By पं. अमिताभ शर्मा
सूर्य पुत्र यमराज की कथा भरणी नक्षत्र और यम दीपदान विधान

सनातन वैदिक परंपरा में यमराज को केवल मृत्यु का देवता नहीं अपितु परम न्याय, धर्म और सत्य का अधिष्ठाता माना गया है। जब मनुष्य के भीतर अकाल मृत्यु का भय उत्पन्न होता है अथवा परिवार में पितृ शांति की आवश्यकता होती है तब धर्मराज की विशेष पूजा और दीपदान का विधान शास्त्रों में बताया गया है। विशेष रूप से कार्तिक मास के पावन दिनों में किया गया यम दीपदान मनुष्य को समस्त अनिष्टकारी भयों से मुक्त कर देता है। इस पूजन के लिए विशिष्ट तिथियां, दिशा और सामग्रियों का विशेष महत्व होता है।
| अनुष्ठान अंग | वैदिक नियम और अनुष्ठान विधान |
|---|---|
| प्रधान तिथियां | कार्तिक कृष्ण पक्ष त्रयोदशी अर्थात धनतेरस और कार्तिक शुक्ल पक्ष द्वितीया अर्थात यम द्वितीया |
| अधिष्ठाता देवता | भगवान धर्मराज यमराज और कर्म लेखक चित्रगुप्त |
| प्रमुख दिशा | दक्षिण दिशा जो पितरों और यमलोक की अधिष्ठित दिशा मानी जाती है |
| पूजन सामग्री | चार मुख वाला मिट्टी का बड़ा दीपक, शुद्ध सरसों अथवा तिल का तेल, काले तिल, रोली और कुश |
| आध्यात्मिक फल | अकाल मृत्यु के संकट से मुक्ति, दीर्घायु, पितृ तृप्ति और नरक भय का पूर्ण निवारण |
कार्तिक कृष्ण त्रयोदशी की संध्या वेला में जब प्रदोष काल उपस्थित हो तब परिवार के प्रत्येक सदस्य के आरोग्य की कामना से यम दीपदान संपन्न करना चाहिए। घर के मुख्य द्वार के बाहर दक्षिण दिशा की ओर मुख करके पुराना अथवा नया चौमुखा दीपक स्थापित किया जाता है। उसमें तिल का तेल अथवा सरसों का तेल डालकर चार बत्तियां प्रज्वलित की जाती हैं।
इस साधना का नियमित और विधिपूर्वक अनुपालन करने से साधक की चेतना से मृत्यु का काल्पनिक संत्रास दूर हो जाता है। यह अनुष्ठान मनुष्य को इस परम सत्य का बोध कराता है कि जीवन क्षणभंगुर है और प्रत्येक कर्म का फल अचूक है। जब व्यक्ति धर्म के मार्ग पर स्थिर रहता है तब यमराज का भय समाप्त होकर उनकी कृपा का अनुभव होने लगता है।
सृष्टि के निर्माण काल में जब भगवान सूर्य के प्रचंड तेज से संपूर्ण ब्रह्मांड आलोकित हो रहा था तब प्रजापति विश्वकर्मा की पुत्री देवी संज्ञा के गर्भ से भगवान यम का जन्म हुआ। वे सूर्य नारायण के ज्येष्ठ पुत्र हैं। संज्ञा के गर्भ से ही यम के साथ उनकी जुड़वां बहन यमुना का भी प्राकट्य हुआ। वैदिक संहिताओं में वर्णित है कि यम इस मर्त्य लोक के प्रथम ऐसे प्राणी बने जिन्होंने जीवन के उपरांत देह त्याग कर मृत्यु के अज्ञात मार्ग की खोज की। उन्होंने इस भौतिक संसार से परे जाकर एक ऐसे दिव्य लोक की स्थापना की जहां केवल सत्य और कर्म के नियमों का शासन चलता है।
