भूदेवी अवतार और चतुर्थ भाव क्या है?

By पं. अमिताभ शर्मा

वराह शक्ति रसातल उद्धार देवी अंडाल रहस्य और चतुर्थ भाव के भूमि वास्तु का संपूर्ण वैदिक ज्ञान

माता भूदेवी अवतार कथा और चतुर्थ भाव रहस्य

भूदेवी पूजन मुहूर्त और शास्त्रीय विधान

सनातन वैदिक परंपरा और श्रीमद्भागवत महापुराण के पावन दर्शन में साक्षात भगवान श्री हरि विष्णु की शाश्वत अर्धांगिनी और समस्त चराचर जगत को अपनी गोद में धारण करने वाली माता भूदेवी का प्राकट्य सहनशीलता पोषण और पृथ्वी तत्व का सर्वोच्च शिखर है। वैदिक ज्योतिष तथा वास्तु शास्त्र के अंतर्गत जन्म कुंडली के चतुर्थ भाव भूमि भवन माता अचल संपत्ति तथा पृथ्वी तत्व की राशियों वृषभ कन्या और मकर के समस्त अमंगल दोषों को शांत करने के लिए माता भूदेवी की उपासना को सर्वश्रेष्ठ माना गया है। जब जातक की जन्म कुंडली में चतुर्थ भाव पाप ग्रहों से पीड़ित होकर भूमि विवाद गृह निर्माण में निरंतर रुकावटें माता के स्वास्थ्य में कष्ट अथवा वास्तु दोष के कारण घर में अशांति उत्पन्न कर रहा हो तब भगवान वराह की परम शक्ति माँ भूदेवी की शरण में जाने से अमोघ स्थिरता और सुख समृद्धि की प्राप्ति होती है। भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि वराह जयंती अथवा प्रत्येक मास के मंगलवार और शुक्रवार के पावन अनुष्ठान का संपूर्ण शास्त्रीय विवरण नीचे दी गई तालिका में स्पष्ट रूप से प्रस्तुत किया गया है।

शास्त्रीय आयाम अनुष्ठान विवरण और ज्योतिषीय मान्यता
प्रमुख पावन तिथि भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया वराह जयंती अथवा प्रत्येक मंगलवार व शुक्रवार
दैनिक पूजन समय प्रातः कालीन सूर्योदय वेला अथवा दैनिक भूमि स्पर्श वेला
अधिष्ठाता स्वरूप श्याम व स्वर्णिम आभा युक्त दोनों हाथों में नीलकमल धारिणी भगवान वराह की शक्ति माँ भूदेवी
ज्योतिषीय ग्रह व भाव संबंध चतुर्थ भाव भूमि कारक मंगल देव स्थिरता कारक शनि देव और पृथ्वी तत्व राशियां
मुख्य पूजन सामग्री शुद्ध गाय का कच्चा दूध अक्षत दूर्वा ताजी पीली मिट्टी कमल पुष्प और चंदन
प्रधान वैदिक अनुष्ठान भूमि सूक्त पाठ समुद्रवसने देवि क्षमा प्रार्थना और ॐ भूरिदायै नमः जप
अपेक्षित फल भूमि व भवन निर्माण बाधा निवारण वास्तु दोष शांति अचल संपत्ति लाभ और मानसिक धैर्य

रसातल से उद्धार और वराह शक्ति का प्राकट्य

श्रीमद्भागवत महापुराण के तृतीय स्कंध और विष्णु पुराण के अत्यंत पावन इतिहास के अनुसार सतयुग के आरंभिक कालखंड में दिति के गर्भ से उत्पन्न अत्यंत पराक्रमी और क्रूर दैत्य हिरण्याक्ष ने तीनों लोकों पर अपना आतंक स्थापित कर लिया था। उसने अपनी आसुरी शक्ति के घमंड में आकर संपूर्ण पृथ्वी को जलमग्न कर दिया और उसे ब्रह्मांडीय महासागर के सबसे गहरे अंधकारमय रसातल में ले जाकर छिपा दिया। पृथ्वी के रसातल में चले जाने से समस्त वेदों के यज्ञ रुक गए वनस्पतियों का जीवन संकट में पड़ गया और समस्त प्राणी जीवन रक्षा हेतु त्राहिमाम करने लगे।

