भुवनेश्वरी अवतार और चतुर्थ भाव क्या है?

By पं. संजीव शर्मा

संपूर्ण ब्रह्मांड की निर्मात्री ह्रीं बीज मंत्र और चतुर्थ भाव के गृह सुख का संपूर्ण वैदिक रहस्य

माँ भुवनेश्वरी अवतार कथा और चतुर्थ भाव रहस्य

भुवनेश्वरी पूजन मुहूर्त और शास्त्रीय विधान

सनातन वैदिक परंपरा और शाक्त आगम दर्शन में आद्याशक्ति भगवती महामाया के दस महाविद्या स्वरूपों में चतुर्थ और समस्त ब्रह्मांड की निर्मात्री के रूप में पूजित माता भुवनेश्वरी का प्राकट्य ब्रह्मांडीय पोषण अंतरिक्ष के विस्तार और वात्सल्य का सर्वोच्च शिखर है। वैदिक ज्योतिष तथा तत्व विज्ञान के अंतर्गत जन्म कुंडली के चतुर्थ भाव के गृह सुख भूमि भवन माता के स्वास्थ्य तथा मन के अधिपति चंद्र देव के दोषों को शांत करने के लिए माता भुवनेश्वरी की उपासना को सर्वश्रेष्ठ माना गया है। जब जातक की जन्म कुंडली में चंद्रमा नीच राशि वृश्चिक में स्थित होकर अथवा पाप ग्रहों से पीड़ित होकर निरंतर मानसिक संताप गृह कलह संपत्ति विवाद अथवा भवन निर्माण में गंभीर अड़चनें उत्पन्न कर रहा हो तब चौदह भुवनों की स्वामिनी माँ भुवनेश्वरी की शरण में जाने से अमोघ मानसिक शांति और अखंड भौतिक समृद्धि की प्राप्ति होती है। भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की द्वादशी तिथि भुवनेश्वरी जयंती और इस पावन अनुष्ठान की तिथि समय तथा शास्त्रीय घटकों का संपूर्ण विवरण नीचे दी गई तालिका में स्पष्ट रूप से प्रस्तुत किया गया है।

शास्त्रीय आयामअनुष्ठान विवरण और ज्योतिषीय मान्यता
प्रमुख पावन तिथिभाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की द्वादशी भुवनेश्वरी जयंती अथवा प्रत्येक मास की शुक्ल तृतीया व सोमवार
दैनिक पूजन समयप्रातः कालीन सूर्योदय वेला अथवा सायंकालीन गोधूलि प्रदोष काल
अधिष्ठाता स्वरूपस्वर्णिम आभा युक्त चतुर्भुजा अंकुश पाश वरद और अभय मुद्रा धारिणी भुवनेश्वरी
ज्योतिषीय ग्रह व भाव संबंधचतुर्थ भाव मन और माता के कारक चंद्र देव तथा रोहिणी व हस्त नक्षत्र
मुख्य पूजन सामग्रीशुद्ध गाय का कच्चा दूध श्वेत चंदन अक्षत कमल पुष्प लाल रेशमी वस्त्र और श्रीयंत्र
प्रधान वैदिक अनुष्ठानभुवनेश्वरी स्तोत्र पाठ एकाक्षर ह्रीं बीज मंत्र जप और भुवनेश्वरी कवच
अपेक्षित फलचतुर्थ भाव दोष शांति भूमि भवन निर्माण बाधा निवारण और मानसिक शांति

सृष्टि से पूर्व शून्य और आद्याशक्ति का प्राकट्य

श्रीमद्देवीभागवत महापुराण और तंत्र चूड़ामणि के अत्यंत गूढ़ दार्शनिक आख्यानों के अनुसार सृष्टि के आरंभ से पूर्व जब न तो आकाश था न पृथ्वी थी न अग्नि जल अथवा वायु का अस्तित्व था केवल एक असीम और अंधकारमय शून्य विद्यमान था। उस महाशून्य में केवल निराकार परब्रह्म अपनी अव्यक्त अवस्था में स्थित थे। जब उस निराकार सत्ता के भीतर एक से अनेक होने और ब्रह्मांड के सृजन की दिव्य इच्छा जाग्रत हुई तब उस परम चेतना के गर्भ से साक्षात माँ भुवनेश्वरी का प्राकट्य हुआ।

भगवती भुवनेश्वरी ने शून्य के विस्तार को अपने भीतर समेटकर आकाश तत्व का निर्माण किया। उन्होंने अपने संकल्प मात्र से तीनों लोकों अर्थात स्वर्ग लोक भूलोक और पाताल लोक सहित संपूर्ण 14 भुवनों की रचना की। वे संपूर्ण ब्रह्मांड को अपने उदर में धारण करने वाली जगन्माता हैं इसलिए उन्हें भुवनेश्वरी अर्थात भुवनों की ईश्वरी कहा गया।

