भ्रामरी अवतार और वायु तत्व क्या?

By पं. अभिषेक शर्मा

अरुणासुर का वध छह पैरों वाले भंवरों का रहस्य और वायु तत्व की विजय का संपूर्ण वैदिक ज्ञान

माँ भ्रामरी अवतार कथा और वायु तत्व रहस्य

भ्रामरी पूजन मुहूर्त और शास्त्रीय विधान

सनातन वैदिक परंपरा और शाक्त आगम दर्शन में आद्याशक्ति भगवती महामाया के परम कल्याणकारी और संहारक स्वरूप के रूप में पूजित माता भ्रामरी का प्राकट्य वायु तत्व के नियमन संक्रामक रोगों के विनाश और शरणागत भक्तों के प्राणों की रक्षा का सर्वोच्च शिखर है। वैदिक ज्योतिष तथा तत्व विज्ञान के अंतर्गत वायु तत्व की राशियों मिथुन तुला और कुंभ के संतुलन तथा छाया ग्रह राहु व कर्म कारक शनि देव द्वारा उत्पन्न समस्त संक्रामक व्याधियों विष जनित बाधाओं और श्वास रोगों को शांत करने के लिए भगवती भ्रामरी की उपासना को सर्वश्रेष्ठ माना गया है। जब जातक की जन्म कुंडली में शनि और राहु का संबंध षष्ठ अष्टम अथवा द्वादश भाव से होकर असाध्य ज्वर अज्ञात त्वचा विकार अथवा कीट दंश से रक्त दूषित कर रहा हो तब छह पैरों वाले भंवरों की अधिष्ठात्री माँ भ्रामरी की शरण में जाने से अमोघ आरोग्यता और आत्मिक बल की प्राप्ति होती है। चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि अथवा प्रत्येक मास की शुक्ल त्रयोदशी और शुक्रवार के पावन अनुष्ठान का संपूर्ण शास्त्रीय विवरण नीचे दी गई तालिका में स्पष्ट रूप से प्रस्तुत किया गया है।

शास्त्रीय आयाम अनुष्ठान विवरण और ज्योतिषीय मान्यता
प्रमुख पावन तिथि चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की दशमी भ्रामरी जयंती अथवा प्रत्येक मास की शुक्ल त्रयोदशी व शुक्रवार
दैनिक पूजन समय प्रातः कालीन ब्रह्म मुहूर्त अथवा सायंकालीन गोधूलि वेला
अधिष्ठाता स्वरूप स्वर्णिम कांति वाली असंख्य छह पैरों वाले विशाल भंवरों से घिरी चतुर्भुजा माँ भ्रामरी
ज्योतिषीय ग्रह व तत्व संबंध मिथुन तुला कुंभ राशि वायु तत्व छाया ग्रह राहु कर्म कारक शनि और स्वाति नक्षत्र
मुख्य पूजन सामग्री शुद्ध मधु अर्थात शहद गेंदे व कनेर के पुष्प गाय का शुद्ध घी काले तिल और कपूर
प्रधान वैदिक अनुष्ठान भ्रामरी स्तोत्र पाठ देवी कवच और ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं भ्रामर्यै नमः जप
अपेक्षित फल वायु दोष निवारण संक्रामक रोगों से मुक्ति राहु शनि शांति और प्राण शक्ति विस्तार

अरुणासुर का वरदान और अजेयता का दंभ

श्रीमद्देवीभागवत महापुराण के दशम स्कंध के पावन आख्यान के अनुसार प्राचीन काल में दैत्यों के कुल में अरुणासुर नामक एक अत्यंत दुराचारी और महाबली असुर उत्पन्न हुआ। उसके मन में संपूर्ण ब्रह्मांड का स्वामी बनने और देवताओं पर विजय प्राप्त करने की भयानक वासना जाग्रत हुई। उसने विचार किया कि यदि वह अमरता का वरदान प्राप्त कर ले तो कोई भी सत्ता उसका मार्ग नहीं रोक सकती। इस उद्देश्य से अरुणासुर हिमालय की पावन और दुर्गम कंदराओं में चला गया जहां उसने जगत के सृष्टिकर्ता परमपिता ब्रह्मा जी को प्रसन्न करने के लिए घोर तपस्या आरंभ की।

