छिन्नमस्ता अवतार और राहु रहस्य क्या?

By पं. सुव्रत शर्मा

प्रचंड चंडिका का प्राकट्य कामदेव रति दमन और राहु ग्रह के संपूर्ण ज्योतिषीय उपाय

माँ छिन्नमस्ता अवतार कथा और राहु रहस्य

छिन्नमस्ता पूजन मुहूर्त और शास्त्रीय विधान

सनातन वैदिक परंपरा और शाक्त तांत्रिक दर्शन में आद्याशक्ति भगवती महामाया के दस महाविद्या स्वरूपों में पंचम और प्रचंड चंडिका के रूप में पूजित माता छिन्नमस्ता का प्राकट्य असीम ममता काम वासना के दमन अहंकार के समूल विसर्जन और सहस्रार चक्र पर कुण्डलिनी जागरण का सर्वोच्च शिखर है। वैदिक ज्योतिष तथा तत्व विज्ञान के अंतर्गत सौरमंडल के सर्वाधिक मायावी रहस्यमयी और तमोगुणी छाया ग्रह राहु के समस्त क्रूर दोषों को शांत करने के लिए भगवती छिन्नमस्ता की उपासना को सर्वश्रेष्ठ माना गया है। जब जातक की जन्म कुंडली में राहु ग्रह लग्न अष्टम अथवा द्वादश भाव में स्थित होकर कालसर्प योग ग्रहण दोष मानसिक मतिभ्रम नशा व्यसन हिंसक प्रवृत्तियां अथवा आकस्मिक विनाशकारी संकट उत्पन्न कर रहा हो तब छिन्नमस्तक धारण करने वाली देवी की शरण में जाने से अमोघ आत्मिक विजय और परम चेतना की प्राप्ति होती है। वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी तिथि छिन्नमस्ता जयंती और इस पावन साधना की तिथि समय तथा शास्त्रीय घटकों का संपूर्ण विवरण नीचे दी गई तालिका में स्पष्ट रूप से प्रस्तुत किया गया है।

शास्त्रीय आयाम अनुष्ठान विवरण और ज्योतिषीय मान्यता
प्रमुख पावन तिथि वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी छिन्नमस्ता जयंती अथवा मंगलवार व शनिवार
दैनिक पूजन समय अर्धरात्रि का निशीथ काल अथवा सायंकालीन संधि वेला
अधिष्ठाता स्वरूप स्वयं का कटा मस्तक बाएं हाथ में लिए तीन रक्त धाराएं बहाती त्रिगुणात्मिका देवी
ज्योतिषीय ग्रह व चक्र संबंध छाया ग्रह राहु सहस्रार चक्र तथा स्वाति व शतभिषा नक्षत्र
मुख्य पूजन सामग्री शुद्ध सरसों का तेल रक्त चंदन गुड़हल पुष्प काले तिल लाल कनेर और नारियल
प्रधान वैदिक अनुष्ठान छिन्नमस्ता स्तोत्र पाठ त्रैलोक्य विजय कवच और ॐ श्रीं ह्रीं क्लीं ऐं वज्र वैरोचनीये हूं हूं फट् स्वाहा जप
अपेक्षित फल राहु महादशा शांति कुण्डलिनी जागरण काम क्रोध दमन और भय मुक्ति

मंदाकिनी तट पर सहचरियों की क्षुधा

प्राणतोषिणी तंत्र और स्वतंत्र तंत्र के अत्यंत गोपनीय आख्यानों के अनुसार एक बार देवाधिदेव भगवान शिव की शाश्वत शक्ति माता पार्वती अपनी दो प्रधान सहचरियों डाकिनी और वर्णिनी जिन्हें जया और विजया भी कहा जाता है के साथ मंदाकिनी नदी में स्नान करने के लिए पधारीं। मंदाकिनी का पावन जल अत्यंत शीतल और प्रवाहमान था। देवी और उनकी सहचरियों ने उस पावन जल में दीर्घ काल तक जलक्रीड़ा की। स्नान के उपरांत जब वे तट पर आईं तब एक अत्यंत विचित्र और विस्मयकारी घटना घटित हुई।

दीर्घ काल तक स्नान करने के कारण डाकिनी और वर्णिनी की जठराग्नि अत्यंत तीव्र हो गई। उन्हें इतनी भयानक भूख लगी कि उनका शरीर दुर्बल होने लगा और भूख की ज्वाला से उनका वर्ण काला और पीला पड़ने लगा। उन दोनों ने अत्यंत कातर स्वर में माता से प्रार्थना की कि हे करुणामयी माता हमें अत्यंत तीव्र भूख लगी है कृपया हमारे भोजन की व्यवस्था कीजिए।

