धूम्रवर्ण अवतार और अहंकारासुर रहस्य क्या?

By पं. नीलेश शर्मा

सूर्य का गर्व अहंकारासुर प्राकट्य नीले अश्व की सवारी और राहु शनि के तामसिक अहंकार का संपूर्ण रहस्य

भगवान धूम्रवर्ण अवतार कथा और अहंकारासुर संहार

धूम्रवर्ण पूजन मुहूर्त और शास्त्रीय विधान

सनातन वैदिक परंपरा और गणेश पुराण के पावन दर्शन में आद्यावतार के रूप में पूजित भगवान श्री गणेश का धूम्रवर्ण स्वरूप मानव चेतना के सबसे अंधकारमय विकार अर्थात तामसिक अहंकार मिथ्या दंभ और अवसाद के संहार का सर्वोच्च शिखर है। वैदिक ज्योतिष तथा तत्व विज्ञान के अंतर्गत सौरमंडल के सर्वाधिक रहस्यमयी छाया ग्रह राहु के मायावी भ्रम व मतिभ्रम तथा कर्म फल प्रदाता शनि देव के गहन संताप व अवसाद को शांत करने के लिए भगवान धूम्रवर्ण की आराधना को सर्वश्रेष्ठ माना गया है। जब जातक की जन्म कुंडली में प्रथम भाव अष्टम भाव दशम भाव अथवा द्वादश भाव में राहु और शनि की युति से शापित योग अथवा प्रेत बाधा दोष निर्मित होकर व्यक्ति को अंधी हठधर्मिता समाज से अलगाव अथवा आत्मघाती अवसाद की ओर धकेल रहा हो तब नीले अश्व पर आरूढ़ भगवान धूम्रवर्ण की शरण में जाने से अमोघ आत्मबल और परम शांति की प्राप्ति होती है। भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी गणेश चतुर्थी पौष मास की संकष्टी चतुर्थी अथवा प्रत्येक मास के शुक्ल पक्ष के शनिवार और बुधवार के पावन अनुष्ठान का संपूर्ण शास्त्रीय विवरण नीचे दी गई तालिका में स्पष्ट रूप से प्रस्तुत किया गया है।

शास्त्रीय आयामअनुष्ठान विवरण और ज्योतिषीय मान्यता
प्रमुख पावन तिथिभाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी अथवा प्रत्येक शनिवार व बुधवार
दैनिक पूजन समयप्रातः कालीन सूर्योदय वेला अथवा सायंकालीन गोधूलि प्रदोष काल
अधिष्ठाता स्वरूपधुएं के समान वर्ण वाले नीले अश्व पर विराजमान शुंडादंड से अग्नि उगलते धूम्रवर्ण
ज्योतिषीय ग्रह व भाव संबंधप्रथम भाव अष्टम भाव दशम भाव द्वादश भाव छाया ग्रह राहु और कर्म कारक शनि देव
मुख्य पूजन सामग्री21 दूर्वा दल अपराजिता के नीले पुष्प शमी पत्र शुद्ध रक्त चंदन और काले तिल के मोदक
प्रधान वैदिक अनुष्ठानधूम्रवर्ण स्तोत्र पाठ गणेश अथर्वशीर्ष और ॐ धूम्रवर्णाय नमः जप
अपेक्षित फलतामसिक अहंकार का नाश राहु शनि शांति अवसाद से मुक्ति और आत्मिक शुद्धि

सूर्य का गर्व और अहंकारासुर का प्राकट्य

गणेश पुराण के क्रीड़ा खंड में वर्णित अत्यंत पावन और शिक्षाप्रद इतिहास के अनुसार प्राचीन काल में संपूर्ण ब्रह्मांड को अपनी स्वर्णिम किरणों से आलोकित करने वाले भगवान सूर्य देव अपनी प्रखर प्रभा से युक्त होकर मेरु पर्वत की परिक्रमा कर रहे थे। तीनों लोकों को जीवन प्रकाश और ऊर्जा प्रदान करते हुए सूर्य देव के अंतःकरण में अचानक एक अत्यंत सूक्ष्म विचार उत्पन्न हुआ। सूर्य देव ने विचार किया कि इस चराचर जगत में मेरे समान कोई दूसरा तेजस्वी नहीं है और यदि मैं एक क्षण के लिए भी विश्राम ले लूं तो संपूर्ण सृष्टि अंधकार में डूबकर नष्ट हो जाएगी।