उस विषम परिस्थिति में जगत के पालनकर्ता भगवान श्री हरि विष्णु ने अपनी योगमाया का विस्तार किया। परमपिता ब्रह्मा जी के नासिका छिद्र से अचानक एक अत्यंत सूक्ष्म अंगूठे के आकार का वराह शिशु प्रकट हुआ जो देखते ही देखते आकाश में एक विशाल पर्वताकार दिव्य श्वेत वराह के रूप में रूपांतरित हो गया। भगवान वराह के नेत्र प्रलयकालीन सूर्यों की भांति चमक रहे थे और उनके शरीर से वेदों की ऋचाओं का पवित्र नाद गूंज रहा था।

भगवान वराह ने अपनी दिव्य दृष्टि से रसातल में छिपी पृथ्वी का संधान किया। वे अत्यंत तीव्र वेग से ब्रह्मांडीय महासागर की अगाध गहराइयों में कूद पड़े। रसातल के तलहटी में पहुंचकर भगवान वराह ने महाबली हिरण्याक्ष का अपनी गदा से संहार किया और अधर्म का अंत कर दिया।

इसके पश्चात भगवान वराह ने अपनी दोनों विशाल और वज्र सदृश सफेद दाढ़ों के अग्र भाग पर साक्षात माँ भूदेवी को प्रेमपूर्वक उठा लिया। भगवान वराह जब उस अथाह जलराशि को चीरते हुए पुनः बाहर आए तो उन्होंने अपनी इस पावन शक्ति को अपनी नित्य संगिनी के रूप में स्वीकार किया।

  • भगवान वराह ने भूदेवी को अपने वाम अंग में स्थापित किया और उन्हें ब्रह्मांड की परम रानी के रूप में प्रतिष्ठित किया।
  • रसातल से मुक्त होने के पश्चात पृथ्वी को पुनः अपने अक्ष पर स्थापित किया गया और समस्त जीव जगत का उद्धार हुआ।
  • भगवान वराह ने घोषणा की कि जो मनुष्य भूदेवी का सम्मान करेगा उसे इस संसार में कभी भी अन्न धन और आश्रय का अभाव नहीं रहेगा।
  • भूदेवी साक्षात श्री हरि की वह संहारक और पोषक शक्ति हैं जो समस्त पापी भार को नष्ट कर धर्म को पल्लवित करती हैं।

क्या चराचर जगत का भार सहनशीलता का शिखर है?

सनातन दर्शन में माता भूदेवी का स्वरूप केवल मिट्टी या पत्थर का एक भौतिक पिंड नहीं है अपितु वे एक साक्षात सचेतन और परम करुणामयी दिव्य माता हैं। भूदेवी संपूर्ण ब्रह्मांड के समस्त पर्वतों घने वनों कलकल बहती नदियों विशाल महासागरों और बहुमूल्य खनिजों को अपने गर्भ में धारण करती हैं।

मनुष्य अपने स्वार्थ के लिए पृथ्वी का सीना चीरता है उस पर हल चलाता है गहरे कुएं और सुरंगे खोदता है और उस पर भारी भवनों का निर्माण करता है। इसके अतिरिक्त मनुष्य अपने समस्त मल मूत्र और कूड़े कचरे को भी पृथ्वी पर ही त्यागता है। किंतु माता भूदेवी एक सच्चे मातृत्व की पराकाष्ठा का परिचय देते हुए इन समस्त आघातों को शांत भाव से सहन करती हैं।