भगवती पार्वती ने अत्यंत स्नेह से उत्तर दिया कि तुम दोनों कुछ समय धैर्य रखो हम अपने धाम कैलाश पहुंचकर तुम्हें उत्तम और तृप्तिकारक भोजन प्रदान करेंगे। दोनों सहचरियां कुछ समय शांत रहीं किंतु कुछ ही पलों के पश्चात भूख की पीड़ा इतनी असहनीय हो गई कि वे तड़पने लगीं।

  • सहचरियों ने कांपते हुए स्वर में कहा कि हे जगन्माता संपूर्ण संसार अपनी भूख मिटाने के लिए अपनी माता के पास ही पुकार करता है।
  • उन्होंने कहा कि जब एक बालक भूख से व्याकुल होता है तब माता उसकी रक्षा करती है और इस समय आपके अतिरिक्त हमारा कोई दूसरा आश्रय नहीं है।
  • सहचरियों की वाणी में भूख की जो दारुण वेदना थी उसने भगवती के कोमल मातृ हृदय को द्रवित कर दिया।
  • माता भवानी ने विचार किया कि जो संतान अपनी माता के सम्मुख भूख से तड़प रही हो उसे धैर्य रखने का उपदेश देना मातृत्व का अपमान है।

स्वयं का शीश कर्तन और तीन रक्त धाराएं

भगवती पराशक्ति ने देखा कि उस निर्जन वन में उनके अतिरिक्त भोजन का कोई अन्य स्रोत उपलब्ध नहीं था। तब आद्याशक्ति ने अपने मातृत्व की वह पराकाष्ठा प्रकट की जिसकी कल्पना भी संपूर्ण ब्रह्मांड में कोई दूसरा नहीं कर सकता। देवी ने विचार किया कि संतान के जीवन की रक्षा हेतु माता अपने प्राणों और अपनी देह का भी उत्सर्ग करने में तनिक संकोच नहीं करती।

भगवती ने तत्काल अपने दाहिने हाथ में एक अत्यंत तीक्ष्ण खड्ग धारण किया। उन्होंने बिना एक क्षण का विलंब किए उस दिव्य खड्ग के एक ही भीषण प्रहार से अपने ही शीश को अपने धड़ से अलग कर दिया। उनका पावन मस्तक कटकर उनके बाएं हाथ में आ गिरा। वह रूप साक्षात प्रचंड चंडिका और छिन्नमस्ता का था।

जैसे ही देवी का शीश कटा वैसे ही उनके कबंध अर्थात धड़ की ग्रीवा से रक्त की तीन अत्यंत वेगवती दिव्य धाराएं फव्वारे की भांति प्रस्फुटित हुईं। वे तीनों धाराएं साधारण रक्त नहीं थीं अपितु वे अमृतमयी जीवनदायिनी ऊर्जा का साक्षात प्रवाह थीं।

  • बाईं ओर फूटी रक्त धारा को डाकिनी ने अपने मुख में भर लिया और वह तृप्त होकर आनंद से नाचने लगी।
  • दाईं ओर प्रवाहित रक्त धारा को वर्णिनी ने पिया जिससे उसकी भूख तत्क्षण शांत हो गई और उसका तेज पुनः लौट आया।
  • मध्य की जो सबसे विशाल और ऊर्ध्वगामी रक्त धारा थी वह सीधे आकाश की ओर उछली और देवी के बाएं हाथ में स्थित उनके स्वयं के कटे हुए मस्तक ने उस धारा का पान किया।

स्वयं अपनी ही रक्त धारा का पान करके देवी का मुखमंडल करोड़ों सूर्यों के समान दैदीप्यमान हो उठा। उन्होंने अपनी दोनों सहचरियों को अपनी देह का रस पिलाकर जीवनदान दिया। अपने मस्तक का त्याग करके संतान की क्षुधा शांत करने के कारण ही वे संपूर्ण ब्रह्मांड में छिन्नमस्ता और प्रचंड चंडिका के नाम से अमर हुईं।

क्या काम और रति पर चरण न्यास है?