परमात्मा के उस तेज स्वरूप देवता के अंतःकरण में आए उस क्षणिक गर्व और आत्म प्रशंसा की तरंगों से अंतरिक्ष में एकाएक एक अत्यंत विशाल धुएं के समान काले वर्ण का दैत्य प्रकट हुआ। चूंकि वह दैत्य सूर्य देव के प्रकाश जनित अहंकार से उत्पन्न हुआ था अतः उसका नाम अहंकारासुर रखा गया। सनातन तत्व दर्शन में अहंकार का अर्थ होता है यह झूठा भाव कि मैं ही सब कुछ करने वाला हूं और मेरे बिना संसार का संचालन असंभव है। यह विकार मनुष्य के विवेक को हरकर उसे आत्ममुग्धता के दलदल में धकेल देता है।

अहंकारासुर जन्म लेते ही दैत्यों के कुलगुरु शुक्राचार्य के आश्रम पहुंचा। दैत्यगुरु शुक्राचार्य ने उसके भीतर धधक रही आसुरी ऊर्जा को देखकर उसे देवाधिदेव भगवान शिव की घोर तपस्या करने का निर्देश दिया। अहंकारासुर ने घने वनों में जाकर सहस्रों वर्षों तक सूर्य की प्रखर किरणों के सम्मुख खड़े होकर पंचाग्नि तप किया।

उसकी कठोर साधना से संतुष्ट होकर जब भगवान शिव प्रकट हुए तब अहंकारासुर ने वरदान मांगा कि वह तीनों लोकों में किसी भी देवता दानव गंधर्व यक्ष अथवा भौतिक अस्त्र शस्त्र से कभी पराजित न हो सके। भगवान शिव से अजेयता का वरदान प्राप्त करते ही अहंकारासुर का घमंड संपूर्ण सीमाओं को लांघ गया।

  • अहंकारासुर ने एक विशाल आसुरी सेना का गठन किया और उसने अमरावती पर आक्रमण कर दिया।
  • उसने अपने प्रभाव से देवराज इंद्र वरुण यम और कुबेर जैसे समस्त लोकपालों की सत्ता छीन ली।
  • देवताओं को स्वर्ग से निष्कासित कर दिया गया और वे अपनी पहचान छिपाकर वनों में भटकने लगे।
  • अहंकारासुर ने तीनों लोकों पर अधिकार कर लिया और संपूर्ण पृथ्वी पर अहंकार की महामारी फैला दी।
  • संसार के मनुष्य अपने वास्तविक स्वरूप को भूलकर झूठी पद प्रतिष्ठा धन और शक्ति के घमंड में अंधे होकर दूसरों को प्रताड़ित करने लगे।

ऋषियों का संताप और धूम्रवर्ण का प्राकट्य

जब अहंकारासुर के संहारक प्रकोप से संपूर्ण चराचर जगत में त्राहिमाम मच गया और पृथ्वी पर धर्म सत्य तथा वेदों का पठन पाठन पूरी तरह बंद हो गया तब समस्त पीड़ित देवता और ऋषि मुनि देवगुरु बृहस्पति की शरण में पहुंचे। देवगुरु बृहस्पति ने ध्यान लगाकर देखा कि अहंकारासुर वास्तव में मनुष्य के अंतःकरण का वह सूक्ष्म घमंड है जिसे किसी सामान्य बाहुबल अथवा शस्त्र से नहीं काटा जा सकता क्योंकि अहंकार पर प्रहार करने से वह और अधिक हिंसक हो जाता है।

देवगुरु बृहस्पति ने देवताओं को उपदेश दिया कि अहंकार को केवल वही सत्ता भस्म कर सकती है जो स्वयं माया के समस्त आवरणों को धुएं की भांति उड़ा देने में समर्थ हो। देवगुरु ने देवताओं को आदिदेव भगवान श्री गणेश के उस परम गोपनीय विग्रह की आराधना करने का आदेश दिया जो धूम्रवर्ण नाम से प्रसिद्ध हैं।

