चामुंडा अवतार और अष्टम भाव क्या है?

By पं. संजीव शर्मा

चंड मुंड संहार विकराल काली प्राकट्य और अष्टम भाव की मारकेश ऊर्जा का संपूर्ण वैदिक ज्योतिषीय रहस्य

माँ चामुंडा अवतार कथा और अष्टम भाव रहस्य

चामुंडा पूजन मुहूर्त और शास्त्रीय अनुष्ठान विधान

सनातन वैदिक परंपरा और शाक्त आगम दर्शन में आद्याशक्ति भगवती दुर्गा के अत्यंत उग्र संहारक और भक्तों के समस्त भय हरने वाले स्वरूप के रूप में पूजित माता चामुंडा का प्राकट्य आसुरी शक्तियों के समूल नाश अकाल मृत्यु निवारण और चेतना के गहन शोधन का सर्वोच्च शिखर है। वैदिक ज्योतिष तथा तंत्र शास्त्र के अंतर्गत जन्म कुंडली के अष्टम भाव की मारकेश ऊर्जा आकस्मिक दुर्घटनाओं गुप्त शत्रुओं के षड्यंत्रों तथा सौरमंडल के दो सर्वाधिक क्रूर ग्रहों शनि और मंगल की विस्फोटक युति को शांत करने के लिए भगवती चामुंडा की उपासना को सर्वश्रेष्ठ माना गया है। जब जातक की जन्म कुंडली में अष्टम भाव पाप ग्रहों से पीड़ित होकर दीर्घकालिक असाध्य व्याधियां विष भय अथवा तंत्र बाधा उत्पन्न कर रहा हो तब कालिका स्वरूपा माँ चामुंडा की शरण में जाने से अमोघ सुरक्षा और दीर्घायु की प्राप्ति होती है। चैत्र व शारदीय नवरात्रि की अष्टमी तिथि महानवमी अथवा प्रत्येक मास की कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी और मंगलवार व शनिवार के पावन अनुष्ठान का संपूर्ण शास्त्रीय विवरण नीचे दी गई तालिका में स्पष्ट रूप से प्रस्तुत किया गया है।

शास्त्रीय आयाम अनुष्ठान विवरण और ज्योतिषीय मान्यता
प्रमुख पावन तिथि चैत्र अथवा शारदीय नवरात्रि की महाष्टमी महानवमी और प्रत्येक मास की कृष्ण चतुर्दशी
दैनिक पूजन समय अर्धरात्रि का निशीथ काल अथवा सायंकालीन गोधूलि प्रदोष वेला
अधिष्ठाता स्वरूप खट्वांग खड्ग पाश और नरमुंड धारिणी व्याघ्र चर्म विभूषित माँ चामुंडा
ज्योतिषीय ग्रह व भाव संबंध अष्टम भाव द्वादश भाव आयु कारक शनि देव पराक्रम कारक मंगल देव और आर्द्रा नक्षत्र
मुख्य पूजन सामग्री शुद्ध सरसों का तेल रक्त चंदन गुड़हल पुष्प नींबू की माला काले तिल और कपूर
प्रधान वैदिक अनुष्ठान दुर्गा सप्तशती सप्तम अध्याय पाठ चामुंडा स्तोत्र और नवार्ण मंत्र जप
अपेक्षित फल अष्टम भाव दोष शांति अकाल मृत्यु से रक्षा शनि मंगल दोष निवारण और शत्रु शमन

शुंभ निशुंभ का आतंक और चंड मुंड का अभियान

श्रीमार्कंडेय पुराण के अंतर्गत वर्णित परम पावन श्रीदुर्गा सप्तशती के पंचम और षष्ठ अध्याय के इतिहास के अनुसार प्राचीन काल में शुंभ और निशुंभ नामक दो अत्यंत पराक्रमी और अहंकारी असुर भाइयों ने तीनों लोकों पर अपना आधिपत्य स्थापित कर लिया था। उन्होंने देवराज इंद्र सहित समस्त लोकपालों को स्वर्ग से निष्कासित कर दिया और देवताओं के यज्ञीय भाग छीन लिए। जब समस्त देवता हिमालय की कंदराओं में जाकर भगवती आद्याशक्ति की स्तुति करने लगे तब माता पार्वती के शरीर कोश से परम सुंदरी माँ कौशिकी का प्राकट्य हुआ।

