था से परम विद्वान और रस सिद्ध साहित्यकार बनाने का दिव्य वरदान साक्षात माता भारती सरस्वती की कृपा से प्राप्त हुआ था।
ज्योतिष में माँ भारती का संबंध कुंडली के किन प्रमुख भावों से है? वैदिक ज्योतिष में माँ भारती का सीधा संबंध द्वितीय भाव वाक् स्थान तृतीय भाव लेखन कला और पंचम भाव मौलिक काव्य प्रतिभा से माना जाता है।
लेखकों कवियों और पत्रकारों के लिए कौन सा मंत्र और पाठ सर्वोत्तम है? लेखकों और पत्रकारों के लिए प्रतिदिन प्रातः काल सरस्वती वंदना और ॐ ऐं ह्रीं श्रीं भारती देव्यै नमः मंत्र का 108 बार जाप करना सर्वोत्तम माना गया है।
साहित्य में नव रसों का प्राकट्य किस देवी के स्वरूप से जुड़ा हुआ है? साहित्य के समस्त 9 रस श्रृंगार करुण वीर हास्य आदि साक्षात रस स्वरूपा माता भारती की भावनात्मक और रचनात्मक शक्तियों से जुड़े हुए हैं।
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