भिक्षुवर्य अवतार और राजयोग रहस्य क्या?

By अपर्णा पाटनी

विदर्भ नरेश सत्यरथ के अनाथ बालक की रक्षा धर्मगुप्त का उत्थान और दशम एकादश भाव का संपूर्ण रहस्य

भिक्षुवर्य अवतार कथा और राजयोग का रहस्य

भिक्षुवर्य पूजन मुहूर्त और शास्त्रीय विधान

सनातन वैदिक परंपरा में देवाधिदेव भगवान शिव के परम करुणामयी और शरणागत रक्षक स्वरूप के रूप में पूजित भगवान भिक्षुवर्य का प्राकट्य अनाथों की रक्षा शून्य से राजयोग के निर्माण और प्रारब्ध के पुनरुद्धार का सर्वोच्च शिखर है। वैदिक ज्योतिष तथा तत्व विज्ञान के अंतर्गत जन्म कुंडली के दशम भाव के राजपद प्रतिष्ठा आजीविका तथा एकादश भाव के अप्रत्याशित लाभ व मनोकामना पूर्ति को जाग्रत करने के लिए भगवान भिक्षुवर्य की आराधना को सर्वश्रेष्ठ माना गया है। जब जातक का जीवन चारों ओर से पराजय व्यापारिक दिवालियापन पदच्युति अथवा घोर दरिद्रता से घिर जाए और कोई सांसारिक सहारा शेष न रहे तब भिक्षुवर्य स्वरूप का ध्यान चेतना को अमोघ संरक्षण और खोए हुए वैभव की पुनर्प्राप्ति प्रदान करता है। इस पावन अनुष्ठान की तिथि समय और शास्त्रीय घटकों का संपूर्ण विवरण नीचे दी गई तालिका में स्पष्ट रूप से प्रस्तुत किया गया है।

शास्त्रीय आयाम अनुष्ठान विवरण और ज्योतिषीय मान्यता
प्रमुख पावन तिथि प्रत्येक मास के कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी प्रदोष व्रत अथवा सोमवार और महाशिवरात्रि
दैनिक पूजन समय सायंकालीन प्रदोष वेला अथवा प्रातः कालीन ब्रह्म मुहूर्त
अधिष्ठाता स्वरूप भिक्षुक रूप धारी शांत जटाजूट विभूषित त्रिशूल कमंडल धारी भगवान शिव
ज्योतिषीय भाव व ग्रह संबंध दशम भाव एकादश भाव सत्ता कारक सूर्य देव और न्याय कारक शनि देव
मुख्य पूजन सामग्री शुद्ध गंगाजल श्वेत चंदन बेलपत्र भस्म कच्चा गाय का दूध और जौ
प्रधान वैदिक अनुष्ठान प्रदोष व्रत कथा श्रवण शिव पंचाक्षर मंत्र जप और ॐ भिक्षुवर्याय नमः पाठ
अपेक्षित फल खोए हुए पद की पुनर्प्राप्ति दशम एकादश भाव दोष शांति और राजयोग जागरण

विदर्भ नरेश सत्यरथ का अंत और अनाथ राजकुमार

शिव महापुराण की शतरुद्र संहिता में वर्णित अत्यंत पावन इतिहास के अनुसार प्राचीन काल में विदर्भ देश में सत्यरथ नामक एक परम प्रतापी धर्मात्मा और प्रजापालक राजा शासन करते थे। राजा सत्यरथ भगवान शिव के अनन्य भक्त थे और उनके राज्य में प्रजा अत्यंत सुखी और संपन्न थी। किंतु काल चक्र की गति अत्यंत विचित्र होती है। पड़ोसी राज्य के दुष्ट और आक्रामक शत्रुओं ने एक विशाल सेना के साथ विदर्भ पर अचानक आक्रमण कर दिया।

राजा सत्यरथ ने अपने धर्म और राष्ट्र की रक्षा हेतु अत्यंत वीरतापूर्वक युद्ध किया। उस भीषण संग्राम में शत्रुओं की विशाल सेना के सम्मुख राजा सत्यरथ वीरगति को प्राप्त हो गए और शत्रुओं ने विदर्भ की राजधानी पर अधिकार कर लिया। राजा की गर्भवती पटरानी अपने गर्भस्थ शिशु की रक्षा हेतु गुप्त मार्ग से राजमहल से बाहर निकलकर घने जंगलों की ओर भाग गईं।

