धन्वंतरि अवतार और षष्ठ भाव का रहस्य क्या?

By पं. अभिषेक शर्मा

समुद्र मंथन से अमृत कलश प्राकट्य आयुर्वेद का उदय और षष्ठ भाव के रोग नाश का संपूर्ण ज्योतिषीय रहस्य

भगवान धन्वंतरि अवतार कथा और षष्ठ भाव का रहस्य

धन्वंतरि जयंती पूजन मुहूर्त और विधि विधान

सनातन वैदिक परंपरा में भगवान श्री हरि विष्णु के बारहवें दिव्य अवतार और समस्त चिकित्सा पद्धतियों के मूल अधिष्ठाता के रूप में पूजित भगवान धन्वंतरि का प्राकट्य आरोग्य आयु और अमृत तत्व का सर्वोच्च शिखर है। वैदिक ज्योतिष के अंतर्गत कुंडली के षष्ठ भाव के रोग ऋण शत्रु बाधा के निवारण तथा सौरमंडल के राजा भगवान सूर्य देव के आरोग्य कारक प्रभाव को जाग्रत करने के लिए भगवान धन्वंतरि की उपासना को सर्वश्रेष्ठ माना गया है। जब जातक की जन्म कुंडली में षष्ठ भाव अथवा षष्ठेश पाप ग्रहों से पीड़ित होकर असाध्य व्याधियां उत्पन्न करता है और औषधियां अपना प्रभाव दिखाना बंद कर देती हैं तब धन्वंतरि नारायण की शरण में जाने से दिव्य स्वास्थ्य और नवजीवन की प्राप्ति होती है। इस पावन अनुष्ठान की तिथि समय और शास्त्रीय घटकों का संपूर्ण विवरण नीचे दी गई तालिका में स्पष्ट रूप से प्रस्तुत किया गया है।

शास्त्रीय आयामअनुष्ठान विवरण और ज्योतिषीय मान्यता
प्रमुख पावन तिथिकार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि धनतेरस व धन्वंतरि जयंती
दैनिक पूजन समयसायंकालीन प्रदोष वेला सूर्यास्त के बाद का 2 घंटे 24 मिनट का समय
अधिष्ठाता स्वरूपचतुर्भुज रूप में अमृत कलश शंख चक्र और जलोका धारण किए हुए देव वैद्य
ज्योतिषीय भाव व ग्रह संबंधषष्ठ भाव अष्टम भाव आरोग्य कारक सूर्य देव और देवगुरु बृहस्पति
मुख्य पूजन सामग्रीपीत पुष्प तुलसी दल शुद्ध केसर गाय का घी पीतल का पात्र और औषधियां
प्रधान वैदिक अनुष्ठानधन्वंतरि स्तोत्र पाठ अमृत संजीवनी ध्यान और ॐ नमो भगवते धन्वंतरये जप
अपेक्षित फलअसाध्य रोगों से मुक्ति षष्ठ भाव की शुद्धि दीर्घायु और औषधीय प्रभाव वृद्धि

क्षीरसागर मंथन और चौदहवें रत्न का प्राकट्य

श्रीमद्भागवत महापुराण और विष्णु पुराण के पावन आख्यानों के अनुसार जब देवताओं और दानवों ने अमृत प्राप्ति हेतु विशाल मंदराचल पर्वत को मथानी और नागराज वासुकि को नेति बनाकर क्षीरसागर का मंथन किया तब समुद्र से एक के बाद एक 13 दिव्य रत्न प्रकट हुए। इन रत्नों में कालकूट विष कामधेनु गाय उच्चैःश्रवा अश्व ऐरावत हाथी कौस्तुभ मणि कल्पवृक्ष रंभा अप्सरा देवी महालक्ष्मी वारुणी मदिरा चंद्रमा पारिजात और पांचजन्य शंख सम्मिलित थे। परंतु जिस परम उद्देश्य के लिए यह भीषण मंथन किया गया था वह अमृत अभी तक प्रकट नहीं हुआ था।

जब मंथन अपने अंतिम चरण में पहुंचा तब कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की पावन त्रयोदशी तिथि को समुद्र की अगाध गहराइयों से एक अत्यंत अलौकिक तेजस्वी और दिव्य पुरुष प्रकट हुए। उनका शरीर विशाल और सुगठित था उनकी छाती चौड़ी थी और उनके नेत्र खिले हुए कमल के समान विशाल व सम्मोहक थे। वे पीतांबर धारण किए हुए थे और उनके शरीर से तपे हुए स्वर्ण जैसी दिव्य आभा निकल रही थी। भगवान नारायण के इस बारहवें अवतार को देखकर देव और दानव दोनों विस्मय से भर गए। उनके चारों हाथों में दिव्य आयुध और जीवन रक्षक साधन सुशोभित थे।