भगवती कौशिकी के अनुपम और अलौकिक सौंदर्य की चर्चा जब शुंभ और निशुंभ के अनुचरों चंड और मुंड ने अपने स्वामियों से की तब उन दैत्यों के भीतर उस जगन्माता को अपनी पटरानी बनाने की कुत्सित अभिलाषा जाग्रत हुई। शुंभ ने पहले सुग्रीव नामक दूत को भेजा किंतु जब देवी ने युद्ध की चुनौती देकर उसे लौटा दिया और इसके पश्चात भेजे गए सेनापति धूम्रलोचन को अपने हुंकार मात्र से भस्म कर दिया तब शुंभ का क्रोध दावानल की भांति भड़क उठा।

शुंभ ने अपने सबसे विश्वासपात्र और क्रूर सेनापतियों चंड और मुंड को बुलाया। शुंभ ने आदेश दिया कि तुम दोनों एक विशाल अक्षौहिणी चतुरंगिणी सेना लेकर तुरंत उस हिमालय शिखर पर जाओ और उस गर्वीली स्त्री को बलपूर्वक बांधकर अथवा उसके केश पकड़कर घसीटते हुए मेरे सम्मुख उपस्थित करो। यदि कोई देवता गंधर्व अथवा यक्ष उसकी रक्षा हेतु आगे आए तो उसका तत्क्षण संहार कर डालो।

अपने राजा की आज्ञा शिरोधार्य करके चंड और मुंड लाखों दैत्यों रथों हाथियों और घुड़सवारों की विशाल सेना लेकर हिमालय की ओर बढ़े। उनके अस्त्र शस्त्रों की खनखनाहट और सेना की पदचाप से धरती कांपने लगी। उन्होंने हिमालय के उस पावन शिखर को चारों ओर से घेर लिया जहां भगवती कौशिकी सिंह पर सवार होकर मंद मुस्कान के साथ विराजमान थीं। दैत्यों ने अपने धनुषों पर बाण चढ़ाए और नंगी तलवारें लहराते हुए देवी पर आक्रमण करने हेतु आगे कदम बढ़ाए।

कौशिकी के ललाट से विकराल काली का प्राकट्य

अपनी ओर विशाल असुर सेना को अस्त्र शस्त्र ताने बढ़ते देखकर भगवती कौशिकी का अंतःकरण भीषण क्रोध से प्रज्वलित हो उठा। उस पावन मुखमंडल का दिव्य सौंदर्य एक ही क्षण में प्रलयंकारी तेज में रूपांतरित हो गया। देवी की भौंहें तिरछी हो गईं और क्रोध के उस चरम बिंदु पर उनके ललाट फलक से अचानक एक अत्यंत अंधकारमय विकराल और संहारक शक्ति का प्राकट्य हुआ।

वह शक्ति कोई और नहीं अपितु साक्षात संहारक कालिका थीं। उनका रूप इतना भयावह था कि उसे देखकर काल भी भयभीत हो जाए। उनका शारीरिक वर्ण प्रलयकालीन सजल मेघों और काजल के पर्वत के समान गहरा काला था। उनके खुले हुए केश आकाश मंडल में बादलों की भांति फैले हुए थे। उनके नेत्र गहरे गड्ढों के समान लाल अंगारों की भांति धधक रहे थे। उनका मुख अत्यंत विशाल था जिससे भयंकर दाढ़ें बाहर निकली हुई थीं और उनकी लपलपाती लाल जिह्वा संपूर्ण ब्रह्मांड को निगल जाने को आतुर दिखाई दे रही थी।

वे चीते के चर्म की साड़ी पहने हुए थीं और उनके गले में नरमुंडों की एक विशाल माला लटक रही थी। उनके हाथों में नरमुंडों से सुशोभित खट्वांग तीक्ष्ण खड्ग और पाश विद्यमान थे। उनके शरीर का मांस सूख चुका था और केवल अस्थि पंजर दिखाई दे रहा था जो इस बात का प्रतीक था कि वे भौतिक नश्वरता को भस्म करने वाली परम शून्यता हैं।

