By पं. अभिषेक शर्मा
पवनपुत्र भीमसेन का असीम बल नागलोक रहस्य और दुर्योधन वध

सनातन वैदिक परंपरा में पवन पुत्र भीमसेन को साक्षात प्राण तत्व, असीम शारीरिक पराक्रम और अपराजित आत्मबल का अधिष्ठाता माना गया है। जब किसी जातक के जीवन में शारीरिक दुर्बलता, वात विकार, स्नायु दुर्बलता, शत्रु भय अथवा अकारण मानसिक भय के कारण पौरुष कुंठित होने लगे तब पवन देव के अंशावतार भीमसेन और भगवान मारुति की उपासना अचूक फल प्रदान करती है। यह साधना मनुष्य के भीतर सुप्त पड़ी जीवनी शक्ति का विस्तार करती है और रक्त संचार को तेजस्वी बनाकर चित्त में निर्भयता की स्थापना करती है। इस अनुष्ठान को संपन्न करने के लिए शास्त्रोक्त तिथियों, पवित्र द्रव्यों और कठोर संयम का विधान बताया गया है।
| साधना अंग | वैदिक विधान और शास्त्रोक्त निर्देश |
|---|---|
| शुभ वार और काल | मंगलवार अथवा शनिवार का दिन और शुक्ल पक्ष की त्रयोदशी या पूर्णिमा तिथि |
| अधिष्ठाता देवता | भगवान वायु देव और उनके अंशावतार महाबली भीमसेन |
| सिद्ध बीज मंत्र | ॐ पवननंदनाय नमः अथवा ॐ भीमसेनाय नमः |
| पूजन सामग्री | शुद्ध ताम्र पात्र, लाल चंदन, रक्त पुष्प, अक्षत, शुद्ध गोघृत, तुलसी पत्र और शहद |
| आध्यात्मिक फल | प्राण वायु की शुद्धि, शत्रु विजय, अदम्य शारीरिक बल और भय से मुक्ति |
इस साधना को प्रारंभ करने के लिए सूर्योदय से पूर्व ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नानादि नित्यकर्म से निवृत्त हो जाएं। लाल अथवा गेरुए रंग के स्वच्छ वस्त्र धारण कर पूर्व दिशा की ओर मुख करके बैठें। पूजा वेदी पर तांबे का एक शुद्ध कलश स्थापित करें और उसके सम्मुख शुद्ध गोघृत का दीपक प्रज्वलित करें।
नियमित रूप से इस साधना का अनुष्ठान करने से शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता में तीव्र वृद्धि होती है। स्नायु दुर्बलता और वात रोग शांत होते हैं। यह अनुष्ठान साधक को सिखाता है कि शारीरिक बल का उद्देश्य निर्बलों पर अत्याचार करना नहीं अपितु सत्य और धर्म की रक्षा हेतु ढाल बनना है।
द्वापर युग में जब कुरुवंश के राजा पांडु किंदम ऋषि के शापवश वन में तपस्वी जीवन व्यतीत कर रहे थे तब कुंती ने महर्षि दुर्वासा द्वारा दिए गए गोपनीय मंत्र का प्रयोग कर धर्मराज से युधिष्ठिर को प्राप्त किया। इसके उपरांत महाराज पांडु ने विचार किया कि क्षत्रिय धर्म की रक्षा और अधर्मियों के संहार के लिए एक ऐसे पुत्र की आवश्यकता है जो संपूर्ण त्रिलोकी में शारीरिक बल में अद्वितीय हो।
महाराज पांडु के परामर्श पर माता कुंती ने समस्त दिशाओं में गतिशील, प्राण वायु के स्वामी और अगाध शक्ति के पुंज भगवान वायु देव का आह्वान किया। कुंती के निर्मल ध्यान और तपोबल से प्रसन्न होकर पवन देव प्रकट हुए। वायु देव ने वरदान दिया कि तुम्हारे गर्भ से एक ऐसा महाबली बालक उत्पन्न होगा जिसके पराक्रम और बल की बराबरी तीनों लोकों में कोई नहीं कर सकेगा।
समय आने पर शतश्रृंग पर्वत की पावन कंदराओं में माता कुंती के गर्भ से एक अत्यंत पुष्ट और विशालकाय बालक का जन्म हुआ। उसी क्षण संपूर्ण वन में सिंहनाद जैसी ध्वनि गूंज उठी। इस बालक का नाम भीमसेन रखा गया।