समस्त देवताओं ने एक पावन एकांत वन में जाकर भगवान गणेश के पावन बीज मंत्र का सस्वर अनुष्ठान आरंभ किया। देवताओं की उस निष्कपट पुकार से संतुष्ट होकर भगवान गणेश अपने आठवें प्रमुख अवतार के रूप में धूम्रवर्ण स्वरूप में प्रकट हुए।

भगवान धूम्रवर्ण का स्वरूप अत्यंत अलौकिक रहस्यमयी और विस्मयकारी था। उनका शारीरिक वर्ण प्रलयकालीन धुएं के समान धूसर और श्याम था जो यह दर्शाता था कि वे माया के समस्त आवरणों को अपने भीतर समेटे हुए हैं। उनके चार हाथ थे जिनमें उन्होंने पाश अंकुश वरद मुद्रा और तीक्ष्ण परशु धारण कर रखा था।

सबसे विस्मयकारी बात यह थी कि भगवान मूषक गज अथवा सिंह पर नहीं अपितु एक अत्यंत तीव्रगामी और शक्तिशाली नीले अश्व पर सवार होकर प्रकट हुए थे। उनके प्राकट्य के साथ ही अंतरिक्ष में बादलों की गड़गड़ाहट होने लगी और उनकी सूंड से निकलती हुई दिव्य अग्नि ने अहंकारासुर के साम्राज्य की नींव हिला दी।

क्या है नीले अश्व और शुंडादंड का आध्यात्मिक मर्म?

शाक्त और गाणपत्य तत्व दर्शन में भगवान धूम्रवर्ण द्वारा नीले घोड़े की सवारी करना और धुएं जैसा रंग धारण करना अद्वैत वेदांत का परम गुह्य संदेश प्रदान करता है। धूम्र अर्थात धुआं अविद्या और माया का साक्षात प्रतीक है। जब तक मनुष्य अज्ञान में रहता है संसार उसे सत्य प्रतीत होता है किंतु जैसे ही ज्ञान की वायु चलती है संसार धुएं की भांति उड़ जाता है।

भगवान धूम्रवर्ण का धूसर रंग यह सिखाता है कि परमात्मा समस्त बाह्य रूपों और रंगों से परे निर्गुण और निराकार हैं।

  • भगवान का वाहन नीला अश्व है जो सनातन दर्शन में वायु तत्व तीव्र गति और मानव मन की समस्त इंद्रियों का प्रतीक है।
  • अश्व का नीला रंग आकाश तत्व की विशालता और अनंत चेतना को दर्शाता है।
  • भगवान धूम्रवर्ण द्वारा नीले अश्व पर आरूढ़ होना यह सिद्ध करता है कि वे मनुष्य के तीव्रगामी मन और उसकी समस्त चंचल इंद्रियों को अपने नियंत्रण में रखते हैं।
  • भगवान के शुंडादंड अर्थात सूंड से निकलने वाला धुआं और अग्नि ब्रह्म ज्ञान की वह पावन ज्वाला है जो साधक के अंतःकरण में बैठे हुए अज्ञान रूपी अहंकार को जलाकर भस्म कर देती है।
  • उनके हाथ में स्थित पाश मोह और घमंड को बांधने वाला अस्त्र है तथा अंकुश इंद्रियों को मर्यादा में रखने वाला अनुशासन है।

अहंकारासुर का मान मर्दन और शरणागति

जब अहंकारासुर को गुप्तचरों से सूचना मिली कि देवता धूम्रवर्ण नामक महाशक्ति की शरण में गए हैं तब उसने क्रोध से प्रज्वलित होकर अपनी सेना को युद्ध की आज्ञा दी। अहंकारासुर ने अपने दो अत्यंत बलशाली सेनापतियों दंभ और गर्व को एक अक्षौहिणी सेना के साथ आगे भेजा।

भगवान धूम्रवर्ण ने अपने परशु के एक ही प्रहार से दंभ और गर्व की सेनाओं को तितर बितर कर दिया और उन्हें क्षणभर में यमलोक पहुंचा दिया। यह देखकर अहंकारासुर स्वयं अपने विशाल रथ पर सवार होकर युद्ध भूमि में पहुंचा और उसने भगवान धूम्रवर्ण पर प्रलयंकारी अग्नि बाणों की वर्षा आरंभ कर दी।