शाक्त प्रतिमा विज्ञान और तंत्र चित्रों में भगवती छिन्नमस्ता का स्वरूप अत्यंत विलक्षण और गूढ़ प्रतीकात्मकता से युक्त है। देवी एक खिले हुए श्वेत कमल पर आरूढ़ हैं और उस कमल के ऊपर साक्षात कामदेव और उनकी पत्नी रति रति क्रीड़ा में रत हैं जिनके वक्षस्थल पर भगवती छिन्नमस्ता अपने दोनों चरण रखकर खड़ी हैं।

संसार के साधारण मनुष्य इस दृश्य को देखकर भ्रमित हो जाते हैं किंतु इसका आध्यात्मिक रहस्य अत्यंत पावन और वैज्ञानिक है। कामदेव सांसारिक वासना और काम भाव के प्रतीक हैं तथा रति उस भोग से उत्पन्न होने वाले आकर्षण और आसक्ति की प्रतीक हैं।

  • काम और रति के ऊपर अपने चरण रखना यह दर्शाता है कि जब तक मनुष्य अपनी इंद्रिय जनित कामुकता और भोग विलास की वासनाओं को कुचल नहीं देता तब तक उसकी आध्यात्मिक चेतना का उत्थान असंभव है।
  • यह स्वरूप काम का संहार नहीं करता अपितु काम ऊर्जा को नियंत्रित करके उसे ऊर्ध्वगामी बनाता है।
  • जो ऊर्जा सामान्यतः अधोगामी होकर संसार के बंधनों में गिराती है छिन्नमस्ता उस ऊर्जा को सहस्रार चक्र की ओर मोड़ देती हैं।
  • देवी के गले में नरमुंडों की माला और सर्प का यज्ञोपवीत यह सिद्ध करता है कि वे काल और प्राण शक्ति दोनों की परम स्वामिनी हैं।

कुण्डलिनी जागरण और सहस्रार चक्र का विज्ञान

योग तंत्र के अंतर्गत मानव शरीर के मेरुदंड में तीन प्रमुख नाड़ियां स्थित होती हैं जिन्हें इड़ा पिंगला और सुषुम्ना कहा जाता है। भगवती छिन्नमस्ता की ग्रीवा से निकलने वाली तीन रक्त धाराएं साक्षात इन तीनों सूक्ष्म नाड़ियों का ही प्रकटीकरण हैं।

बाईं धारा इड़ा नाड़ी है जो चंद्र स्वर और मन की प्रतीक है जिसे डाकिनी पीती है। दाईं धारा पिंगला नाड़ी है जो सूर्य स्वर और प्राण शक्ति की प्रतीक है जिसे वर्णिनी ग्रहण करती है। मध्य की ऊर्ध्वगामी धारा सुषुम्ना नाड़ी है जो विशुद्ध ब्रह्म चेतना का मार्ग है जिसे स्वयं छिन्नमस्ता का मस्तक पीता है।

मानव शरीर में सिर अहंकार बुद्धि और मैं के भाव का केंद्र होता है। जब साधक योग साधना के शिखर पर पहुंचता है तो उसे अपने इस अहंकार रूपी सिर को ज्ञान के खड्ग से काटना पड़ता है जिसे शास्त्रों में रुद्र ग्रंथि का भेदन कहा गया है। जब अहंकार का मस्तक कट जाता है तब मूलाधार में सोई हुई कुण्डलिनी शक्ति तीव्र वेग से जागृत होकर रीढ़ की हड्डी से होती हुई मस्तक के शिखर पर स्थित सहस्रार चक्र में प्रवेश कर जाती है। वहां पहुंचकर साधक को परम समाधि और अमृत रस की प्राप्ति होती है। छिन्नमस्ता साक्षात इस आंतरिक कुण्डलिनी विस्फोट की अधिष्ठात्री महाशक्ति हैं।

छाया ग्रह राहु और काल का ज्योतिषीय मर्म

वैदिक ज्योतिष के महानतम ग्रंथ बृहत् पराशर होरा शास्त्र में छाया ग्रह राहु को एक अत्यंत विचित्र और संहारक शक्ति माना गया है। पौराणिक समुद्र मंथन की कथा के अनुसार राहु वास्तव में स्वर्भानु नामक असुर का कटा हुआ सिर है जिसके पास केवल मस्तक है किंतु धड़ नहीं है। धड़ न होने के कारण राहु की भूख कभी शांत नहीं होती वह निरंतर अतृप्त रहता है और सांसारिक भोगों की ओर भागता है।

ज्योतिष में राहु अज्ञात भय मतिभ्रम अचानक होने वाले षड्यंत्र विष तंत्र बाधा और तामसिक विकारों का अधिपति है। जब किसी जातक की जन्म कुंडली में राहु पीड़ित होता है तो व्यक्ति का अपनी बुद्धि और इंद्रियों पर कोई नियंत्रण नहीं रहता।

