दत्तात्रेय अवतार और नवम भाव रहस्य क्या?

By पं. अमिताभ शर्मा

अत्रि अनसूया के तपोबल से प्राकट्य 24 गुरुओं का ज्ञान और गुरु चांडाल दोष निवारण का संपूर्ण रहस्य

भगवान दत्तात्रेय अवतार कथा और नवम भाव का रहस्य

दत्तात्रेय पूजन विधान और ज्योतिषीय नियम

सनातन वैदिक परंपरा में भगवान श्री हरि विष्णु के परम गुरु स्वरूप और ब्रह्मा विष्णु महेश के संयुक्त अवतार के रूप में पूजित भगवान दत्तात्रेय का प्राकट्य ज्ञान वैराग्य और अवधूत चेतना का सर्वोच्च शिखर है। वैदिक ज्योतिष के अंतर्गत कुंडली के नवम भाव के धर्म तत्व भाग्य और देवगुरु बृहस्पति की कृपा को जाग्रत करने के लिए भगवान दत्तात्रेय की उपासना को सर्वश्रेष्ठ माना गया है। जब जातक की जन्म कुंडली में देवगुरु बृहस्पति राहु के प्रभाव से दूषित होकर गुरु चांडाल दोष का निर्माण कर रहे हों अथवा पितृ शाप के कारण वंश वृद्धि और आध्यात्मिक उन्नति अवरुद्ध हो रही हो तब दत्तात्रेय साधना एक दिव्य सुरक्षा कवच बन जाती है। इस पावन साधना की तिथि समय और शास्त्रीय घटकों का संपूर्ण विवरण नीचे दी गई तालिका में स्पष्ट रूप से प्रस्तुत किया गया है।

शास्त्रीय आयामअनुष्ठान विवरण और ज्योतिषीय मान्यता
प्रमुख पावन तिथिमार्गशीर्ष मास की पूर्णिमा तिथि श्री दत्तात्रेय जयंती
दैनिक पूजन समयप्रातः कालीन ब्रह्म मुहूर्त अथवा सायंकालीन प्रदोष वेला
अधिष्ठाता स्वरूपतीन मुख 6 भुजाएं शंख चक्र त्रिशूल डमरू कमंडल और जपमाला धारी
ज्योतिषीय भाव व ग्रह संबंधनवम भाव पंचम भाव देवगुरु बृहस्पति और छाया ग्रह राहु
मुख्य पूजन सामग्रीपीत पुष्प पीत चंदन गूलर के पत्ते पंचामृत और गाय का शुद्ध घी
प्रधान वैदिक अनुष्ठानदत्त बावनी पाठ दत्तात्रेय वज्र कवच और गुरु चरित्र का पारायण
अपेक्षित फलगुरु चांडाल दोष शांति पितृ शाप निवारण और प्रखर आध्यात्मिक ज्ञान

अत्रि अनसूया तप और त्रिदेवों का प्राकट्य

वैदिक काल गणना के अनुसार प्राचीन काल में जब धर्म और सत्य की मर्यादाओं को सुदृढ़ करने की आवश्यकता थी तब चित्रकूट के पावन वन में महर्षि अत्रि और उनकी पतिव्रता पत्नी माता अनसूया निवास करते थे। माता अनसूया के पातिव्रत्य धर्म का तेज तीनों लोकों में इतना प्रखर था कि स्वर्ग के देवता भी उनकी आध्यात्मिक शक्ति से विस्मयचकित थे। देवर्षि नारद के मुख से माता अनसूया के पातिव्रत्य की प्रशंसा सुनकर त्रिदेवियों माता सरस्वती माता लक्ष्मी और माता पार्वती के मन में उनकी परीक्षा लेने का विचार आया। तीनों देवियों के अनुरोध पर ब्रह्मा विष्णु और महेश भिक्षुक का वेष धारण करके महर्षि अत्रि के आश्रम में पहुंचे।