वे मनुष्य के इन अपराधों के बदले में उसे शुद्ध जल मीठे फल औषधियां सुगंधित पुष्प और पोषक अन्न प्रदान करती हैं। शास्त्रों में कहा गया है कि यदि इस संपूर्ण ब्रह्मांड में क्षमा और सहनशीलता की कोई साकार प्रतिमा है तो वे केवल और केवल माता भूदेवी हैं। जब तक मनुष्य के भीतर यह क्षमा भाव और धैर्य जाग्रत नहीं होता तब तक वह वास्तविक रूप से भूदेवी का पुत्र कहलाने का अधिकारी नहीं बन सकता।

दक्षिण भारत की देवी अंडाल और भूदेवी का रहस्य

दक्षिण भारत की परम पावन श्रीवैष्णव परंपरा और आलवार संतों के इतिहास में माता भूदेवी का एक अत्यंत अलौकिक और मधुर प्राकट्य मिलता है जिसे संसार देवी अंडाल अथवा गोदा देवी के नाम से जानता है। तमिलनाडु के पावन तीर्थ श्रीविल्लीपुत्तूर में 8वीं शताब्दी में परम संत पेरियालवार जिन्हें विष्णुचित्त भी कहा जाता है उन्हें अपने तुलसी के बगीचे में मिट्टी की खुदाई करते समय एक अत्यंत रूपवती नवजात कन्या प्राप्त हुई थी।

पेरियालवार ने उस पावन बालिका को अपनी पुत्री मानकर पालन पोषण किया और उसका नाम कोदई रखा जो बाद में अंडाल कहलाईं। दक्षिण भारत के समस्त आचार्यों और संप्रदायों का यह अखंड विश्वास है कि देवी अंडाल साक्षात माता भूदेवी का ही अवतार थीं जो कलयुग के जीवों को भगवान रंगनाथ के प्रति अनन्य शरणागति और मधुर भक्ति का मार्ग सिखाने अवतरित हुई थीं।

  • देवी अंडाल ने बाल्यकाल से ही भगवान रंगनाथ को अपना पति मान लिया था।
  • वे भगवान को अर्पित की जाने वाली फूलों की माला को पहले स्वयं पहनकर दर्पण में देखती थीं कि क्या वे अपने प्रभु के योग्य लग रही हैं।
  • जब उनके पिता को यह ज्ञात हुआ तो वे अत्यंत दुखी हुए किंतु भगवान रंगनाथ ने स्वप्न में आकर कहा कि मुझे केवल अंडाल द्वारा पहनी गई माला ही प्रिय है।
  • देवी अंडाल ने तिरुप्पावै नामक अत्यंत पावन ग्रंथ की रचना की जिसमें 30 दिव्य पाशुर हैं जो आज भी धनुर्मास मार्गशीर्ष में घर घर गाए जाते हैं।
  • अंत में देवी अंडाल श्रीरंगम के विशाल मंदिर में भगवान रंगनाथ के विग्रह में समाहित होकर साक्षात नारायण से एकाकार हो गईं।

पृथ्वी तत्व और चतुर्थ भाव का ज्योतिषीय मर्म

वैदिक ज्योतिष के आधार ग्रंथ बृहत् पराशर होरा शास्त्र में जन्म कुंडली के प्रत्येक भाव और प्रकृति के पंचमहाभूतों का अत्यंत सूक्ष्म विवेचन मिलता है। ज्योतिषीय दृष्टिकोण से माता भूदेवी भचक्र के संपूर्ण पृथ्वी तत्व और जन्म कुंडली के चतुर्थ भाव की सर्वोच्च स्वामिनी हैं।

भचक्र की 12 राशियों में से वृषभ कन्या और मकर ये 3 राशियां पृथ्वी तत्व की राशियां मानी जाती हैं। पृथ्वी तत्व व्यक्ति के जीवन में स्थिरता यथार्थवादी सोच सहनशीलता अचल संपत्ति और व्यावहारिक ज्ञान का प्रतिनिधित्व करता है।

जन्म कुंडली का चतुर्थ भाव जिसे सुख भाव मातृ भाव और गृह भाव कहा जाता है सीधे तौर पर व्यक्ति के अपने घर भूमि जायदाद माता के सुख और मानसिक शांति का केंद्र होता है।