जैसे ही वे युद्ध भूमि में उतरीं उन्होंने एक ऐसी प्रलयंकारी और अट्टहास युक्त गर्जना की जिससे अंतरिक्ष के तारे डोलने लगे। उस भीषण गर्जना मात्र से सहस्रों असुरों के कान के पर्दे फट गए और वे रक्त वमन करते हुए भूमि पर गिर पड़े। इसके पश्चात उस विकराल देवी ने असुर सेना का संहार आरंभ किया।

  • वे विशाल हाथियों को अपने दोनों हाथों से उठाकर उनके सवारों और घंटियों सहित सीधे अपने मुख में डालकर चबाने लगीं।
  • घोड़ों रथों और सारथियों को वे एक साथ अपनी दाढ़ों के बीच पीसकर उनका चूरा बनाने लगीं।
  • जो असुर भागने का प्रयास कर रहे थे उन्हें उन्होंने अपने पाश से बांधकर धरती पर पटक दिया।
  • उनके पैरों के आघात से रथों के पहिए चूर्ण हो गए और युद्ध भूमि रक्त के महासागर में परिवर्तित हो गई।

चंड और मुंड का वध तथा चामुंडा नामकरण

सेना का ऐसा भयानक संहार देखकर महाबली असुर चंड अत्यंत क्रोधित हो उठा। उसने अपने अक्षय तुणीर से भयानक बाणों की वर्षा आरंभ कर दी। चंड के सहस्रों तीक्ष्ण बाण देवी के मुख में ऐसे समाने लगे जैसे आकाश से गिरती हुई जल की बूंदें प्रलयकालीन समुद्र में विलीन हो जाती हैं। इसके पश्चात मुंड ने भी आगे बढ़कर सहस्रों चक्रों और भालों का प्रहार किया किंतु देवी ने उन समस्त अस्त्रों को अपनी दाढ़ों से पकड़कर तिनके के समान चबा डाला।

क्रोध में भरकर उस विकराल रूप धारी देवी ने एक भयानक गर्जना की। वे अपने सिंह से उतरकर तीव्र गति से चंड की ओर झपटीं। उन्होंने चंड के बालों को अपने बाएं हाथ से पकड़ लिया और अपनी विशाल चमकती हुई खड्ग के एक ही प्रहार से उसका मस्तक धड़ से अलग कर दिया। चंड का विशाल शरीर भूमि पर गिरकर तड़पने लगा।

अपने भाई चंड को मृत देखकर मुंड दावानल की भांति जल उठा और वह गदा लेकर देवी की ओर दौड़ा। देवी ने तनिक भी विलंब किए बिना मुंड पर भी अपनी तीक्ष्ण तलवार का वार किया और क्षणभर में उसका सिर भी काटकर भूमि पर लुढ़का दिया। शेष बचे हुए असुर अपने प्रधान सेनापतियों को इस प्रकार मरते देखकर अपने अस्त्र शस्त्र फेंककर दसों दिशाओं में प्राण बचाकर भाग खड़े हुए।

इसके पश्चात उस विकराल देवी ने चंड और मुंड दोनों के कटे हुए विशाल मस्तकों को अपने हाथों में उठा लिया। वे युद्ध भूमि से आगे बढ़ीं और जहां भगवती कौशिकी विराजमान थीं वहां पहुंचकर उन्होंने एक दिव्य अट्टहास किया। उन्होंने दोनों दैत्यों के सिरों को देवी कौशिकी के पावन चरणों में एक विजय उपहार के रूप में समर्पित कर दिया।

विकराल रूप धारी देवी ने अत्यंत विनम्र स्वर में कहा कि हे कल्याणी इस महान युद्ध यज्ञ में मैंने चंड और मुंड नामक इन दोनों विशाल पशुओं का वध करके आपको भेंट किया है। अब आगे होने वाले महासंग्राम में आप स्वयं शुंभ और निशुंभ का वध करेंगी।