बालक के जन्म के कुछ ही दिनों पश्चात एक अत्यंत विस्मयकारी घटना घटी। एक दिन माता कुंती बालक भीम को अपनी गोद में लेकर पर्वत के रमणीय शिखर पर भ्रमण कर रही थीं। अचानक घने जंगल से एक भयानक व्याघ्र की भीषण गर्जना सुनाई दी। उस अप्रत्याशित गर्जना से भयभीत होकर कुंती का पैर फिसल गया और उनकी गोद से नवजात बालक छूटकर नीचे गिर पड़ा।
शिखर के नीचे एक विशाल और सुदृढ़ ग्रेनाइट की शिला विद्यमान थी। उस गहरी खाई में बालक को गिरते देख माता कुंती चीत्कार कर उठीं। किंतु अगले ही क्षण जो दृश्य उपस्थित हुआ उसने प्रकृति के नियमों को चकित कर दिया। बालक भीम जब अपनी पीठ के बल उस विशाल शिलाखंड पर गिरे तो बालक को एक खरोंच भी नहीं आई बल्कि उनके वज्र तुल्य शरीर के आघात से वह विशालकाय शिला चकनाचूर होकर धूल में परिवर्तित हो गई। यह इस बात का प्रत्यक्ष प्रमाण था कि यह बालक साधारण मनुष्य नहीं अपितु साक्षात वायु के प्रचंड वेग और वज्र के समान दृढ़ शरीर को धारण करके अवतरित हुआ है।
पांडु के देहावसान के पश्चात जब माता कुंती अपने पांचों बालकों को लेकर हस्तिनापुर लौटीं तब कौरवों और पांडवों की बाल्यावस्था की क्रीड़ाएं आरंभ हुईं। भीमसेन बाल्यावस्था में ही इतने शक्तिशाली थे कि वे अकेले ही दुर्योधन, दुःशासन और अन्य समस्त सौ कौरव भाइयों को पकड़कर धूल चटा देते थे। वृक्षों को हिलाकर उन पर चढ़े कौरव बालकों को नीचे गिरा देना और जल क्रीड़ा में उन्हें जल में डुबोए रखना भीम के लिए अत्यंत सहज था। उनके मन में कोई दुर्भाव नहीं था किंतु दुर्योधन के मन में भीम के प्रति ईर्ष्या का भयानक विष जन्म ले चुका था।
दुर्योधन ने विचार किया कि जब तक भीम जीवित है तब तक हस्तिनापुर के सिंहासन पर उसका एकाधिकार कभी स्थापित नहीं हो सकता। अतः दुर्योधन ने अपने मामा शकुनि के साथ मिलकर एक अत्यंत कुत्सित षड्यंत्र रचा। उसने गंगा तट पर प्रमाणकोटि नामक स्थान पर एक अत्यंत भव्य जल विहार और क्रीड़ा शिविर का आयोजन किया।
वहां दुर्योधन ने अत्यंत मीठे वचनों से भीमसेन को प्रसन्न किया और उन्हें विशेष रूप से तैयार किए गए स्वादिष्ट मोदक और मिष्ठान्न परोसे। उन मिष्ठानों में अत्यंत तीव्र और प्राणघाती कालकूट विष मिलाया गया था जिसकी एक बूंद भी किसी प्राणी के प्राण हरने के लिए पर्याप्त थी। भीमसेन ने बिना किसी संशय के उन सभी विषैले मोदकों को बड़े चाव से खा लिया।
विष के तीव्र प्रभाव से भीमसेन की चेतना लुप्त होने लगी और वे गंगा तट की बालू पर अचेत होकर गिर पड़े। दुर्योधन और दुःशासन ने अवसर पाकर मूर्छित भीम को जंगली लताओं और लोहे की जंजीरों से कसकर बांध दिया और उन्हें उठाकर गंगा के सबसे गहरे और प्रचंड भंवर में फेंक दिया।
जल की तीव्र धाराओं में बहते हुए अचेत भीमसेन पाताल लोक स्थित नागलोक में जा पहुंचे। वहां विषैले सर्पों ने उन पर चारों ओर से आक्रमण कर दिया और अपने तीक्ष्ण विष दंत भीम के शरीर में गड़ा दिए। किंतु विधि का विधान अत्यंत विचित्र था। सर्पों के दंश से निकले सर्प विष ने भीम के शरीर में पहले से उपस्थित कालकूट विष के प्रभाव को काट दिया। आयुर्वेद का यह अकाट्य नियम है कि विष ही विष का परम शमन करता है। दोनों विषों के परस्पर घर्षण से भीमसेन की चेतना लौट आई।
