बुद्ध अवतार और बुध का रहस्य क्या?

By पं. संजीव शर्मा

भगवान बुद्ध का पावन प्राकट्य अहिंसा का संदेश और बुध ग्रह की कृपा का संपूर्ण ज्योतिषीय रहस्य

बुद्ध अवतार कथा और बुध का ज्योतिषीय रहस्य

बुद्ध अवतार पूजन विधान और ज्योतिषीय नियम

सनातन वैदिक परंपरा में भगवान श्री हरि विष्णु के नौवें अवतार के रूप में पूजित भगवान बुद्ध का स्वरूप अहिंसा परम धर्म और विशुद्ध बौद्धिक चेतना का सर्वोच्च प्रतीक है। वैदिक ज्योतिष के अंतर्गत तार्किक बुद्धि वाणी विश्लेषण व्यापार और तंत्रिका तंत्र के स्वामी बुध देव के समस्त दोषों को शांत करने के लिए भगवान बुद्ध की उपासना को सर्वश्रेष्ठ माना गया है। जब जातक की जन्म कुंडली में बुध ग्रह अस्त वक्री या नीच का होकर निर्णय क्षमता को क्षीण कर देता है अथवा वाणी विकार व व्यापारिक असंतुलन उत्पन्न करता है तब भगवान बुद्ध के शांत स्वरूप की शरण में जाने से अद्वितीय मानसिक स्थिरता प्राप्त होती है। इस पावन अनुष्ठान की तिथि समय और शास्त्रीय घटकों का संपूर्ण विवरण नीचे दी गई तालिका में प्रस्तुत किया गया है।

शास्त्रीय आयामअनुष्ठान विवरण और ज्योतिषीय मान्यता
प्रमुख पावन तिथिवैशाख मास की पूर्णिमा तिथि बुद्ध पूर्णिमा
दैनिक पूजन समयप्रातः कालीन ब्रह्म मुहूर्त अथवा सायंकालीन शांत वेला
अधिष्ठाता स्वरूपध्यान मुद्रा में पद्मासन पर आसीन शांत चित्त शाक्यमुनि बुद्ध
ज्योतिषीय ग्रह संबंधबुद्धि वाणी तर्क और संतुलन के अधिपति बुध देव
मुख्य पूजन सामग्रीश्वेत पुष्प तुलसी दल केसर युक्त खीर और शुद्ध पीत चंदन
प्रधान वैदिक अनुष्ठानबुद्ध स्तोत्र पाठ विपश्यना ध्यान और ॐ नमो बुद्धाय मंत्र जप
अपेक्षित फलबुध दोष निवारण वाणी सिद्धि तार्किक प्रज्ञा और मानसिक शांति

कलिकाल के आरंभ में शाक्यमुनि का पावन प्राकट्य

वैदिक इतिहास और पौराणिक संहिताओं के अनुसार जब द्वापर युग का समापन हुआ और कलियुग की काली छाया पृथ्वी पर फैलने लगी तब धर्म के नाम पर पाखंड और बाह्य आडंबरों की भरमार हो गई थी। वैदिक यज्ञों के गूढ़ वैज्ञानिक और आध्यात्मिक मर्म को भुलाकर लोग अंधविश्वास के वशीभूत होकर निरीह पशुओं की बलि देने लगे थे। धर्म की आत्मा करुणा और सत्य के स्थान पर स्वार्थ का साम्राज्य स्थापित हो रहा था। उस समय मूक पशुओं की रक्षा करने और मानव चेतना को बाह्य कर्मकांडों से मुक्त कर आत्मिक शुद्धि की ओर ले जाने हेतु भगवान श्री हरि विष्णु ने कीकट देश अर्थात मगध क्षेत्र में अवतार लेने का संकल्प लिया।