उस समय महर्षि अत्रि आश्रम में उपस्थित नहीं थे। त्रिदेवों ने माता अनसूया से भिक्षा की याचना की किंतु उन्होंने एक अत्यंत विचित्र और कठिन शर्त रखी। उन्होंने कहा कि वे भिक्षा तभी स्वीकार करेंगे जब माता अनसूया उन्हें निर्वस्त्र होकर भोजन परोसेंगी। किसी भी अन्य स्त्री के लिए यह मर्यादा का हनन होता किंतु माता अनसूया ने अपने तपोबल और अंतर्दृष्टि से तुरंत पहचान लिया कि ये तीनों भिक्षुक कोई साधारण मनुष्य नहीं अपितु स्वयं सृष्टि के संचालक त्रिदेव हैं।

माता अनसूया ने अपने कमंडल से अभिमंत्रित जल निकाला और उन तीनों देवों पर छिड़क दिया। पातिव्रत्य के अमोघ तेज से ब्रह्मा विष्णु और शिव उसी क्षण 6 माह के नन्हे बालकों में परिवर्तित हो गए। माता अनसूया ने मातृत्व के परम पवित्र भाव से उन्हें गोद में उठाया और वात्सल्य भाव से उन्हें स्तनपान कराकर पालने में झुला दिया। जब तीनों देव स्वर्ग नहीं लौटे तब चिंतित होकर तीनों देवियां चित्रकूट पहुंचीं और उन्होंने माता अनसूया से क्षमा याचना करते हुए अपने पतियों को पुनः मूल रूप में लौटाने की प्रार्थना की।

माता अनसूया ने अपने पति महर्षि अत्रि के चरणोदक से पुनः उन बालकों को उनके मूल दिव्य स्वरूप में प्रकट कर दिया। त्रिदेवों ने प्रसन्न होकर वरदान मांगने को कहा। महर्षि अत्रि और माता अनसूया ने प्रार्थना की कि आप तीनों हमारे पुत्र रूप में हमारे ही घर में वास करें। त्रिदेवों के अंश से तीन दिव्य पुत्र प्रकट हुए। ब्रह्मा जी के अंश से चंद्रमा शिव जी के अंश से महर्षि दुर्वासा और भगवान विष्णु के मुख्य अंश से समस्त सिद्धियों के स्वामी भगवान दत्तात्रेय का प्राकट्य हुआ। बाद में चंद्रमा और दुर्वासा जी ने अपना तेज भगवान दत्तात्रेय में ही विसर्जित कर दिया जिससे वे त्रिमूर्ति के संयुक्त साक्षात विग्रह बने।

प्रकृति से चौबीस गुरु और परम ज्ञान

भगवान दत्तात्रेय का संपूर्ण जीवन अवधूत अवस्था का प्रतीक है जहां न कोई राग है और न कोई द्वेष। श्रीमद्भागवत महापुराण के ग्यारहवें स्कंध में यदु और दत्तात्रेय के संवाद में भगवान ने स्पष्ट किया है कि ज्ञान किसी एक व्यक्ति तक सीमित नहीं होता। उन्होंने प्रकृति पशु पक्षियों और सामान्य जीवों के आचरण का सूक्ष्म निरीक्षण करके 24 गुरु बनाए और संसार को यह अमर संदेश दिया कि यदि दृष्टि खुली हो तो संसार का प्रत्येक तत्व हमें आत्म ज्ञान सिखा सकता है।