बंधन मुक्त होकर भीमसेन ने उन विषैले नागों को उठाकर पटकना आरंभ कर दिया। भयभीत होकर नाग अपने राजा वासुकी के पास पहुंचे। जब नागराज वासुकी और उनके मंत्री आर्यक वहां आए तो आर्यक ने भीमसेन को पहचान लिया। आर्यक वास्तव में माता कुंती के नाना थे। उन्होंने अपने दौहित्र के प्रपौत्र को तुरंत अपने हृदय से लगा लिया।
नागराज वासुकी ने भीमसेन के स्वागत में विपुल धन और रत्न भेंट करने चाहे किंतु आर्यक ने कहा कि रत्नों से इस बालक का क्या प्रयोजन है। इसके पश्चात नागराज ने भीमसेन को नागलोक के उस परम गोपनीय सरोवर के पास ले जाया जहां दिव्य अमृत रस से भरे विशाल कुंडे रखे थे।
नागों ने अत्यंत आदरपूर्वक भीमसेन को गंगा के जल से बाहर निकालकर हस्तिनापुर के तट पर पहुंचा दिया। जब भीम सकुशल राजमहल पहुंचे तो माता कुंती और पांडवों की आंखों से आनंद के अश्रु बह निकले जबकि दुर्योधन का मुख पीला पड़ गया।
भीमसेन का संपूर्ण जीवन धर्म की रक्षा और समाज को आततायी शक्तियों से मुक्त कराने का स्वर्णिम इतिहास है। जब वारणावत में दुर्योधन ने पांडवों को जीवित जलाने के लिए लाक्षागृह का निर्माण कराया तब भीमसेन ने ही अपनी माता और चारों भाइयों को अपनी विशाल भुजाओं और कंधों पर उठाकर उस जलते हुए भवन की सुरंग से सुरक्षित बाहर निकाला।
वनवास के दिनों में उन्होंने हिडिंब नामक नरभक्षी असुर का वध किया और उसकी बहन हिडिंबा के सात्विक प्रेम को स्वीकार कर घटोत्कच जैसे पराक्रमी पुत्र को जन्म दिया। एकचक्रा नगरी में जब उन्होंने देखा कि बकासुर नामक राक्षस प्रतिदिन नगर से एक मनुष्य और गाड़ी भर अन्न खा जाता है तब भीमसेन स्वयं उस असुर के पास भोजन लेकर पहुंचे। उन्होंने बकासुर के सामने ही उसका सारा भोजन खा लिया और जब असुर क्रोधित होकर झपटा तो भीम ने उसे अपनी जंघाओं पर रखकर उसकी रीढ़ की हड्डी तोड़ दी और उस पूरे क्षेत्र को भयमुक्त कर दिया।
राजसूय यज्ञ के समय मगध का सम्राट जरासंध संपूर्ण भूमंडल के राजाओं को बंदी बनाकर भगवान शिव को उनकी बलि चढ़ाने की योजना बना रहा था। जरासंध को यह वरदान प्राप्त था कि उसका शरीर दो टुकड़ों में विभक्त होने पर भी पुनः जुड़ जाता था।
भगवान श्रीकृष्ण के संकेत पर भीमसेन ने जरासंध को मल्ल युद्ध के लिए ललकारा। सत्ताईस दिनों तक चले उस भयानक मल्लयुद्ध में भीमसेन ने जरासंध के शरीर को बीच से चीरकर उसके दोनों भागों को विपरीत दिशाओं में फेंक दिया जिससे वह पुनः न जुड़ सका। इसके पश्चात अज्ञातवास के दौरान विराट नगर में द्रौपदी पर कुदृष्टि डालने वाले महाबली कीचक का वध भी भीमसेन ने रात्रि के अंधकार में नाट्यशाला के भीतर अपनी भुजाओं से उसका मांस पिंड बनाकर किया।
कुरुक्षेत्र के भीषण संग्राम में भीमसेन का रौद्र रूप देखकर कौरव सेना थर्रा उठी। उन्होंने भरी सभा में द्रौपदी के अपमान का प्रतिशोध लेने की जो भीषण प्रतिज्ञाएं की थीं उन्हें एक एक करके पूर्ण किया।
दुर्योधन के पतन के साथ ही महाभारत का युद्ध समाप्त हुआ और धर्मराज युधिष्ठिर का निष्कंटक राज्याभिषेक संपन्न हुआ। भीमसेन हस्तिनापुर के युवराज बने और उन्होंने आजीवन धर्म की सेवा की।
वैदिक ज्योतिष के गूढ़ फलित सिद्धांतों में भीमसेन का चरित्र पंचमहाभूतों में से वायु तत्व और नवग्रहों में से सेनापति मंगल के साक्षात प्रभाव का प्रतिनिधित्व करता है। मानव शरीर में प्राण वायु ही समस्त गतियों, नाड़ियों के संचालन और शारीरिक बल का मूल आधार है। जब शरीर में वात दोष प्रकुपित होता है तो वह विनाश लाता है किंतु जब वह संतुलित और सबल होता है तो वह भीमसेन जैसा असीम पराक्रम उत्पन्न करता है।