हिमालय की तराई में स्थित शाक्य गणराज्य की राजधानी कपिलवस्तु में सूर्यवंशी इक्ष्वाकु कुल के राजा शुद्धोधन और महारानी मायादेवी के आंगन में वैशाख पूर्णिमा के पावन दिन एक अलौकिक बालक का जन्म हुआ। बालक के जन्म लेते ही देवऋषि असित ने भविष्यवाणी की थी कि यह बालक या तो संपूर्ण चक्रवर्ती सम्राट बनेगा या फिर संसार को दुखों से मुक्ति दिलाने वाला महान बुद्ध बनेगा। राजा शुद्धोधन ने बालक का नाम सिद्धार्थ रखा जिसका अर्थ है जिसकी समस्त मनोकामनाएं सिद्ध हो चुकी हों। पिता ने सिद्धार्थ को सांसारिक दुखों से अनभिज्ञ रखने के लिए तीनों ऋतुओं के अनुकूल अत्यंत वैभवशाली महल बनवाए जहां दुख रोग और मृत्यु का कोई नामोनिशान नहीं था।

राजकुमार सिद्धार्थ का विवाह परम सुंदरी यशोधरा से हुआ और उन्हें राहुल नाम का पुत्र प्राप्त हुआ। परंतु नियति का विधान कुछ और ही था। एक दिन जब सिद्धार्थ नगर भ्रमण पर निकले तब उन्होंने क्रमशः 4 दृश्यों को देखा जिन्होंने उनकी अंतरात्मा को झकझोर कर रख दिया। उन्होंने प्रथम दृश्य में एक दुर्बल वृद्ध पुरुष को कांपते हुए देखा द्वितीय दृश्य में एक व्याधिग्रस्त रोगी को तड़पते हुए देखा तृतीय दृश्य में एक मृत देह को श्मशान ले जाते देखा और चतुर्थ दृश्य में एक शांत प्रशांत मुख वाले संन्यासी को देखा। इन दृश्यों ने सिद्धार्थ के हृदय में वैराग्य की तीव्र ज्वाला प्रज्वलित कर दी। उन्होंने विचार किया कि जिस यौवन सौंदर्य और शरीर का अंत रोग बुढ़ापे और मृत्यु में होना है उसके प्रति आसक्ति केवल अज्ञान है। 29 वर्ष की आयु में अर्धरात्रि के समय सिद्धार्थ ने अपनी पत्नी पुत्र और राजसी वैभव का त्याग कर दिया जिसे इतिहास में महाभिनिष्क्रमण कहा जाता है।

बोधि वृक्ष के नीचे तप और अष्टांगिक मार्ग का अमृत

राजसी सुखों का परित्याग करने के उपरांत सिद्धार्थ ने अनेक वर्षों तक वन वन भटकते हुए कठिन तपस्या की। उन्होंने आलार कालाम और उद्दक रामपुत्त जैसे गुरुओं से सांख्य और योग दर्शन की शिक्षा ली किंतु उनके अंतर्मन की पिपासा शांत नहीं हुई। अंततः उन्होंने गया में निरंजना नदी के तट पर एक विशाल पीपल वृक्ष के नीचे समाधि लगा ली। वैशाख पूर्णिमा की पावन रात्रि में जब चंद्रमा विशाखा नक्षत्र में पूर्णता को प्राप्त कर रहा था तब सिद्धार्थ की चेतना ने समस्त बंधनों को भेदकर परम ज्ञान प्राप्त किया और वे गौतम बुद्ध कहलाए। जिस पीपल वृक्ष के नीचे उन्हें ज्ञान प्राप्त हुआ वह संसार में बोधि वृक्ष के नाम से अमर हो गया।

ज्ञान प्राप्ति के पश्चात भगवान बुद्ध ने सारनाथ के मृगदाव में अपने 5 पूर्व संन्यासियों को प्रथम उपदेश दिया जिसे धर्म चक्र प्रवर्तन कहा जाता है। भगवान बुद्ध ने संसार को 4 आर्य सत्यों का बोध कराया जिसमें प्रथम सत्य दुख है द्वितीय सत्य दुख का कारण तृष्णा है तृतीय सत्य दुख का निवारण संभव है और चतुर्थ सत्य दुख निवारण का मार्ग है। उन्होंने मानव जाति को मध्यम मार्ग का उपदेश दिया जो न तो अत्यधिक भौतिक भोग की ओर झुकता है और न ही शरीर को व्यर्थ कष्ट देने वाले कठोर तप की ओर। उन्होंने चेतना के परिशोधन हेतु अष्टांगिक मार्ग का प्रतिपादन किया जो मानव जीवन को समस्त संतापों से मुक्त करने का दिव्य मार्ग है।