  • पृथ्वी से उन्होंने सहनशीलता और क्षमा का गुण सीखा कि लोग चाहे कितना भी आघात करें धैर्य नहीं खोना चाहिए।
  • वायु से उन्होंने सीखा कि जिस प्रकार सुगंध और दुर्गंध दोनों को स्पर्श करके भी वायु उनसे निर्लिप्त रहती है उसी प्रकार आत्मा को संसार में अनासक्त रहना चाहिए।
  • आकाश से उन्होंने आत्मा की सर्वव्यापकता और असीम शून्यता का बोध प्राप्त किया।
  • जल से उन्होंने पवित्रता शीतलता और दूसरों को निर्मल बनाने का स्वभाव ग्रहण किया।
  • अग्नि से उन्होंने सीखा कि जिस प्रकार अग्नि प्रत्येक वस्तु को भस्म करके स्वयं प्रकाशित रहती है उसी प्रकार ज्ञानी को समस्त विकारों को ज्ञान में जला देना चाहिए।
  • चंद्रमा से उन्होंने देह के घटने बढ़ने और आत्मा के नित्य स्थिर रहने का रहस्य जाना।
  • सूर्य से उन्होंने सीखा कि जल के पात्रों में सूर्य का प्रतिबिंब अलग अलग दिखाई देने पर भी सूर्य एक ही रहता है वैसे ही परमात्मा सभी घटों में एक है।
  • कबूतर के जोड़े से उन्होंने अत्यधिक मोह और परिवार में अत्यधिक आसक्ति के विनाशकारी परिणाम का पाठ सीखा।
  • अजगर से उन्होंने संतोष और जो भी प्रारब्धवश प्राप्त हो जाए उसमें संतुष्ट रहने की कला सीखी।
  • समुद्र से उन्होंने अगाध गंभीरता और किसी भी स्थिति में अपनी मर्यादा न लांघने का संकल्प लिया।
  • पतंगे से उन्होंने रूप के आकर्षण और दृष्टि के संयम का महत्व समझा।
  • भौंरे से उन्होंने सीखा कि वृक्ष को नुकसान पहुंचाए बिना केवल सार रूपी पराग ग्रहण करना चाहिए।
  • शहद निकालने वाले से उन्होंने संचय की व्यर्थता सीखी कि मधुमक्खी का संचित शहद दूसरा ले जाता है।
  • हाथी से उन्होंने स्पर्श की वासना और कामांध होने के घातक परिणाम को जाना।
  • हिरण से उन्होंने श्रवण के लोभ में फंसकर बंधने की दुर्बलता को समझा।
  • मछली से उन्होंने रसना अर्थात स्वाद की इंद्रिय पर नियंत्रण करने का संकल्प लिया।
  • पिंगला वेश्या से उन्होंने आशा और अपेक्षाओं के त्याग से मिलने वाली परम शांति का अनुभव किया।
  • कुरर पक्षी से उन्होंने संग्रह न करने और वस्तु के त्याग से मिलने वाले अभय को सीखा।
  • छोटे बालक से उन्होंने मान अपमान से परे होकर निश्चल और आनंदित रहने का गुण पाया।
  • चूड़ी वाली कन्या से उन्होंने सीखा कि जब हाथों में अधिक चूड़ियां होती हैं तो खनखनाती हैं इसलिए एकांत ही साधना का मार्ग है।
  • तीर बनाने वाले से उन्होंने लक्ष्य के प्रति एकाग्र और एकनिष्ठ दृष्टि का अभ्यास सीखा।
  • सर्प से उन्होंने बिना स्थायी घर बनाए स्वतंत्र और सजग विचरण करने का स्वभाव लिया।
  • मकड़ी से उन्होंने परमात्मा द्वारा सृष्टि का सृजन और पुनः संहार करने का गूढ़ चक्र समझा।
  • भृंगी कीट से उन्होंने सीखा कि जिस प्रकार कीट के निरंतर चिंतन से कीड़ा भृंगी बन जाता है उसी प्रकार ईश्वर का ध्यान करने से आत्मा ब्रह्ममय हो जाती है।

भगवान दत्तात्रेय के साथ सदैव 4 श्वान दिखाई देते हैं जो वास्तव में चारों वेदों ऋग्वेद यजुर्वेद सामवेद और अथर्ववेद के प्रतीक हैं। उनके पीछे स्थित कामधेनु गाय संपूर्ण प्रकृति और पोषण शक्ति का प्रतिनिधित्व करती है तथा उनके पीछे स्थित पावन औदुंबर अर्थात गुलर का वृक्ष साक्षात अमरत्व और कल्पवृक्ष का स्वरूप है।

नवम भाव गुरु चांडाल और पितृ दोष

वैदिक ज्योतिष में जन्म कुंडली का नवम भाव धर्म भाग्य पिता उच्च विद्या और गुरु कृपा का मूल आधार होता है। इसे कालपुरुष का त्रिकोण भाव कहा जाता है जहां देवगुरु बृहस्पति का स्वाभाविक आधिपत्य माना जाता है। जब किसी जातक की कुंडली में नवम भाव पीड़ित होता है तो व्यक्ति का भाग्य उसका साथ छोड़ देता है धर्म कर्म में मन नहीं लगता और गुरुजनों का आशीर्वाद प्राप्त नहीं होता।