रानी कई दिनों तक भूखी प्यासी घने वनों में भटकती रहीं। जब प्रसव पीड़ा अत्यंत तीव्र हो गई तब वे एक शांत सरोवर के तट पर पहुंचीं। वहां एक विशाल वृक्ष की छाया में उन्होंने एक अत्यंत तेजस्वी और अलौकिक कांति वाले बालक को जन्म दिया। प्रसव के पश्चात भूख प्यास और अत्यधिक शारीरिक थकावट के कारण रानी अत्यंत दुर्बल हो चुकी थीं। जब वे अपनी प्यास बुझाने हेतु सरोवर के जल के समीप गईं तब विधि के क्रूर विधान से जल पीने के उपरांत वहीं तट पर उनके प्राण पखेरू उड़ गए। वह नवजात राजपुत्र उस निर्जन वन में अपनी मृत माता के समीप पड़ा हुआ भूख प्यास से तड़पकर रोने लगा।

भिक्षुवर्य रूप में भगवान शिव का प्राकट्य

उस अनाथ बालक के रुदन से संपूर्ण वन गूंज उठा। जिस बालक के सिर पर राजमुकुट होना चाहिए था वह धूल में पड़ा हुआ था। उस समय विदर्भ के उस अनाथ राजपुत्र की रक्षा करने वाला तीनों लोकों में कोई नहीं था। तब कैलाशपति देवाधिदेव महादेव का अंतःकरण करुणा से द्रवित हो उठा। भगवान शिव ने विचार किया कि जब सांसारिक माता पिता का साया उठ जाए तब साक्षात जगत्पिता को ही पालक बनना पड़ता है।

भगवान शिव ने एक अत्यंत शांत और वृद्ध भिक्षुक का रूप धारण किया जिसे शास्त्रों में भिक्षुवर्य अवतार कहा गया है। उनके हाथ में भिक्षापात्र था उनके मस्तक पर भस्म का त्रिपुंड चमक रहा था और उनके नेत्रों से असीम वात्सल्य प्रवाहित हो रहा था। उसी समय एक अत्यंत निर्धन भिखारिन अपने स्वयं के एक वर्षीय अबोध बालक को गोद में लिए भिक्षा मांगती हुई उस सरोवर के तट पर पहुंची।

सरोवर के किनारे रोते हुए उस सुंदर नवजात शिशु को देखकर उस भिखारिन के मन में दया तो जाग्रत हुई किंतु अपनी दारुण दरिद्रता को देखकर वह संकोच में पड़ गई। तभी साक्षात भिक्षुवर्य शिव उसके सम्मुख प्रकट हुए।

  • भिक्षुवर्य ने उस स्त्री को संबोधित करते हुए कहा कि हे कल्याणी तू इस अनाथ बालक को अपनी गोद में उठा ले और इसका पालन पोषण अपने पुत्र के समान कर।
  • भिखारिन ने हाथ जोड़कर कांपते हुए स्वर में कहा कि हे पूज्य भिक्षुक मैं स्वयं दाने दाने को तरसती हूं भिक्षा मांगकर अपने बालक का पेट बमुश्किल भर पाती हूं फिर इस दूसरे बालक का भरण पोषण मैं कैसे कर सकूंगी।
  • भगवान भिक्षुवर्य ने मंद मुस्कान के साथ कहा कि जो जन्म देता है वही पोषण की व्यवस्था भी करता है। तू संकोच मत कर इस बालक का पालन करने से तेरे समस्त पाप और दरिद्रता नष्ट हो जाएंगे।
  • भिक्षुवर्य ने उसे आशीर्वाद दिया कि यह बालक कोई साधारण मनुष्य नहीं है यह बड़ा होकर राजा बनेगा और तेरे जीवन को भी स्वर्णमयी बना देगा।

भगवान भिक्षुवर्य के इन अमृतमयी वचनों को सुनकर उस भिखारिन का संपूर्ण भय दूर हो गया। उसने उस अनाथ बालक को अपनी छाती से लगा लिया और उसका नाम धर्मगुप्त रखा गया। वह स्त्री अपने दोनों बालकों को लेकर एक नगर में निवास करने लगी और भिक्षाटन से उनका पालन करने लगी।