  • राहु का स्वभाव है सिर का होना और शरीर का न होना जबकि छिन्नमस्ता का स्वरूप है सिर का अलग होना और धड़ का चैतन्य रहना।
  • भगवती छिन्नमस्ता साक्षात राहु ग्रह की सर्वोच्च अधिष्ठात्री देवी हैं।
  • जहाँ राहु अतृप्त होकर संसार को निगलना चाहता है वहीं माँ छिन्नमस्ता अपने ही रक्त से संसार को तृप्त करके राहु की उस अनंत भूख को शांत कर देती हैं।
  • जब कोई साधक छिन्नमस्ता की उपासना करता है तो राहु का विनाशकारी प्रभाव तत्क्षण एक परम आध्यात्मिक शक्ति में रूपांतरित हो जाता है।
  • राहु जनित कालसर्प दोष प्रेत बाधा अथवा पागलपन जैसी व्याधियां छिन्नमस्ता कृपा से क्षणभर में भस्म हो जाती हैं।

क्या वासना और अहंकार का दमन संभव है?

आधुनिक युग में मानव समाज की सबसे बड़ी त्रासदी यह है कि मनुष्य अपने ही काम क्रोध और अहंकार की अग्नि में जल रहा है। व्यक्ति बाह्य जगत को जीतने का प्रयास करता है किंतु अपने भीतर उठने वाले विकारों के सम्मुख असहाय हो जाता है। जब तक मनुष्य अपने भीतर के झूठे अहंकार को पोषित करता रहता है तब तक वह तनाव अवसाद और संताप से मुक्त नहीं हो सकता।

माँ छिन्नमस्ता का स्वरूप हमें यह अमर संदेश देता है कि सच्चा त्याग वही है जहां व्यक्ति अपने अहंकार का समर्पण कर दे। जब मनुष्य यह समझ लेता है कि यह देह यह पद और यह प्रतिष्ठा सब नश्वर हैं और वह अपने स्वार्थ की बलि चढ़ा देता है तब उसके जीवन में दिव्यता का अवतरण होता है। जो साधक काम वासना के भयंकर वेग से त्रस्त हैं अथवा जिनके भीतर अत्यधिक क्रोध और अहंकार भरा हुआ है उनके लिए छिन्नमस्ता साधना मन को शीतल और शांत करने वाली अमोघ औषधि सिद्ध होती है।

राहु दोष शांति और आत्मिक सिद्धि के उपाय

यदि किसी जातक की जन्म कुंडली में राहु ग्रह नीच का हो कालसर्प दोष बन रहा हो व्यापार में अचानक भारी नुकसान हो रहा हो अथवा मन में निरंतर आत्महत्या या अज्ञात भय के विचार आते हों तो शास्त्रों में इसके निवारण हेतु अत्यंत प्रभावी वैदिक उपाय बताए गए हैं।

  • प्रत्येक मंगलवार अथवा शनिवार की संध्या को स्नान के उपरांत घर के एकांत पूजा स्थल पर बैठें और माता छिन्नमस्ता के चित्र अथवा यंत्र के सम्मुख शुद्ध कड़वे सरसों के तेल का दीपक प्रज्वलित करें।
  • पूर्व अथवा उत्तर दिशा की ओर मुख करके बैठें और रुद्राक्ष की माला से माता छिन्नमस्ता के पावन बीज मंत्र ॐ श्रीं ह्रीं क्लीं ऐं वज्र वैरोचनीये हूं हूं फट् स्वाहा अथवा ॐ छिन्नमस्तायै नमः का कम से कम 108 बार शांत मन से जाप करें।
  • प्रतिदिन प्रातः काल अथवा सायंकाल के समय महर्षि विश्वामित्र रचित छिन्नमस्ता स्तोत्र अथवा त्रैलोक्य विजय कवच का पाठ करें जो शरीर और आभा मंडल को अभेद्य सुरक्षा प्रदान करता है।
  • प्रत्येक शनिवार को किसी प्राचीन शिव अथवा भैरव मंदिर में जाकर शिवलिंग पर जल और काले तिल अर्पित करें तथा नारियल पर मौली बांधकर भैरव जी के चरणों में चढ़ाएं।
  • जातक को अपनी शारीरिक अवस्था और योग्य ज्योतिर्विद के परामर्श के अनुसार आठ मुखी अथवा नौ मुखी नेपाली रुद्राक्ष काले रेशमी धागे में पिरोकर शनिवार के दिन धारण करना चाहिए जो राहु की ऊर्जा को संतुलित करता है।
  • प्रत्येक शनिवार को कुष्ठ रोगियों अथवा निर्धन सफाई कर्मचारियों को काले कंबल उड़द की दाल और सरसों के तेल से बने भोजन का आदरपूर्वक दान करें जिससे राहु के क्रूर दोष शांत होते हैं।