कुंडली में जब छाया ग्रह राहु नवम भाव में स्थित हो अथवा देवगुरु बृहस्पति के साथ युति बनाकर बैठ जाए तब अत्यंत अनिष्टकारी गुरु चांडाल दोष का निर्माण होता है। इस दोष के प्रभाव से जातक की सात्विक मति भ्रष्ट हो जाती है वह कुसंगति में पड़ जाता है और अपने ही कुल धर्म तथा पिता का विरोध करने लगता है। इसी प्रकार जब नवम भाव में सूर्य शनि अथवा राहु की युति बनती है तब भयंकर पितृ शाप और पितृ दोष उत्पन्न होता है जिसके कारण वंश की वृद्धि रुक जाती है संतान कष्ट भोगती है और परिवार में अकाल मृत्यु या असाध्य रोग बने रहते हैं।

भगवान दत्तात्रेय साक्षात आदि गुरु और परम अवधूत हैं। वे परशुराम और सहस्रार्जुन दोनों के ही गुरु रहे हैं। जब कोई जातक भगवान दत्तात्रेय की शरण में जाता है तब नवम भाव के समस्त पाप प्रभाव भस्म हो जाते हैं। भगवान दत्तात्रेय राहु के भ्रम को अपने त्रिशूल से नष्ट करते हैं और देवगुरु बृहस्पति के सात्विक प्रभाव को पुनः जाग्रत कर देते हैं जिससे जातक का सोया हुआ भाग्य चमक उठता है और उसे सदगुरु की प्राप्ति होती है।

गुरु दोष शांति और दत्तात्रेय साधना के उपाय

यदि किसी जातक की जन्म कुंडली में देवगुरु बृहस्पति नीच राशि मकर में स्थित हों गुरु चांडाल योग बन रहा हो अथवा पितृ दोष के कारण जीवन में निरंतर असफलताएं मिल रही हों तो शास्त्रों में भगवान दत्तात्रेय की आराधना के अत्यंत प्रामाणिक उपाय बताए गए हैं।

  • प्रतिदिन प्रातः काल स्नान के उपरांत पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख करके भगवान दत्तात्रेय का ध्यान करें और पावन मंत्र ॐ द्रां दत्तात्रेयाय नमः अथवा ॐ नमो भगवते दत्तात्रेयाय का 108 बार शांत मन से जाप करें।
  • श्री वासुदेवानंद सरस्वती जी द्वारा रचित पावन दत्त बावनी का नित्य 52 दिनों तक नियमपूर्वक पाठ करें जो कुंडली के समस्त ग्रह दोषों और नकारात्मक ऊर्जाओं को नष्ट करने में सक्षम है।
  • प्रत्येक गुरुवार को किसी गूलर औदुंबर के वृक्ष की जड़ में कच्चा दूध मिश्रित जल अर्पित करें और उसकी 7 परिक्रमा करें क्योंकि इस वृक्ष में साक्षात दत्तात्रेय का वास माना जाता है।
  • पितृ दोष और राहु जनित बाधाओं से मुक्ति पाने के लिए प्रतिदिन अथवा प्रत्येक गुरुवार को आवारा श्वानों को ताजी रोटी और गाय को हरी घास व गुड़ खिलाएं।
  • जातक को अपनी शारीरिक स्थिति और विद्वान ज्योतिर्विद के परामर्श के अनुसार ग्यारह मुखी अथवा पांच मुखी नेपाली रुद्राक्ष पीले रेशमी धागे में पिरोकर गले में धारण करना चाहिए।
  • पवित्र दत्त धामों जैसे गाणगापुर नरसोबावाड़ी अथवा गिरनार पर्वत का मानसिक स्मरण करें और पवित्र ग्रंथ श्री गुरु चरित्र का श्रद्धापूर्वक अध्ययन करें जिससे वंश दोष समाप्त होते हैं।