भगवान धन्वंतरि ने अपने प्रथम हाथ में शंख धारण किया हुआ था जो नाद ब्रह्म और ध्वनि चिकित्सा का प्रतीक है। द्वितीय हाथ में उन्होंने सुदर्शन चक्र धारण किया था जो सूक्ष्म जीवाणुओं और रोगों के समूल नाश का प्रतीक है। तृतीय हाथ में उन्होंने जलोका अर्थात रक्त मोक्षण करने वाली जोंक धारण की थी जो शल्य चिकित्सा और रक्त की शुद्धि का परिचायक है। चतुर्थ हाथ में उन्होंने दिव्य अमृत कलश धारण किया था जिसमें अमरता प्रदान करने वाला अलौकिक रस भरा हुआ था। भगवान धन्वंतरि के प्रकट होते ही तीनों लोकों से रोगों और अकाल मृत्यु का भय समाप्त हो गया।

देव वैद्य स्वरूप और आयुर्वेद का पावन अवतरण

भगवान धन्वंतरि केवल देवताओं के चिकित्सक ही नहीं हैं अपितु वे संपूर्ण ब्रह्मांड में चिकित्सा विज्ञान अर्थात आयुर्वेद के मूल जनक हैं। वैदिक संहिताओं के अनुसार आयुर्वेद वास्तव में अथर्ववेद का उपवेद है जिसे भगवान ब्रह्मा ने सृष्टि की रचना से पूर्व ही 100000 श्लोकों और 1000 अध्यायों में रचा था। साधारण मनुष्यों की अल्प बुद्धि और घटती आयु को देखकर भगवान धन्वंतरि ने उस विशाल ज्ञान को आठ मुख्य अंगों में विभाजित किया जिसे अष्टांग आयुर्वेद कहा जाता है।

  • शल्य तंत्र जिसके अंतर्गत शल्य क्रिया अर्थात सर्जरी और यंत्रों का प्रयोग सिखाया गया।
  • शालाक्य तंत्र जिसके अंतर्गत आंख कान नाक गले और सिर के रोगों का निदान किया जाता है।
  • काय चिकित्सा जिसके अंतर्गत संपूर्ण शरीर के आंतरिक रोगों और त्रिदोष वात पित्त कफ का संतुलन सिखाया गया।
  • भूत विद्या जिसके अंतर्गत मानसिक व्याधियों और सूक्ष्म नकारात्मक ऊर्जाओं का उपचार किया जाता है।
  • कौमारभृत्य जिसके अंतर्गत गर्भाधान से लेकर बालकों के पोषण और बाल रोगों की चिकित्सा की जाती है।
  • अगद तंत्र जिसके अंतर्गत विषैले जीवों रसायनों और स्थावर जंगम विषों के प्रभाव को नष्ट करने का ज्ञान है।
  • रसायन तंत्र जिसके अंतर्गत शरीर को सदा युवा ओजस्वी और दीर्घायु बनाए रखने की दिव्य औषधियों का विधान है।
  • वाजीकरण तंत्र जिसके अंतर्गत शारीरिक पौरुष और उत्तम संतान उत्पत्ति के विज्ञान का विस्तार है।

कालांतर में जब पृथ्वी पर राजाओं और प्रजाजनों में अनेक असाध्य व्याधियां फैलने लगीं तब भगवान धन्वंतरि ने काशी के प्रतापी राजा दिवोदास के रूप में पुनः अवतार लिया। महर्षि सुश्रुत और अन्य ऋषियों ने उनके आश्रम में जाकर शल्य चिकित्सा और आयुर्वेद का गहन अध्ययन किया जिससे सुश्रुत संहिता जैसे महान चिकित्सा ग्रंथ की रचना संभव हो सकी।

महर्षि पराशर अनुसार सूर्य और षष्ठ भाव का रहस्य

वैदिक ज्योतिष के महानतम आधार ग्रंथ बृहत् पराशर होरा शास्त्र में महर्षि पराशर ने स्पष्ट प्रतिपादित किया है कि मानव शरीर का स्वास्थ्य और जीवनी शक्ति सीधे तौर पर ग्रहों की चाल से संचालित होती है। ज्योतिष शास्त्र में भगवान सूर्य देव को संपूर्ण जगत की आत्मा और स्वाभाविक आरोग्य कारक माना गया है। यदि किसी जातक की जन्म कुंडली में सूर्य देव बली और शुभ स्थिति में हों तो व्यक्ति की रोग प्रतिरोधक क्षमता अत्यंत सुदृढ़ रहती है और वह कठिन से कठिन बीमारियों को भी सहजता से परास्त कर देता है।