भगवान धूम्रवर्ण मंद मुस्कान के साथ नीले अश्व पर अडिग विराजमान रहे। भगवान ने अपने विशाल शुंडादंड से एक अत्यंत भीषण ब्रह्मांडीय हुंकार भरी और अपनी सूंड से प्रलयंकारी धुआं और कालाग्नि उगलना आरंभ किया।

भगवान की सूंड से निकले उस दिव्य धुएं ने एक ही क्षण में अहंकारासुर की संपूर्ण सेना उसके रथों घोड़ों और अस्त्र शस्त्रों को ढक लिया। उस धुएं के प्रभाव से असुर सेना के नेत्रों की दृष्टि चली गई और वे दम घुटने से तड़प तड़प कर भूमि पर गिरने लगे। भगवान द्वारा उगली गई पावन अग्नि ने अहंकारासुर के संपूर्ण सैन्य बल को क्षणभर में राख के ढेर में बदल दिया।

  • अपनी विशाल सेना को भस्म होते देखकर अहंकारासुर का सारा नशा एक ही पल में उतर गया।
  • उसने देखा कि भगवान धूम्रवर्ण के सम्मुख उसकी समस्त शक्तियां तिनके के समान भी नहीं हैं।
  • दैत्य का अज्ञान नष्ट हो गया और उसने अपने धनुष बाण पृथ्वी पर फेंक दिए।
  • वह थर थर कांपते हुए भगवान धूम्रवर्ण के पावन चरणों में साष्टांग गिर पड़ा और अश्रु बहाते हुए क्षमा मांगने लगा।
  • दया के सागर भगवान धूम्रवर्ण ने उस पर अपना वरद हस्त रखा और उसे अभय दान दिया तथा उसे पाताल लोक में जाकर धर्मपूर्वक जीवन व्यतीत करने का आदेश दिया।

राहु और शनि के तामसिक अहंकार का ज्योतिषीय मर्म

वैदिक ज्योतिष के महान आधार ग्रंथ बृहत् पराशर होरा शास्त्र में ग्रहों के आत्मिक और तामसिक प्रभावों का अत्यंत विस्तृत विवेचन मिलता है। ज्योतिषीय दृष्टिकोण से भगवान धूम्रवर्ण का पावन स्वरूप सीधे तौर पर छाया ग्रह राहु और कर्म कारक शनि देव के तामसिक दोषों को नष्ट करने वाली सर्वोच्च पराशक्ति है।

राहु ग्रह को ज्योतिष में धुआं मतिभ्रम अंधी महत्वाकांक्षा और मिथ्या अहंकार का अधिपति माना गया है। राहु व्यक्ति को यह भ्रम कराता है कि वह संसार का सबसे महत्वपूर्ण व्यक्ति है। वहीं दूसरी ओर शनि ग्रह दुख अकेलेपन निराशा और कर्म जनित दंड के स्वामी हैं।

जब किसी जातक की जन्म कुंडली में राहु और शनि की युति होती है जिसे ज्योतिष में शापित योग कहा जाता है तो व्यक्ति के जीवन में एक अत्यंत विनाशकारी स्थिति उत्पन्न होती है।

  • ऐसा व्यक्ति पहले तो राहु के प्रभाव में आकर अत्यंत घमंडी और दूसरों को तुच्छ समझने वाला बन जाता है।
  • जब उसका यह झूठा अहंकार टूटता है तो शनि का क्रूर प्रभाव उसे भयंकर मानसिक अवसाद निराशा और एकाकीपन के अंधकार में धकेल देता है।
  • जन्म कुंडली का प्रथम भाव मस्तक और स्वभाव का स्थान होता है जहां राहु शनि व्यक्ति की सोच को कुंठित कर देते हैं।
  • जन्म कुंडली का अष्टम भाव गुप्त संताप और मानसिक पीड़ा का केंद्र माना जाता है।
  • जन्म कुंडली का दशम भाव सामाजिक प्रतिष्ठा का स्थान है जहां का दूषित प्रभाव व्यक्ति को पद से गिराकर अपमानित कराता है।
  • भगवान धूम्रवर्ण राहु के धुएं रूपी भ्रम को काटकर और शनि के दंडात्मक ताप को शांत करके साधक को सच्चा आत्मज्ञान प्रदान करते हैं।

क्या धूम्रवर्ण साधना से अवसाद और अहंकार मिटते हैं?