यमराज का जीवन आरंभ से ही अत्यंत कठोर और निष्पक्ष रहा। जब देवी संज्ञा सूर्य देव का असह्य ताप सहन न कर सकीं और अपनी छाया को सूर्य लोक में छोड़कर तपस्या के लिए चली गईं तब छाया ने यमराज के प्रति सौतेला व्यवहार आरंभ किया। छाया ने अपने पुत्र शनि को अधिक स्नेह दिया और यमराज की उपेक्षा की। एक दिन जब बालक यम ने छाया के इस अन्यायपूर्ण आचरण का विरोध करते हुए अपना पैर उठाया तब छाया ने कुपित होकर यम को यह शाप दे दिया कि उनका वह पैर गलकर गिर जाएगा और उसमें कीड़े पड़ जाएंगे।
सृष्टि का अटल नियम है कि कोई भी सगी माता अपने बालक को ऐसा विनाशकारी शाप नहीं दे सकती। व्यथित होकर बालक यम अपने पिता सूर्य देव के पास पहुंचे और संपूर्ण वृत्तांत सुनाया। सूर्य देव ने तुरंत पहचान लिया कि यह स्त्री संज्ञा नहीं हो सकती। सूर्य देव ने यमराज के पैर को अपने दिव्य तेज और औषधियों से स्वस्थ किया किंतु माता के शाप का मान रखने के लिए यह व्यवस्था की कि उस पैर के घाव से गिरे अंशों को भूमि के कीड़े खाएंगे जिससे शाप भी पूरा हो जाएगा और यम भी सुरक्षित रहेंगे।
सूर्य देव ने अपने ज्येष्ठ पुत्र की निष्पक्षता, सत्यवादिता और असीम धैर्य को देखकर उन्हें संपूर्ण ब्रह्मांड के न्याय का दायित्व सौंपा। सूर्य देव ने यमराज को समस्त दक्षिण दिशा का दिक्पाल और पितृलोक तथा यमलोक का अधिपति नियुक्त किया। जिस निष्पक्षता और धर्मपरायणता से उन्होंने न्याय का पालन किया उसी के कारण संपूर्ण संसार में वे धर्मराज के नाम से विख्यात हुए।
वैदिक आख्यानों में भगवान यमराज के स्वरूप का जो चित्रण किया गया है वह अत्यंत गंभीर और दार्शनिक रहस्यों से परिपूर्ण है। वे गहरे श्यामल वर्ण के हैं और उनके नेत्र अग्नि के समान प्रदीप्त हैं जो मनुष्य के बाह्य आवरण को भेदकर उसकी अंतरात्मा के भीतर छिपे पाप और पुण्य को प्रत्यक्ष देख लेते हैं। यमराज का वाहन एक विशाल महिष अर्थात भैंसा है। भैंसा अदम्य शक्ति, तमोगुण, जड़ता और असीम हठ का साक्षात प्रतीक है।
यमराज द्वारा भैंसे की सवारी करना यह दर्शाता है कि जो मृत्यु और धर्म का स्वामी है वह सृष्टि की सबसे बड़ी जड़ता और अंधकार को भी अपने नियंत्रण में रखता है। जब तक मनुष्य का तमोगुण जाग्रत रहता है तब तक वह संसार के विकारों में लिप्त रहता है किंतु धर्मराज उस तमोगुण को वश में करके आत्मा को शुद्ध चेतना की ओर मोड़ देते हैं।
भगवान यमराज के दाहिने हाथ में काल का प्रतीक यमपाश रहता है और बाएं हाथ में महादंड अर्थात गदा होती है। यमपाश कोई साधारण भौतिक रस्सी नहीं है। यह मनुष्य की वासनाओं, आसक्तियों और प्रारब्ध कर्मों का वह सूक्ष्म बंधन है जिससे बंधी जीवात्मा शरीर में अटकी रहती है। मृत्यु के समय जब स्थूल शरीर शिथिल हो जाता है तब यमराज अपने पाश से उस सूक्ष्म शरीर को अत्यंत सूक्ष्मता से खींच लेते हैं।
चित्रगुप्त वास्तव में मनुष्य के चित्त में छिपी हुई गुप्त वृत्तियों के प्रतीक हैं। मनुष्य चाहे संसार से अपने कुकर्मों को छिपा ले किंतु उसके अपने चित्त में प्रत्येक विचार और कर्म की अमिट छाप अंकित हो जाती है। वही संचित कर्म यमराज के सम्मुख प्रस्तुत होते हैं जहां पक्षपात का लेशमात्र भी स्थान नहीं होता।