  • सम्यक दृष्टि और सम्यक संकल्प से अंतर्मन की भ्रांतियों और अज्ञान का नाश होता है।
  • सम्यक वाक और सम्यक कर्म से समाज में सत्य अहिंसा और सौहार्द की प्रतिष्ठा होती है।
  • सम्यक आजीविका और सम्यक व्यायाम से जीवन में नैतिक अनुशासन और आंतरिक ऊर्जा बनी रहती है।
  • सम्यक स्मृति और सम्यक समाधि से आत्मा अपने वास्तविक शांत स्वरूप में स्थित होकर निर्वाण को प्राप्त करती है।

भगवान बुद्ध ने वैदिक यज्ञों के नाम पर होने वाली पशु बलि का पुरजोर विरोध किया। उन्होंने राजा बिंबिसार की यज्ञशाला में पहुंचकर एक नन्हे मेमने को अपनी गोद में उठा लिया और कहा कि यदि किसी निरीह प्राणी का रक्त बहाने से स्वर्ग मिलता है तो यह अधर्म है क्योंकि संसार के प्रत्येक जीव को जीने का समान अधिकार है। अंगुलिमाल जैसे भयंकर डाकू को केवल अपनी शांत करुणा से परास्त करके उन्होंने यह सिद्ध कर दिया कि घृणा को घृणा से नहीं बल्कि केवल प्रेम और क्षमा से ही जीता जा सकता है।

महर्षि पराशर अनुसार बुध और बुद्ध का गूढ़ संबंध

वैदिक ज्योतिष के महानतम ग्रंथ बृहत् पराशर होरा शास्त्र में महर्षि पराशर ने स्पष्ट उद्घोष किया है कि भगवान विष्णु के दशावतार नवग्रहों की ऊर्जा के मूर्त रूप हैं। महर्षि पराशर के सूत्र के अनुसार भगवान बुद्ध साक्षात बुध देव का प्रतिनिधित्व करते हैं। संस्कृत व्याकरण के अनुसार बुध और बुद्ध दोनों शब्दों की उत्पत्ति एक ही धातु बुध अवबोधने से हुई है जिसका अर्थ होता है जानना जागना समझना और प्रबुद्ध होना।

बुध ग्रह को ज्योतिष शास्त्र में बुद्धि का कारक माना गया है। बुद्धि वह शक्ति है जो भले और बुरे का सूक्ष्म विवेक करती है। भगवान बुद्ध का संपूर्ण दर्शन तर्क विश्लेषण मनोवैज्ञानिक यथार्थ और वैज्ञानिक दृष्टिकोण पर आधारित है। वे किसी भी सिद्धांत को केवल इसलिए स्वीकार करने से मना करते हैं क्योंकि वह परंपरा में कहा गया है बल्कि वे कहते हैं कि उसे स्वयं अपनी बुद्धि की कसौटी पर परखो। बुध ग्रह का स्वभाव तटस्थ और संतुलित होता है जो ठीक भगवान बुद्ध के मध्यम मार्ग को दर्शाता है। जिस प्रकार बुध ग्रह कालपुरुष की कुंडली में मिथुन और कन्या राशि का स्वामी होकर संवाद कौशल व्यापारिक चातुर्य और बौद्धिक गहराई प्रदान करता है उसी प्रकार भगवान बुद्ध के उपदेशों ने बिना किसी युद्ध के केवल अपनी सम्मोहक वाणी और तार्किक प्रज्ञा से संपूर्ण एशिया महाद्वीप को जीत लिया था।