  • मंगल ग्रह को शास्त्रों में भूमिपुत्र कहा गया है जो पृथ्वी से उत्पन्न होने के कारण अचल संपत्ति और भूमि क्रय विक्रय का नैसर्गिक कारक है।
  • जब कुंडली में चतुर्थ भाव का स्वामी बली होता है और उस पर शुभ ग्रहों की दृष्टि होती है तो जातक को विशाल भूमि भवन और पैतृक संपत्ति का सुख प्राप्त होता है।
  • यदि चतुर्थ भाव पर राहु अथवा वक्री शनि का क्रूर प्रभाव हो तो व्यक्ति को अपने ही घर में कलह का सामना करना पड़ता है और संपत्ति को लेकर न्यायालय में मुकदमे चलते हैं।
  • जो जातक माता भूदेवी की आराधना करते हैं उनके चतुर्थ भाव के समस्त वास्तु दोष और अमंगलकारी योग स्वतः शांत हो जाते हैं।
  • भूदेवी की कृपा से जातक को अपने जीवन में स्वयं का सुंदर घर बनाने का सौभाग्य प्राप्त होता है।

समुद्रवसने देवि श्लोक और वास्तु दोष निवारण

सनातन धर्म की दैनिक दिनचर्या में प्रातः काल निद्रा से जागते ही पृथ्वी पर अपने पैर रखने से पूर्व दोनों हाथ जोड़कर माता भूदेवी से क्षमा मांगने का एक अत्यंत पावन और वैज्ञानिक विधान है।

यह पावन श्लोक इस प्रकार है समुद्रवसने देवि पर्वतस्तन मंडिते विष्णुपत्नि नमस्तुभ्यं पादस्पर्शं क्षमस्वमे।

इस पावन श्लोक का अर्थ है कि हे समुद्र रूपी वस्त्रों को धारण करने वाली हे पर्वतों रूपी वक्षस्थल से सुशोभित होने वाली हे भगवान श्री हरि विष्णु की परम प्रिय पत्नी माँ पृथ्वी मैं अपने जीवन की गति के लिए आपके ऊपर अपने पैर रख रहा हूं अतः मेरे इस पाद स्पर्श के अपराध को आप कृपा करके क्षमा करें।

  • यह श्लोक मनुष्य के भीतर से अहंकार को समाप्त कर उसमें विनम्रता और प्रकृति के प्रति कृतज्ञता की भावना भरता है।
  • प्रातः काल भूमि का स्पर्श करते ही शरीर में स्थित अतिरिक्त नकारात्मक विद्युत तरंगे सीधे पृथ्वी के भीतर समाहित होकर न्यूट्रलाइज हो जाती हैं।
  • इस पावन श्लोक के नित्य उच्चारण से जातक के घर और भूमि में स्थित समस्त प्रकार के वास्तु दोष शांत होते हैं।
  • जो व्यक्ति नित्य यह क्षमा प्रार्थना करता है उसकी भूमि पर कभी भी अकाल मृत्यु अथवा प्राकृतिक आपदा का साया नहीं पड़ता।

क्या भूमि विवाद और गृह निर्माण की बाधाएं मिटती हैं?

आधुनिक युग में अनेक लोग अपने जीवन की समस्त पूंजी लगाने के बाद भी अपने लिए एक छोटा सा घर नहीं बना पाते। कई बार जमीन की रजिस्ट्री में विवाद हो जाता है ठेकेदार धोखा दे जाते हैं अथवा निर्माण कार्य वर्षों तक अधर में लटका रहता है। इसके अतिरिक्त पारिवारिक स्तर पर भाइयों के मध्य पैतृक भूमि के बंटवारे को लेकर भयंकर शत्रुता उत्पन्न हो जाती है।