उनका विग्रह प्रातः कालीन उदीयमान सूर्य के समान स्वर्णिम कांति से आलोकित है। उनके तीन विशाल नेत्र हैं जो भूत वर्तमान और भविष्य तीनों कालों का नियमन करते हैं। पौराणिक संहिताओं के अनुसार भगवान सूर्य उनका दाहिना नेत्र हैं जो दिन और तेज का प्रतीक हैं तथा भगवान चंद्रमा उनका बायां नेत्र हैं जो रात्रि और अमृतमयी शांति का प्रतीक हैं। उनका तीसरा नेत्र अग्नि का स्वरूप है जो ज्ञान और संहारक शक्ति का प्रतिनिधित्व करता है। उनके मस्तक पर बाल चंद्रमा मुकुट के रूप में सुशोभित है जो यह दर्शाता है कि संपूर्ण काल चक्र और मानसिक चेतना सदा उनके अधीन रहती है।

ह्रीं बीज मंत्र और भुवनेश्वरी का तात्विक स्वरूप

शाक्त आगम दर्शन में भगवती भुवनेश्वरी को ह्रीं एकाक्षर बीज मंत्र की साक्षात साकार मूर्ति माना गया है। वैदिक मंत्र विज्ञान में ह्रीं को माया बीज और हृदय बीज कहा जाता है जिसके बिना किसी भी मंत्र की पूर्णता संभव नहीं है।

  • ह वर्ण साक्षात देवाधिदेव भगवान शिव अर्थात विशुद्ध चेतना का प्रतीक है।
  • र वर्ण प्रकृति और अग्नि तत्व का प्रतिनिधित्व करता है जो क्रिया और प्रकाश का उद्गम है।
  • ई वर्ण महामाया और वात्सल्यमयी शक्ति का सूचक है जो सृष्टि का पालन करती है।
  • नाद विश्व की माता का वह अव्यक्त स्पंदन है जिससे समस्त ब्रह्मांडीय ध्वनियों का जन्म हुआ।
  • बिंदु समस्त दुखों और भयों को हरने वाले परब्रह्म का केंद्र बिंदु है।

जब यह पांचों तत्व एक साथ संयुक्त होते हैं तब ह्रीं बीज मंत्र का प्राकट्य होता है। जो साधक शांत चित्त होकर इस एकाक्षर मंत्र का ध्यान करता है वह साक्षात भुवनेश्वरी के हृदय में प्रवेश कर जाता है। माँ भुवनेश्वरी के चार हाथ मानव जीवन के 4 पुरुषार्थों धर्म अर्थ काम और मोक्ष को संतुलित करते हैं। उनके दो हाथों में पाश और अंकुश हैं जो राग को नियंत्रित करने और विवेक को जाग्रत करने का कार्य करते हैं जबकि अन्य दो हाथ वरद और अभय मुद्रा में स्थित होकर भक्तों को संपूर्ण निर्भयता प्रदान करते हैं।

चतुर्थ भाव मातृ सुख और भूमि भवन का ज्योतिषीय मर्म

वैदिक ज्योतिष के आधार ग्रंथ बृहत् पराशर होरा शास्त्र में जन्म कुंडली के प्रत्येक भाव का सूक्ष्म विश्लेषण किया गया है। ज्योतिषीय दृष्टिकोण से माँ भुवनेश्वरी का सीधा संबंध जन्म कुंडली के चतुर्थ भाव से माना गया है।

जन्म कुंडली का चतुर्थ भाव जिसे मातृ भाव सुख भाव और गृह भाव कहा जाता है सीधे तौर पर व्यक्ति के मानसिक संतुलन हृदय की शांति माता के स्वास्थ्य अचल संपत्ति भूमि और भवन निर्माण का केंद्र होता है। इस भाव के नैसर्गिक कारक ग्रह मन के स्वामी चंद्रमा और भौतिक सुखों के अधिपति शुक्र देव हैं।

  • जब किसी जातक की कुंडली में चतुर्थ भाव पाप ग्रहों से पीड़ित होता है तो व्यक्ति अपने जीवन में कभी भी सुखी और संतुष्ट नहीं रह पाता।
  • यदि कुंडली में मंगल और शनि का प्रभाव चतुर्थ भाव पर पड़ जाए तो व्यक्ति को अपना स्वयं का घर बनाने में भयंकर बाधाओं का सामना करना पड़ता है।
  • चंद्रमा जब नीच राशि वृश्चिक में होता है अथवा राहु से युक्त होकर ग्रहण दोष बनाता है तो जातक निरंतर अज्ञात भय मानसिक अवसाद और अनिद्रा से घिरा रहता है।
  • माँ भुवनेश्वरी साक्षात अंतरिक्ष और आकाश की स्वामिनी हैं जो भवन निर्माण के लिए आवश्यक स्थान प्रदान करती हैं।
  • जब साधक माँ भुवनेश्वरी का ध्यान करता है तो चतुर्थ भाव का संपूर्ण वास्तु दोष शांत हो जाता है और व्यक्ति को मनवांछित अचल संपत्ति की प्राप्ति होती है।

क्या भुवनेश्वरी साधना से गृह निर्माण बाधाएं मिटती हैं?