सनातन ज्ञान परंपरा में कठोपनिषद का स्थान अत्यंत सर्वोच्च है जिसमें महर्षि वाजश्रवा के तेजस्वी पुत्र बालक नचिकेता और भगवान यमराज के मध्य हुआ संवाद अंकित है। जब नचिकेता अपने पिता के एक शापवश यमलोक पहुंचे तब यमराज अपने भवन में उपस्थित नहीं थे। बालक नचिकेता ने तीन दिनों और तीन रातों तक बिना अन्न जल ग्रहण किए यमराज के द्वार पर प्रतीक्षा की।
जब धर्मराज लौटे और उन्होंने अपने द्वार पर एक ब्राह्मण बालक को भूखा प्यासा पाया तो वे अत्यंत दुखी हुए। अतिथि सत्कार के वैदिक नियम के अनुसार यमराज ने नचिकेता को तीन वरदान मांगने को कहा। नचिकेता ने प्रथम वरदान में अपने पिता के क्रोध की शांति और स्नेह की याचना की जिसे यमराज ने तत्काल स्वीकार कर लिया। द्वितीय वरदान में नचिकेता ने स्वर्ग प्रदान करने वाली उस दिव्य अग्नि विद्या का ज्ञान मांगा जो मनुष्य को दिव्य लोकों की प्राप्ति कराती है।
तृतीय वरदान में बालक नचिकेता ने वह प्रश्न पूछा जिसने संपूर्ण ब्रह्मांड के रहस्यों को झकझोर दिया। नचिकेता ने पूछा कि मृत्यु के उपरांत जीवात्मा का क्या होता है क्या उसका अस्तित्व समाप्त हो जाता है अथवा वह शाश्वत रहती है। यमराज ने नचिकेता की परीक्षा लेने के लिए उसे संसार के समस्त ऐश्वर्य, अप्सराएं, विशाल राज्य और लंबी आयु देने का प्रलोभन दिया किंतु नचिकेता अपने प्रश्न पर अडिग रहे।
नचिकेता की इस अप्रतिम वैराग्य भावना से संतुष्ट होकर यमराज ने उन्हें आत्मज्ञान का उपदेश दिया। यमराज ने स्पष्ट किया कि संसार में दो मार्ग हैं एक प्रेय का मार्ग है जो केवल इंद्रिय सुख देता है और दूसरा श्रेय का मार्ग है जो आत्मा को मुक्ति और शाश्वत आनंद प्रदान करता है। अज्ञानी मनुष्य प्रेय को चुनता है और बारंबार जन्म मरण के चक्र में फंसता है जबकि धीर पुरुष श्रेय को चुनकर स्वयं को उस ब्रह्म में लीन कर लेता है जो कभी नहीं मरता। यमराज का यह उपदेश प्रमाणित करता है कि वे केवल प्राण हरने वाले देवता नहीं बल्कि ब्रह्मविद्या के परम गुरु हैं।
वैदिक ज्योतिष के सत्ताईस नक्षत्रों के चक्र में द्वितीय नक्षत्र भरणी है जिसके साक्षात अधिष्ठाता देवता भगवान यमराज हैं। कालपुरुष के चक्र में भरणी नक्षत्र मेष राशि में 13 अंश 20 कला से लेकर 26 अंश 40 कला तक फैला रहता है। मेष राशि का स्वामी पराक्रमी ग्रह मंगल है और भरणी नक्षत्र का आधिपत्य भोग, सौंदर्य और सृजन के कारक ग्रह शुक्र के पास है। इस नक्षत्र का प्रतीक चिन्ह योनि है जो जन्म, गर्भाधान और मृत्यु के द्वार का प्रतिनिधित्व करता है।
| ज्योतिषीय तत्व | भरणी नक्षत्र और यमराज का संबंध |
|---|---|
| नक्षत्र चक्र में स्थान | 2 अर्थात दूसरा नक्षत्र |
| राशि चक्र में स्थिति | मेष राशि में 13 अंश 20 कला से 26 अंश 40 कला |
| नक्षत्र अधिपति देवता | धर्मराज यमराज |
| नक्षत्र स्वामी ग्रह | शुक्र जो दैहिक आकर्षण और सांसारिक सुखों का स्वामी है |
| राशि स्वामी ग्रह | मंगल जो साहस, रक्त और ऊर्जा का प्रतीक है |