अस्त बुध वक्री स्थिति और वाणी दोष का ज्योतिषीय समाधान

कालपुरुष की कुंडली में बुध तृतीय भाव पराक्रम व संवाद तथा षष्ठ भाव रोग ऋण व शत्रु का अधिपति होता है। कन्या राशि में बुध 15 अंश पर परम उच्च का होता है जबकि मीन राशि में 15 अंश पर वह परम नीच का माना जाता है। जब किसी जातक की जन्म कुंडली में बुध सूर्य के अत्यधिक निकट आकर अस्त हो जाता है अथवा वक्री होकर पापी ग्रहों राहु केतु या मंगल के प्रभाव में आ जाता है तब जातक के जीवन में अनेक प्रकार के मानसिक और व्यावहारिक संकट उत्पन्न होते हैं।

ऐसे जातक की निर्णय क्षमता अत्यंत दुर्बल हो जाती है वह सही समय पर सही निर्णय लेने में असमर्थ रहता है और व्यापार में भारी वित्तीय हानियां उठाता है। कुंडली में बुध का पीड़ित होना हकलाहट तुतलाहट अथवा वाणी में कटुता उत्पन्न करता है जिससे व्यक्ति के सामाजिक संबंध नष्ट हो जाते हैं। इसके अतिरिक्त तंत्रिका तंत्र की दुर्बलता त्वचा के असाध्य रोग और अत्यधिक मानसिक बेचैनी भी निर्बल बुध के लक्षण हैं। ऐसी विषम परिस्थितियों में भगवान बुद्ध के शांत स्वरूप का ध्यान एक दिव्य औषधि का कार्य करता है। भगवान बुद्ध सम्यक वाक अर्थात सत्य हितकारी और मधुर वाणी के साक्षात प्रतीक हैं। उनकी आराधना करने से मस्तिष्क की बिखरी हुई तरंगे शांत हो जाती हैं और जातक को अद्भुत बौद्धिक एकाग्रता प्राप्त होती है।

बुध ग्रह की शांति और बौद्धिक संतुलन के अचूक वैदिक उपाय

यदि किसी जातक की जन्म कुंडली में बुध ग्रह की महादशा या अंतर्दशा चल रही हो अथवा बुध के अशुभ प्रभाव के कारण शिक्षा व्यापार वाणी और तंत्रिका तंत्र में बाधाएं आ रही हों तो शास्त्रों में इसके निवारण के लिए अत्यंत दिव्य उपाय बताए गए हैं।

  • प्रतिदिन प्रातः काल स्नान के उपरांत पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख करके भगवान बुद्ध की शांत प्रतिमा के सम्मुख बैठें और पावन मंत्र ॐ नमो बुद्धाय अथवा बुध बीज मंत्र ॐ ब्रां ब्रीं ब्रौं सः बुधाय नमः का 108 बार शांत मन से जाप करें।
  • प्रत्येक बुधवार को देशी गौमाता को ताजी हरी घास हरी पालक अथवा भीगी हुई साबुत मूंग अपने हाथों से खिलाएं जिससे बुध ग्रह की क्रूरता शांत होती है।
  • भगवान बुद्ध के उपदेशों के अनुसार प्रत्येक बुधवार को कम से कम 2 घंटे का मौन व्रत धारण करें जो वाणी दोष को समाप्त करके मानसिक ऊर्जा को संचित करता है।
  • निर्धन विद्यार्थियों अनाथ बच्चों अथवा गुरुकुल में अध्ययनरत बालकों को पाठ्य पुस्तकें कलम और हरे रंग की अध्ययन सामग्री का आदरपूर्वक दान करें।
  • जातक को अपनी शारीरिक अवस्था और योग्य ज्योतिर्विद के परामर्श के अनुसार चार मुखी अथवा दस मुखी नेपाली चार मुखी रुद्राक्ष चांदी के तार या हरे रेशमी धागे में पिरोकर गले में धारण करना चाहिए।
  • घर के उत्तर दिशा में तुलसी का पौधा स्थापित करें और उसमें नित्य जल अर्पित करें तथा घर की महिलाओं बहनों और बुआ का सदैव आदर करें क्योंकि बुध ग्रह पारिवारिक संबंधों में बहन और कन्या का कारक माना जाता है।