आधुनिक युग में मानव समाज की सबसे बड़ी विडंबना यह है कि व्यक्ति भौतिक सफलताओं के नशे में चूर होकर अपनों को भूल जाता है और जब जीवन में कोई असफलता आती है तो वह सीधे डिप्रेशन अर्थात अवसाद का शिकार हो जाता है। झूठा दिखावा और अहंकार मनुष्य की मानसिक शांति को पूरी तरह नष्ट कर देता है।

भगवान धूम्रवर्ण साक्षात वह आध्यात्मिक संजीवनी हैं जो चेतना के इस रोग को जड़ से मिटा देते हैं। जिस प्रकार भगवान ने अपनी सूंड की दिव्य अग्नि से अहंकारासुर के दंभ को जलाकर उसे निर्मल भक्त बना दिया था उसी प्रकार जो साधक नित्य धूम्रवर्ण स्तोत्र का पाठ करता है उसके अंतःकरण से समस्त हीन भावना और अहंकार समाप्त हो जाता है।

यह साधना उन लोगों के लिए साक्षात वरदान है जो लंबे समय से अज्ञात भय अवसाद अनिद्रा अथवा राहु शनि की साढ़ेसाती व ढैया के कष्टों से जूझ रहे हैं। धूम्रवर्ण की कृपा से मन स्थिर होता है और व्यक्ति वास्तविक आत्मसम्मान के साथ जीवन जीने में समर्थ होता है।

राहु शनि दोष शांति और मानसिक विजय के अचूक उपाय

यदि किसी जातक की जन्म कुंडली में राहु और शनि पीड़ित हों मन में निरंतर नकारात्मक विचार आते हों अवसाद बना रहता हो अथवा बनते काम अचानक बिगड़ जाते हों तो शास्त्रों में भगवान धूम्रवर्ण की प्रसन्नता हेतु अत्यंत प्रामाणिक वैदिक उपाय बताए गए हैं।

  • प्रत्येक शनिवार अथवा बुधवार के दिन प्रातः काल स्नान के उपरांत पूर्व दिशा की ओर मुख करके बैठें और भगवान धूम्रवर्ण के चित्र अथवा विग्रह के सम्मुख शुद्ध गाय के घी का दीपक प्रज्वलित करें।
  • भगवान धूम्रवर्ण को 21 दूर्वा दल गंगाजल से धोकर अर्पित करें और अपराजिता के नीले पुष्प चढ़ाएं तथा पावन बीज मंत्र ॐ धूम्रवर्णाय नमः अथवा ॐ गं गणपतये नमः का कम से कम 108 बार शांत मन से जाप करें।
  • प्रतिदिन प्रातः काल स्नान के उपरांत महर्षि व्यास विरचित धूम्रवर्ण स्तोत्र अथवा पावन गणेश अथर्वशीर्ष का शुद्ध उच्चारण के साथ पाठ करें जो चित्त की समस्त नकारात्मक तरंगों को नष्ट करता है।
  • प्रत्येक शनिवार को भगवान गणेश को काले तिल और गुड़ से बने मोदक अथवा तिल के लड्डुओं का भोग लगाएं और उस प्रसाद को परिवार के सदस्यों में वितरित करें।
  • जातक को अपनी शारीरिक अवस्था और योग्य ज्योतिर्विद के परामर्श के अनुसार आठ मुखी अथवा चौदह मुखी नेपाली रुद्राक्ष नीले रेशमी धागे में पिरोकर शनिवार के दिन धारण करना चाहिए जो राहु और शनि के क्रूर प्रभावों को शांत करता है।
  • प्रत्येक शनिवार को किसी निर्धन सफाई कर्मचारी अथवा दिव्यांग व्यक्ति को काले तिल सरसों का तेल अथवा कंबल का आदरपूर्वक दान करें तथा कौवों और कुत्तों को तेल लगी ताजी रोटी खिलाएं।