छिन्नमस्ता साधना के आवश्यक शास्त्रीय नियम

क्या अवश्य करें किन गलतियों से सर्वथा दूर रहें
प्रतिदिन प्रातः काल अपने मन में काम और क्रोध को शांत रखने का संकल्प लें केवल किसी को हानि पहुंचाने अथवा तांत्रिक अभिचार हेतु साधना न करें
छिन्नमस्ता देवी को सदैव शुद्ध रक्त चंदन और लाल गुड़हल पुष्प अर्पित करें साधना काल में पराई स्त्री अथवा कामुक विचारों को मन में न आने दें
मंगलवार और शनिवार को पूर्ण ब्रह्मचर्य और सात्विक आहार का पालन करें तामसिक भोजन मदिरा और किसी भी प्रकार के नशीले पदार्थों से दूर रहें
अपने माता पिता गुरु और असहाय प्राणियों की सदैव सेवा करें अपनी शक्ति विद्या अथवा तंत्र ज्ञान का कभी भी अहंकार न करें
पूजा में शुद्ध सरसों का तेल भस्म और ताजे पुष्पों का ही प्रयोग करें बिना योग्य गुरु के मार्गदर्शन के उग्र श्मशान साधना में प्रवृत्त न हों

अहं विसर्जन से परम चेतना का साक्षात्कार

भगवती छिन्नमस्ता का पावन अवतार संपूर्ण मानव जाति को यह सनातन सत्य सिखाता है कि जीवन का वास्तविक आनंद संग्रह करने में नहीं अपितु स्वयं को न्योछावर कर देने में है। जब एक माता अपनी संतानों के लिए अपने ही शीश का कर्तन कर सकती है तो उस मातृत्व की अगाध करुणा की तुलना संसार के किसी भी भाव से नहीं की जा सकती। कटा हुआ मस्तक यह स्मरण कराता है कि जब तक बुद्धि का अहंकार जीवित रहेगा तब तक ईश्वर से मिलन संभव नहीं है। जब मनुष्य अपने अहंता और ममता की बलि चढ़ाकर पूर्ण शरणागति के साथ प्रचंड चंडिका के चरणों में गिर पड़ता है तब उसकी कुण्डलिनी शक्ति सुषुम्ना मार्ग से होती हुई सहस्रार में शिव से एकाकार हो जाती है। माँ छिन्नमस्ता का नित्य स्मरण मनुष्य के जीवन से राहु के समस्त भयों को समाप्त करके उसे निर्भय तेजस्वी और परम ज्ञानी बनाकर अंततः मोक्ष की प्राप्ति कराता है।

FAQ

माँ छिन्नमस्ता ने अपना शीश किस कारण से काटा था? मंदाकिनी नदी में स्नान के पश्चात अपनी सहचरियों डाकिनी और वर्णिनी की भूख को शांत करने हेतु माता ने ममतावश अपना शीश काट दिया था।

माँ छिन्नमस्ता के कटे हुए धड़ से निकली तीन रक्त धाराओं का क्या रहस्य है? दो रक्त धाराएं सहचरियों डाकिनी और वर्णिनी की भूख शांत करती हैं और तीसरी ऊर्ध्वगामी धारा स्वयं देवी का कटा हुआ मस्तक पीता है जो इड़ा पिंगला और सुषुम्ना नाड़ी का प्रतीक हैं।

माँ छिन्नमस्ता कामदेव और रति के ऊपर क्यों खड़ी हैं? कामदेव और रति पर चरण रखना काम वासना और सांसारिक भोग के पूर्ण दमन तथा काम ऊर्जा को सहस्रार की ओर ऊर्ध्वगामी बनाने का प्रतीक है।

ज्योतिष में माँ छिन्नमस्ता का संबंध किस प्रमुख ग्रह से माना जाता है? वैदिक ज्योतिष में माँ छिन्नमस्ता का सीधा संबंध छाया ग्रह राहु से है जिनके समस्त क्रूर दोष और कालसर्प योग छिन्नमस्ता साधना से शांत होते हैं।

राहु की महादशा और भय निवारण के लिए किस मंत्र का जाप करना चाहिए? राहु दोष शांति और मानसिक भय से मुक्ति हेतु प्रतिदिन ॐ श्रीं ह्रीं क्लीं ऐं वज्र वैरोचनीये हूं हूं फट् स्वाहा अथवा ॐ छिन्नमस्तायै नमः मंत्र का जाप सर्वोत्तम है।

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लेखक

पं. सुव्रत शर्मा

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