अरुणासुर ने सहस्रों वर्षों तक कठोर ग्रीष्म में पंचाग्नि तप किया और शीत ऋतु में जल में खड़े रहकर केवल सूखे पत्तों और वायु का भक्षण किया। उसकी देह सूखकर मात्र अस्थियों का ढांचा रह गई। उसके तपोबल से उत्पन्न प्रचंड ताप से तीनों लोकों की वायु तपने लगी। ब्रह्मा जी उसकी तपस्या से विवश होकर उसके सम्मुख प्रकट हुए और उन्होंने उसे मनचाहा वरदान मांगने को कहा।

अरुणासुर ने अत्यंत कुटिलता और पूर्व नियोजित षड्यंत्र के साथ ऐसा वरदान मांगा जिसे वह अपनी अमरता का अमोघ कवच समझता था।

  • उसने मांगा कि इस संपूर्ण ब्रह्मांड में उसकी मृत्यु किसी भी 2 पैर वाले प्राणी अर्थात देव दानव गंधर्व यक्ष अथवा मनुष्य के हाथों न हो।
  • उसने यह भी शर्त जोड़ी कि उसकी मृत्यु किसी भी 4 पैर वाले प्राणी अर्थात सिंह व्याघ्र गज वृषभ अथवा अन्य चौपायों के माध्यम से भी न हो सके।
  • उसने यह भी वचन ले लिया कि वह किसी भी प्रकार के अस्त्र शस्त्र द्वारा कभी न मारा जा सके।
  • उसने वरदान मांगा कि न तो कोई पुरुष और न ही कोई स्त्री उसका वध करने में समर्थ हो।

ब्रह्मा जी ने तथास्तु कहकर उसे वरदान दे दिया। वरदान प्राप्त करते ही अरुणासुर के अंतःकरण में घोर अहंकार प्रविष्ट हो गया। उसने सोचा कि जब 2 पैर और 4 पैर वाले सभी जीव उसके वध में असमर्थ हैं तो संसार में ऐसा कोई अस्तित्व शेष ही नहीं है जो उसका संहार कर सके। इस भीषण दंभ से उन्मत्त होकर उसने अपनी विशाल आसुरी सेना के साथ स्वर्ग लोक पर आक्रमण कर दिया।

देवराज इंद्र वरुण कुबेर और सूर्य जैसे लोकपाल उसके वरदान जनित बल के सम्मुख टिक न सके और वे स्वर्ग छोड़कर वनों में छिपने के लिए विवश हो गए। अरुणासुर ने स्वर्ग पर अधिकार कर लिया और संपूर्ण पृथ्वी पर यज्ञों का अनुष्ठान वेदों का स्वाध्याय और धर्म की मर्यादाओं को पूरी तरह नष्ट कर दिया।

देवताओं का रुदन और नाद ब्रह्म का प्राकट्य

जब अरुणासुर का अत्याचार अपनी चरम सीमा पार कर गया और समस्त ऋषि मुनि तथा देवता अपनी रक्षा का कोई मार्ग न पा सके तब वे सब भगवान शिव और आद्याशक्ति जगदंबा की शरण में पहुंचे। देवताओं ने हाथ जोड़कर अश्रुपूर्ण नेत्रों से माता पार्वती की स्तुति की और निवेदन किया कि हे जगन्माता इस महाबली दैत्य के वरदान की मर्यादा को नष्ट किए बिना इसका संहार केवल आप ही कर सकती हैं।

देवताओं की करुण पुकार सुनकर माता पार्वती के अंतःकरण में अगाध ममता और संहारक तेज जाग्रत हुआ। देवी ने विचार किया कि ब्रह्मा जी के दिए गए वरदान का सम्मान भी बना रहे और अधर्म का समूल नाश भी हो सके। इसके लिए एक ऐसे दिव्य स्वरूप का प्राकट्य आवश्यक था जो न तो 2 पैर वाले जीवों की श्रेणी में आता हो और न ही 4 पैर वाले प्राणियों की श्रेणी में।