माता भूदेवी संपूर्ण पृथ्वी की मूल स्वामिनी हैं और उनकी अनुमति के बिना इस धरा पर एक तिनका भी नहीं हिल सकता। जिस प्रकार भगवान वराह ने रसातल से भूदेवी को निकालकर उन्हें पुनः प्रतिष्ठित किया था उसी प्रकार जो व्यक्ति निष्कपट भाव से माता भूदेवी की शरण लेता है उसके जीवन से भूमि संबंधी समस्त अवरोध समाप्त हो जाते हैं।

यह साधना न्यायालय में चल रहे भूमि मुकदमों में सत्य की विजय कराती है और जातक को बिना किसी विघ्न के सुखद गृह प्रवेश का वरदान प्रदान करती है। किसान भाइयों के लिए यह साधना उनकी भूमि की उर्वरा शक्ति को बढ़ाकर फसलों को प्राकृतिक आपदाओं से सुरक्षा प्रदान करती है।

भूदेवी कृपा और वास्तु शांति के अचूक वैदिक उपाय

यदि किसी जातक की जन्म कुंडली में चतुर्थ भाव का स्वामी निर्बल हो भूमि भवन को लेकर विवाद चल रहा हो अथवा घर में भयंकर वास्तु दोष हो तो शास्त्रों में माता भूदेवी की प्रसन्नता हेतु अत्यंत प्रामाणिक उपाय बताए गए हैं।

  • प्रतिदिन प्रातः काल शैया त्यागते ही भूमि पर पैर रखने से पूर्व अपने दोनों हाथों से भूमि का स्पर्श करें और तीन बार अपने मस्तक पर लगाएं तथा समुद्रवसने देवि श्लोक का श्रद्धापूर्वक पाठ करें।
  • प्रत्येक मंगलवार अथवा शुक्रवार को प्रातः काल स्नान के उपरांत घर के ईशान कोण में एक पात्र में शुद्ध जल कच्चा गाय का दूध और हल्दी मिलाकर रखें और मन ही मन माता भूदेवी का ध्यान करते हुए ॐ भूरिदायै नमः अथवा ॐ विष्णुपत्न्यै नमः का 108 बार शांत मन से जाप करें।
  • भवन निर्माण आरंभ करने से पूर्व भूमि पूजन के समय भूमि में चांदी का एक छोटा नाग नागिन का जोड़ा और तांबे का कलश स्थापित करें जिससे पाताल लोक और पृथ्वी तत्व के दोष शांत होते हैं।
  • अथर्ववेद में वर्णित परम पावन भूमि सूक्त का प्रत्येक मास की पूर्णिमा अथवा मंगलवार को सस्वर पाठ करें जो घर में अखंड अन्न धान्य और संपदा का वास कराता है।
  • जातक को अपनी शारीरिक अवस्था और योग्य ज्योतिर्विद के परामर्श के अनुसार चार मुखी अथवा सात मुखी नेपाली रुद्राक्ष चांदी के तार में पिरोकर धारण करना चाहिए जो पृथ्वी तत्व और स्थिरता को बल प्रदान करता है।
  • प्रत्येक मंगलवार को किसी गौशाला में जाकर गायों को भीगी हुई चने की दाल और हरा चारा खिलाएं तथा घर के मुख्य द्वार पर प्रतिदिन प्रातः काल शुद्ध जल का छिड़काव करें।

भूदेवी आराधना और प्रकृति संरक्षण के शास्त्रीय नियम

क्या अवश्य करें किन गलतियों से सर्वथा दूर रहें
प्रतिदिन प्रातः काल उठकर भूमि का स्पर्श कर क्षमा प्रार्थना अवश्य करें बिना क्षमा मांगे प्रातः काल सीधे भूमि पर जोर से पैर पटकने से बचें
अपनी भूमि खेत और घर के आंगन में फलदार व छायादार वृक्ष अवश्य लगाएं कभी भी जीवित हरे भरे वृक्षों को अकारण काटने अथवा जलाने की भूल न करें
मंगलवार और शुक्रवार के दिन घर के भीतर पूर्ण स्वच्छता और शांति बनाए रखें पृथ्वी पर कभी भी विषैले रसायन प्लास्टिक अथवा कचरा फेंककर उसे दूषित न करें
भवन निर्माण के समय भूमि के समस्त वास्तु नियमों का आदरपूर्वक पालन करें कभी भी किसी निर्बल अथवा अनाथ की भूमि को बलपूर्वक हड़पने का प्रयास न करें
पूजा में शुद्ध गंगाजल पीली मिट्टी चंदन और ताजे पुष्पों का ही प्रयोग करें सूर्यास्त के पश्चात भूमि की खुदाई करने अथवा कृषि कार्य करने से सर्वथा बचें