महर्षि शांडिल्य की कृपा और धर्मगुप्त का उत्थान

जब धर्मगुप्त और उस भिखारिन का पुत्र दोनों थोड़े बड़े हुए तब प्रारब्ध वश वे दोनों बालक उस नगर में पधारे परम सिद्ध महर्षि शांडिल्य के आश्रम में पहुंचे। महर्षि शांडिल्य ने अपनी दिव्य दृष्टि से तुरंत पहचान लिया कि यह धूल धूसरित बालक विदर्भ का वास्तविक उत्तराधिकारी राजकुमार धर्मगुप्त है।

महर्षि शांडिल्य ने उन दोनों बालकों और उस भिखारिन को अपने आश्रम में शरण दी। उन्होंने उस माता को उसके पूर्व जन्म का वृत्तांत सुनाया कि पूर्व जन्म में उसने किसी का ऋण नहीं चुकाया था जिसके कारण वह इस जन्म में भिखारिन बनी। महर्षि ने धर्मगुप्त और उस ब्राह्मण बालक को भगवान शिव के परम कल्याणकारी प्रदोष व्रत का शास्त्रीय विधान सिखाया और उन्हें शिव पंचाक्षर मंत्र ॐ नमः शिवाय की दीक्षा दी।

राजकुमार धर्मगुप्त ने महर्षि के आदेशानुसार प्रति त्रयोदशी को प्रदोष काल में भगवान शिव की अनन्य निष्ठा से आराधना आरंभ की। उस घोर तपस्या और शिव मंत्र के प्रभाव से धर्मगुप्त के भीतर का क्षत्रिय तेज और आत्मबल पुनः जाग्रत हो उठा।

एक दिन जब धर्मगुप्त वन में भ्रमण कर रहे थे तब उनका साक्षात्कार गंधर्वराज की परम सुंदरी कन्या अंशुमती से हुआ। गंधर्वराज को जब महर्षि शांडिल्य के माध्यम से ज्ञात हुआ कि धर्मगुप्त विदर्भ के वास्तविक राजा हैं तब उन्होंने अपनी कन्या का विवाह धर्मगुप्त के साथ संपन्न कर दिया। गंधर्वों ने धर्मगुप्त को एक अत्यंत विशाल और अजेय चतुरंगिणी सेना दिव्य रथ और अलौकिक अस्त्र शस्त्र भेंट किए।

धर्मगुप्त ने उस विशाल गंधर्व सेना के साथ अपने पैतृक राज्य विदर्भ पर आक्रमण कर दिया। उन्होंने अपने पराक्रम से उन दुष्ट शत्रुओं का संहार किया जिन्होंने उनके पिता की हत्या की थी। धर्मगुप्त ने विदर्भ का राजसिंहासन पुनः प्राप्त किया और वे एक अत्यंत न्यायप्रिय चक्रवर्ती सम्राट बने। राजा धर्मगुप्त ने अपनी उस पालक माता भिखारिन को राजमाता का सर्वोच्च सम्मान दिया और उसके पुत्र को राज्य का प्रधान सेनापति नियुक्त किया। इस प्रकार भिक्षुवर्य शिव की कृपा से एक अनाथ बालक धूल से उठकर राजसिंहासन पर आसीन हुआ।

दशम और एकादश भाव से राजयोग का निर्माण

वैदिक ज्योतिष के महानतम ग्रंथ बृहत् पराशर होरा शास्त्र में दशम और एकादश भाव के संबंध को जीवन की सर्वोच्च सफलता का आधार माना गया है। ज्योतिषीय दृष्टिकोण से भगवान भिक्षुवर्य की यह पावन कथा जन्म कुंडली के दशम भाव और एकादश भाव के गूढ़ रहस्यों को उद्घाटित करती है।

कुंडली का दशम भाव कर्म भाव और राजपद का स्थान होता है जो व्यक्ति के अधिकार सामाजिक प्रतिष्ठा करियर और पिता के प्रभाव को दर्शाता है। इस भाव के नैसर्गिक कारक सूर्य देव और शनि देव हैं। दूसरी ओर कुंडली का एकादश भाव लाभ भाव कहलाता है जो अप्रत्याशित आर्थिक लाभ बड़े भाइयों के सहयोग और समस्त इच्छाओं की पूर्ति का केंद्र है जिसके कारक देवगुरु बृहस्पति हैं।

  • जब दशम और एकादश भाव का संबंध बनता है तो कुंडली में शक्तिशाली राजयोग का निर्माण होता है।
  • धर्मगुप्त की कथा यह सिद्ध करती है कि जब प्रारब्ध वश व्यक्ति का दशम भाव पूरी तरह ध्वस्त हो जाता है तब एकादश भाव का अप्रत्याशित लाभ उसे पुनः खड़ा करता है।
  • एक भिखारिन द्वारा अनाथ राजपुत्र का पालन करना और बाद में उसका राजमाता बनना एकादश भाव के उस अप्रत्याशित लाभ का प्रतीक है जिसकी मनुष्य कभी कल्पना भी नहीं कर सकता।
  • भिक्षुवर्य शिव साक्षात उस शक्ति के प्रतीक हैं जो विपरीत से विपरीत परिस्थितियों में भी शून्य से राजयोग खड़ा करने में समर्थ हैं।

क्या शून्य से पुनः राजयोग का उदय संभव है?