जन्म कुंडली का षष्ठ भाव जिसे रोग भाव और रिपु भाव कहा जाता है सीधे तौर पर शारीरिक व्याधियों ऋण और जीवन के संघर्षों से जुड़ा हुआ है। जब षष्ठ भाव पर क्रूर ग्रहों राहु केतु अथवा शनि का पाप प्रभाव पड़ता है अथवा षष्ठेश दुर्बल होकर अष्टम या द्वादश भाव में बैठ जाता है तब व्यक्ति का शरीर असाध्य रोगों का घर बन जाता है। ऐसी स्थिति में जातक को बार बार चिकित्सालय जाना पड़ता है महंगी से महंगी दवाइयां भी व्यर्थ सिद्ध होती हैं और चिकित्सक रोग का सही कारण समझने में असमर्थ रहते हैं।

भगवान धन्वंतरि का स्वरूप सूर्य देव की आरोग्य शक्ति और देवगुरु बृहस्पति के औषधीय ज्ञान का साक्षात संगम है। भगवान धन्वंतरि की आराधना कुंडली के षष्ठ भाव के नकारात्मक स्पंदनों को समाप्त करती है। जब कोई पीड़ित व्यक्ति धन्वंतरि नारायण का ध्यान करके दवा का सेवन करता है तो वह साधारण दवा भी अमृत संजीवनी में रूपांतरित हो जाती है और शरीर के भीतर सुप्त जीवनी शक्ति पुनः जाग्रत हो उठती है।

क्या असाध्य व्याधियों में धन्वंतरि साधना से लाभ मिलता है?

आधुनिक युग में अनेक बार ऐसा देखने में आता है कि रोगी को विश्व की सर्वश्रेष्ठ चिकित्सा उपलब्ध कराई जाती है फिर भी उसका स्वास्थ्य दिन प्रतिदिन गिरता चला जाता है। इसका मूल कारण केवल जैविक नहीं अपितु प्रारब्ध जनित कार्मिक दोष होता है। जब तक आत्मा और अंतःकरण पर पूर्व जन्म के पापों का आवरण रहता है तब तक भौतिक औषधियां शरीर की कोशिकाओं पर कार्य नहीं कर पातीं।

भगवान धन्वंतरि का ध्यान वास्तव में उस आंतरिक प्राण ऊर्जा को जागृत करता है जो शरीर की स्व चिकित्सा प्रणाली को सक्रिय करती है। श्रीमद्भागवत में कहा गया है कि धन्वंतरि जी का नाम स्मरण करने मात्र से समस्त व्याधियां नष्ट हो जाती हैं। जब कोई साधक श्रद्धापूर्वक उनके पावन स्तोत्र का पाठ करता है तो उसके आभा मंडल का विषैला तत्व बाहर निकल जाता है। यह साधना रोगी के मन से मृत्यु भय को समाप्त करती है और औषधियों को शरीर के अनुकूल बनाती है जिससे निराश हो चुके रोगियों को भी नवजीवन प्राप्त होता है।

षष्ठ भाव शुद्धि और रोग मुक्ति के अचूक वैदिक उपाय

यदि परिवार में कोई सदस्य लंबे समय से असाध्य रोग से पीड़ित हो दवाइयां निष्फल हो रही हों अथवा कुंडली में षष्ठ भाव के कारण निरंतर स्वास्थ्य संकट बना रहता हो तो शास्त्रों में इसके निवारण के लिए अत्यंत दिव्य उपाय बताए गए हैं।

  • प्रतिदिन प्रातः काल स्नान के उपरांत पूर्व दिशा की ओर मुख करके बैठें और हाथ में तांबे का जल पात्र लेकर भगवान धन्वंतरि का ध्यान करते हुए ॐ नमो भगवते महासुदर्शनाय वासुदेवाय धन्वंतरये अमृतकलशहस्ताय सर्वभयविनाशाय सर्वरोगनिवारणाय त्रैलोक्यपतये त्रैलोक्यनिधये श्रीमहाविष्णुस्वरूप श्रीधन्वंतरि स्वरूप श्री श्री श्री औषधचक्र नारायणाय स्वाहा महामंत्र का 108 बार जाप करें।
  • रोगी को दी जाने वाली किसी भी औषधि को देने से पूर्व उसे भगवान धन्वंतरि के चित्र के सम्मुख रखें और तुलसी दल से स्पर्श कराकर अमृत रूप में ग्रहण कराएं जिससे दवा का प्रभाव कई गुना बढ़ जाता है।
  • प्रत्येक रविवार और धनतेरस के दिन तांबे के लोटे में शुद्ध जल रोली और लाल पुष्प डालकर उगते हुए सूर्य देव को अर्घ्य समर्पित करें जिससे कुंडली का सूर्य बली होकर रोगों का शमन करता है।
  • कार्तिक कृष्ण त्रयोदशी धनतेरस के दिन घर के मुख्य द्वार पर दक्षिण दिशा की ओर मुख करके यमराज के निमित्त एक चौमुखा आटे का दीपक तिल के तेल से प्रज्वलित करें जिससे अकाल मृत्यु का भय समाप्त होता है।
  • जातक को अपनी शारीरिक अवस्था और योग्य ज्योतिर्विद के परामर्श के अनुसार ग्यारह मुखी अथवा तीन मुखी नेपाली रुद्राक्ष चांदी के तार में पिरोकर गले में धारण करना चाहिए जो स्वास्थ्य की रक्षा करता है।
  • प्रत्येक शनिवार अथवा त्रयोदशी तिथि को किसी शासकीय चिकित्सालय में जाकर निर्धन और असहाय रोगियों को निःशुल्क दवाइयां फल और पौष्टिक भोजन का वितरण करें।