दत्तात्रेय साधना के आवश्यक वैदिक नियम

क्या अवश्य करेंकिन गलतियों से सर्वथा दूर रहें
प्रतिदिन प्रातः काल और सायंकाल गुरु पादुका का ध्यान करेंअपने माता पिता गुरु और संन्यासियों का कभी भी अनादर न करें
प्रकृति के समस्त जीवों के प्रति समभाव और करुणा रखेंअहंकारवश किसी भी जीव अथवा मनुष्य को हीन समझने से बचें
गुरुवार के दिन केवल सात्विक और शुद्ध भोजन ग्रहण करेंमदिरा मांसाहार और नशीले पदार्थों का सेवन सर्वथा वर्जित रखें
अपने ज्ञान और साधनों का उपयोग निर्बलों की सहायता में करेंअपने ज्ञान तपस्या अथवा साधना का तनिक भी घमंड न करें
पूजा में पीत चंदन पीले पुष्प और गाय के घी का प्रयोग करेंबिना कुंडली मिलान किए कोई भी तामसिक उपाय करने से बचें

अवधूत चेतना और आत्मिक स्वतंत्रता का मार्ग

भगवान दत्तात्रेय का पावन अवतार यह शाश्वत संदेश देता है कि मनुष्य का वास्तविक स्वरूप किसी संप्रदाय वेशभूषा अथवा सामाजिक बंधनों में नहीं बल्कि आत्मा की परम स्वतंत्रता में स्थित है। अवधूत वह है जो सुख और दुख मान और अपमान तथा सिद्धि और असिद्धि के द्वंद्वों से सर्वथा ऊपर उठ चुका है। जब हम प्रकृति के प्रत्येक कण से सीखने की विनम्रता विकसित करते हैं तब हमारे भीतर का अहंकार स्वतः विगलित हो जाता है। देवगुरु बृहस्पति का सच्चा अनुग्रह यही है कि व्यक्ति को सांसारिक वासनाओं से मुक्ति मिले और वह ईश्वर के प्रत्यक्ष स्वरूप को पहचान सके। जो साधक निष्कपट भाव से भगवान दत्तात्रेय के चरणों में अपना सर्वस्व समर्पित कर देता है उसके नवम भाव के समस्त अंधकार नष्ट हो जाते हैं और वह इस संसार में एक अचल शांत और परम ज्ञानी महात्मा बनकर आत्म साक्षात्कार को प्राप्त करता है।

FAQ

भगवान दत्तात्रेय किन तीन प्रमुख देवताओं के संयुक्त अवतार हैं? भगवान दत्तात्रेय त्रिदेवों अर्थात ब्रह्मा विष्णु और महेश के संयुक्त अवतार हैं जिनमें मुख्य अंश भगवान श्री हरि विष्णु का है।

भगवान दत्तात्रेय के माता पिता कौन थे? भगवान दत्तात्रेय के पिता सप्तऋषियों में श्रेष्ठ महर्षि अत्रि थे और उनकी माता परम पतिव्रता देवी अनसूया थीं।

भगवान दत्तात्रेय ने प्रकृति और जीवों से कितने गुरु बनाए थे? भगवान दत्तात्रेय ने प्रकृति पशु पक्षियों और सामान्य जीवों के आचरण का सूक्ष्म निरीक्षण करके 24 गुरु बनाए थे।

कुंडली में गुरु चांडाल दोष निवारण हेतु कौन सा पाठ सर्वश्रेष्ठ है? गुरु चांडाल दोष और राहु के अशुभ प्रभाव को शांत करने हेतु दत्त बावनी और दत्तात्रेय वज्र कवच का नित्य पाठ सर्वश्रेष्ठ माना गया है।

भगवान दत्तात्रेय के साथ 4 श्वान और गाय किसका प्रतीक हैं? भगवान दत्तात्रेय के साथ 4 श्वान चारों वेदों के प्रतीक हैं और उनके समीप स्थित गाय संपूर्ण माता पृथ्वी और कामधेनु का प्रतीक है।

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लेखक

पं. अमिताभ शर्मा

पं. अमिताभ शर्मा (63)


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