आधुनिक युग में अनेक व्यक्ति अपने जीवन में ऐसे अंधकारमय दौर से गुजरते हैं जहां उनका बसा बसाया करियर नष्ट हो जाता है व्यापार में दिवालियापन आ जाता है और अपने ही सगे संबंधी साथ छोड़ देते हैं। ऐसी स्थिति में व्यक्ति घोर अवसाद में चला जाता है और यह मान लेता है कि अब जीवन में कुछ भी शेष नहीं रहा।

भगवान भिक्षुवर्य का चरित्र यह अमर संदेश देता है कि जब तक सिर पर देवाधिदेव महादेव का हाथ है तब तक कोई भी परिस्थिति अंतिम नहीं हो सकती। जिस बालक के माता पिता मर चुके थे जिसके पास एक वस्त्र तक नहीं था वह बालक यदि चक्रवर्ती राजा बन सकता है तो कोई भी व्यक्ति अपने खोए हुए मान सम्मान को पुनः प्राप्त कर सकता है। इसके लिए केवल दो तत्वों की आवश्यकता होती है पहला प्रदोष व्रत जैसी निष्काम शिव साधना और दूसरा कठिन से कठिन समय में भी धैर्य और धर्म का पालन करना। भिक्षुवर्य साधना मनुष्य के अंतःकरण में उस सोई हुई शक्ति को जाग्रत करती है जो उसे पुनः शिखर तक पहुंचा देती है।

राजपद प्राप्ति और एकादश भाव शुद्धि के अचूक उपाय

यदि किसी जातक की जन्म कुंडली में दशम भाव का स्वामी नीच का हो करियर में निरंतर असफलता मिल रही हो व्यापार नष्ट हो चुका हो अथवा एकादश भाव पीड़ित होकर लाभ के मार्ग अवरुद्ध कर रहा हो तो शास्त्रों में इसके निवारण हेतु अत्यंत दिव्य उपाय बताए गए हैं।

  • प्रत्येक मास के दोनों पक्षों की त्रयोदशी तिथि को पूर्ण श्रद्धा के साथ प्रदोष व्रत का पालन करें और सायंकाल प्रदोष काल में भगवान शिव का गंध अक्षत और बेलपत्र से पूजन करें।
  • प्रतिदिन प्रातः काल स्नान के उपरांत पूर्व दिशा की ओर मुख करके बैठें और भगवान भिक्षुवर्य का ध्यान करते हुए ॐ भिक्षुवर्याय नमः अथवा ॐ नमः शिवाय मंत्र का 108 बार शांत मन से जाप करें।
  • अपने घर में अथवा मंदिर में बैठकर महर्षि शांडिल्य द्वारा उपदिष्ट शिव प्रदोष स्तोत्र का नियमित रूप से पाठ करें जो समस्त प्रकार के दारिद्र्य को नष्ट करने में सक्षम है।
  • प्रत्येक सोमवार को किसी वास्तविक जरूरतमंद अनाथ बालक अथवा निर्धन भिक्षुक को आदरपूर्वक अन्न वस्त्र और धन का दान करें जिससे भिक्षुवर्य शिव अत्यंत प्रसन्न होते हैं।
  • जातक को अपनी शारीरिक अवस्था और योग्य ज्योतिर्विद के परामर्श के अनुसार दस मुखी अथवा ग्यारह मुखी नेपाली रुद्राक्ष चांदी के तार में पिरोकर गले में धारण करना चाहिए जो आजीविका के संकटों को समाप्त करता है।
  • प्रत्येक रविवार को उगते हुए सूर्य देव को तांबे के पात्र से जल अर्पित करें और आदित्य हृदय स्तोत्र का पाठ करें जिससे दशम भाव का सूर्य बली होकर राजपद और प्रतिष्ठा प्रदान करता है।