| मुख्य प्रतीक चिन्ह | योनि जो जीवन के प्राकट्य और विसर्जन का प्रतीक है |
भरणी शब्द का मूल अर्थ भरण पोषण और सहन करना होता है। जिस प्रकार एक माता अपनी कोख में शिशु के भार को नौ महीने तक सहन करती है उसी प्रकार यह नक्षत्र अत्यधिक ऊर्जा और कर्मों के भार को धारण करने की क्षमता प्रदान करता है। जब किसी जातक की जन्म कुंडली में भरणी नक्षत्र सक्रिय होता है तो उसके जीवन में आमूलचूल परिवर्तन और गहरे रूपांतरण घटित होते हैं।
जब तक मनुष्य भरणी नक्षत्र की ऊर्जा को केवल भोग विलास में नष्ट करता है तब तक उसे यमराज के दंड का पात्र बनना पड़ता है। किंतु जब वही ऊर्जा त्याग और तपस्या में बदल जाती है तब जातक महान आध्यात्मिक ऊंचाइयों को स्पर्श करता है।
संसार का सबसे बड़ा आश्चर्य यही है कि मनुष्य प्रतिदिन अपने सामने दूसरों को मरते हुए देखता है फिर भी वह यह सोचता है कि वह स्वयं कभी नहीं मरेगा। भगवान यमराज का स्मरण हमें यह सिखाता है कि जीवन का प्रत्येक क्षण अमूल्य है और समय की गति कभी किसी के लिए नहीं रुकती। जो व्यक्ति मृत्यु को एक निश्चित सत्य मानकर जीता है वह कभी अधर्म के मार्ग पर नहीं चल सकता।
यमराज का स्वरूप वास्तव में क्रूरता का नहीं बल्कि उस असीम करुणा का है जो जीव को उसके पुराने और रोगग्रस्त वस्त्र रूपी शरीर से मुक्त कर नई यात्रा का अवसर प्रदान करती है। धर्मराज का तुला दंड कभी पक्षपात नहीं करता। उनके सम्मुख राजा और रंक, ज्ञानी और अज्ञानी सब समान हैं।
जब हम यम द्वितीया पर भाई बहन के प्रेम का उत्सव मनाते हैं और कार्तिक में दीप प्रज्वलित करते हैं तब हम अंधकार पर प्रकाश की और मृत्यु पर अमरत्व की विजय का जयघोष करते हैं। धर्म के मार्ग पर चलना ही यमराज की सच्ची उपासना है। जो साधक अपने जीवन को सत्य, दया और निष्काम कर्म से सजाता है उसके लिए यमराज भयानक काल रूप में नहीं अपितु परम शांत और तेजोमय धर्मराज के रूप में प्रकट होकर मोक्ष का द्वार खोल देते हैं।
यमराज के माता पिता कौन हैं? यमराज भगवान सूर्य नारायण और विश्वकर्मा की पुत्री देवी संज्ञा के ज्येष्ठ पुत्र हैं तथा यमुना उनकी सहोदरा बहन हैं।
यम दीपदान किस दिन और किस समय किया जाता है? यम दीपदान कार्तिक कृष्ण त्रयोदशी अर्थात धनतेरस की शाम को प्रदोष काल में दक्षिण दिशा की ओर मुख करके किया जाता है।
वैदिक ज्योतिष में यमराज किस नक्षत्र के स्वामी हैं? वैदिक ज्योतिष के 27 नक्षत्रों में से यमराज दूसरे नक्षत्र भरणी के अधिष्ठाता देवता हैं जो मेष राशि में स्थित है।
यमराज का वाहन क्या है और उसका क्या अर्थ है? यमराज का वाहन भैंसा है जो अदम्य शारीरिक बल, अज्ञानता और तमोगुण पर धर्म के पूर्ण नियंत्रण का प्रतीक है।
कठोपनिषद में यमराज ने नचिकेता को क्या ज्ञान दिया था? यमराज ने नचिकेता को आत्मा की अमरता, ब्रह्मविद्या और प्रेय तथा श्रेय के मध्य अंतर का परम आध्यात्मिक उपदेश दिया था।
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