देवी कौशिकी अपने ललाट से उत्पन्न उस शक्ति के पराक्रम और सेवा भाव से अत्यंत प्रसन्न हुईं। भगवती कौशिकी ने मंद मुस्कान के साथ अमृतमयी वाणी में कहा कि हे कल्याणी तुमने चंड और मुंड जैसे संसार को कंपाने वाले दो महादैत्यों का संहार किया है। अतः आज से संपूर्ण त्रिलोकी में तुम्हारा यश गूंजेगा और तुम समस्त देवताओं ऋषियों और मनुष्यों के मध्य चामुंडा के नाम से सदा सदा के लिए विख्यात होगी। चंड का चा और मुंड का मुंडा लेकर तुम्हारा यह पावन नाम समस्त दुखों और शत्रुओं का नाश करने वाला महामंत्र बनेगा।

अष्टम भाव की मारकेश ऊर्जा और आयु रक्षा

वैदिक ज्योतिष के महानतम ग्रंथ बृहत् पराशर होरा शास्त्र में जन्म कुंडली के प्रत्येक भाव के गूढ़ रहस्यों का सूक्ष्म विवेचन मिलता है। ज्योतिषीय दृष्टिकोण से माँ चामुंडा का पावन स्वरूप सीधे तौर पर जन्म कुंडली के अष्टम भाव का शोधन करने वाली सर्वोच्च पराशक्ति है।

जन्म कुंडली का अष्टम भाव जिसे रंध्र भाव अथवा आयु भाव कहा जाता है सीधे तौर पर व्यक्ति की जीवन प्रत्याशा मृत्यु के प्रकार आकस्मिक विपत्तियों गुप्त विद्याओं असाध्य रोगों और अदृश्य षड्यंत्रों का स्थान होता है। जब किसी जातक की कुंडली में अष्टम भाव अत्यधिक पीड़ित होता है अथवा मारकेश ग्रहों की दशा अंतर्दशा चल रही होती है तो व्यक्ति का जीवन निरंतर संकटों के भंवर में फंसा रहता है।

  • अष्टम भाव में स्थित पापी ग्रह व्यक्ति के जीवन में अचानक होने वाली प्राणघातक दुर्घटनाओं का मार्ग प्रशस्त करते हैं।
  • यदि अष्टम भाव पर राहु अथवा केतु का प्रभाव हो तो जातक को अज्ञात विष जनित रोग प्रेत बाधा अथवा गहरी मानसिक कुंठा का सामना करना पड़ता है।
  • चंड और मुंड वास्तव में मनुष्य के अंतःकरण में छिपे हुए उन तामसिक विकारों और अहंकार के प्रतीक हैं जो अष्टम भाव से उत्पन्न होकर मनुष्य की आयु और शांति को निगल जाते हैं।
  • माँ चामुंडा का खड्ग अष्टम भाव के समस्त काल दोषों और अकाल मृत्यु के पाश को एक ही वार में काट देता है।
  • जब कोई साधक चामुंडा स्वरूप का ध्यान करता है तो उसकी कुंडली का अष्टम भाव शुद्ध होकर मारकेश ऊर्जा से मुक्त हो जाता है और जातक को अमोघ दीर्घायु तथा अभय की प्राप्ति होती है।

क्या शनि और मंगल की क्रूर युति शांत होती है?

वैदिक ज्योतिष में शनि और मंगल का संबंध सर्वाधिक विस्फोटक और विनाशकारी माना गया है। शनि ग्रह वायु तत्व मंद गति और अंधकार का प्रतीक है जबकि मंगल ग्रह अग्नि तत्व तीव्र गति और रक्त का स्वामी है। जब किसी कुंडली में शनि और मंगल एक साथ बैठते हैं अथवा एक दूसरे पर दृष्टि डालते हैं तो उसे द्वंद्व योग अथवा अंगारक योग का उग्र रूप माना जाता है।