क्षमा की पराकाष्ठा और सनातन पोषण की विजय

भगवती भूदेवी का पावन अवतार संपूर्ण मानव जाति को यह सनातन शिक्षा प्रदान करता है कि वास्तविक शक्ति विनाश करने में नहीं अपितु धारण करने और पोषण करने में निहित है। मनुष्य चाहे कितना भी धनवान अथवा शक्तिशाली क्यों न बन जाए अंततः उसे इसी पावन मिट्टी की गोद में ही विश्राम पाना होता है। भगवान वराह द्वारा रसातल से उनका उद्धार यह सिद्ध करता है कि जब जब पृथ्वी पर अधर्म का भार बढ़ता है तब तब परमात्मा स्वयं अवतरित होकर प्रकृति और सत्य की रक्षा करते हैं। देवी अंडाल का भक्ति भाव यह सिखाता है कि इस पावन धरा पर रहते हुए भी अपनी आत्मा को केवल परमात्मा के प्रेम में समर्पित रखना ही जीवन का परम लक्ष्य है। पृथ्वी तत्व की स्थिरता और चतुर्थ भाव की शुद्धि जब मनुष्य के जीवन में उतरती है तब उसके समस्त गृह कलह और अशांति सदा के लिए समाप्त हो जाते हैं। माता भूदेवी का नित्य स्मरण मनुष्य के जीवन से समस्त वास्तु दोषों भूमि विवादों और ग्रह दोषों को समाप्त करके उसे अखंड सुख मानसिक धैर्य और अंततः वैकुंठ धाम की परम प्राप्ति कराता है।

FAQ

भगवान वराह ने माता भूदेवी का उद्धार किस पावन स्थान से किया था? भगवान वराह ने दैत्य हिरण्याक्ष का वध करके माता भूदेवी को ब्रह्मांडीय महासागर के अतल अंधकारमय रसातल से अपनी दाढ़ों पर उठाकर उद्धार किया था।

प्रातः काल उठकर भूमि पर पैर रखने से पूर्व किस पावन श्लोक का पाठ किया जाता है? प्रातः काल समुद्रवसने देवि पर्वतस्तन मंडिते विष्णुपत्नि नमस्तुभ्यं पादस्पर्शं क्षमस्वमे श्लोक का पाठ कर माता भूदेवी से क्षमा मांगी जाती है।

दक्षिण भारत की किस महान संत को माता भूदेवी का साक्षात अवतार माना जाता है? दक्षिण भारत की परम पावन आलवार संत देवी अंडाल गोदा देवी को माता भूदेवी का ही साक्षात अवतार माना जाता है जो भगवान रंगनाथ में समाहित हुई थीं।

ज्योतिष में माता भूदेवी का संबंध किस भाव और किन राशियों से है? वैदिक ज्योतिष में माता भूदेवी का सीधा संबंध जन्म कुंडली के चतुर्थ भाव गृह भूमि सुख और पृथ्वी तत्व की राशियों वृषभ कन्या और मकर से माना जाता है।

भूमि विवाद और वास्तु दोष शांति के लिए किस वैदिक सूक्त का पाठ सर्वोत्तम है? भूमि के समस्त दोषों और विवादों को समाप्त करने हेतु अथर्ववेद में वर्णित परम पावन भूमि सूक्त का पाठ करना सर्वश्रेष्ठ माना गया है।

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लेखक

पं. अमिताभ शर्मा

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