बुद्ध साधना और बुध कृपा के आवश्यक नियम

क्या अवश्य करेंकिन गलतियों से सर्वथा दूर रहें
प्रतिदिन कुछ समय मौन रहकर अपनी श्वासों पर ध्यान केंद्रित करेंकिसी भी प्राणी के प्रति कटु वाणी अथवा अपशब्दों का प्रयोग न करें
प्रत्येक जीव के प्रति करुणा अहिंसा और दया का भाव रखेंनिरीह पशु पक्षियों को सताने अथवा मांस मदिरा के सेवन से बचें
बुधवार को हरे वस्त्र हरी मूंग और पुस्तकों का दान करेंव्यापार में किसी के साथ छल कपट बेईमानी अथवा जालसाजी न करें
दूसरों के विचारों को धैर्यपूर्वक सुनकर सम्यक निर्णय लेंबिना सोचे समझे क्रोध में आकर त्वरित प्रतिक्रिया देने से बचें
पूजा में श्वेत चंदन तुलसी पत्र और केसर युक्त खीर अर्पित करेंबिना कुंडली परीक्षण के पन्ना रत्न धारण करने की भूल न करें

विशुद्ध प्रज्ञा और आत्मिक शांति से स्वर्णिम जीवन

भगवान बुद्ध का पावन जीवन यह शाश्वत संदेश देता है कि संसार के समस्त दुखों की जड़ किसी बाहरी परिस्थिति में नहीं बल्कि मनुष्य के अपने भीतर की अशांत तृष्णा और अज्ञान में विद्यमान है। साम्राज्य सेनाएं और असीम संपत्तियां भी वह शांति प्रदान नहीं कर सकतीं जो स्वयं के मन को जीतकर प्राप्त होती है। बुध ग्रह का वास्तविक आशीर्वाद सांसारिक चालाकी नहीं अपितु वह विशुद्ध प्रज्ञा है जो सत्य और असत्य का सूक्ष्म बोध कराती है। जब मनुष्य अपने भीतर करुणा और विवेक का दीप प्रज्वलित करता है तब अज्ञान का सारा अंधकार स्वतः विलीन हो जाता है। भगवान बुद्ध के अष्टांगिक मार्ग का अनुसरण करने वाला साधक जीवन के समस्त द्वंद्वों से मुक्त होकर एक समतावादी शांत और यशस्वी व्यक्तित्व का निर्माण करता है और अंततः परम निर्वाण की आनंदमयी चेतना में लीन हो जाता है।

FAQ

भगवान बुद्ध का संबंध किस नवग्रह से माना जाता है? महर्षि पराशर रचित बृहत् पराशर होरा शास्त्र के अनुसार भगवान विष्णु का बुद्ध अवतार साक्षात बुध ग्रह का प्रतिनिधित्व करता है।

बुद्ध पूर्णिमा किस पावन तिथि को मनाई जाती है? बुद्ध पूर्णिमा प्रतिवर्ष वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा तिथि को अत्यंत श्रद्धा और ध्यान साधना के साथ मनाई जाती है।

भगवान बुद्ध ने मानव चेतना के कल्याण हेतु कौन सा मार्ग बताया? भगवान बुद्ध ने मानव जाति को दुखों से मुक्ति पाने के लिए मध्यम मार्ग और 8 सदगुणों से युक्त अष्टांगिक मार्ग का उपदेश दिया।

कुंडली में बुध ग्रह के दोष निवारण हेतु कौन सा मंत्र जपना चाहिए? बुध ग्रह के दोष निवारण और तार्किक बुद्धि की वृद्धि हेतु प्रतिदिन ॐ नमो बुद्धाय अथवा ॐ ब्रां ब्रीं ब्रौं सः बुधाय नमः मंत्र का 108 बार जाप करना सर्वोत्तम माना गया है।

बुद्ध अवतार की पूजा से किस प्रकार के विकारों में लाभ मिलता है? भगवान बुद्ध की आराधना से वाणी विकार हकलाहट मानसिक अवसाद तंत्रिका तंत्र की दुर्बलता और व्यापारिक अनिर्णय की स्थिति में अद्भुत लाभ प्राप्त होता है।

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लेखक

पं. संजीव शर्मा

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