आरोग्य रक्षा और धन्वंतरि साधना के आवश्यक नियम

क्या अवश्य करेंकिन गलतियों से सर्वथा दूर रहें
प्रतिदिन प्रातः काल सूर्योदय से पूर्व शय्या का त्याग करेंरात के समय भारी गरिष्ठ और बासी भोजन करने से बचें
औषधियों को सदैव शुद्ध और पवित्र स्थान पर रखेंदवाओं को कभी भी जूठे हाथों से स्पर्श न करें
भोजन से पूर्व भगवान धन्वंतरि को अन्न का मानसिक भोग लगाएंभोजन करते समय क्रोध चिंता अथवा मोबाइल का प्रयोग न करें
घर के पूजा स्थल पर पीतल अथवा तांबे का जल पात्र रखेंघर में टूटे फूटे बर्तन और व्यर्थ की दवाइयां एकत्र न रखें
नित्य ताजे जल में तुलसी पत्र डालकर सेवन करेंबिना योग्य चिकित्सक और ज्योतिषी की सलाह के कोई उपाय न करें

अमृत चेतना और समग्र आरोग्य से परिपूर्ण जीवन

भगवान धन्वंतरि का पावन प्राकट्य यह सनातन सत्य उद्घाटित करता है कि स्वास्थ्य केवल शरीर की व्याधि मुक्त अवस्था का नाम नहीं है अपितु शरीर मन और आत्मा का पूर्ण सामंजस्य ही वास्तविक स्वास्थ्य है। जब तक मनुष्य प्रकृति के नियमों का उल्लंघन करता रहेगा और अपनी जीवन शैली को असंयमित रखेगा तब तक कोई भी औषधि उसे स्थायी सुख नहीं दे सकती। अमृत कलश वास्तव में उस आंतरिक संतुष्टि और आत्म ज्ञान का प्रतीक है जो मनुष्य को अजर अमर बनाता है। जब हम अपने शरीर को परमात्मा का मंदिर मानकर उसकी रक्षा करते हैं और धन्वंतरि चेतना को अपने भीतर स्थान देते हैं तब हमारा संपूर्ण जीवन रोग शोक और भय से मुक्त हो जाता है। भगवान धन्वंतरि का नित्य स्मरण मनुष्य को दीर्घायु तेजस्वी और परोपकारी जीवन जीने का वरदान प्रदान करता है।

FAQ

भगवान धन्वंतरि का प्राकट्य किस तिथि को हुआ था? भगवान धन्वंतरि का प्राकट्य समुद्र मंथन के समय कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि को हुआ था जिसे धनतेरस और धन्वंतरि जयंती के रूप में मनाया जाता है।

भगवान धन्वंतरि के हाथों में कौन से चार दिव्य साधन हैं? भगवान धन्वंतरि के चार हाथों में अमृत कलश नाद ब्रह्म का शंख सुदर्शन चक्र और रक्त शुद्धि करने वाली जलोका जोंक सुशोभित हैं।

ज्योतिष में भगवान धन्वंतरि का संबंध किस भाव और ग्रह से है? ज्योतिष में भगवान धन्वंतरि का सीधा संबंध कुंडली के षष्ठ भाव रोग नाश तथा आरोग्य के अधिपति भगवान सूर्य देव से माना गया है।

असाध्य रोगों में दवाइयों का प्रभाव बढ़ाने के लिए कौन सा उपाय करना चाहिए? औषधियों को भगवान धन्वंतरि के सम्मुख रखकर धन्वंतरि मंत्र से अभिमंत्रित करने और तुलसी पत्र का स्पर्श कराकर रोगी को देने से दवाइयां तुरंत असर करने लगती हैं।

आयुर्वेद के आठ प्रमुख अंग कौन से हैं जिनकी रचना धन्वंतरि जी ने की? भगवान धन्वंतरि द्वारा प्रतिपादित आठ अंग शल्य शालाक्य काय चिकित्सा भूत विद्या कौमारभृत्य अगद तंत्र रसायन और वाजीकरण हैं।

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पं. अभिषेक शर्मा

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