माता पार्वती ने एक अत्यंत दिव्य और अलौकिक विग्रह धारण किया जिसे शास्त्रों में माँ भ्रामरी कहा जाता है। देवी के ध्यानस्थ होते ही उनके संपूर्ण शरीर से एक अत्यंत मधुर और ब्रह्मांडीय गुंजन उत्पन्न हुआ जिसे नाद ब्रह्म अथवा ओंकार की दिव्य ध्वनि कहा जाता है। वह गुंजन किसी साधारण भंवरे की ध्वनि नहीं थी अपितु वह संपूर्ण आकाश मंडल को कंपायमान कर देने वाली परा चेतना की संहारक गर्जना थी।

देवी के मस्तक पर बाल चंद्रमा दमक रहा था उनके नयनों में प्रलयंकारी अग्नि धधक रही थी और उनका शारीरिक तेज करोड़ों मध्याह्न के सूर्यों को लज्जित कर रहा था। जैसे ही देवी ने अपने हाथों को ऊपर उठाया वैसे ही उनके पावन शरीर के प्रत्येक रोम छिद्र और वक्षस्थल से करोड़ों विशाल सुनहरे और काले रंग के भंवरे प्रस्फुटित होने लगे।

वे भंवरे कोई सामान्य कीट नहीं थे अपितु वे साक्षात छह पैरों वाले दिव्य भ्रमर थे। उन भंवरों के पंखों की फड़फड़ाहट से संपूर्ण ब्रह्मांड में एक प्रलयंकारी चक्रवात चलने लगा। देखते ही देखते उन असंख्य भंवरों ने आकाश को पूरी तरह ढक लिया जिससे दिन में भी घोर अंधकार छा गया।

अरुणासुर का संहार और षटपद रहस्य

भगवती भ्रामरी ने अपने उस विशाल भंवरों के झुंड को अरुणासुर की सेना पर आक्रमण करने का आदेश दिया। भंवरों का वह महादल प्रलयकालीन टिड्डी दल से भी करोड़ों गुना अधिक तीव्र गति से असुरों की राजधानी की ओर झपटा।

जब अरुणासुर ने देखा कि आकाश से करोड़ों काले और सुनहरे भंवरे गगनभेदी गुंजन करते हुए उसकी ओर बढ़ रहे हैं तो उसने अपनी सेना को धनुष बाण और गदाओं से प्रहार करने की आज्ञा दी। किंतु वायु में उड़ते हुए उन सूक्ष्म और तीव्र वेग वाले भंवरों पर कोई भी अस्त्र शस्त्र असर नहीं कर सका। भंवरों के उस दिव्य दल ने अरुणासुर की सेना को चारों ओर से घेर लिया।

  • भंवरों ने असुर सैनिकों के शरीरों पर चिपक कर उनके चर्म को काटना और उनके भीतर विषैले डंक मारना आरंभ कर दिया।
  • भंवरों के तीक्ष्ण डंकों के प्रहार से असुर तड़प तड़प कर भूमि पर गिरने लगे और उनकी विशाल सेना क्षणभर में समाप्त हो गई।
  • अंत में भंवरों के उस विशाल दल ने साक्षात अरुणासुर को चारों ओर से ढक लिया।
  • भंवरों ने अरुणासुर के कवच को भेदकर उसकी छाती उसके गले और उसकी आंखों को अपने नुकीले डंकों से छलनी कर दिया।
  • अरुणासुर चीखता हुआ भूमि पर गिर पड़ा और उसके प्राण पखेरू उड़ गए।

ब्रह्मा जी का वरदान अक्षरशः सत्य रहा क्योंकि भंवरे षटपद होते हैं अर्थात उनके 6 पैर होते हैं। वे न तो 2 पैर वाले जीव थे और न ही 4 पैर वाले प्राणी थे। प्रकृति की सूक्ष्म शक्ति ने उस महाबली असुर के विशाल आकार और भौतिक दंभ को एक ही क्षण में धूल में मिला दिया। अरुणासुर के वध के पश्चात संपूर्ण ब्रह्मांड में देवताओं ने पुष्प वर्षा की और देवी का नाम भ्रामरी के रूप में सदा के लिए अमर हो गया।