यह युति व्यक्ति के जीवन में अचानक रक्तपात भयंकर अग्नि दुर्घटनाएं पुलिस कचहरी के गंभीर विवाद और हड्डियों अथवा रक्त से जुड़े असाध्य रोग उत्पन्न करती है। ऐसे जातक का स्वभाव या तो अत्यधिक क्रोधी हो जाता है अथवा वह गहरे अवसाद में चला जाता है।

माँ चामुंडा साक्षात मंगल के संहारक पराक्रम और शनि के कठोर न्याय का पावन संगम हैं। जहाँ वे मंगल की उग्रता को नियंत्रित करके उसे धर्म की रक्षा में लगाती हैं वहीं शनि के क्रूर दण्ड को अपनी ममतामयी कृपा से शांत कर देती हैं। जब कोई पीड़ित जातक माँ चामुंडा के चरणों में नतमस्तक होता है तो शनि और मंगल का यह आपसी संघर्ष एक शक्तिशाली रक्षा कवच में बदल जाता है जिससे साधक समाज में अजेय प्रतिष्ठा प्राप्त करता है।

अष्टम भाव दोष शांति और शत्रु शमन के अचूक वैदिक उपाय

यदि किसी जातक की जन्म कुंडली में अष्टम भाव पीड़ित हो शनि मंगल की युति बन रही हो अकाल मृत्यु का भय निरंतर सताता हो अथवा गुप्त शत्रुओं ने जीवन संकट में डाल दिया हो तो शास्त्रों में माँ चामुंडा की प्रसन्नता हेतु अत्यंत प्रामाणिक उपाय बताए गए हैं।

  • प्रत्येक मंगलवार अथवा शनिवार की संध्या को सूर्यास्त के पश्चात स्नान करके लाल वस्त्र धारण करें और घर के एकांत पूजा स्थल पर बैठकर मिट्टी के दीपक में शुद्ध कड़वा सरसों का तेल डालकर प्रज्वलित करें।
  • पूर्व अथवा उत्तर दिशा की ओर मुख करके बैठें और रुद्राक्ष की माला से पावन नवार्ण मंत्र ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे का कम से कम 108 बार शांत मन से जाप करें जो तीनों लोकों में समस्त सिद्धियों का मूल है।
  • अपने भीतर के भय को नष्ट करने और प्राणों की रक्षा हेतु प्रतिदिन प्रातः काल श्रीदुर्गा सप्तशती के अंतर्गत आने वाले पावन सप्तम अध्याय का पाठ करें जिसमें चंड और मुंड के वध का पावन प्रसंग वर्णित है।
  • प्रत्येक मंगलवार को माँ चामुंडा के मंदिर में जाकर उन्हें 9 ताजे लाल गुड़हल के पुष्प अर्पित करें और एक साबुत नींबू की माला देवी के चरणों में समर्पित करें जिससे समस्त प्रकार की नकारात्मक शक्तियां तत्काल शांत होती हैं।
  • जातक को अपनी शारीरिक अवस्था और योग्य ज्योतिर्विद के परामर्श के अनुसार आठ मुखी अथवा चौदह मुखी नेपाली रुद्राक्ष काले अथवा लाल रेशमी धागे में पिरोकर मंगलवार के दिन धारण करना चाहिए जो अकाल मृत्यु के योग को नष्ट करता है।
  • प्रत्येक शनिवार को काले तिल उड़द की दाल और सरसों के तेल से बनी रोटी आवारा काले कुत्तों अथवा कौवों को खिलाएं तथा निर्धन असहाय व्यक्तियों को जूते चप्पल अथवा कंबल का आदरपूर्वक दान करें।