आधुनिक युग में प्रत्येक व्यक्ति का यह स्वप्न होता है कि उसका अपना एक सुंदर और शांतिपूर्ण घर हो। किंतु अनेक लोग जीवन भर धन कमाने के बाद भी भूमि क्रय करने अथवा भवन निर्माण संपन्न कराने में असमर्थ रहते हैं। कई बार जमीन के सौदों में विवाद हो जाता है अथवा बना बनाया मकान बिकने की नौबत आ जाती है।

माँ भुवनेश्वरी संपूर्ण ब्रह्मांड की वास्तु निर्मात्री हैं। वे राजराजेश्वरी हैं जो शून्य से भी भव्य महलों का सृजन कर सकती हैं। जब कोई साधक निरंतर भूमि विवादों से घिरा हो अथवा गृह निर्माण में बार बार रुकावटें आ रही हों तो भुवनेश्वरी साधना उसके जीवन के समस्त अवरोधों को दूर कर देती है। यह साधना केवल ईंट और पत्थरों का मकान नहीं देती अपितु उस घर के भीतर रहने वाले प्रत्येक सदस्य को मानसिक शांति और समाज में अद्वितीय ख्याति प्रदान करती है। जो व्यक्ति राजनीति प्रशासन अथवा सार्वजनिक जीवन में उच्च पद और प्रतिष्ठा पाना चाहते हैं उनके लिए भुवनेश्वरी कृपा साक्षात राजयोग का मार्ग प्रशस्त करती है।

चतुर्थ भाव शुद्धि और मानसिक शांति के अचूक वैदिक उपाय

यदि किसी जातक की जन्म कुंडली में चतुर्थ भाव का स्वामी निर्बल हो चंद्रमा के कारण अत्यधिक मानसिक तनाव रहता हो अथवा स्वयं का घर बनाने में निरंतर रुकावटें आ रही हों तो शास्त्रों में इसके निवारण हेतु अत्यंत प्रामाणिक वैदिक उपाय बताए गए हैं।

  • प्रत्येक सोमवार अथवा शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को प्रातः काल स्नान के उपरांत पूर्व दिशा की ओर मुख करके बैठें और माँ भुवनेश्वरी के चित्र अथवा श्रीयंत्र के सम्मुख शुद्ध गाय के घी का दीपक जलाकर पावन बीज मंत्र ॐ ह्रीं भुवनेश्वर्यै नमः अथवा ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं ऐं सौः भुवनेश्वर्यै नमः का 108 बार शांत मन से जाप करें।
  • प्रतिदिन प्रातः काल अथवा सायंकाल के समय पावन भुवनेश्वरी स्तोत्र अथवा भुवनेश्वरी कवच का पाठ करें जिससे घर की समस्त नकारात्मक ऊर्जा और मानसिक संताप समाप्त होते हैं।
  • भूमि और भवन निर्माण की बाधाओं को समाप्त करने हेतु प्रत्येक शुक्ल पक्ष के सोमवार को शिवलिंग पर शुद्ध जल कच्चा गाय का दूध और श्वेत चंदन अर्पित करें तथा सफेद कनेर के पुष्प चढ़ाएं।
  • अपनी सगी माता अथवा माता तुल्य वृद्ध स्त्रियों का नित्य प्रातः काल चरण स्पर्श करके आशीर्वाद लें क्योंकि माता का आशीर्वाद साक्षात चंद्रमा और चतुर्थ भाव को परम बलशाली बनाता है।
  • जातक को अपनी शारीरिक अवस्था और योग्य ज्योतिर्विद के परामर्श के अनुसार दो मुखी अथवा चार मुखी नेपाली रुद्राक्ष चांदी के तार में पिरोकर सोमवार के दिन धारण करना चाहिए जो मन को अचल शांति देता है।
  • प्रत्येक पूर्णिमा को चंद्रोदय के समय किसी चांदी अथवा मिट्टी के पात्र में जल कच्चा दूध और अक्षत मिलाकर चंद्रमा को अर्घ्य समर्पित करें और निर्धन व्यक्तियों को चावल खीर व सफेद वस्त्रों का आदरपूर्वक दान करें।