धूम्रवर्ण साधना और आत्म शुद्धि के शास्त्रीय नियम

क्या अवश्य करेंकिन गलतियों से सर्वथा दूर रहें
प्रतिदिन प्रातः काल उठकर अपने चित्त को विनम्र और अहंकार मुक्त रखने का संकल्प लेंअपने पद धन रूप अथवा ज्ञान का कभी भी किसी असहाय पर घमंड न करें
भगवान धूम्रवर्ण को सदैव ताजी हरी दूर्वा नीले पुष्प और तिल के मोदक अर्पित करेंसमाज अथवा परिवार में किसी भी व्यक्ति का अकारण उपहास अथवा अपमान न करें
बुधवार और शनिवार के दिन पूर्ण स्वच्छता ब्रह्मचर्य और सात्विक आहार लेंतामसिक भोजन मदिरा मांस और किसी भी प्रकार के नशीले पदार्थों से सर्वथा दूर रहें
अपने जीवन में सत्य सेवा और परोपकार को सर्वोच्च प्राथमिकता देंअवसाद अथवा निराशा आने पर ईश्वर की सत्ता पर संशय करने से बचें
पूजा में शुद्ध रक्त चंदन पीतल अथवा तांबे के बर्तन और गाय के घी का प्रयोग करेंबिना स्नान किए अथवा अशुद्ध अवस्था में पूजा के स्थान पर जाने से बचें

निरहंकार चेतना और परम शांति का शाश्वत संदेश

भगवान धूम्रवर्ण का पावन अवतार संपूर्ण मानव जाति को यह सनातन शिक्षा प्रदान करता है कि इस संसार में सबसे बड़ा शत्रु कोई बाहरी व्यक्ति नहीं अपितु हमारे अपने भीतर बैठा हुआ अहंकारासुर है। मनुष्य का घमंड चाहे कितना भी विशाल क्यों न हो परमात्मा की एक सांस के सम्मुख वह धुएं की भांति बिखर जाता है। नीले अश्व पर सवार भगवान धूम्रवर्ण का स्वरूप यह सिखाता है कि जब मनुष्य अपनी चंचल इंद्रियों और मन को ईश्वर के चरणों में समर्पित कर देता है तब उसके जीवन से समस्त अवसाद और अंधकार सदा के लिए समाप्त हो जाते हैं। राहु का भ्रम और शनि का संताप उसी साधक के जीवन से दूर होता है जो अपने हृदय को निर्मल बनाकर निष्काम भाव से जीवन व्यतीत करता है। भगवान धूम्रवर्ण का नित्य स्मरण मनुष्य के जीवन से समस्त तामसिक अहंकार अवसाद और ग्रह दोषों को समाप्त करके उसे एक तेजस्वी विनम्र और सम्मानित व्यक्तित्व बनाकर अंततः परम मोक्ष की प्राप्ति कराता है।

FAQ

भगवान गणेश ने धूम्रवर्ण अवतार किस मुख्य असुर के संहार हेतु लिया था? भगवान गणेश ने सूर्य देव के मन में उपजे प्रकाश के घमंड से उत्पन्न दैत्य अहंकारासुर का मान मर्दन करने और उसका दमन करने हेतु धूम्रवर्ण अवतार धारण किया था।

धूम्रवर्ण अवतार में भगवान गणेश की सवारी क्या है? धूम्रवर्ण अवतार में भगवान गणेश मूषक के स्थान पर एक अत्यंत तीव्रगामी और शक्तिशाली नीले रंग के अश्व पर सवार होकर प्रकट हुए थे।

भगवान धूम्रवर्ण ने अहंकारासुर की सेना को किस प्रकार भस्म किया था? भगवान धूम्रवर्ण ने अपने विशाल शुंडादंड अर्थात सूंड से प्रलयंकारी धुआं और कालाग्नि उगलकर अहंकारासुर की विशाल सेना को क्षणभर में राख कर दिया था।

ज्योतिष में भगवान धूम्रवर्ण का संबंध किन प्रमुख ग्रहों से माना जाता है? वैदिक ज्योतिष में भगवान धूम्रवर्ण का सीधा संबंध छाया ग्रह राहु के मायावी भ्रम और कर्म कारक शनि देव के तामसिक अहंकार व अवसाद को शांत करने से है।

अवसाद और तामसिक अहंकार से मुक्ति पाने हेतु किस मंत्र का जाप सर्वोत्तम है? मानसिक शांति पाने और अवसाद को दूर करने हेतु प्रतिदिन प्रातः काल ॐ धूम्रवर्णाय नमः अथवा गणेश अथर्वशीर्ष का 108 बार शांत मन से जाप करना सर्वश्रेष्ठ माना गया है।

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लेखक

पं. नीलेश शर्मा

पं. नीलेश शर्मा (63)


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