वायु तत्व और षड्रिपु दमन का दार्शनिक मर्म

सनातन योग और सांख्य दर्शन में पंचमहाभूतों के अंतर्गत वायु तत्व को अत्यंत महत्वपूर्ण माना गया है। वायु तत्व गति श्वास विचार और संचार का साक्षात प्रतीक है। भगवती भ्रामरी संपूर्ण ब्रह्मांड के वायु तत्व की परम स्वामिनी हैं।

भंवरे का छह पैर वाला स्वरूप मानव चेतना के संदर्भ में अत्यंत गहन आध्यात्मिक संदेश देता है। वेदांत में मनुष्य के अंतःकरण के 6 प्रमुख शत्रुओं का वर्णन मिलता है जिन्हें षड्रिपु कहा जाता है। ये 6 शत्रु काम क्रोध लोभ मोह मद और मात्सर्य हैं। जब तक मनुष्य इन 6 आंतरिक विकारों पर नियंत्रण प्राप्त नहीं कर लेता तब तक उसकी आत्मा बंधनों में जकड़ी रहती है।

माँ भ्रामरी के छह पैरों वाले भंवरे वास्तव में इन 6 विकारों को भस्म करने वाले दिव्य ज्ञान के प्रतीक हैं। इसके अतिरिक्त योग शास्त्र में भ्रामरी प्राणायाम का अत्यंत विशिष्ट स्थान है। जब साधक अपने दोनों कानों को बंद करके भंवरे के समान गुंजन करता है तो उसके मस्तिष्क की समस्त नकारात्मक तरंगे शांत हो जाती हैं। यह गुंजन आज्ञा चक्र और सहस्रार चक्र को जाग्रत करके आत्मा को परम शांति प्रदान करता है। अरुणासुर वास्तव में हमारे भीतर का वह भौतिक अहंकार है जो अपने स्थूल शरीर पर गर्व करता है और भ्रामरी शक्ति उस अहंकार को नष्ट करने वाली सूक्ष्म प्राण ऊर्जा है।

राहु शनि और संक्रामक रोगों का ज्योतिषीय मर्म

वैदिक ज्योतिष के महानतम ग्रंथ बृहत् पराशर होरा शास्त्र में ग्रहों के संक्रामक और वायु जनित प्रभावों का विस्तृत विश्लेषण किया गया है। ज्योतिषीय दृष्टिकोण से माँ भ्रामरी का सीधा संबंध छाया ग्रह राहु और कर्म कारक शनि देव से माना जाता है।

शनि ग्रह ज्योतिष में वायु तत्व के स्वामी हैं जो शरीर में वात विकार स्नायु दुर्बलता और दीर्घकालिक पीड़ाएं उत्पन्न करते हैं। वहीं दूसरी ओर राहु ग्रह अदृश्य कीटाणुओं रहस्यमयी संक्रमणों विषाक्त वायु और महामारियों का अधिपति है। जब किसी जातक की जन्म कुंडली में शनि और राहु की युति होती है जिसे शापित योग कहा जाता है अथवा जब राहु षष्ठ भाव में बैठकर वायु तत्व की राशियों को दूषित करता है तो व्यक्ति संक्रामक रोगों से घिर जाता है।

  • ऐसे जातक को अज्ञात त्वचा रोग रक्त विकार श्वास नलिका में अवरोध अथवा कीट दंश से एलर्जी का सामना करना पड़ता है।
  • भ्रामरी देवी वायु मंडल में फैले हुए समस्त विषैले विषाणुओं और कीटाणुओं का भक्षण करने वाली परम शक्ति हैं।
  • जब साधक भ्रामरी स्वरूप का ध्यान करता है तो उसके शरीर की प्राण वायु शुद्ध हो जाती है और फेफड़ों की कार्यक्षमता बढ़ जाती है।
  • यह साधना कुंडली के वायु तत्व को संतुलित करके राहु और शनि के समस्त क्रूर प्रभावों को शांत कर देती है जिससे जातक को असाध्य संक्रामक रोगों से मुक्ति मिलती है।

क्या संक्रामक व्याधियां और अज्ञात भय मिट सकते हैं?