| ज्योतिषीय तत्व | भीमसेन अवतार और ग्रहों का शास्त्रीय संबंध |
|---|---|
| प्रधान अधिष्ठाता ग्रह | मंगल जो शौर्य, रक्त, मांसपेशी और युद्ध कौशल का प्रतीक है |
| सहायक तत्व | वायु तत्व जो प्राण ऊर्जा, गति और विस्तार का कारक है |
| शरीर धातु संबंध | मांस धातु और मज्जा धातु जो शारीरिक सुदृढ़ता प्रदान करती हैं |
| कुंडली भाव संबंध | तृतीय भाव (बाहुबल) और षष्ठम भाव (शत्रु हनन व मल्लयुद्ध) |
| नक्षत्र संबंध | मृगशिरा, चित्रा और धनिष्ठा जो मंगल के अग्नियुक्त नक्षत्र हैं |
जन्म कुंडली में मंगल ग्रह पराक्रम, अदम्य साहस, भूमि और अस्त्र शस्त्र के संचालन का स्वामी होता है। यदि कुंडली का तीसरा भाव बलवान हो तो जातक के भीतर किसी भी चुनौती से टकराने का निर्भय साहस होता है। वहीं षष्ठम भाव शत्रुओं के दमन और रोग निवारण का भाव है। भीमसेन की पत्रिका में मंगल और वायु तत्व का अत्यंत दुर्लभ और उच्च कोटि का समन्वय था।
भीमसेन का ज्योतिषीय स्वरूप यह स्पष्ट करता है कि बाहुबल कोई पाशविक वृत्ति नहीं है। जब उसी बल को धर्म, सत्य और न्याय की वेदी पर अर्पित कर दिया जाता है तब वह साक्षात ईश्वरीय तेज बन जाता है।
महाबली भीमसेन का पावन चरित्र संपूर्ण मानव जाति को यह अमर संदेश देता है कि शक्ति का संचय करना प्रत्येक मनुष्य का कर्तव्य है किंतु उस शक्ति का नियंत्रण धर्म के अधीन होना चाहिए। भीमसेन के पास 10,000 हाथियों का बल था और वे चाहते तो पलक झपकते ही हस्तिनापुर का सिंहासन छीन सकते थे। किंतु उन्होंने अपने संपूर्ण जीवन में अपने बड़े भाई धर्मराज युधिष्ठिर की प्रत्येक आज्ञा को शिरोधार्य किया।
उनका संपूर्ण बल सदैव सत्य के संरक्षण और दुर्बलों के उद्धार के लिए समर्पित रहा। जब समाज में अन्याय अपनी चरम सीमा पर पहुंच जाता है तब केवल शांत रहने से अधर्म का नाश नहीं होता। उस समय भीमसेन जैसी प्रलयंकारी शक्ति की आवश्यकता होती है जो अन्यायी की जंघा तोड़कर सत्य की पुनः स्थापना कर सके। भीमसेन का स्मरण प्रत्येक व्यक्ति के भीतर आत्मसम्मान, निर्भयता और धर्म पर अडिग रहने की दिव्य ज्वाला प्रज्वलित करता है।
भीमसेन किसके अंशावतार थे? भीमसेन समस्त दिशाओं में गतिशील और जीवन दायिनी प्राण शक्ति के स्वामी भगवान वायु देव के अंशावतार थे।
भीमसेन को दस सहस्र हाथियों का बल कैसे प्राप्त हुआ? नागलोक में नागराज वासुकी की अनुमति से दिव्य अमृत रस के आठ कुंडे पीने के पश्चात भीमसेन को यह असीम बल प्राप्त हुआ था।
भीमसेन के जन्म के समय कौन सी अद्भुत घटना घटी थी? माता की गोद से फिसलकर एक विशाल शिला पर गिरते ही भीमसेन के वज्र शरीर के आघात से वह विशाल शिला चकनाचूर हो गई थी।
भीमसेन ने दुर्योधन का वध किस प्रकार किया था? कुरुक्षेत्र के अंतिम दिन द्वैपायन सरोवर के निकट हुए गदा युद्ध में भीमसेन ने दुर्योधन की जंघा तोड़कर उसका वध किया था।
वैदिक ज्योतिष में भीमसेन का संबंध किस ग्रह और तत्व से है? वैदिक ज्योतिष में भीमसेन का संबंध मुख्य रूप से मंगल ग्रह और वायु तत्व तथा शरीर की प्राण ऊर्जा से है।
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