चामुंडा साधना के आवश्यक शास्त्रीय नियम

क्या अवश्य करें किन गलतियों से सर्वथा दूर रहें
प्रतिदिन प्रातः काल और सायंकाल अपने इष्ट देव और माँ चामुंडा का स्मरण करें केवल किसी निर्दोष व्यक्ति को हानि पहुंचाने अथवा बदले की भावना से साधना कभी न करें
मंगलवार और शनिवार को पूर्ण ब्रह्मचर्य स्वच्छता और सात्विक आहार का पालन करें तामसिक भोजन मदिरा और किसी भी प्रकार के नशीले पदार्थों से सर्वथा दूर रहें
पूजा में सदैव शुद्ध सरसों का तेल रक्त चंदन और लाल पुष्पों का ही प्रयोग करें साधना के समय मन में काम क्रोध अथवा हिंसक विचारों को तनिक भी स्थान न दें
अपने जीवन में सत्य धर्म और असहाय प्राणियों की रक्षा का अटूट संकल्प लें किसी भी वृद्ध दुर्बल अथवा संकटग्रस्त व्यक्ति का कभी अनादर अथवा उपहास न करें
रात्रि कालीन जप के समय मन को पूर्णतः एकाग्र और शांत बनाए रखें बिना योग्य गुरु के मार्गदर्शन के श्मशान साधना अथवा उग्र तांत्रिक कर्मकांडों में न उलझें

धर्म विजय और अभय चेतना का शाश्वत संदेश

भगवती चामुंडा का पावन अवतार संपूर्ण मानव जाति को यह सनातन शिक्षा प्रदान करता है कि अधर्म असत्य और आसुरी वृत्तियां चाहे कितनी भी विशाल सेना लेकर क्यों न आएं सत्य के एक ही प्रहार से उनका विनाश सुनिश्चित होता है। चंड और मुंड के शीश काटकर कौशिकी को समर्पित करना यह सिखाता है कि साधक को अपने जीवन की समस्त विजय और सिद्धियों का श्रेय स्वयं न लेकर केवल परमात्मा के चरणों में समर्पित कर देना चाहिए। जब तक मनुष्य अपने भीतर के अहंकार को जीवित रखता है तब तक वह अष्टम भाव के मृत्यु चक्र में बंधा रहता है किंतु जिस क्षण वह अपने अहंकार का शीश काटकर जगन्माता के चरणों में रख देता है उसी क्षण वह अमरत्व और परम पद को प्राप्त कर लेता है। माँ चामुंडा का नित्य स्मरण मनुष्य के जीवन से समस्त भय अकाल मृत्यु के संकट और ग्रह दोषों को समाप्त करके उसे एक तेजस्वी निर्भय और सम्मानित व्यक्तित्व बनाकर अंततः मोक्ष की प्राप्ति कराता है।

FAQ

माँ काली को चामुंडा नाम किस कारण से प्राप्त हुआ था? शुंभ और निशुंभ के महाबली सेनापति चंड और मुंड का संहार करके उनके शीश देवी कौशिकी को भेंट करने के कारण भगवती को संसार में चामुंडा नाम प्राप्त हुआ।

माँ चामुंडा का प्राकट्य किस देवी के ललाट से हुआ था? दुर्गा सप्तशती के अनुसार माँ चामुंडा का प्राकट्य हिमालय पर तपस्यारत भगवती कौशिकी के क्रोधित ललाट से एक अत्यंत विकराल संहारक शक्ति के रूप में हुआ था।

ज्योतिष में माँ चामुंडा का संबंध किस भाव और किन ग्रहों से माना जाता है? वैदिक ज्योतिष में माँ चामुंडा का सीधा संबंध जन्म कुंडली के अष्टम भाव मारकेश ऊर्जा तथा आयु कारक शनि देव और पराक्रम कारक मंगल देव की युति शांति से है।

अकाल मृत्यु और भयंकर भय से मुक्ति पाने हेतु किस मंत्र का जाप सर्वश्रेष्ठ है? अकाल संकटों और भय से मुक्ति पाने हेतु प्रतिदिन नवार्ण मंत्र ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे का 108 बार शांत मन से जाप करना सर्वश्रेष्ठ माना गया है।

दुर्गा सप्तशती के किस अध्याय में चामुंडा प्राकट्य और चंड मुंड वध की कथा है? श्रीदुर्गा सप्तशती के पावन सप्तम अध्याय में माँ चामुंडा के प्राकट्य और चंड तथा मुंड के संहार का अत्यंत विस्तृत और प्रामाणिक वर्णन मिलता है।

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लेखक

पं. संजीव शर्मा

पं. संजीव शर्मा (63)


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