आधुनिक युग में मानव समाज निरंतर नई नई संक्रामक महामारियों वायु प्रदूषण और अज्ञात जीवाणुओं के भय से त्रस्त रहता है। कई बार चिकित्सा विज्ञान के उपचारों के उपरांत भी शरीर में एलर्जी और श्वास के रोग बने रहते हैं जिससे मनुष्य का जीवन दुर्भर हो जाता है।

माँ भ्रामरी साक्षात प्रकृति की वह शोधक शक्ति हैं जो वायु मंडल के समस्त विष को सोख लेती हैं। जिस प्रकार भंवरे पुष्पों से केवल शुद्ध पराग और मधुर मधु एकत्र करते हैं और अशुद्धियों को त्याग देते हैं उसी प्रकार जो साधक श्रद्धा भाव से माँ भ्रामरी का आश्रय लेता है उसके शरीर और आभा मंडल से समस्त विषाक्त तत्व बाहर निकल जाते हैं। यह साधना उन लोगों के लिए साक्षात अमृत के समान है जो श्वास रोग दमा ब्रोंकाइटिस त्वचा की गंभीर एलर्जी अथवा अज्ञात भय से पीड़ित हैं।

वायु शुद्धि और राहु शनि शांति के अचूक वैदिक उपाय

यदि किसी जातक की जन्म कुंडली में शनि और राहु पीड़ित हों संक्रामक रोगों का भय निरंतर बना रहता हो अथवा मानसिक तनाव के कारण सिर भारी रहता हो तो शास्त्रों में माँ भ्रामरी की प्रसन्नता हेतु अत्यंत प्रामाणिक उपाय बताए गए हैं।

  • प्रत्येक शुक्रवार अथवा शुक्ल पक्ष की त्रयोदशी तिथि को प्रातः काल स्नान के उपरांत पूर्व दिशा की ओर मुख करके बैठें और माँ भ्रामरी के चित्र अथवा यंत्र के सम्मुख शुद्ध गाय के घी का दीपक प्रज्वलित करें।
  • देवी के सम्मुख शुद्ध प्राकृतिक मधु अर्थात शहद और गेंदे के पीले पुष्प अर्पित करें तथा पावन बीज मंत्र ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं भ्रामर्यै नमः अथवा ॐ भ्रामरी देव्यै नमः का कम से कम 108 बार शांत मन से जाप करें।
  • प्रतिदिन प्रातः काल खुले वातावरण में बैठकर कम से कम 11 बार भ्रामरी प्राणायाम का अभ्यास करें जिसमें श्वास छोड़ते समय भंवरे के समान ओंकार का मधुर गुंजन किया जाता है।
  • संक्रामक रोगों और विषाक्त वायु से रक्षा हेतु अपने घर में प्रतिदिन सायंकाल के समय गुग्गुल लोबान और कपूर की धूप जलाएं जिससे वातावरण की नकारात्मक ऊर्जा नष्ट होती है।
  • जातक को अपनी शारीरिक अवस्था और योग्य ज्योतिर्विद के परामर्श के अनुसार आठ मुखी अथवा चौदह मुखी नेपाली रुद्राक्ष काले रेशमी धागे में पिरोकर शनिवार के दिन धारण करना चाहिए जो राहु और शनि के दोषों को शांत करता है।
  • प्रत्येक शनिवार को आवारा काले कुत्तों अथवा कौवों को सरसों के तेल से चुपड़ी हुई रोटी खिलाएं तथा निर्धन सफाई कर्मचारियों को काले तिल और कंबल का आदरपूर्वक दान करें।

भ्रामरी साधना के आवश्यक शास्त्रीय नियम

क्या अवश्य करें किन गलतियों से सर्वथा दूर रहें
प्रतिदिन प्रातः काल उठकर शुद्ध वायु में प्राणायाम और ध्यान का अभ्यास करें किसी भी मधुमक्खी भंवरे अथवा अन्य कीट पतंगों को व्यर्थ में कभी न मारें
माँ भ्रामरी को सदैव शुद्ध शहद ताजे पीले पुष्प और पंचामृत का भोग लगाएं घर के भीतर सीलन दुर्गंध अथवा बासी वस्तुओं का संग्रह कभी न होने दें
शुक्रवार और त्रयोदशी के दिन पूर्णतः सात्विक और पवित्र भोजन ग्रहण करें तामसिक भोजन मदिरा और किसी भी प्रकार के नशीले पदार्थों से सर्वथा दूर रहें
अपनी वाणी और विचारों को सदैव शुद्ध और मधुर बनाए रखने का संकल्प लें किसी भी जीव के प्रति मन में द्वेष ईर्ष्या अथवा प्रतिशोध की भावना न रखें
पूजा में शुद्ध गाय का घी कपूर और गेंदे के ताजे पुष्पों का ही प्रयोग करें बिना स्नान किए अथवा अशुद्ध अवस्था में पूजा के स्थान पर जाने से बचें