भुवनेश्वरी साधना और गृहस्थ के शास्त्रीय नियम

क्या अवश्य करेंकिन गलतियों से सर्वथा दूर रहें
प्रतिदिन प्रातः काल उठकर अपनी माता और कुलदेवी का आदरपूर्वक नमन करेंघर की महिलाओं और कन्याओं का कभी भी अपमान अथवा अनादर न करें
घर के पूजा स्थल को सदैव स्वच्छ सुगंधित और पवित्र बनाए रखेंघर के उत्तर पूर्व अथवा मुख्य द्वार पर कबाड़ या गंदगी जमा न होने दें
सोमवार और शुक्ल तृतीया के दिन पूर्णतः सात्विक और फलाहारी भोजन लेंतामसिक भोजन मदिरा और किसी भी प्रकार के अनैतिक आचरण से दूर रहें
अपने भवन निर्माण में कभी भी किसी निर्बल की भूमि हड़पने का प्रयास न करेंदूसरों की संपत्ति को देखकर मन में ईर्ष्या अथवा द्वेष की भावना न लाएं
पूजा में शुद्ध कमल पुष्प श्वेत चंदन और शुद्ध गाय के घी का प्रयोग करेंबिना कुंडली मिलान किए मोती अथवा ओपल रत्न पहनने की भूल न करें

वात्सल्यमयी सत्ता से परम शांति और ऐश्वर्य

भगवती भुवनेश्वरी का पावन अवतार संपूर्ण मानव जाति को यह सनातन संदेश देता है कि ब्रह्मांड का संचालन किसी कठोर नियम से नहीं अपितु माता के अगाध वात्सल्य और करुणा से होता है। जिस प्रकार एक माता अपने गर्भ में शिशु का पोषण करती है उसी प्रकार माँ भुवनेश्वरी संपूर्ण 14 भुवनों के समस्त प्राणियों का निरंतर पालन पोषण कर रही हैं। जब मनुष्य अपने अंतःकरण से स्वार्थ और संकीर्णता को त्यागकर संपूर्ण सृष्टि को जगन्माता का विस्तार मानकर प्रेम करता है तब उसके जीवन के समस्त अभाव स्वतः समाप्त हो जाते हैं। चतुर्थ भाव का सुख केवल भौतिक सुखों में नहीं अपितु उस आंतरिक संतोष में है जो केवल भुवनेश्वरी कृपा से ही सुलभ होता है। माँ भुवनेश्वरी का नित्य स्मरण मनुष्य के जीवन से समस्त वास्तु दोषों गृह निर्माण की बाधाओं और मानसिक अवसाद को समाप्त करके उसे अखंड मानसिक शांति सामाजिक ख्याति और अंततः परम पद की प्राप्ति कराता है।

FAQ

माँ भुवनेश्वरी को भुवनेश्वरी नाम किस कारण से प्राप्त हुआ? सृष्टि रचना के समय शून्य में से तीनों लोकों सहित संपूर्ण 14 भुवनों को अपने गर्भ में धारण और निर्माण करने के कारण भगवती को भुवनेश्वरी कहा जाता है।

माँ भुवनेश्वरी का एकाक्षर सिद्ध बीज मंत्र कौन सा है? माँ भुवनेश्वरी का साक्षात स्वरूप माना जाने वाला परम सिद्ध और कल्याणकारी एकाक्षर बीज मंत्र ह्रीं है जिसे माया बीज कहा जाता है।

ज्योतिष में माँ भुवनेश्वरी का संबंध किस भाव और ग्रह से माना जाता है? वैदिक ज्योतिष में माँ भुवनेश्वरी का सीधा संबंध जन्म कुंडली के चतुर्थ भाव गृह सुख माता भूमि और मन के कारक ग्रह चंद्रमा से माना जाता है।

भवन निर्माण में आने वाली बाधाओं को दूर करने हेतु किस देवी की उपासना सर्वश्रेष्ठ है? भूमि क्रय करने और भवन निर्माण की समस्त अड़चनों को दूर करने के लिए चतुर्थ महाविद्या माँ भुवनेश्वरी की साधना और ह्रीं मंत्र का जाप सर्वोत्तम माना गया है।

माँ भुवनेश्वरी के नेत्र किन आकाशीय पिंडों का प्रतिनिधित्व करते हैं? पौराणिक संहिताओं के अनुसार माँ भुवनेश्वरी का दाहिना नेत्र भगवान सूर्य का बायां नेत्र भगवान चंद्रमा का और तीसरा नेत्र अग्नि का प्रतिनिधित्व करता है।

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लेखक

पं. संजीव शर्मा

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