भिक्षुवर्य साधना के आवश्यक नियम और मर्यादाएं

क्या अवश्य करें किन गलतियों से सर्वथा दूर रहें
प्रत्येक प्रदोष तिथि को निराहार अथवा केवल फलाहार का व्रत रखें द्वार पर आए किसी भी भिक्षुक अथवा निर्धन का कभी अपमान न करें
अनाथ असहाय और निर्बल बालकों की यथासंभव सहायता करें किसी भी अनाथ अथवा असहाय व्यक्ति का हक मारने से बचें
सोमवार और प्रदोष के दिन पूर्णतः सात्विक आहार ही ग्रहण करें मांस मदिरा और किसी भी प्रकार के तामसिक पदार्थों से दूर रहें
अपने माता पिता और पालन पोषण करने वालों का सदैव आदर करें धन और पद प्राप्त होने पर अपने पुराने दिनों को भूलने की भूल न करें
पूजा में शुद्ध गंगाजल श्वेत चंदन और ताजे बेलपत्र ही अर्पित करें बिना सोचे समझे किसी पर अत्याचार अथवा छल कपट करने से बचें

दिव्य कृपा और कर्मफल से अखंड साम्राज्य

भगवान शिव का भिक्षुवर्य अवतार संपूर्ण मानव जाति को यह सनातन शिक्षा प्रदान करता है कि इस नश्वर संसार में कोई भी व्यक्ति अनाथ नहीं है क्योंकि संपूर्ण जगत के वास्तविक माता पिता साक्षात पार्वती और परमेश्वर हैं। जब मनुष्य अपने अहंकार को त्यागकर पूर्ण शरणागति के साथ भगवान शिव के चरणों में मस्तक झुकाता है तो विधाता के लिखे हुए क्रूर लेख भी बदल जाते हैं। राजा धर्मगुप्त का जीवन यह प्रमाणित करता है कि जो व्यक्ति धर्म की राह पर चलता है उसे प्रकृति भी सहयोग प्रदान करती है और एक दिन उसका खोया हुआ राजसिंहासन उसे पुनः प्राप्त होता है। दशम भाव का कर्म और एकादश भाव का लाभ जब शिव कृपा से जुड़ते हैं तो मनुष्य जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में अजेय बन जाता है। भगवान भिक्षुवर्य का नित्य स्मरण मनुष्य के जीवन से समस्त दरिद्रता और संकटों को समाप्त करके उसे अखंड वैभव उच्च प्रतिष्ठा और अंततः परम पद की प्राप्ति कराता है।

FAQ

भगवान शिव ने भिक्षुवर्य अवतार किस मुख्य कारण से धारण किया था? भगवान शिव ने विदर्भ नरेश सत्यरथ के अनाथ नवजात पुत्र धर्मगुप्त की वन में रक्षा करने और एक भिखारिन को उसका पालक बनाने हेतु भिक्षुवर्य अवतार धारण किया था।

राजकुमार धर्मगुप्त को उनका खोया हुआ राज्य किस प्रकार पुनः प्राप्त हुआ था? महर्षि शांडिल्य के उपदेश से प्रदोष व्रत करने पर धर्मगुप्त को गंधर्वों की विशाल सेना प्राप्त हुई जिसकी सहायता से उन्होंने शत्रुओं को परास्त कर विदर्भ का राज्य पुनः प्राप्त किया।

ज्योतिष में भिक्षुवर्य अवतार का संबंध किन प्रमुख भावों से है? वैदिक ज्योतिष में भिक्षुवर्य अवतार का सीधा संबंध कुंडली के दशम भाव राजपद आजीविका और एकादश भाव अप्रत्याशित लाभ व मनोकामना पूर्ति से माना जाता है।

दरिद्रता दूर करने और करियर में सफलता हेतु कौन सा व्रत सर्वश्रेष्ठ है? दरिद्रता निवारण और करियर में उच्च पद प्राप्ति हेतु प्रत्येक मास की त्रयोदशी को प्रदोष व्रत का पालन करना और प्रदोष स्तोत्र का पाठ करना सर्वश्रेष्ठ माना गया है।

राजा धर्मगुप्त ने अपनी पालक माता भिखारिन के साथ कैसा व्यवहार किया था? राजा धर्मगुप्त ने राजा बनने के पश्चात उस भिखारिन को राजमाता का सर्वोच्च पद प्रदान किया और उसके पुत्र को अपने राज्य का प्रधान सेनापति नियुक्त किया था।

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लेखक

अपर्णा पाटनी

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