सूक्ष्म प्राण शक्ति और अभय का अमर साक्षात्कार

भगवती भ्रामरी का पावन अवतार संपूर्ण मानव जाति को यह सनातन शिक्षा प्रदान करता है कि भौतिक आकार और बाहुबल ही संसार में सब कुछ नहीं होता। एक अत्यंत विशाल और अजेय दिखने वाला असुर भी प्रकृति के नन्हे भंवरों के सम्मुख असहाय होकर नष्ट हो गया। छह पैरों वाले भंवरों का यह प्रकटीकरण यह सिद्ध करता है कि परमात्मा की लीला अनंत है और विधि का विधान अधर्म का नाश करने के लिए अत्यंत सूक्ष्म मार्ग खोज लेता है। जब मनुष्य अपने भीतर के काम क्रोध और अहंकार रूपी 6 शत्रुओं को नाद ब्रह्म के गुंजन से भस्म कर देता है तब उसकी आत्मा वायु की भांति स्वतंत्र और निर्मल हो जाती है। राहु और शनि की क्रूरता उस साधक के सम्मुख नतमस्तक हो जाती है जो अपनी प्राण शक्ति को माँ भ्रामरी के चरणों में समर्पित कर देता है। माँ भ्रामरी का नित्य स्मरण मनुष्य के जीवन से समस्त संक्रामक रोगों अकाल मृत्यु के भय और ग्रह दोषों को समाप्त करके उसे एक निरोगी दीर्घायु और तेजस्वी व्यक्तित्व बनाकर अंततः परम शांति की प्राप्ति कराता है।

FAQ

माँ पार्वती ने भ्रामरी अवतार किस मुख्य कारण से धारण किया था? अरुणासुर नामक दैत्य को 2 पैर और 4 पैर वाले जीवों से अवध्य होने का वरदान प्राप्त था अतः उसका वध करने हेतु देवी ने 6 पैरों वाले भंवरों से युक्त भ्रामरी रूप धारण किया था।

माँ भ्रामरी के शरीर से निकले भंवरों की क्या मुख्य विशेषता थी? वे भंवरे विशाल सुनहरे और काले रंग के दिव्य भ्रमर थे जिनके 6 पैर थे और उनके भयंकर डंकों से अरुणासुर की संपूर्ण सेना और उसका अहंकार नष्ट हुआ था।

ज्योतिष में माँ भ्रामरी का संबंध किस तत्व और किन ग्रहों से है? वैदिक ज्योतिष में माँ भ्रामरी का सीधा संबंध वायु तत्व तथा छाया ग्रह राहु और कर्म कारक शनि देव के संक्रामक व वात जनित दोषों के शमन से माना जाता है।

मानसिक तनाव और अनिद्रा से मुक्ति पाने हेतु कौन सा प्राणायाम सर्वोत्तम है? मानसिक शांति एकाग्रता और तनाव मुक्ति के लिए प्रतिदिन माँ भ्रामरी के स्वरूप का ध्यान करते हुए भ्रामरी प्राणायाम का अभ्यास करना सर्वोत्तम माना गया है।

संक्रामक रोगों और वायु दोष निवारण के लिए किस मंत्र का जाप करना चाहिए? संक्रामक व्याधियों से रक्षा और आरोग्यता हेतु प्रतिदिन ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं भ्रामर्यै नमः अथवा भ्रामरी स्तोत्र का 108 बार शांत मन से जाप करना सर्वश्रेष्ठ है।

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लेखक

पं. अभिषेक शर्मा

पं. अभिषेक शर्मा (63)


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